Illustration: Ratna Sagar Shrestha/THT

सूचना कानून इतिहास और बदलाव – राजविंदर सिंह चंदी

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(a) के अनुसार हर भारतीय नागरिक को बोलने व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। हमने संसदीय लोकतंत्र अपनाया है। जनतंत्र में राज्य की सारी शक्तियाँ जनता में निहित होती हैं। जनता द्वारा अपने कार्यों जिनमें नीतियां, कानून-व्यवस्था,परियोजनाओं, निर्णय, प्राशसनिक गतिविधियों का क्रियान्वयन आदि शामिल है, के लिए सरकार चुनी जाती है।

राजविंद्र चंदी

संविधान सभा के सदस्यों का मकसद था कि स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्य/सरोकार साकार रूप ले सकें, इसलिए वो जनता को संविधान में ज्यादा से ज्यादा अधिकार दिए जाने के पक्ष में थे। उनका मानना था कि इससे लोकतंत्र मजबूत होगा i

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(a)  के अनुसार हर भारतीय नागरिक को बोलने व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। हमने संसदीय लोकतंत्र अपनाया है। जनतंत्र में राज्य की सारी शक्तियाँ जनता में निहित होती हैं। जनता द्वारा अपने कार्यों जिनमें नीतियां, कानून-व्यवस्था,परियोजनाओं, निर्णय, प्राशसनिक गतिविधियों का क्रियान्वयन आदि शामिल है, के लिए सरकार चुनी जाती है।

यह भी कटु सत्य है कि एक बार सरकार चुने जाने के बाद उस पर जनता का कोई नियंत्रण नहीं रहता, इसे भारतीय जनतंत्र की खामी या अधुरापन भी कह सकते हैं।वैसे तो संविधान के अनुसार सरकार संसद के प्रति जवाबदेह है और संसद जनता के प्रति यधपि यह भी सत्य है कि बिना पारदर्शिता के जवाबदेही के कोई मायने नहीं हैं। जवाबदेही की मुखर अभिव्यक्ति पारदर्शिता है।

दूसरा वही लोकतंत्र कामयाब कहा जा सकता है, जिसमें जनता की भागीदारी ज्यादा से ज्यादा हो अन्यथा तय समय सीमा तक सरकार जनता से वोट लेकर जनहित नहीं, राज करती है। सरकार का उद्देश्य जनहित में नीतियाँ न बनाकर चंद लोगों के सुख व स्वार्थों की पूर्ति करना मात्र रह जाता है। जिस कारण भ्र्ष्टाचार, भाई-भतीजावाद,सार्वजनिक संसाधनों की लूट, तानाशाही आदि बीमारियां पनपती हैं।

तीसरा गोपनीयता तानाशाही की तरफ ले जाती है। अंग्रेज सरकार ने 1889 में सरकारी गोपनीयता कानून सूचना की ताकत को अवरुद्ध करने के लिए बनाया था ताकि सरकार द्वारा किए जाने वाले कार्य कारनामों यानि के जनता विरोधी नीतियों, कार्यों को जनता से छुपाया जा सके। गोपनीयता और भ्र्ष्टाचार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। गोपनीयता से जुड़ी एक रोचक बहस 1957 में मूंदड़ा घोटाला कांड को लेकर संसद में हुई। सरकार के इशारे पर LIC ने हरिदास मूंदड़ा की कंपनियों से 1.25 करोड़ रूपये  के शेयर खरीदे। तत्कालीन सांसद फिरोज गाँधी ने मामले को संसद में उठाया और पत्रिका में छपे तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री टी.टी कृष्णमचारी व् वित् सचिव के बीच हुए पत्र-व्यवहार को सबूत के तौर पर पेश किया।

पूंजीपति समर्थक सांसदों ने फिरोज गाँधी पर गोपनीय दस्तावेजों को हासिल करने के जुर्म के आरोप लगाए। तत्कालीन स्पीकर ने लम्बे विचार-विमर्श के बाद फैसला दिया कि अगर लोकसभा सदस्य किसी दस्तावेज की प्रमाणिकता की जिम्मेदारी लेने को तैयार हैं तो उन्हें सदन के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है, बेशक चोरी से ही हासिल किये हों। स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही हमारे देश के भ्र्ष्ट नेताओं, नौकरशाहों  और पूंजीपतियों का नापाक गठजोड़ बन गया था,जो मूंदड़ा घोटाला कांड ने साबित किया। यह गठजोड़ भारतीय लोकतंत्र की बहुत बड़ी दुखती रग है।मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश एम सी छांगला ने जांच में मुदड़ा कांड के आरोप जांच में सही पाए और वित् मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा था। सरकारी गोपनीयता कानून को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद खत्म करने की बजाय सरकार द्वारा बरकरार रखा गया।

इसके इलावा भ्रष्टाचार के अनेकों मामले इस मामले से पहले भी और बाद में भी उजागर हुए है। जो भारतीय लोकतंत्र के माथे पर कलंक हैं। सरपंच से लेकर प्रधानमंत्री ग्राम सचिव से लेकर मुख्य सचिव तक पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं और इनका भी भ्रष्टाचार में संलिप्त हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अब तक अनेकों घपले-घोटाले स्वतंत्र भारत में हो चुके हैं।

1996 में सुप्रीम कोर्ट ने राजनेता राजनारयण मामले में महसूस किया कि लोग जाने बगैर बोलने व स्वयं की अभिव्यक्ति कैसे करें। लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है क्योंकि देश को चलाने के लिए वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर कर देती है। लोकतंत्र में सरकार जनता के लिए होती है जनता ही हितधारक (stakeholder) होती है। लंबे समय से सूचना दिए जाने की मांग भारत में होती रही। 

 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी, जो वामपंथी दलों के बाहर से दिय जा रहे समर्थन से चल रही थी। इस कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को समर्थन के लिए न्यूतम साँझा कार्यक्रम व्यापक दबाव में बनाना पड़ा। इस सरकार ने दवाब में अनेकों जनपक्षीय कार्य किए। जिसका प्रतिफल अनको जनपक्षीय अधिनियमों का पारित होना था।

1996 में सुप्रीम कोर्ट ने राजनेता राजनारयण मामले में महसूस किया कि लोग जाने बगैर बोलने व स्वयं की अभिव्यक्ति कैसे करें। लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है। वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर कर देती है। लोकतंत्र में सरकार जनता के लिए होती है जनता ही हितधारक (stakeholder) होती है। लंबे समय से सूचना दिए जाने की मांग भारत में होती रही। 

 इस अधिनियम के पास होने पर बोलने व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को ताकत मिली। अनेकों विद्वानों ने इस अधिनियम की सराहना की।  सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय ने कहा सूचना के अधिकार को सिर्फ भ्रष्टाचार के भंडाफोड़ तक सीमित कर देने की बजाय समूचे लोकतंत्र का कायाकल्प करने और एक वैकल्पिक राजनीति से जोड़कर देखना होगा। यह अधिकार भारतीय लोकतंत्र के मौजूदा संकट को हल करने और नीतियों के निर्माण और क्रियान्वयन में जन भागीदारी सुनिश्चित करने का एक हथियार हो सकता है।

अंतत: लंबे समय बाद सूचना देने की भारतीय जनता की मांग पूरी हुई। यूपीए सरकार ने 11 मई 2005 को सूचना अधिकार अधिनियम पारित किया, जिसे पूरे 121 दिन बाद, 12 अक्टूबर 2005 को संपूर्ण भारत में कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने लोक प्रहरी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया 2018 (2) आरसीआर (सिविल) केस में सूचना की महत्ता पर कहा कि नागरिक अंततः लोकतंत्र में प्रभुसत्ता संपन्न के भंडार हैं, जिनकी राज्य के हर नाजुक निष्पादन लेखा परीक्षा, उसके माध्यमों और अवलंबी अधिकारिक सूचना की पहुंच आवश्यक है। सूचना ही एक ऐसा माध्यम है जो नागरिक को सरकारी दफ्तर रखने वाले या सरकारी दफ्तर की आकांक्षा रखने वालों के तार्किक चयन करने के सशक्त बनाती है।

अंजलि भारद्वाज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया 2019 (3) आरसीआर (सिविल) केस में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सूचना अधिकार अधिनियम का अर्थ लोगों को केवल सेवा देना नहीं है बल्कि उनके बोलने की आजादी को सुनिश्चित करना है। सुशासन जो की जीवंत लोकतंत्र के लिए आवश्यक घटक है, अगर इस अधिनियम को सही तरीके से लागू किया जाता है तो लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।  सुशासन लेना सविधान की दृष्टि है, इसका देश के विकास के साथ महत्वपूर्ण संबंध है।

सूचना अधिकार अधिनियम एक ऐसा यंत्र है, जो भारत के नागरिकों को सशक्त करता है उन्हें शक्ति देता है। यह स्वतंत्र भारत का एक बहुत थोड़े समय में बहुत ही ज्यादा कामयाब होने वाला कानून साबित हुआ है, जिसने नागरिकों को सरकारी तंत्र से सवाल पूछने का बल दिया। इस ऐतिहासिक अधिनियम का उद्देश्य जवाबदेही के सिद्धांत को मजबूत करते हुए सरकारी तंत्र के कार्यों में पारदर्शिता लाकर नागरिक केंद्रीय पंहुच बनाना है। यह चैकस एंड बैलेंस के सिद्धांत को मजबूत करता है। इससे देश के शासन में पारदर्शिता, ईमानदारी, जवाबदेही बढ़ेगी, जो भ्रष्टाचार की कुशलता से ग्रस्त है। यह अधिनियम देश के संविधान में बोलने की आजादी के मौलिक अधिकार को मजबूत करने की सोच के साथ पारित किया गया।  सूचना अधिनियम 2005 को बारीकी से समझने की आवश्यकता है ताकि सूचना आवेदन से सही व उसके मूल उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयोग किया जा सके।

 वैसे तो सुचना अधिनियम की धारा 4 सभी विभागों से उपेक्षा करती है कि वह विभाग से संबंधित सभी जानकारियां इंटरनेट और अन्य माध्यमों से इस तरह प्रकाशित करेंगे कि नागरिकों के द्वारा देखा व पढ़ा  जा सके। अगर इस धारा का प्रयोग सही से किया जाए तो बहुत सी सूचनाएं बिना आपत्ति से नागरिकों को उपलब्ध हो जाए।

सूचना क्या हो सकती है?
सूचना कई रूप में ली जा सकती है। वह सरकारी व शासकीय कार्यवाही, बैठकों के ब्यौरे, शासकीय निर्णय, आदेश, अधिसूचनाओं, शासकीय रजिस्टर में एंट्री की कापियां, खातों की कॉपियां, विभागो की प्रक्रियाएं, नियम, किसी निर्माण कार्य का चित्रांकन/मानचित्र, इलेक्ट्रॉनिक रूप में धारित कोई पांडुलिपि, कोई दस्तावेज, किसी दस्तावेज की माइक्रो फिल्म, ज्ञापन, ईमेल, प्रेस विज्ञप्ति, आदेश, लागबुक, संविदा रिपोर्ट, कागज पत्र, नमूने, आंकड़े आदि सभी सूचनाएं हैं।

इस अधिनियम के अनुसार सभी विभागों में केंद्र और राज्य स्तर पर जनसूचना अधिकारी व सहायक सूचना अधिकारी बनाये जाएँगे। हर विभाग में एक बोर्ड लगाया जाना आवश्यक है, जिस पर जनसूचना अधिकारी व सहायक सूचना अधिकारी व् अपीलीय अधिकारी का पद पते सहित लिखा होना चाहिए ताकि जनता सुचना प्राप्त करे के अधिकार का बेखूबी  इस्तेमाल कर सके।

सूचना के दायरे में कौन-कौन आता है। 

1. सविधान द्वारा स्थापित या गठित 
2.  संसद या किसी राज्य विधायिका के कानून द्वारा स्थापित या गठित
3.  केंद्र या राज्य सरकार की किसी अधिसूचना या आदेश के द्वारा स्थापित या गठित 
4. राज्य व केंद्र सरकार के स्वामित्व वाली, उनके द्वारा नियांत्रित या पर्याप्त मात्रा में सरकारी धन राशियां पाने वाले निकाय
5.  सभी गैर सरकारी संगठन व निजी क्षेत्र के निकाय, जो सरकार के द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वित्तपोषित हैं।

सूचना कौन मांग सकता है?
देश के सभी नागरिकों गरीब, अमीर, शिक्षित, अशिक्षित, बूढ़े, नौजवान सभी को सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। लेकिन कोई भी संस्था सूचना के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकती क्योंकि यह अधिकार नागरिकों  का मौलिक अधिकारों के अनुसार स्वतंत्र अधिकार है।

सूचना के लिए शुल्क
केंद्र व राज्य सरकार द्वारा सूचना फीस निर्धारित की जाती है। जैसा कि केंद्र सरकार के पास सूचना के लिए ₹10 आवेदन के साथ फीस अदा करनी होती है। राज्य सरकारों द्वारा अलग-अलग फीस तय की गई है। 
धारा 7 की उपधारा (5) से नीचे जीवन जीने वाले लोगों को निशुल्क सुचना  जाएगी। ऐसे आवेदकों को BPL राशन कार्ड की एक प्रति आवेदन फार्म के साथ लगानी होगी।

समय सीमा
सूचना अधिकार अधिनियम के अनुसार 30 दिन के अंदर सूचना देने का प्रावधान है अगर वांछित सूचना का संबंध किसी व्यक्ति के जीवित रहने या उसकी आजादी से जुड़ा हुआ है तो ऐसी में धारा 7 की उप धारा (1) के तहत   सूचना 48 घंटे के अंदर दी  जानी आवश्यक है, जैसे कि गैर क़ानूनी हवालात। अगर आवेदन सहायक जन सूचना अधिकारी के पास जमा किया गया है तो सूचना में सूचना देने में अधिकारी 5 दिन अतिरिक्त समय ले सकता है ऐसे में सूचना 35 दिन के अंदर देने का प्रावधान है।  अगर सूचना दूसरे विभाग से संबंधित है तो धारा 6 की उपधारा (3) के तहत वह आवेदन को संबन्धित विभाग को स्थांतरण कर देगा और सुचना 35 दिन में उपलब्ध होगी।

निरीक्षण का अधिकार 
आप निजी तौर पर किसी कार्य, दस्तावेज या अभिलेख का निरीक्षण करने की मांग कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर किसी पुल सड़क बनाने आदि का निरीक्षण कर सकते हैं कि काम उचित सेवा मानदंडों के अनुसार किया जा रहा है या किया गया है या नहीं सरकारी फाइलों का निरीक्षण भी कर सकते हैं, जैसे कि परीक्षा शाखा से आप अपने परीक्षा पेपर की प्रति कानिरीक्षण।  सत्यपाल बनाम टीसीआईएल में केंद्रीय सूचना आयोग ने व्यवस्था दी कि फाइलों की नोटिंग सुचना में दी जाए।

नमूने या मॉडल 
आवेदक जो भी सामग्री किसी निर्माण कार्य में प्रयोग की जा रही है उसके प्रमाणित नमूने या माडलो  की मांग कर सकते हैं उदाहरण के तौर पर सड़क के लिए प्रयोग हुई रेत, सीमेंट, ईट के नमूने की मांग।

                                                                                                                                      प्रथम अपील 
अगर सूचना अधिकारी आवेदक को निर्धारित अवधि में सूचना उपलब्ध नहीं कराता तो ऐसी स्थिति में आवेदक  जिस अधिकारी के पास अपील दायर कर सकता है उसे प्रथम अपीलीय अधिकारी कहा जाता है। हर जन सूचना अधिकारी के ऊपर उसी विभाग में एक वरिष्ठ अधिकारी को अपीलीय अधिकारी बनाया जाता है,जिसे प्रथम अपील सुनने का अधिकार होता है।अपील के साथ आवेदन की कॉपी, फ़ीस की कॉपी, अगर जन सूचना अधिकारी द्वारा कोई जवाब दिया गया है उसकी  की कॉपी, अगर सूचना डाक द्वारा भेजी गयी हे तो पोस्टल रसीद की कॉपी सलग्न करना आवश्यक है।  जैसे तहसीलदार के ऊपर डिप्टी कमिश्नर। प्रथम अपीलीय अधिकारी को 45 दिन के अंदर दायर की गई अपील पर निर्णय सुनाना होता है। 

 शिकायत/ द्वितीय अपील 
अगर प्रथम अपलीय अधिकारी के निर्णय के बावजूद सूचना उपलब्ध नहीं कराई जाती या फिर प्रथम अपलीय अधिकारी कोई आदेश नहीं देता या फिर आवेदक के खिलाफ निर्णय सुनाता है तो ऐसी सूरत में  द्वितीय अपील सूचना आयोग में दायर की जाती है,जो 90 दिन के अंदर दायर करनी होती है। अपील के साथ आवेदन की कॉपी,अगर जन सूचना अधिकारी द्वारा कोई जवाब दिया गया है उसकी  की कॉपी और प्रथम अपीलीय अधिकारी के निर्णय की कॉपीसलग्न करना आवश्यक है। आयोग को जन सूचना अधिकारी द्वारा गलत सूचना देने या फिर सूचना ना  देने  की स्थिति में जन सूचना अधिकारी पर प्रतिदिन 250 रूपये या अधिकतम 25000 रूपये जुर्माना लगाने का अधिकार है। धारा 18  की उपधारा (1) आवेदक को  बिना प्रथम अपील करे सूचना आयोग में सीधे जन सूचना अधिकारी के खिलाफ शिकायत का अधिकार देता है।

जिला उपभोक्ता फॉर्मो ने जन सूचना अधिकारियों द्वारा सूचना देने के 25000/- रूपये तक के जुर्माने लगाए हैं।

न्यायालय 
भारत के सभी न्यायालय निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत सूचना उपलब्ध करवाने को बाध्य हैं।
जो सूचना नहीं मिल सकती
सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 8 की उपधारा (1) के अनुसार 
1. जिसके प्रकटन से भारत की संप्रभुता, अखंडता, राज्य की सुरक्षा, रणनीति, वैज्ञानिक या आर्थिक हित और विदेश से संबंध पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो। 
2.जो सूचना किसी अपराध को करने के लिए उकसाती हो। 
3. जिसके प्रकटन से संसद या विधानमंडल का विशेषाधिकार भंग हो सकते हों। 
4. जो वाणिज्यिक और व्यापार गोपनीयता या बौद्धिक संपदा से संबंधित हैं। 
5. जिसके प्रकटन से तीसरे पक्षकार को प्रतियोगी स्थिति को नुकसान पहुंचाती हो।
6. जो सूचना किसी व्यक्ति को उसके वैश्ववासिक नातेदारी से उपलब्ध हुई हो।
7. जो सूचना किसी विदेशी सरकार से विश्वास में प्राप्त हुई हो। 
8. जो पुलिस या सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखने के लिए विश्वास में दी गई सूचना के स्त्रोत को बेनकाब करती हो। 
9. जिसके प्रकटन से अपराधों की तहकीकात, अपराधियों के गिरफ्तारी या उसके खिलाफ मुकदमा चलाने में बाधा उत्पन्न होती हो। 
10. कैबिनेट के कागजपत्र जिसमें शामिल हैं- मंत्री परिषद, सचिव और अन्य अधिकारियों के विचार-विमर्श के अभिलेख। (लेकिन मंत्रिपरिषद के निर्णयों के कारण सहितउस सामग्री को जिनकेआधार पर वे निर्णय लिए गए हैं, विषय को पूरा समाप्त होने के बाद, जनता को उपलब्ध कराया जाएगा)।

धारा 24 में विशिष्ट रूप से उन केंद्रीय सुरक्षा तथा संगठनों को सूचीबद्ध करता है जिन्हें सूचनाएं प्रदान करने की जरूरत नहीं है। राज्यों को भी अपने नियंत्रण वाली ऐसी ही संस्थाओं को इस दायरे से बाहर रखने की शक्तियां प्रदान करता है। लेकिन अधिनियम कम से कम इन एंजेसियों से वे सूचनाएं देने की मांग करता है जो भ्रष्टाचार तथा मानवाधिकारोंके आरोपों के हनन के मामलों से संबंधित हैं। मानवाधिकारों के हनन के आरोपों के बारे में सूचनाएं आवेदन की प्राप्ति के 45 दिन के भीतर केवल संबंधित सूचना आयोग के अनुमोदन से ही प्रदान की जाएंगी।

तीसरे पक्ष से संबंधित सूचना
अगर किसी सूचना का संबंध तीसरे पक्ष से है तो धारा 11 के अनुसार तीसरे पक्ष का मत जानने के बाद ही सूचना दी जाती है उसके लिए 40 दिन का समय लगता है लोकहित की सूचना हो तो दी जाएगी अन्यथा नहीं।
वैवाहिक, मनमुटाव, पैन नंबर, बौद्धिक संपदा, बैलेंस शीट, व्यवसायिक गोपनीयता, व्यवसायिक ब्योरों से युक्त निजी सूचनाएं, किसी की मेडिकल रिपोर्ट आदि नहीं ली जा सकती।

न्यायालय
वैसे तो धारा 23 के अनुसार न्यायालय का अधिकार क्षेत्र वर्जित है लेकिन संविधान के अनुच्छेद 226 व 32 के तहत रिट पिटीशन उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय में दायर हुई है, जिनमें माननीय उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले दिए हैं ।


सफलतम अधिनियम
सूचना अधिकार अधिनियम स्वतंत्र भारत के सबसे अधिक सफलतम अधिनियमों में से एक है। इस अधिनियम की सफलता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि अधिनियम के लागू होने से वर्ष 2014 तक , 10 वर्ष के अंतराल में प्रतिदिन लगभग 4800 आवेदन सूचना के लिए विभिन्न विभागों को जनता द्वारा भेजे गए। इन 10 वर्षों में लगभग 17 करोड़ 50 लाख आवेदन सूचना प्राप्ति हेतु आये। 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद 2015-16 से 2016-17 में आवेदनों में 6% की गिरावट आई है।

सूचना के अधिकार अधिनियम में 2019 का संशोधन
मोदी 2.0 सरकार ने सूचना अधिकार अधिनियम में बदलाव के लिए 19 जुलाई 2019 को लोकसभा में अधिनियम की धाराओं 13,16 व 27 जो केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त, केंद्रीय आयुक्तों, राज्य मुख्य सूचना आयुक्तों, राज्य आयुक्तों की पदावधि, वेतनमान, सेवा शर्तों से संबंधित हैं। संशोधन बिल 22 जुलाई 2019 को भाजपा ने अपने बहुमत के बल पर लोकसभा से बहुत जल्दी व बिना व्यापक बहस के पास करवा लिया। इसी तरह से 25 जुलाई 2019 को कुछ दलों जिनमें टीआरएस, बीजेडी, वाईएसआर सी अदि के सहयोग से राज्यसभा से पास करवा लिया। 

सात पूर्व केंद्रीय, राज्य मुख्य आयुक्त व अन्य आयुक्तों ने संशोधन बिल को सदनों से वापस लेने की मांग की और सरकार को अपनी चिंताओं से अवगत करवाया।  सामाजिक व सूचना कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों व विपक्षी दलों ने विरोध प्रदर्शन भी  किए। लेकिन सरकार ने बहुमत की ताकत से एक सप्ताह के अंदर संशोधन बिल  पास करवा लिया। 13 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद की मंजूरी मिलने से लागू हो गया है।   यह संशोधन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सुर्खियॉं व् बहसों का हिस्सा नहीं बना, मीडिया की गैर मुद्दों पर बहसों के शोरगुल में सरकार अपनी राजनैतिक इच्छा पूरी कर गई।

 कांग्रेस, वामपंथी पार्टियों, डीएमके आदि दलों ने संसद के दोनों सदनों  में पुरजोर विरोध किया, तार्किक सवाल उठाये, गंभीर चिंताएँ पेश की और संशोधित बिल को व्यापक बहस हेतु संसद की  विभिन्न समितियों को भेजने  के प्रस्ताव पेश किए लेकिन सरकार के बहुमत के आगे उनकी एक न चली, सरकार ने बिना व्यापक विचार-विमर्श , बहस, बिना किसी संसदीय समिति को भेजे व जनता के सलाह मशविरे के बिल को पास करवा लिया।

1. इस संशोधन ने केंद्रीय मुख्य आयुक्त, केंद्रीय आयुक्तों, राज्य मुख्य आयुक्तों और राज्य आयुक्तों की पदावधि 65 वर्ष तक की आयु तक तय कर दी। पहले इनका कार्यकाल 5 वर्ष का था या 65 वर्ष की आयु पूरा होना पर सेवानिवृत्त करने का प्रावधान था।  इस संशोधन से मूल अधिनियम से 5 वर्ष की पदावधि हटा दी गई है। 

2. केंद्रीय मुख्य आयुक्त व केंद्रीय आयुक्तों का वेतन व भत्ते मुख्य निर्वाचन आयुक्त व  निर्वाचन आयुक्तों के समान दिए जाने का प्रावधान था इसी तरह से राज्य मुख्य आयुक्त व राज्य आयुक्तों को वेतनमान में भत्ते राज्य के मुख्य सचिव के समान दिए जाने का प्रावधान मूल अधिनियम में किया गया था, जिसको संशोधित करके सरकार द्वारा वेतन व भत्ते खुद तय करने का अधिकार ले लिया है अगर किसी सेवानिवृत्त व्यक्ति को मुख्य सूचना आयुक्त या आयुक्त नियुक्त किया जाता है तो उसको मिल रही पेंशन को सरकार द्वारा तय वेतनमान से कम कर दिया जाएगा। 

3.संशोधन ने राज्य सरकारों से राज्यों मुख्य सूचना आयुक्त व आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार छीन लिया है। यहां पर यह बताना आवश्यक है कि सूचना आयोग एक अर्ध न्यायिक निकाय (quasi judicial body) है जो अपनी कार्यप्रणाली न्यायालय की तरह से चलाता है। अपीलों,  शिकायतों पर अपने फैसले दोनों पक्षों को सुन कर सुनाता है।

संशोधन से सूचना आयोग की स्वतंत्रता के संबंध में अनेकों शंकाएं जनता में पैदा हुई है 
1. यह संशोधन सरकार को बेतहा शक्ति देता है। सब कुछ सरकार द्वारा तय होगा। सूचना आयोगों की निष्पक्षता व स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है ऐसी शंका व्यक्त की गई है कि आयुक्त सरकार के वफादार बाबू अधिकारी बनकर रह जायेंगे।

2. यह संशोधन लोगों के हाथ कमजोर और सरकार के हाथ मजबूत करेगा। इस संशोधन से राज्य सरकारों को राज्य के मुख्य सूचना आयुक्तों व आयुक्तों के चयन करने के अधिकार को छिनता है जो सहकारी संघवाद के सिद्धांत के विपरीत है।

3. शासन का स्थापित नियम है कि संस्थाओं का कार्यकाल निश्चित हो ताकि वो बिना भय व स्वंतन्त्रता से अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सके यद्धपि संशोधन से मुख्य सूचना आयुक्त अन्य आयुक्त केंद्र सरकार की दया से पद पर रह सकेंगे।

4. यह संशोधन बहुत जल्द संसद के दोनों सदनों में बिना व्यापक बहस, विचार-विमर्श और संसदीय समितियों को बिना भेजें पारित किया गया। जिससे इसका क्रांतिकारी चरित्र व स्वरूप बदल गया है। अब आयुक्त केवल सरकार वरिष्ठ अधिकारी बनकर रह जाएंगे।

5. इस संशोधन ने केंद्र व राज्य के मुख्य आयुक्त व अन्य आयुक्तों को सुप्रीम कोर्ट के जज के समान स्तर (status) को खत्म कर दिया।

6.इस संशोधन से जन सूचना अधिकारी जनता को समय पर सूचना देने में आनाकानी करेंगे, सूचना नहीं देंगे या गलत सूचना देंगे।

7.इस संशोधन का उद्देश्य सूचना आयोगों को पूर्णत: सरकारी नियंत्रण में लाना प्रतीत होता है, इसके पीछे नौकरशाही, राजनेताओं व कारपोरेट के निहित स्वार्थ छुपे हुए हैं जो जनता को उनके खिलाफ मिलने वाली सूचनाएं या कहिए गलत कार्य पर लगाम लगाने वाली जानकारियां से मुक्ति मिल सकती है।

8.यह संशोधन पारदर्शिता जवाबदेही व चेक एंड बैलेंस ऑफ पावर के सिद्धाँत के खिलाफ है। इससे सारी शक्ति सरकार को मिल जाएगी। 

 9. केंद्रीय सूचना आयोग ने कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय दिए थे जिनमें नोटबंदी,  आरबीआई,  एनपीए आदि शामिल है, जो सरकार के खिलाफ जाते हैं। जिससे सोशल मीडिया पर सरकार की किरकिरी हुई। सरकार ने इस मंशा से भी संशोधन किया हो सकता है।

10. यह संशोधन संविधान के अनुच्छेद 14, 19 (1) और 21 में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। इससे सूचना आयोग का सुरक्षा कवच खत्म हो जाएगा और जनता को उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों के खिलाफ सूचना, ऐसी सूचनाएं जो भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ करती हो और लोकतंत्र को मजबूत करती हो आदि मिलना मुश्किल हो जाएगा।

2017 में एक सूचना कार्यकर्ता की अपील पर केंद्रीय सूचना आयुक्त श्री श्रीधर अचारयूल्य ने दिल्ली विश्वविद्यालय को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का दिल्ली विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड से संबंधित निरीक्षण करने का आदेश पारित किया था। कुछ दिन बाद केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त श्री आर के माथुर ने मानव संसाधन मंत्रालय का कार्यभार वापिस ले लिया था।

आरबीआई ने बैंकों के बड़े डिफाल्टरों की सूचना आवेदक को देने से मना कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई बनाम जयंतीलाल मिस्त्री 2016 ()आरसीआर (सिविल) 568 में आरबीआई को डिफॉल्टरों की सूचना देने का आदेश पारित किया था।

जब अधिनियम का खाका यूपीए सरकार ने संसद में पेश किया था तो उस बिल पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ। मूल बिल में केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त व आयुक्तों का वेतनमान सचिव व अतिरिक्त सचिव के समान रखने की बात थी परंतु संसदीय समिति जिसमें उस समय भाजपा के सांसद और वर्तमान में भारत के राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी भी सदस्य थे, ने वेतनमान मुख्य निर्वाचन आयुक्त व निर्वाचन आयुक्तों के समान करने की सिफारिश की थी, जिसको संसद ने सही मानकर पास किया था। 

चयन प्रक्रिया 

पहले केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त व आयुक्तों की नियुक्ति एक कमेटी द्वारा की जाती थी जिसमें प्रधानमंत्री लोकसभा में विपक्ष के नेता या फिर लोकसभा में बड़े दल के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त केंद्रीय मंत्री  सदस्य होते है। राज्य के स्तर पर मुख्यमंत्री विपक्ष का नेता या फिर बड़े दल का नेता और मुख्यमंत्री द्वारा चयन मंत्री की एक कमेटी द्वारा की जाती थी। अब स्थिति बदल चुकी है।

हटाने की प्रक्रिया

अगर किसी मुख्य सूचना आयुक्त या किसी आयुक्त के खिलाफ कोई आरोप लगते थे तो ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट का जज जांच करके रिपोर्ट देगा अगर आरोप सही पाए जाते थे तब राष्ट्रपति उस मुख्य सूचना आयुक्त या आयुक्त को हटा सकता था। 
संशोधन से स्थिति बदल चुकी है अब सरकार अपनी मनमर्जी से हटा सकती है।
अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों की तरह से सूचना आयोग जो महत्वपूर्ण संस्था थी, सरकार ने संशोधन अधिनियम 2019 द्वारा इस संस्था को पिंजरे का तोता बना लिया है। 
इस संशोधन के खिलाफ कांग्रेस के नेता श्री जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट में मौजूदा संशोधनों को चैलेंज किया है और सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिया।
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 स्वतंत्र भारत के अधिनयमों में सबसे सफलतम अधिनयम है लेकिन सूचना का अधिकार संशोधन अधिनियम 2019 से इस अधिनियम के उद्देश्यों को धक्का लगेगा। यह प्रतिगामी बदलाव प्रतीत होते है, यह तथ्य भविष्य साबित करेगा।

राजविंद्र चंदी, एडवोकेट, कुरुक्षेत्र 9416271188 

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