समाज की धड़कनों को पढ़ लेता है रचनाकार – टी. आर. कुण्डू

समाज व्यक्तियों का घर नहीं है, समूह नहीं, ये एक संवेदनशील सामूहिकता है। जिसका एक मिजाज है, जिसकी एक अंतरात्मा है, जो हमें बुरे-भले की समझ का बोध कराते हैं। मूलत: यह एक नैतिकता में ही बसी हुई है। इसी के बलबूते हम आगे बढ़े हैं। कोई भी संरचना अंतिम नहीं है। उसके बाह्य व भीतरी समीकरण है जो बदलते रहते हैं। हर बदलाव के कुछ दबाव होते हैं। कुछ तनाव होते हैं। कुछ पीड़ाएं होती हैं। सबसे पहले इसकी आहट आप रचनाकारों को मिलती है।

पहले हरियाणा सृजन उत्सव (25 फरवरी 2017) के उदघाटन सत्र के अवसर पर अध्यक्षीय टिप्पणी करते हुए टी आर कुण्डू

आज एक ऐतिहासिक दिवस है हम एक नए अध्याय की शुरूआत करने जा रहे हैं हरियाणा सृजन उत्सव के साथ। हरियाणवी भाषा में कहते हैं कि ‘कहलवा तो गांम रहा है और कह मैं रहा हूं।’ यानी जो काम सृजन सभा ने किया है, इसकी कमी तो सबको महसूस हो रही थी, लेकिन इन्होंने इसको कर दिखाया है, उसके लिए बधाई के पात्र हैं। 

मनुष्य आदिकाल से ही सृजनशील है। उसने अपनी हालात-परिस्थितियां बदली हैं। आज हम इस सभ्यता में रह रहे हैं मनुष्य की कृति है।  मनुष्य की सबसे बड़ी मौलिक व अनूठी कृति है – सामाजिक संरचना। क्योंकि समाज नहीं होता तो न कोई भाषा होती न कोई विज्ञान होता न कोई तरकीब होती। कुछ भी न होता। 

समाज व्यक्तियों का घर नहीं है, समूह नहीं, ये एक संवेदनशील सामूहिकता है। जिसका एक मिजाज है, जिसकी एक अंतरात्मा है, जो हमें बुरे-भले की समझ का बोध कराते हैं। मूलत: यह एक नैतिकता में ही बसी हुई है। इसी के बलबूते हम आगे बढ़े हैं। कोई भी संरचना अंतिम नहीं है। उसके बाह्य व भीतरी समीकरण है जो बदलते रहते हैं। हर बदलाव के कुछ दबाव होते हैं। कुछ तनाव होते हैं। कुछ पीड़ाएं होती हैं। सबसे पहले इसकी आहट आप रचनाकारों को मिलती है। आपके पास संवेदनाओं का स्टेथेस्कॉप है जो समाज की धड़कनों को पढ़ लेता है। उनको समझ लेता है, उनको एक नया मीनिंग देता है। एक प्रस्पेक्टिव में बुनता है और अपनी कल्पना और एक गहरे अहसास के साथ समाज को वापिस लौटाते हैं और समाज को बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। रचनाकार सामाजिक मूल्यों व परम्पराओं की भी पड़ताल करता है। उनके स्थान पर नए मूल्य स्थापित करता है या नए समाज की रचना करता है।  

सत्ता कई बार समाज को क्षति पहुंचाती है और हरियाणा उसका जीता-जागता सबूत है। समाज में विकास के नाम पर जो बदलाव है, वो आपके सामने है। विकास मानव जीवन से जुड़ी बहुमुखी प्रक्रिया है। जिसका आर्थिक पहलू भी है, सांस्कृतिक पहलू भी है और सामाजिक पहलू भी है और सब आपस में जुड़े हैं। किसी एक की अवहेलना समस्त समाज को प्रभावित करती है। हमारी सरकारों का जोर आर्थिक पहलू  पर रहा है। नतीजतन हमने अपनी अर्थव्यवस्था तो बदल ली, लेकिन सामाजिक व्यवस्था नहीं बदल पाए। आज भी जाति व्यवस्था, पितृसत्ता उतनी ही प्रबल है, जितनी कि पचास साल पहले थी।

जाति व्यवस्था, पितृसत्ता शोषण के तरीके हैं और जातीय और लैंगिक भेदभाव के स्रोत हैं।  संस्कृति पर उच्च वर्ग  के एकाधिकार बनाए रखने का जरिया हैं। ये महिलाओं और निम्न वर्ग के सांस्कृतिक जीवन पर अंकुश लगाते हैं, उनके रहन-सहन, खान-पान आदि सांस्कृतिक रूप पर बंधन लगाते हैं। ये सांस्कृतिक बंधन ही आर्थिक, सामाजिक व  राजनैतिक बंधन का कारण बनते हैं।  

अभी जाट आरक्षण के दौरान सामाजिक हिंसा फैली उसने हमारे समाज का ताना-बाना छिन्न-भिन्न किया। जातिगत खाईयां ज्यादा गहरी और चौड़ी हो गई हैं। हम अपने राजनीतिक आकाओं की बात सुन रहे हैं, अपनी नहीं सुन रहे। हम इकट्ठे रह रहे हैं, लेकिन मिलजुल कर नहीं रह रहे। बिगड़ती लैंगिक व्यवस्था नेे हमारे हरियाणा के अंदर कुंठित कुंवारों की एक फौज हमारे सामने खड़ी कर दी है। हताशा में दूसरे प्रांतों से बहुएं ला रहे हैं। ये महिला के वस्तुकरण का एक जीता-जागता नमूना है। अपने घरों से दूर अपनी परम्पराओं से कटी हुई घर की चार दीवारों में बंद। उनकी स्थिति एक बंधुआ सेक्स वर्कर से ज्यादा नहीं है।  इनका क्या होगा, इनके बच्चों का क्या होगा, क्या उनको समाज अपनाएगा। मैं चाहता हूं ये समस्याएं विमर्श का हिस्सा बनें। मैं हरियाणा सृजन सभा को शुभकानाएं देता हूं और आशा करता हूं आप यहां से नई प्रेरणा लेकर जाएंगे और नए समाज को बनाने में भूमिका निभाएंगे।

One comment

  • Rama Kant Yadav says:

    हरियाणा सृजन उत्सव का प्रयास आज के सन्दर्भ मे सराहनीय व प्रासंगिक है। प्रो टी आर कुण्डू द्वारा समाज एवं सामाजिक संरचना के तानाबाना सम्बन्धी आन्तरिक और बाह्य तत्व समाज के जुड़े रहने या टूटने मे परिलक्षित होते हैं लेकिन यह अलग बात है कि कभी हम देख पाते हैं और कभी नहीं देख पाते हैं।
    प्रो कुण्डू के विचारों को व्यवहारिक रूप देते हुए मैं प्रमुखता से औपचारिक (बाह्य)और अनौपचारिक (आन्तरिक) पहलूओं की ओर ध्यान आकर्षित करता हूँ। बाह्य साधनों में कानून, कोर्ट, पुलिस आदि आते हैं जबकि आन्तरिक साधनों मे हमारे सामाजिक मूल्य, अच्छे बुरे का ग्यान ,आत्म अवलोकन, क्या करना क्या नहीं करना आदि आते हैं। दिन प्रति दिन हम देखें तो आन्तरिक पहलू कुछ करने या न करने की अन्दर से प्रेरणा देते हैं जबकि बाह्य बाहरी दबाव बनाते हैं।

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