अमीर खुसरो: हिंदुस्तान की साझी संस्कृति, साझी विरासत – सोफिया खातून

अमीर खुसरो किसी विशेष धर्म-संस्कृति संबंधित न होकर हिंदुस्तान की साझी-संस्कृति, साझी विरासत के प्रतीक हैं। वर्तमान समय में जबकि धार्मिक वैमनस्य चरम पर है तथा अपनी-अपनी धर्म-संस्कृति को लेकर छोटे-छोटे प्रसंगों में तनाव एवं अराजकता की स्थिति बन जाती है, वहाँ उनके जीवन-चरित्र एवं साहित्य से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। गंगा-जमुनी तहजीब हिन्दुस्तान की परंपरा एवं पहचान है और अमीर खुसरो इस गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक हैं।

‘धन्य भूमि भारत, सब रतननि की उपजावनी, – ‘बद्रीनारायण चैधरी ‘प्रेमघन’

भारत भूमि धन्य है जो अनेक रत्नों की जन्मदात्री रही है। समय-समय पर यहाँ अनेक रत्नों ने जन्म लिया, जो अपनी विलक्षण प्रतिभा से सभी को चमत्कृत कर देते हैं। अमीर खुसरो एक ऐसा ही व्यक्तित्व हैं जो अपनी बहुआयामी प्रतिभा से आज भी साहित्य-प्रेमियों को प्रभावित एवं आकर्षित करने का कार्य कर रहे हैं। हिन्दुस्तान में आज भी उनकी प्रतिभा की बराबरी करने वाले कवि, साहित्यकार नगण्य हैं। उन्होंने जिस तरह साहित्य एवं संगीत की विविध विधाओं में अपना योगदान दिया वह प्रशंसनीय है। उनके विषय में ‘शिबली नोमानी’ का यह कथन पूर्णतः सटीक है –

‘‘हिंदुस्तान में छह सौ बरस से आज तक इस दर्जे का जामे-कमालत् (उत्कृष्टताओं से परिपूर्ण) नहीं पैदा हुआ। ………… फिरदौसी, सादी, अनवरी, अर्फी, नजीरी, बेशुबा अकलीम सुखन के बादशाह हैं लेकिन उनकी सीमा एक अकलाम से आगे नहीं बढ़ती। फिरदोसी मसनवी से आगे नहीं बढ़ सकता, सादी कसीदे को हाथ नहीं लगा सकते। अनवरी मसनवी और ग़ज़ल को छू नहीं सकता। हाफिज, उर्फी, नजीरी ग़ज़ल के दायरे से बाहर नहीं निकल सकते। लेकिन अमीर खुसरो की साहित्यिक सत्ता में ग़ज़ल, रूबाई, कसीदा और मसनवी सबकुछ दाखिल हैं और काव्यकला की छोटी-मोटी विधाएँ अर्थात् तज़मीन, मुस्तजाद सनाय (अलंकार आदि) व बदाय की तो गिनती ही नहीं।’’1

‘अमीर खुसरो’ का जन्म सन् 1253 ई0 में उत्तर प्रदेश के एटा जिले के ‘पटियाली’ कस्बे में हुआ था। वर्तमान में ‘पटियाली’ कासगंज जिले के अंतर्गत आता है। पटियाली गंगा किनारे स्थित है तथा यह उन दिनों ‘मोमिनपुर’ या ‘मोमिनाबाद’ के नाम से जाना जाता था। कुछ लोग अमीर खुसरो का जन्मस्थान दिल्ली या भारत से बाहर का मानते हैं किंतु वर्तमान में सर्वसम्मति से पटियाली कोई इनकी जन्मस्थली माना जाता है- ‘‘अमीर खुसरो ने अपनी मसनवी ‘शिकायत नामा मोमिनपुर’ में जहां एक ओर दिल्ली की जी भर प्रशंसा की है तो वहीं ‘पटियाली’ की दुर्दशा पर आंसू भी बहाए हैं।’’2 इनके पिता ‘सैफुद्दीन महमूद लाचीनी’ तुर्किस्तान के ‘लाचीन’ कबीले के सरदार थे, जो ‘चंगेज खाँ’ के समय में मंगोलो के अत्याचार से दुःखी होकर भारत आकर बस गए थे। वे अत्यंत प्रतिभाशाली थे। कुशल सैनिक होने के कारण उनकी नियुक्ति सुल्तान शमसुद्दीन इल्तुतमिश के दरबार में हो गई। अपनी निर्भीकता, दिलेरी इत्यादि गुणों के कारण वे जल्द ही शाही सेना में सरदार बन गए। इन्हीं सैफुद्दीन महमूद के घर ‘अबुल हसन यमीनुद्दीन खुसरो’ का जन्म हुआ है। ‘‘कहते हैं खुसरो जब पैदा हुए तो इनकी पिताजी इन्हें एक कपड़े में लपेटकर आशीर्वाद के लिए एक दरवेश (संत) के पास ले गये दरवेश ने इन्हें देखते ही कहा ‘आवारदी कसे राके दो कदम अज़ खाकानी पेश ख्वाहिद बूद’ (तुम मेरे पास ऐसे बच्चे को लाये हो जो खाकानी से भी दो कदम आगे होगा)’’3

अमीर खुसरो बचपन से ही मेधावी थे, किंतु दुर्भाग्य से अल्पायु में ही इनके सिर से पिता का साया उठ गया और यह अपने नाना ‘इमादुल्मुल्क’ के यहां दिल्ली (सात वर्ष की आयु में) चले गए। वहीं इनका पालन-पोषण एवं प्रतिभा का विकास हुआ। दुर्भाग्य से कुछ वर्षों बाद (1273ई0 में) इनके नाना का भी देहांत हो गया। अब खुसरो के सामने जीविका का प्रश्न उठ खड़ा हुआ। अभी तक तो वे स्वच्छंद जीवन व्यतीत करते थे। अतः उन्होंने दिल्ली के सुल्तान ‘ग्यासुद्दीन बलबन’ का राज्याश्रय प्राप्त किया। यहीं से उनके दरबारी जीवन का आरंभ हो गया। अमीर खुसरो कदाचित् इतिहास के सबसे अधिक राजाओं का आश्रय प्राप्त करने वाले कवि हैं। उन्होंने दिल्ली में ग्यारह बदशाहों की बादशाहत देखी थी तथा सात बादशाहों के दरबार में आश्रय प्राप्त किया था। इन सुल्तानों के जीवन में आने वाले उतार-चढ़ावों से वे वखूबी वाकिफ़ थे। वे स्वयं को हिंदुस्तान की तूती कहा करते थे –

चु मन तूती-ए हिन्दम अर रास्त पुर्सी
जि मन हिन्दवी पुर्स ता नग्ज़ गोयम
(चूँकि मैं तूती-ए-हिंद हूं, इसलिए मुझसे हिन्दवी के संबंध में पूछिए ताकि उसमें मैं अपनी काव्यकला प्रदर्शित कर सकूँ।)4

हज़रत निजामुद्दीन औलिया उनके आध्यात्मिक गुरु थे। उनके नाना तथा पिता दोनों ही निजामुद्दीन औलिया के मुरीद (भक्त) थे। एक तरह से निजामुद्दीन औलिया उनके परिवार के आध्यात्मिक गुरु थे। अमीर खुसरो की अपने गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा थी। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व थे। उनका अपनी मातृभूमि हिंदुस्तान के प्रति गहरा लगाव था। देशभक्ति की भावना उनके अंदर कूट-कूट कर भरी थी। उन्होंने अपनी कविता में हिंदुस्तान के पेड़-पौधे, फल-फूल, जलवायु तथा यहां के निवासियों की बुद्धिमत्ता की जो प्रशंसा की है, वह उनके राष्ट्रप्रेम का प्रतीक है। सामान्य भावनाओं वाला व्यक्ति इस प्रकार का वर्णन नहीं कर सकता। अपने आस-पास के परिवेश का अत्यंत सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन करके उसकी भावभीनी अभिव्यक्ति करने वाला कोई विलक्षण प्रतिभा का धनी व्यक्ति ही हो सकता है,

‘‘मसनवी ‘नूह सिपहर’ का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण तीसरा परिच्छेद पूरा हिंदुस्तान की स्तुति में है। इसमें चार-पांच सौ शेर हैं, जिनमें हिंदुस्तान के पक्षियों, मौसमों, फलों, फूलों आदि सभी बातों के बारे में  जितने प्रभावकारी ढंग और भाव प्रवणता के साथ शेर कहे हैं उनकी मिसाल शायद ही किसी दूसरे शायर के यहां मिल सके।’’5

उनके जीवन का अधिकांश समय दिल्ली में व्यतीत हुआ। दिल्ली से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होंने अपनी मसनवी ‘शिकायतनामा मोमिनपुर’ में दिल्ली के फल-फूल तथा जलवायु इत्यादि की दिल खोलकर प्रशंसा की है। दिल्ली के प्रति उनके मन में अगाध प्रेम एवं सम्मान की भावना थी। वे दिल्ली को सिर्फ दिल्ली न कहकर हज़रत-ए-देहली कहा करते थे-

हजरते देहली कनफे दीन व दान
जन्नते अदन अस्त कि आबाद बाद
गर सनूद किस्सा ई बोस्ताँ
मक्का शवद तायफे हिन्दोस्ताँ।
  (‘मसनवी किरानुस्सरदैन’6)
(अर्थात् दिल्ली के न्याय-धर्म तथा दान की कीर्ति दूर-दूर तक फैली है। वह अदन की जन्नत है। अपनी विशेषताओं के कारण यह ‘स्वर्ग के बाग’ की भांति है। इस बाग का किस्सा सुनकर मक्का भी हिन्दोस्तान का तवाफ (परिक्रमा) करने लगे।)

अमीर खुसरो बहुभाषाविद् थे। अरबी, फारसी और तुर्की में वे निपुण थे। यदि खड़ीबोली उनकी विरासत थी तो संस्कृत पर भी उन्हें अधिकार प्राप्त था। खड़ीबोली हिंदी का उज्जवल भविष्य तो मानो उन्होंने अपनी पारखी आँखों से तभी देख लिया था। उन्होंने अपनी रचनाओं में खड़ीबोली का प्रयोग किया और खड़ीबोली हिन्दी के प्रथम कवि कहलाये। उल्लेखनीय है कि इस हिन्दी की प्रशंसा उन्होंने हिन्दुई, हिन्दवी या देहलवी नाम से की है। खड़ीबोली संज्ञा शब्द तो बहुत बाद में प्रचलन में आया। उनकी ‘हिन्दवी’ में ब्रजभाषा का पुट है। उनकी भाषा के संबंध में शुक्ल जी का यह कथन उल्लेखनीय है- ‘‘इसी से अमीर खुसरो की हिन्दी रचनाओं में भी दो प्रकार की भाषा  पाई जाती है। ठेठ खड़ी बोलचाल पहेलियों, मुकरियों और दो सखुनों  में ही मिलती है। यद्यपि उसमें कहीं-कहीं ब्रजभाषा की झलक है। पर गीतों और दोहों की भाषा ब्रज या मुख-प्रचलित काव्यभाषा ही है।’’7

इनकी एक ग़ज़ल बहुत ही प्रसिद्ध है जिसका एक मिश्रा फारसी में और दूसरा हिंदी भी में है यह ग़ज़लप्रेमियों एवं ग़ज़ल के क्षेत्र में शोध कार्य करने वालों द्वारा बहुतायत से उद्धृत की जाती है-

जे हाले मिस्कीं मकुन तगाफुल दुराय नैना बनाए बतियाँ।
किताबे हिज्रां ना दारम-ए जाँ! न लेहु काहे लगाए छतियाँ।।8

तथा एक अन्य गज़ल़

जब यार देखा नैन भर दिल की गई चिंता उतर
ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाय कर।9

इन्हीं ग़ज़लों के आधार पर कुछ लोग अमीर खुसरो को ग़ज़ल का जन्मदाता भी मानते हैं। भले ही वे ग़ज़ल के जन्मदाता न हो किंतु यह स्पष्ट है कि उन्होंने ग़ज़ल के क्षेत्र में कई नवीन प्रयोग किए। अमीर खुसरो उच्चकोटि के संगीतकार भी थे। उन्होंने अपनी प्रतिभा से संगीत के क्षेत्र में भी समन्वय स्थापित किया। उन्होंने परंपरागत भारतीय संगीत एवं ईरानी संगीत का समन्वय कर अनेक नवीन राग-रागिनियों का आविष्कार किया। उन्होंने  न सिर्फ राग-रागिनियों वरन् कई वाद्ययंत्रों जैसे ढोलक, सितार, तबला आदि का भी आविष्कार किया- ‘‘अमीर खुसरो ने हिंदुस्तानी संगीत में ख्याल, कौल, कल्बाना, कव्वाली, तराना, तिल्लाना, नक्श, गुलनिगार, बहार, रंग, विदाई, बुलावनी, बसंत, बर्सात, तिरवट, चतुरंग, सोहेला, सवेला, मुखम्मस, मुअम्मा, मुलम्मा, चीस्तान (लुग्ज़ या पहेली), मसनवीं, खम्सा, नुस्खा, लोरी, खालिक-ए-बारी, रुबाईयात-ए-पेशवराँन, शहर आशोब, सनअतें, मुनकलिब, अब्यात-ए-सिलसिला या अब्यात-ए-सुर्ख आदि का आविष्कार किया। इसके अलावा खुसरो ने सितार, तबला और ढोलक नामक वाद्ययंत्रों का आविष्कार करने के साथ-साथ कई सौ राग-रागिनियों को ईजाद किया। यही नहीं उन्होंने सितार और तबले के बोल भी ईजाद किए और कई तालों का अविष्कार किया।’’10

संगीत से अमीर खुसरो को आत्मिक लगाव था। वे स्वयं अच्छे गायक थे, उनकी आवाज बहुत मधुर थी। उनके गुरु निजामुद्दीन औलिया प्रायः उनसे गीत-संगीत सुना करते थे। अमीर खुसरो के स्वभाव में मनमौजीपन विद्यमान था। किसी धर्म-संस्कृति में उन्हें जो परंपरा प्रिय लगती थी, मन की मौज में आकर वे उसका अनुकरण करना शुरू कर देते थे। यहाँ वह किसी भी प्रकार के सामाजिक अथवा धार्मिक बंधन की सीमा को नहीं मानते थे। अपनी समन्वयात्मक प्रकृति के कारण उन्होंने हिंदू संस्कृति की अनेक परंपराओं को खानकाहों में लोकप्रिय बनाया।

इस सम्बन्ध में उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसंग उल्लेखनीय है- ‘‘खुसरो ने भारतीय परंपरा से प्रभावित होकर बसंत के गीतों को भी दरगाहों और खानकाहों में लोकप्रिय बनाया।………..लोग कालकाजी के मंदिर पर सरसों के पीले फूल चढ़ा रहे थे और मस्त होकर बसन्त राग गा रहे थे। अमीर खुसरो उधर से निकले तो इस मनोहारी दृश्य को देखकर इतने भाव-विभोर हुए कि तत्काल हिंदी और फारसी के कुछ शेरों की रचना कर डाली। सरसों के पीले फूल हाथ में लेकर पगड़ी को मस्तानी अदा में टेढ़ा कर झूमते-झूमते हजरत निजामुद्दीन की सेवा में उपस्थित हुए। अमीर खुसरो की इस मस्त अदा को देखकर और उनका यह शेर सुनकर ख्वाजा निजामुद्दीन मुस्कुराने लगे-

अश्क रेज आमदस्त अब्र बहार
साकिया गुल बरेजो- बादः बयार

अर्थात् – बहार के मेघ अश्रु बहाने आ रहे हैं। साकी फूल बरसाओ और मदिरापान कराओ।

इसके बाद वे प्रतिवर्ष कालकाजी की मेले पर सूफी कव्वालों को लेकर जाते और आत्म विभोर होकर बसन्त के गीत और कव्वाली गाते।’’11

स्पष्ट है कि धार्मिक संकीर्णता से वे कोसों दूर थे। उनका संबंध प्रत्येक धर्म की अच्छी रिवायतों से था। उन्होंने अच्छी परंपराओं को ग्रहण करने में किसी भी प्रकार के धार्मिक भेदभाव को नहीं माना। जहाँ कुछ अच्छा मिला उन्होंने उसे तत्काल ग्रहण किया। उनका समय राजनीतिक छल-कपट और धार्मिक संकीर्णता का था। ऐसे वातावरण में और राज्याश्रय में रहकर भी उन्होंने स्पष्टता एवं निर्भीकता के साथ न सिर्फ सुल्तानों को उनके कर्तव्य से अवगत कराया वरन् मानवतावाद और सांस्कृतिक समन्वय का संदेश भी दिया, ‘‘अमीर खुसरो ने एक ईमानदार मार्गदर्शक निर्भीक राजधर्म उपदेष्टा की भाँति सुल्तान का कर्तव्य जनहित या प्रजा कल्याण बतलाया है। ‘तुगलकनामा’ और ‘नुह सिपहर’ दोनों ग्रंथों से यह बात परिपुष्ट होती है। खुसरो का कहना है कि सुल्तान का कर्तव्य केवल अपनी रक्षा और अथवा अपना ही कल्याण नहीं बल्कि वह समस्त प्रजा का उत्तरदायी है। ‘नुह सिपहर’ में भी यही इशारा है।’’12

उनकी अपने गुरु निजामुद्दीन औलिया के प्रति भक्ति अनन्य थी। गुरु के प्रति उनके अनुराग एवं श्रद्धा से गुरुभक्ति की शिक्षा ली जा सकती है। अपने गुरु औलिया के देहांत के उपरांत वे केवल छह मास तक ही जीवित रहे। गुरु विछोह उन्हें असहनीय था। आज भी प्रतिवर्ष उनके उर्स का आरंभ गुरु के देहांत का समाचार पाकर उनके द्वारा पढ़े गए इस दोहे से होता है-
गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस
चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस।।13

गुरु के प्रति ऐसी श्रद्धा एवं निष्ठा अनुकरणीय है। अमीर खुसरो के जीवन का अधिकांश समय राज दरबारों में व्यतीत हुआ किंतु उन्होंने लोकजीवन की कभी उपेक्षा नहीं की। राजसी ठाट-बाट को देखने और भोगने तथा सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने के बाद भी वे लोक जीवन से पूर्णतः जुड़े हुए थे। वे मानवताप्रेमी थे और आम आदमी के दुःख-दर्द से पूरा सरोकार रखते थे। उन्होंने अपने हिन्दवी गीत अथवा कव्वालियों में तत्कालीन हिंदुस्तान के आम जनजीवन से जुड़ी अनेक अभिव्यक्तियाँ की हैं। यहाँ तक कि मायके से विदा होती हुई बेटी की पीड़ा से भी उन्हें पूरा सरोकार था। घर से विदा होती हुई बेटी की यह मार्मिक पुकार किसी के भी हृदय को पिघला सकती है –

बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए
हाँ रे बाबुला तोरा संग छूट्यो ही जाय।14

परदेस  में ब्याही जाने वाली बेटियों के हृदय की पीड़ा को अभिव्यक्त करने में यह गीत पूर्णतः सक्षम है-

काहे को ब्याही बिदेश, अरे सुन बाबुल मोरे
काहे को ब्याही विदेश अरे लखि बाबुल मोरे
हम तो बाबुल तोरे पिंजरे की चिड़िया
अरे कुहुक-कुहुक रह जाए, अरे सुन बाबुल मोरे।15

स्पष्ट है कि लोक जीवन से गहराई से जुड़ा संवेदनशील व्यक्ति ही ऐसी हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति कर सकता है। धार्मिक कट्टरता का उनमें लेशमात्र भी न था। उन्होंने अपनी रचना ‘नुह सिपहर’ में बड़ी ही भावात्मक शब्दों में हिंदुस्तान के प्रशंसा की है। ‘सुन्नत’ अर्थात रसूल के कथन पर पूर्ण विश्वास व्यक्त करते हुए उन्होंने माना कि वतन की मोहब्बत यानी की ‘हुब्ब-ए-वतन’ ईमान का हिस्सा है-
वीं जे रसूल आमेदः किः जूमर-ए-दीं
हुब्ब-ए-वतन हस्त जे ईमां बः यकीं।16

वे अपने वतन हिंदुस्तान से बेपनाह मोहब्बत करते थे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में हिंदुस्तान को अन्य मुल्कों से श्रेष्ट बताया। साथ ही इस श्रेष्टता का कारण बताकर इसे साबित भी किया। कुछ लोग अमीर खुसरो पर धार्मिक पक्षपात का आरोप भी लगाते हैं। इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन्हें गैर इस्लामी करार देने की कोशिश की है। हिंदू धर्म एवं संस्कृति के प्रति उनकी आस्था एवं सम्मान देखकर उन पर बुतपरस्ती (मूर्तिपूजा) का आरोप लगाया गया। ऐसे लोगों को उत्तर देते हुए वे कहते हैं-
ख़लक मी गोयद के खुसरो बुत परस्ती मीं कुनद
आरे-आरे मी कुनम बा ख़लक वा दुनियाकार नीस्त।17
(अर्थात् – दुनिया कहती है कि खुसरो बुतपरस्ती (मूर्तिपूजा) करता है। हाँ-हाँ मैं करता हूँ। मेरा दुनिया से कोई सरोकार नहीं)

ऐसी निर्भीक तथा खरी बात उच्च कोटि के देशभक्त ही कर सकते हैं। भले कितने ही ताने कसे जायें, किंतु वे अपने मार्ग से नहीं डिगते। वे ऐसी प्रतिभा थे जिन्हें जाति-धर्म की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। हिंदी साहित्य तथा संगीत के प्रति उनका योगदान अमूल्य है। वह मानव निर्मित सभी बंधनों से परे थे। यदि बात प्रासंगिकता की चले तो आज के धार्मिक वैमनस्य वाले युग में खुसरो अपने समस्त साहित्य सहित प्रासंगिक हैं। उनका जीवन चरित्र मानवीय एकता एवं समन्वय का संदेश देता है। स्वयं उनका व्यक्तित्व ही सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक जान पड़ता है। अपने व्यक्तित्व की सहनशीलता एवं समन्वयात्मक प्रवृत्ति के कारण ही उन्होंने सात बादशाहों (ग्यासुद्दीन बलबन, कैकूबाद, जलालुद्दीन खिलजी, अलाउद्दीन खिलजी, कुतुबुद्दीन मुबारक, ग्यासुद्दीन तुगलक एवं मुहम्मद तुगलक) के दरबार में संरक्षण प्राप्त किया था। अपनी समन्वय भावना के कारण उन्होंने राम-कृष्ण की भक्ति से जुड़े अनेक गीतों की रचना की। ये गीत उनके हृदय की उदारता के परिचायक हैं तथा मानवमात्र को धार्मिक कट्टरता का त्याग करने का संदेश देते हैं-

बन के पंछी भये बाँवरे, मन के पंछी भये बाँवरे
कैसी बीन बजाई साँवरे, तार-तार की तान निराली।18

कहीं-कहीं उन्होंने भक्ति के क्षेत्र में भी समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया है। उदाहरण के लिए उनका यह गीत है जिसमें उन्होंने रामभक्ति के साथ सूफीभक्ति को जोड़ दिया है-

राम कौन बुझावै तपन मोरे मन की
लागी आग लगन की हाय राम
मोहे निज़ाम की हाय लागी लगन
राम के विरह में हाय जागी अगन
मन में लागी मोरे बिरह की अगन।19

उन्होंने होली से जुड़े अनेक गीत लिखे तथा वसंतोत्सव के समान खानकाहों में होली खेलने की परंपरा भी स्थापित की –

होली खेलन चलो री बिरज में सखी
होली खेलन चलो री चिश्त नगर में सखी
मोरी लाल चुनरिया पै रंग बरसै गुलाल बरसै
मोरे श्याम पिया तोरे दरस बिना मोरे नयन तरसै।20

अमीर खुसरो एक ऐसा महान व्यक्तित्व थे जिनका सांप्रदायिकता से कोई लेना-देना न था। वे मानवीयता को सबसे बड़ा धर्म मानते थे। उनके द्वारा लिखे गए हिंदू धर्म-संस्कृति से जुड़े गीत-कव्वाली इसके परिचायक हैं। धर्म निरपेक्षता के विषय में वे अपने गुरु ‘निजामुद्दीन औलिया’ से भी प्रभावित थे। निजामुद्दीन औलिया भी हिंदू-मुस्लिम में कोई भेद नहीं मानते थे। अपने वतन हिंदुस्तान से वे अथाह प्रेम करते थे। हिंदुस्तान के विषय में भी कहते हैं-
हस्त मरा मौलिद ओ-मावा-ओ वतन
(अर्थात्- यही मेरा जन्मस्थान और यही मेरी मातृभूमि है)21

निश्चित ही वे किसी विशेष धर्म-संस्कृति संबंधित न होकर हिंदुस्तान की साझी-संस्कृति, साझी विरासत के प्रतीक हैं। वर्तमान समय में जबकि धार्मिक वैमनस्य चरम पर है तथा अपनी-अपनी धर्म-संस्कृति को लेकर छोटे-छोटे प्रसंगों में तनाव एवं अराजकता की स्थिति बन जाती है, वहाँ उनके जीवन-चरित्र एवं साहित्य से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। प्रत्येक संस्कृति के जीवंत एवं प्रेरणादायी तत्वों को ग्रहण करने की शिक्षा उनसे ली जा सकती है। उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक समन्वय की भावना अनुकरणीय है। इसके द्वारा लोगों के आपसी वैमनस्यों को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। गंगा-जमुनी तहजीब हिन्दुस्तान की परंपरा एवं पहचान है और अमीर खुसरो इस गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक हैं। उनका जीवन-चरित्र मानवता की राह से भटके हुओं को बखूबी राह दिखाने का कार्य कर सकता है।
संदर्भ सूची-
1.          अमीर खुसरो: व्यक्तित्व और कृतित्व, डॉ0 परमानंद पांचाल, हिंदी बुक सेंटर, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2001 ई0 पृ0 31 से उद्धृत शिबली नोमानी का कथन।
2.         अमीर खुसरो: व्यक्तित्व और कृतित्व, डॉ0 परमानंद पांचाल, हिंदी बुक सेंटर, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2001ई0 पृ0 03
3.         वही, पृ0 04
4.         अमीर खुसरो का हिन्दवी काव्य, गोपीचंद नारंग, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2013 पृ0 25
5.         वही पृष्ठ 25
6.         अमीर खुसरो: व्यक्तित्व और कृतित्व, डॉ0 परमानंद पांचाल, हिंदी बुक सेंटर, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2001ई0 पृ0 16
7.         हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, आठवें संस्करण की पुनरावृत्ति 2017 पृ0 34
8.         अमीर खुसरो: व्यक्तित्व और कृतित्व, डॉ0 परमानंद पांचाल, हिंदी बुक सेंटर, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2001ई0 पृ0 75
9.         हिंदी ग़ज़ल: उद्भव और विकास, रोहिताश्व अस्थाना, सुनील साहित्य सदन, नई दिल्ली, संस्सकरण 2010 पृ0 144
10.        अमीर खुसरो: एक बहुआयामी व्यक्तित्व प्रदीप शर्मा ‘खुसरो’ साक्षी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण-2016, पृ0 264
11.         अमीर खुसरो: व्यक्तित्व और कृतित्व, डॉ0 परमानंद पांचाल, हिंदी बुक सेंटर, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2001ई0 पृ0 24-25
12.        अमीर खुसरो: एक बहुआयामी व्यक्तित्व प्रदीप शर्मा ‘खुसरो’ साक्षी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण-2016, पृ0 257
13.        अमीर खुसरो: भावात्मक एकता के मसीहा, डॉ0 मलिक मोहम्मद, पीताम्बर पब्लिशिंग कम्पनी, नई दिल्ली, द्वितीय संस्करण-1987, पृ0 199
14.        अमीर खुसरो: एक बहुआयामी व्यक्तित्व प्रदीप शर्मा ‘खुसरो’ साक्षी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण-2016, पृ0 227
15.        वही, पृ0 226
16.        वही, पृ0 246
17.        अमीर खुसरो: व्यक्तित्व और कृतित्व, डॉ0 परमानंद पांचाल, हिंदी बुक सेंटर, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2001ई0 पृ0 19
18.        अमीर खुसरो: एक बहुआयामी व्यक्तित्व प्रदीप शर्मा ‘खुसरो’ साक्षी प्रकाशन, दिल्ली, प्रथम संस्करण-2016, पृ0 228
19.        वही, पृ0 236-237
20.       वही, पृ0 229
21.        अमीर खुसरो का हिन्दवी काव्य, गोपीचंद नारंग, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2013 पृ0 24

सोफिया खातून, शोधार्थी, हिन्दी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय अलीगढ़
मो0 नं0 9520652667

Email -Saufiakhatoon84@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *