कोरोना के समय में ऑनलाइन स्कूली शिक्षा – राजेंद्र चौधरी

कोरोना महामारी ने जीवन के ऑनलाइन पक्ष को बढ़ावा दिया है और ऑनलाइन शिक्षा इसका एक प्रमुख घटक है। स्कूल और कॉलेज सबसे पहले बंद हुए थे और शायद सब से अंत में ही खुलें। इस लिए ऑनलाइन की समीक्षा ज़रूरी है।

कोरोना  महामारी ने जीवन के ऑनलाइन पक्ष को बढ़ावा दिया है और ऑनलाइन शिक्षा इसका एक प्रमुख घटक है। स्कूल और कॉलेज सबसे पहले बंद हुए थे और शायद सब से अंत में ही खुलें। इस लिए ऑनलाइन की समीक्षा ज़रूरी है। लेकिन देश की सांस्कृतिक और ऑनलाइन व्यवस्था की संरचनात्मक विविधता को देखते हुए पूरे देश की ऑनलाइन शिक्षा के बारे में कुछ कहना मुश्किल है। इस लिए हम केवल हरियाणा के सरकारी स्कूलों की ऑनलाइन शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा करेंगे।  ऑनलाइन शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा इन्टरनेट की उपलब्धता का है जिस से ऑनलाइन शिक्षण की पहुंच तय होती है। परन्तु हम इस मुद्दे पर ध्यान केंद्रित नहीं करेंगे क्योंकि इंटरनेट उपलब्धता की असमानता बहु रेखांकित मुद्दा है। हमारी समीक्षा के केंद्र में हैं हरियाणा के सरकारी स्कूलों में ऑनलाइन शिक्षण की व्यवस्था एवं शिक्षकों तथा बच्चों पर इस का बोझ। 

सब से पहली बात तो यह है कि ” हर दिन सुबह दस से बारह , घर से चले स्कूल हमारा” की टैगलाइन के बावजूद हरियाणा में ऑनलाइन शिक्षण में निश्चित समय पर दो तरफ़ा संवाद (लाइव और इंटरेक्टिव) की व्यवस्था के स्थान पर केवल शिक्षण सामग्री का व्हाट्स एप्प, इमेल या टीवी के माध्यम से एकतरफा ऑनलाइन प्रसारण मात्र हो रहा है। हालाँकि कुछ सामग्री केंद्र से प्रदान की जा रही है, लेकिन इसमें सभी विषयों / कक्षाओं को शामिल नहीं किया गया है और शिक्षकों से अपनी सामग्री बनाने की अपेक्षा की जाती है। इस तरह के वीडियो तैयार करने के लिए न तो स्कूल शिक्षक प्रशिक्षित हैं और न ही उन के पास इस के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचा है। यदि कक्षाएं निश्चित समय पर एवं दो तरफ़ा (लाइव और इंटरेक्टिव) नहीं हैं, तो प्रत्येक शिक्षक को अपने व्याख्यान को अलग से रिकॉर्ड करने की आवश्यकता कहां है? इस की बजाय चुने हुए विषय विशेषज्ञों से आवश्यक बुनियादी सुविधाओं के साथ अच्छे वीडियो तैयार  करवा कर उन का प्रयोग किया जा सकता है बजाय इस के अध्यापक केवल अपना भाषण रिकार्ड कर के भेजे। 

हरियाणा में ऑनलाइन स्कूली शिक्षण का सबसे भयावह पक्ष है व्यापक और दैनिक रिपोर्टिंग। इसमें कोई संदेह नहीं है कि निगरानी और सूचना प्रबंधन व्यवस्था (एमआईएस) किसी भी उपक्रम के संचालन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन हरियाणा में जिस तरह से यह किया जा रहा है, वह न केवल बोझिल है अपितु बेकार भी है। हर दिन हर शिक्षक को यह रिपोर्ट देनी होती है कि  “ई-लर्निंग के लिए कितने छात्रों से बात की” एवं “कितने छात्रों ने समयसारणी के अनुसार टीवी देखा”।

इस लिए हर रोज़ शिक्षक को ऑनलाइन पढ़ाने के अलावा अपनी कक्षा के छात्रों से फोन पर बात भी करनी पड़ती है। इस के साथ ही स्वाभाविक है कि ये संख्या बढ़ाने का कहा-अनकहा दबाव भी रहता है। साप्ताहिक रिपोर्ट में ‘कितने माता-पिता से टेलीफोन पर संपर्क किया’ का कॉलम भी है। शिक्षकों को अक्सर इन कार्यक्रमों को देखने वाले छात्रों की तस्वीरें एकत्र करके जमा करानी होती हैं। अध्यापकों के अलावा, प्रधानाचार्यों और अन्य पर्यवेक्षी अधिकारियों को रोजाना 20 छात्रों से बात करनी होती है और उन की सूची के साथ रिपोर्ट देनी होती है।  बहुत से शिक्षक/अधिकारी अपनी रिपोर्ट टाइप कर के भेजने में सक्षम नहीं हैं। इस लिए वो हाथ से लिख कर एवं उस का फोटों खींच कर भेजते हैं जिस के चलते इस रिपोर्ट पर अगली कार्यवाही के लिए सॉफ्टवेयर का उपयोग नहीं किया जा सकता और इसे हाथ से करना पड़ता है। इस लिए यह दैनिक रिपोर्ट लेने-देने की प्रक्रिया काफी श्रम साध्य है।

लेकिन इस भारी बोझ के अलावा, बुनियादी सवाल यह है कि क्या ये रिपोर्टें विश्वसनीय भी हैं? शिक्षकों द्वारा अपने खुद को प्रभावशीलता और अधिकारियों द्वारा उनके अधीनस्थ कर्मचारियों की प्रभावशीलता की रिपोर्ट आखिर कितनी विश्वसनीय मानी जा सकती है? इस तरह की निगरानी का उचित माध्यम है एक स्वतंत्र इकाई। छात्र या उनके माता-पिता से सीधे ईमेल या व्हाट्स ऐप संदेश या गूगल फॉर्म इत्यादि के माध्यम से प्रतिक्रिया प्राप्त करने की व्यवस्था की जा सकती है। इस से न केवल स्वतन्त्र मूल्यांकन हो पायगे अपितु शिक्षकों पर काम का बोझ भी काफी कम हो जाएगा। 

नियमित गृहकार्य एवं इसका मूल्यांकन निश्चित रूप से शिक्षण प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण घटक है लेकिन होमवर्क का ऑनलाइन मूल्यांकन सामान्य मूल्यांकन के समान नहीं है । कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर, कम से कम अच्छे संस्थानों में, गृहकार्य/असाइनमेंट न केवल थोड़े होते हैं बल्कि टाइप किए हुए होते हैं,  जबकि स्कूल स्तर पर होमवर्क न केवल दैनिक होता है अपितु टाइप किया न हो कर नोटबुक की फ़ोटो के रूप में होता है। कल्पना करें कि 100 या 200 छात्र प्रतिदिन अपने होमवर्क के कई कई पन्नों की फ़ोटो शिक्षकों को भेजते हैं और उन्हें इस का मूल्यांकन कर के वापिस भेजना और उस का रिकार्ड रखना होता है। इस के लिए शिक्षकों के फोन में कितने डेटा का उपयोग होगा और कितनी भंडारण क्षमता चाहिए होगी?

और यह सर्वविदित है कि ज्यादातर भारतीयों के लिए ऑनलाइन पहुँच कंप्यूटर के माध्यम से न हो फोन के माध्यम से है (तभी तो टविटर संवाद का मुख्य माध्यम बन के उभरा है  क्योंकि फोन पर कुछ भी लम्बा पढ़ना मुश्किल होता है)। फ़ोन पर यह सब करने में लगने वाले समय एवं आँखों पर पड़ने वाले बोझ की कल्पना ही की जा सकती है।  

लेकिन हरियाणा के शिक्षा विभाग की नौकरशाही अपने इस दावे को बनाए रखने के लिए कि ‘हरियाणा, देश में ऐसे ऑनलाइन शिक्षा उपलब्ध कराने वाला न केवल पहला राज्य है अपितु इस को बहुत अच्छी तरह से चला भी रहा है’ ऑनलाइन शिक्षण प्रक्रिया को सामान्य स्कूली दिनचर्या की प्रतिलिपि बनाने पर लगी है। इस लिए दैनिक डायरी लेखन एवं गृहकार्य मूल्यांकन सरीखे नियमित काम ऑनलाइन स्वरूप में भी जारी हैं। इन में अब ‘नक़ल रहित’ घर से होने वाले साप्ताहिक टेस्ट भी शामिल हो गए हैं। अब 12 बजे से लेकर शाम 8 बजे तक कभी भी  किये जा सकने वाले टेस्ट कितने ‘नकल रहित’ हो सकते हैं जब परम्परागत परीक्षा में धड्ले से नकल चलती है। 

निश्चित रूप से कुछ मामलों में यह संभव है कि सामान्य प्रक्रिया ऑनलाइन स्वरूप में भी जारी रहे लेकिन सभी परिस्थितियों में ऐसा होना संभव नहीं है। ऑनलाइन शिक्षण की इन सब जिम्मेदारियों को बोर्ड परीक्षाओं के मूल्यांकन कार्य के अलावा शिक्षकों को उन को सौंपे गए विशिष्ट कोरोना संबंधित काम के साथ साथ करना है/था। कोरोना से संबंधित सर्वेक्षण, स्क्रीनिंग, कोरोना आश्रय स्थल प्रबंधन और रबी फसल की खरीद पर बड़ी संख्या में शिक्षकों को लगाया गया है। क्या यह उम्मीद करना उचित है कि वे इस दोहरे या बल्कि तिहरे फ़र्ज़ (तीसरा फ़र्ज़ है इस कोरोना महामारी के दौरान अपने परिवार की देखभाल) के साथ कागज़ी नहीं बल्कि वास्तविक न्याय कर पाएंगे? 

हरियाणा के ऑनलाइन शिक्षण के प्रयासों के प्रभावी होने के लिए, न्यूनतम आवश्यकता यह है कि दूसरी कक्षा से शुरू हो कर प्रत्येक छात्र के पास अपना स्मार्ट फोन और इंटरनेट कनेक्शन हो तथा प्रत्येक परिवार के पास एक टेलीविजन सेट हो व पूरा समय बिजली उपलब्ध रहे। प्रत्येक छात्र के पास अपने फोन की छोड़ों, कहीं कहीं तो परिवार के पास भी पर्याप्त बैंडविड्थ का एक फोन भी नहीं है और गांवों में बिजली की उपलब्धता राम भरोसे है। हरियाणा में तो खाप/पंचायतों ने लड़कियों को फोन न देने तक के निर्देश दिए हुए हैं। ऑनलाइन माध्यम तक छात्रों की इस सीमित पहुँच के आलोक में ऑनलाइन शिक्षण प्रक्रिया को नियमित शिक्षण व्यवस्था की प्रतिलिपि बनाने की कोशिश बेमानी है; इस में लगने वाली उर्जा और इस के प्रतिफल का बेमेल होना निश्चित है।

इसके अलावा, अधिकारियों के लिए अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से घर से काम लेने के नियम कायदे विकसित करने की भी आवश्यकता है । आप शिक्षकों/कर्मचारियों से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे हमेशा आप को उपलब्ध रहें और हर समय आप का फोन उठायें। जीवन मरण की आपात स्थितियों को छोड़ कर कार्यालय समय के अलावा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से संपर्क पर प्रतिबन्ध होना चाहिए एवं टेलीफोन या ई-मेल संदेश का जवाब देने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। तुरन्त/अभी रिपोर्ट देने की प्रवृति पर रोक लगाने की ज़रूरत है। शिक्षा विभाग बल्कि सरकार को सभी हितधारकों के साथ व्यापक विचार विमर्श के बाद ‘घर से काम लेने’ के मापदंड तय किये जाने चाहिए। आखिर, सामान्य कर्मचारियों और उन लोगों के बीच जिनके पास शिविर/घर में कार्यालय या सचिव सहायता है, अंतर किया जाना चाहिए। 

संक्षेप में, तालाबंदी के दौरान एवं अन्यथा भी डिजिटल शिक्षण संसाधनों का उपयोग जरूर किया जाना चाहिए लेकिन इन के सीमित फैलाव और प्रभाव को ध्यान में रखते हुए ये अतिरिक्त विकल्प के रूप में ही रहे न कि आमने सामने की व्यवस्था का विकल्प (या प्रतिलिपि) बनें। इस सीमित उपयोग के सन्दर्भ में या तो ऑनलाइन शिक्षण को निश्चित समय पर एवं दो तरफ़ा (लाइव और इंटरेक्टिव) स्वरूप दें या फिर शिक्षण सामग्री केन्द्रीय स्थल से उपलब्ध कराई जानी चाहिए; प्रत्येक शिक्षक को रिकार्डिड भाषण के लिए विवश करने की कोई ज़रूरत नहीं है।

जहाँ तक ऑनलाइन शिक्षण के मूल्यांकन की बात है, यह शिक्षकों से स्वतंत्र होना चाहिए और छात्रों या उनके माता-पिता से सीधे तौर पर मांगा जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात, सभी हितधारकों के साथ पारदर्शी परामर्श के माध्यम से, अधीनस्थ कर्मचारियों से घर से काम कराने के नियम कायदे विकसित किये जाने चाहिए। नागरिक समाज को इस बाबत ज़रूर हस्तक्षेप करना चाहिए एवं अपने बच्चों और शिक्षकों के साथ क्या करना है, इसे केवल शिक्षा विभाग के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए।

(लेखक राजेन्द्र चौधरी पूर्व प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक ; rajinderc@gmail.com हैं।)

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