सिद्दिक अहमद ‘मेव’ की कविताएं

धर्म

धर्म नाम पर कदी लड़ा ना,
ना कदी कीनी हमने राड़,
धर्म नाम पे लड़े जो पापी,
वापे हाँ सौ-सौ धिक्कार ।

धर्म सिखावे प्यार-मुहब्बत,
धर्म सिखावे रब से प्यार,
धर्म नाम पे करै दुश्मनी,
वापे हाँ सौ-सौ धिक्कार।

धर्म नाम पे करां दुश्मनी,
लूट-मार अर ब्लात्कार,
धर्म नाम पे कत्ल करे जो,
वापे हाँ सै-सौ धिक्कार ।

धर्म सिखावे सबकी भलाई,
सबका सुख,सबका उपकार,
धर्म नाम पे भेद करे जो,
वापे हाँ सौ-सौ धिक्कार ।

धर्म से सीखो मानव सेवा,
धर्म से सीखो पर उपकार,
धर्म नाम पे अधर्म करे जो,
वापे हाँ सौ-सौ धिक्कार ।

ऐसा क्यों है?

अवसर तो हैं
मगर मिल नहीं रहे हैं
श्रम शक्ति तो है
मगर दुरुपयोग हो रहा है
धन तो बहुत है
मगर जमा हो रहा है
बौद्धिक संपदा तो है
मगर अनदेखा हो रहा है
तो फिर सोचो
अंधेरा क्यों हो रहा है
रहबर क्यों सो रहा है
गरीब क्यों रो रहा है
और
कमेरा बरहाल
मजदूर बेहाल
अन्नदाता कंगाल और
नेता खुशहाल।
ऐसा क्यों हो रहा है ?

नेता

बोले बड़ो मलूक,हंसे है हल्के-हल्के।
अन्दर गहे कटार,शराफत मूँह पे झलके।।
करे छत्तीसू भोग,मजा जीवन का लूटे।
धन की रैलमपैल, मिलें उपहार अनूठे।।
ना कदी देखो कमातो,ना देखे है घाम।।
फिर भी याकी जेब में, कदी न टूटां दाम।।
***
हाथ जोड़ के यू कहे,अबके चुण देवो मोय।
सदा तिहारे साथ रहूँ, कदी न भूलूँ टेव।।
कदी न भूलूँ टेव, गुलामी करूँ तिहारी ।
ऐसों भरले भेष, गुसा में जनता हारी।।
कहे ‘मेव’ नू सोच, इननकी यू ही नीति।
चुणके जब बण जाए,करे फिर खुब अनीति।।
***
-सिद्दीक अहमद मेव

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