क्रांतिकारी शहीद भगवतीचरण बोहरा व दुर्गादेवी – डा. सुभाष चंद्र

भगवतीचरण बोहरा व दुर्गादेवी (क्रांतिकारी इन्हें दुर्गा भाभी कहकर पुकारते थे) का क्रांतिकारी इतिहास में उल्लेखनीय योगदान है। संगठन की रणनीति बनाने का काम हो, परचे-पेम्फलेट लिखने का काम हो, धन जुटाने को काम हो, सूचनाएं एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम हो या फिर बम बनाने का क्रांतिकारियों के हर काम में इस दंपति ने अग्रणी भूमिका निभाई।

भगवतीचरण बोहरा व दुर्गादेवी (क्रांतिकारी इन्हें दुर्गा भाभी कहकर पुकारते थे) का क्रांतिकारी इतिहास में उल्लेखनीय योगदान है। संगठन की रणनीति बनाने का काम हो, परचे-पेम्फलेट लिखने का काम हो, धन जुटाने को काम हो, सूचनाएं एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम हो या फिर बम बनाने का क्रांतिकारियों के हर काम में इस दंपति ने अग्रणी भूमिका निभाई।

दुर्गा भाभी और भगवतीचरण बोहरा

7 अक्तूबर, 1929 को शहीद भगतसिंह व अन्य क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी के बाद जब क्रांतिकारी आंदोलन और दल घोर संकट से गुजर रहा था तो भगवतीचरण बोहरा व दुर्गा भाभी ने विशेष भूमिका निभाई।

28 मई 1930 को रावी नदी के किनारे बम-परीक्षण के दौरान भगवती चरण बोहरा शहीद हो गए। दुर्गा भाभी का जीवन संघर्षों से भरा रहा।

इनको याद करते हुए इनके जीवन पर प्रकाश डालेंगे।

इस दंपति की उम्र में करीब करीब तीन साल का अंतर था। भगवतीचरण वर्मा का जन्म हुआ था 15 नवम्बर सन 1904 को। दुर्गादेवी का जन्म हुआ था 7 अक्तूबर 1907 में।

जिस समय भगवतीचरण बोहरा और दुर्गादेवी का विवाह हुआ तो उस समय बोहरा की उम्र थी 14 साल और दुर्गादेवी की उम्र थी 11 साल। ये बात हैं सन् 1917-18 की।

इन दोनों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि एक ही थी। बोहरा का परिवार लाहौर में बस गया था। लेकिन मूलतः उसका ताल्लुक आगरा से था। दुर्गा देवी का परिवार भी आगरा के स्टेशन शहजादपुर, तहसील भरवारी से ताल्लुक रखता था।

विवाह के बाद दुर्गादेवी ने शिक्षा प्राप्त की। भगवतीचरण बोहरा का साथ व अनुकूल परिवेश पाकर एक साधारण महिला से क्रांतिकारी बनी। आपसी विश्वास, बराबरी व सामाजिक कार्यों में सहभागिता से जिस तरह इस दंपति ने जीवन जिया भारतीय समाज में यदि उसकी मिसाल मिलती है तो जोतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले का दाम्पत्य जीवन। जिस तरह जोतिबा का साथ और शिक्षा से सावित्रीबाई फुले का स्वतंत्र व्यक्तित्व विकसित हुआ उसी तरह सबके साथ बैठकर खाना खाने में संकोच करने वाली दुर्गा का तेजोमयी व्यक्तित्व विकसित हुआ। जो न केवल जोखिम भरे कार्यों को दक्षता से करने में सक्षम था, बल्कि जीवन क्रांति का पर्याय बन गया।

सांडर्स वध के बाद भगतसिंह की पत्नी के रूप में अपनी व अपने तीन साल के बच्चे शची की जान दाव पर लगाकर जब लाहौर से कलकत्ता पहुंची। वहां सुशीला बहन और भगवतीचरण बोहरा स्टेशन पर उन्हें लेने आए। उस समय के भगवतीचरण बोहरा के शब्द उनके आपसी विश्वास व क्रांतिकारी कार्य के प्रति निष्ठा को बयान करते हैं। दुर्गा ने बताया है कि “मैं भगतसिंह को लेकर स्टेशन पर उतरी, तो वे भाव-विभोर हो उठे। मुझे वहीं प्लेटफॉर्म पर ही शाबाशी देने लग गए, पीठ थपथपा कर कहा, ‘मैं समझता हूँ कि हमारी तुम्हारी शादी तो सच पूछो आज हुई है, इसके पहले तो मेरा ख्याल था कि हमारे-तुम्हारे पिता की थैलियों में शादी हुई थी।’ 

भगवतीचरण बोहरा का परिवार संपन्न था और अंग्रेजी शासन जुड़ा था। लेकिन भगवतीचरण विद्रोही प्रकृति के थे, उन्हें अंग्रेजी शासन से नफरत थी। इसीलिए जब अंग्रेजी सरकार ने इनके पिता को रायबहादुर का खिताब देने का फैसला किया और इसके भव्य आयोजन के लिए घर सजाया जा रहा था तो विरोधस्वरूप उन्होंने घर छोड़ दिया।

भगवतीचरण के नाम के पीछे ‘बोहरा’ पद लगा है उसका कारण है कि उनका परिवार पैसे का लेन-देन करता था, इसीलिए बोहरा के तौर पर प्रसिद्ध था। यूं वे नागर ब्राह्मण थे। भगवतीचरण ने एम.एससी. की पढ़ाई की थी और जर्मनी जाने की भी सोच रहे थे।

दुर्गादेवी और भगवतीचरण के विवाह का निमित्त बनी दुर्गा देवी की बुआ। दुर्गा देवी का बचपन कष्टों और उपेक्षा भरा रहा।

दुर्गा की मां यमुना देवी अभी उसके जन्म की पहली साल गिरह भी नहीं मना पाई थी, कि उनका देहांत हो गया। दुर्गा अभी केवल दस महीने की थी। अभी तो वह ‘मां’ शब्द का ठीक से उच्चारण भी नहीं कर पाती थी, मां को ‘पम’ ही कहती थी। लोग उसके ऐसा कहने पर हंसते थे।

मां की मृत्यु के बाद पिता पं. बांकेबिहारी भट्ट ने दूसरा विवाह कर लिया था। सौतेली मांओं के क्रूर बरताव के जो किस्से समाज में प्रचलित हैं वो यहां भी अपवाद नहीं बने। जब मौका मिलता तभी इसके दर्शन होते। दुर्गादेवी ने बताया है कि किसी दिन रास्ते में किसी व्यक्ति ने कान में पहना गहना उतार लिया तो मां ने रौद्र रूप दिखाया। दुर्गा देवी अभी तीसरी कक्षा में पढ़ रही थी तो उसे अक्षरों की दुनिया से दूर कर दिया।

भारतीय मिथकों में दुर्गा को शक्ति की देवी और प्रतीक माना जाता है। दुर्गा ने अपने रोमांचक व साहसपूर्ण रोमांचक कार्यों से अपने नाम को सार्थक किया। इस नाम की भी अपनी एक दिलचस्प कहानी ये है कि इलाहाबाद के कटरेवाले मकान के पास दुर्गा का मंदिर था। पं. बांकेबिहारी दुर्गा के भक्त थे और अपनी बेटी को ‘जय दुर्गा’ कहकर पुकारते थे। पंडित जी अपने व्यक्तिगत जीवन में इतने ईमानदार थे कि डाक के एक लिफाफे में दो लोगों को पत्र भेजने को बेईमानी समझते थे। दूसरी शादी के बाद पं. बांकेबिहारी को वैराग्य उत्पन्न हो गया। दुर्गादेवी का पालन-पोषण हुआ बुआ की देखरेख में या कहो कि अब दुर्गा पर बुआ का नियंत्रण था।

बुआ का बड़ा लड़का लाहौर में नौकरी करता था। एक बार बुआ अपने लड़के से मिलने गई तो उन्होंने भगवतीचरण के परिवार को देखा। अच्छा लगा। रिश्ता पक्का कर दिया।

बोहरा का परिवार संपन्न परिवार था, लेकिन दुर्गादेवी के परिवार में भी कोई तंगी नहीं थी। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि दुर्गा के पिता ने बटुकनाथ अग्रवाल के पास पांच हजार रुपए उसके लिए रख दिए थे, जो संकट के समय दुर्गा के काम भी आए।
भगवतीचरण के तीन मकान लाहौर में थे और दो मकान इलाहाबाद में थे। दुर्गादेवी का कहना है कि “उस जमाने में अपने श्वसुर से 40 हजार रुपए मिले थे।”

इस दंपति ने धन से कभी मोह नहीं रखा। क्रांतिकारी गतिविधियों में धन खर्च करते थे। हालांकि भगवतीचरण की शहादत के बाद दुर्गादेवी को घोर अभाव देखने पड़े। मकानों को तो अंग्रेजी सरकार ने जब्त कर लिया था और कुछ पैसे जो भगवतीचरण ने किसी व्यक्ति को दिए हुए थे, वापस करने से मना कर दिया।

एक बार क्रांतिकारी दल में भगवतीचरण बोहरा के प्रति सी.आई. डी. का आदमी होने का भ्रम फैला। प्रोफेसर जयचन्द्र विद्यालंकार लाहौर में नेशनल कॉलेज में इतिहास पढ़ाते थे। जिन्होंने लाहौर के भगतसिंह, भगवतीचरण, यशपाल यवकों को शुरू-शुरू में क्रांतिकारी दल की ओर उन्मुख किया था। वे भगवतीचरण को सी० आई० डी० का आदमी बताने लगे थे। इस कारण वे संदेह के घेरे में आ गए। ऐसे में उनसे एक दूरी स्वाभाविक ही थी। चंद्रशेखर आजाद जो संगठन के नेता थे उन्होंने बी मिलने से मना कर दिया था। इससे भगवतीचरण को गहरा दुख हुआ, लेकिन वे संगठन का काम निष्ठापूर्वक करते रहे। इस संदेह के समाप्त होने में काफी वक्त लगा। जब चंद्रशेखर आजाद ने इस संबंध में कहा भगवतीचरण को कहा तो वे वे केवल मुस्करा भर दिये। बोले कुछ नहीं।

वचनेश त्रिपाठी ने “क्रांतिमूर्ति दुर्गा भाभी” पुस्तक में भगवतीचरण बोहरा का लिखा ‘भैरवी-गीत’ दिया है। इससे पता चलता है कि भगवतीचरण बोहरा सिर्फ लेख ही नहीं लिखते थे, बल्कि कविता रचना भी करते थे।

“भैरवी-गीत” 
भैरवि! नृत्य करो तुम आकर।
वीर-विगत भारत वसुन्धरा, सींचो रक्त बहाकर ॥१॥

ढाल ढाक-ढफ-ढोलक-ढक्का, खङ्ग-मजीरा बाजें।
कवच-त्रिशुल, झनाझन झांजे, सुन्दर स्वागत साजें ॥२॥

सिंह-सवारी, शूल हाथ में, धनुष-बाण सान्धानें।
अट्टहास रण-रव-दिशि-पूरित, माया शत्रु फंसाने ॥३॥

चन्द्रहास-चपला चमकाओ, शीश गिरें कट-कट कर।
रूण्ड-मुण्ड, अरि-झुण्ड-खण्ड बहु, शंकर-शीश सजाकर ॥४॥

यश-प्रसार, मद ममता नाशे, त्रिभुवन बल न समाए।
डगमग-डगमगाय भू-मण्डल, शेष लाज सकुचाए ॥५॥

अति विकराल, कराल काम सम, भीषण मुख फैलाओ। 
शेष-रज्जु-मथनी समान तुम, मथ-मथ शत्रु मिटाओ॥६॥ “भैरवि”

यह गीत भगवतीचरण बोहरा के हाथ से लिखे मूल गीत को पढ़कर उतारा गया है, फलतः उनकी हस्तलिपि एक-दो स्थान पर ठीक पढ़ न पाने से और स्याही सघन हो जाने से संभव है, किसी पंक्ति का कोई शब्द अशुद्ध आ गया हो। परन्तु इस गीत का भाव हृदयंगम करते हुए कोई भी प्रबुद्ध पाठक उस उद्भट क्रांतिकारी के जीवन के मर्म और उसके ध्येय से अवगत हो सकता है । उस युग में इस प्रकार अपने स्वतः के जीवन को “भैरवी” के आह्वान से जोड़ने और तदनुरूप आचरित करने वाले पढ़े-लिखे युवक भारत में कितने थे? यह भारत मही रक्त-सिंचित हो, क्योंकि अब इसका स्वरूप ‘वीर-विगत’ दृश्यमान है। और जब भैरवी नृत्य करे यहां तो वाद्य बजे “खङ्ग-ढाल” “कवच और त्रिशूल” के । भैरवी आगे सिंह को सवारी बनाकर, शूल-पाणि, शर-सन्धान करती हुई दिशा-दिशा उसके रणोन्मत्त अट्टहास से गूंज रही हो – माया रूपी शत्रु का शिकार कर रही हो, शीश छिन्न-विछिन्न हो-होकर पृथ्वी पर बिखर रहे हो ।शत्रु समूहों के मुण्ड-रुण्ड काटती हुई उन मुण्डों से शिव को सजाती हुई उस भैरवी की शक्ति त्रिभुवन में न समा रही हो, भू-मण्डल डगमगा जाये, शेष नाग लज्जित हो संकोच से घिर जायें और वे विकराल-काल-मुखी माता शेष नाग की रज्जु बनाकर शत्रु-दल का मंथन करते हुए नाश करें।” (वचनेश त्रिपाठी, क्रांतिमूर्ति दुर्गा भाभी, पृ.-76, हिंदी साहित्य अकादमी दिल्ली, सं. 1996)”

28 मई 1930 को भगवतीचरण बोहरा शहीद हो गए। रावी के किनारे बम का परीक्षण करने गए थे। बम उनके हाथ में फट गया।क्रांतिकारी विश्वनाथ वैशम्पायन उस समय मौके पर ने चंद्रशेखर आजाद की जीवनी “अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद” में  भाई भगवतीचरण की शहादत नाम से एक अध्याय में इस घटना पर विस्तार लिखा है, यहां हम उस अंश को दे रहे हैं।

“28 मई 1930 को भगवतीचरण, सुखदेवराज तथा मैं लगभग दस-ग्यारह बजे भोजन कर रावी के किनारे घने जंगल में बम विस्फोट के लिए गए। जब रावी के किनारे पहुँचे तो साइकिल घाट पर ही छोड़ दी। यूनिवर्सिटी क्लब की नावें जिस व्यक्ति की देखरेख में थीं वह सुखदेवराज से अच्छी तरह परिचित था तथा सुखदेवराज बोट क्लब का सेक्रेटरी भी था। इसलिए नाव मिलने में कठिनाई न हुई। सुखदेवराज और बापू भाई नाव खेना जानते थे। इसलिए मल्लाह भी साथ लेने की आवश्यकता नहीं थी। आते समय रास्ते में कुछ सन्तरे व एक तरबूज साथ ले लिया था। गर्मी तेज थी, लू भी जोरों से चल रही थी। नाव जब जंगल के पास पहुँची तो उसे किनारे लगाकर खुंटे से बाँध दिया गया। साथ ही तरबूज भी नाव में ही छोड़ दिया गया। यह सोचकर कि लौटकर नाव पर ही उसे खाएँगे। सन्तरे भी साथ ले लिए थे कि प्यास लगने पर उनसे प्यास बुझाई जा सके। इन दिनों भाई भगवतीचरण बहुत प्रसन्न थे। आज़ाद से मिलकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई थी। वे कहा करते थे कि भैया के साथ काम कर ब्रिटिश शासन से टक्कर लेने में अब मजा आएगा। वे अनुभव करने लगे थे कि उनकी सारी जिम्मेदारी मानो आज़ाद ने सहेज ली हो और वे उस भार से मुक्त हो गए हों। उन्हें अब ऐसा व्यक्ति मिल गया है जिससे वे परामर्श कर उचित मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि वे भगत और दत्त को छुड़ाने में सफल हो जाएँगे। 

जंगल में एक सुरक्षित स्थान देखकर हम लोग रुके। सामने एक बड़ा सा गड्ढा था। उसी में बम फेंककर परीक्षण करना था। पहले सुखदेवराज ने बम फेंकने को लिया, परन्तु उसने उसे देखने पर कहा कि बम की पिन ढीली है। इस पर मैंने उसे चलाने की इच्छा प्रकट की। बापू भाई ने बम हाथ में लेकर देखा और बोले, ‘तुम लोग पीछे हटो मैं देखता हूँ।’ हम दोनों ने बहुत मना किया पर वे न माने, अपनी जिद पर अड़े रहे। पिन निकाली, फेंकने को हाथ उठा भी न पाए थे कि बम का विनाशकारी विस्फोट उनके हाथ में ही हो गया। धुएँ का गुब्बार छा गया। उसके कम होते ही हमने देखा कि बापू भाई जमीन पर जख्मी हो पड़े हैं। इधर सुखदेवराज के बाएँ पैर में एक बम का टुकड़ा घुस गया था। हम दोनों ने तय किया कि सुखदेवराज बँगले में जाकर साथियों को खबर दे और मैं बापू भाई के पास रहूँ। यह सब क्षण भर में ही हो गया। राज के जाने पर मैंने बापू भाई को सहारा देकर जंगल के घने भाग में ले गया जिससे विस्फोट की आवाज से यदि कोई इधर आए भी तो उसे पता न चले। 

भाई भगवतीचरण को भूमि पर लिटाकर मैं उनके घावों पर पट्टियाँ बाँधने लगा। उनका एक हाथ कलाई से उड़ गया था। दूसरे हाथ की उँगलियाँ कट गई थीं। सबसे बड़ा घाव पेट में था जिससे कुछ अंतड़ियाँ बाहर निकल आई थीं। मैं एक हाफ पैंट और कोट को छोड़ शरीर पर जितने कपड़े थे उन सबको फाड़-फाड़कर उनके घावों पर बाँध चुका था। पर रक्त की धाराएँ धरती का अभिषेक किए ही जा रही थी। इतनी शारीरिक वेदनाएँ होते हुए भी उनके मुख पर मुस्कान वैसी ही थी। मानो वे वेदनाएँ उन्हें छू भी नहीं रही थीं। मृत्यु की उपेक्षा का यह अदम्य साहस था। मेरी स्थिति ऐसी थी मानो अपने मृत्यु का ही चित्र मैं अपने सामने देख रहा हूँ। उनके शरीर की मूक वेदनाएँ मेरी मानसिक वेदना का बोझ बनती जा रही थीं।

मैंने रुंधे कंठ से इतना ही कहा, ‘भैया आपने यह क्या किया।’ उत्तर में वही हठीली मुस्कान, वही शान्त मधुर वाणी-‘यह अच्छा ही हुआ। यदि तुम दोनों में से कोई घायल हो जाता तो मैं भैया को मुख दिखाने लायक न रहता।’ आत्मबलिदान का कितना महान आदर्श ! मृत्यु से संघर्ष जारी था पर अन्त में विजय मृत्यु की हुई।

उन्होंने हँसते-हँसते देश की स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर अपने आपको चढ़ा दिया। बलिदान की आहुति पूर्ण हुई। पार्थिव शरीर छोड़ने के पूर्व उनका इतना ही सन्देश था। मेरी मृत्यु भगत-दत्त को छुड़ाने की योजना में बाधक न हो। उस कर्तव्य की पूर्ति ही मेरी आत्मा को शान्ति देगी। बाकी जो कहा वह मानो कोई अपने छोटे भाई से कह रहा हो। अपनी भाभी का साथ न छोड़ना, यह कहते-कहते उनके दोनों हाथ ऊपर उठे मानो वे मेरे अश्रु पोंछना चाहते हों। पर सान्त्वना का सुखद स्पर्श प्रदान करनेवाली उँगलियाँ तो होम हो चुकी थीं। वे निर्निमेष दृष्टि से मेरी ओर देखते रहे। फिर प्यास और पानी की पुकार। पास जो सन्तरे थे उन्हें छील-छील कर खिलाता रहा। उसके बाद पास के गड्ढे से हैट में पानी भरकर लाता और बूंद-बूंद उनके मुँह में टपकाता रहा। बीच-बीच में गीले कपड़े से उनका मुँह भी पोंछता रहा। पर यह सब तो मन को केवल समझाना मात्र था। मैं बार-बार आहट लेता था कि शायद कहीं साथी डॉक्टरी मदद लेकर आ रहे हों। पर घंटों बीत गए कोई नहीं। फिर यशपाल की आवाज सुनाई दी। थोड़ी ही देर में वह छैलबिहारी के साथ वहाँ पहुँच गया।
मैंने पूछा-‘डॉक्टरी सहायता नहीं लाए।’ उत्तर था, ‘भगवती भाई को ले जाने के लिए टैक्सी लाया हूँ !’ परन्तु टैक्सी में उन्हें ले जाना असम्भव था।
अब हम छैलबिहारी को वहाँ छोड़ डॉक्टरी सहायता के लिए वापस लौटे। पहले इन्द्रपाल के घर जाकर उसे एक चारपाई और कुछ आदमियों के साथ वहाँ जाने को कहा और तब मेडिकल कॉलेज गए। वहाँ सच्चिदानन्द वात्स्यायन के भाई ब्रह्मानन्द जो मेडिकल कॉलेज में पढ़ते थे, उनकी सहायता से कुछ और साथी और आवश्यक दवाइयाँ ले घटनास्थल की ओर गए। – घना अन्धकार ! टार्च की रोशनी के सहारे हम जंगल में घुसे। मास्टर छैलबिहारी को पुकारना प्रारम्भ किया परन्तु कोई उत्तर नहीं। इसी बीच टार्च की रोशनी में सफेद की धज्जियाँ बँधी दिखाई दी। उन्हीं के सहारे आगे बढ़े। बापू भाई का शरीर एकान्त में पड़ा था। छैलबिहारी का कहीं पता नहीं था। सूर्यास्त के साथ ही बाप भाई महायात्रा का बहुत-सा मार्ग चलकर पार कर चुके थे। दूर बहुत दूर हमारी पहुँच बाहर । केवल हमारी श्रद्धांजलि ही उन तक पहुँचने में समर्थ थी। इसलिए उन्हें ले जाने के लिए हम जो चादर लाए थे उसी में उनका पार्थिव शरीर लपेट दिया, एक मिनट मौन हो शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित कर दल का एक महान नेता खोकर हम असहाय दीन हो बँगले वापस लौटे। 

वहाँ लोगों को छैलबिहारी से सबकुछ मालूम हो चुका था। बीच के कमरे में बैठे सभी हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। सभी की दृष्टि में प्रश्न चिह्न थे और हमारी झुकी दृष्टि ही मानो उन सबका मौन उत्तर था। मैं भी उन्हीं के बीच बैठ गया। आँसू फिर बह चले। भाभी आँखें बन्दकर निश्चल बैठी थीं। दीदी सिर थामकर रह गई। भैया सिर झुकाकर आखें पोंछ रहे थे। धनवन्तरी भी बेहाल थे। मदन और छैलबिहारी भी उदास थे। राज घायल पलंग पर पड़ा था। अब भाभी उठी और सभी को धीरज बँधाने लगी, परन्तु उनका भी यह साहस अधिक देर न टिक सका। मैंने तथा भैया ने उन्हें ले जाकर पलंग पर लिटा दिया। भैया ने उन्हें धीरज बँधाते हुए कहा-‘तुमने पार्टी के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर दिया है। तुम्हारे प्रति हम अपने कर्तव्य को कभी न भूलेगें।’ दीदी और धनवन्तरी सारी रात भाभी के पास बैठे रहे। 

यह सब होते हुए भी भगवती भाई का अन्तिम संस्कार तो करना ही था। रात बापू भाई की स्मृति में आँखों में ही बीत गई। भाभी तथा दीदी ने बापू भाई के अन्तिम दर्शनों की इच्छा प्रकट की परन्तु सारी परिस्थिति समझकर भैया ने ऐसा करने से उन्हें मना किया। इतने सबेरे दो स्त्रियों को साथ लेकर रावी के जंगल में जाना खतरे से खाली नहीं था। धनवन्तरी ने गैती और फावड़ों की व्यवस्था की। धनवन्तरी, आज़ाद और मदनगोपाल पौ फटने के पूर्व ही रवाना हो गए। सूरज निकलते-निकलते वे शव को धरती माता की गोद में सुला लौट आए। क्योंकि दाहसंस्कार करना खतरे से खाली नहीं था। नदी में इतना पानी भी नहीं था कि शव को प्रवाह कर दिया जाता।” (विश्वनाथ वैशम्पायन, अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद, पृ.-२२१- २२३ तक)

मरने के बाद भी पुलिस ने भगवतीचरण बोहरा को चैन नहीं लेने दिया। बाद में पुलिस को इसकी जानकारी मिली तो शहीद के शव को निकाला गया। उनकी अस्थियां द्वितीय लाहौर षडयंत्र के मुकदमे में प्रस्तुत की गई।

विश्वनाथ वैशम्पायन ने लिखा है कि “भगवतीचरण जी ने लखनऊ के अमीनाबाद पार्क में एक किराए का मकान लिया और इस पर सेनिटरी सप्लायर्स का बोर्ड लगाया गया। … इसी अवसर पर बापू भाई ने ‘फिलासफी आफ दि बम’ पैम्फलेट तैयार किया।” (विश्वनाथ वैशम्पायन, अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद, पृ.-२०६)

26 जनवरी 1930 को ‘फिलासफी ऑफ दि बम’ के समस्त भारत में एक साथ बँटने से आम जनता में और विशेषकर नवयुवकों में एक नवीन चेतना का संचार हुआ तथा दल के प्रति लोगों की आस्था बढ़ी। जनता को यह विश्वास भी हो गया कि हमारी शाखाएँ सारे देश में हैं और इसका प्रमाण था कि ‘बम का दर्शन’ सारे देश में एक ही दिन, एक साथ बाँटा गया ! 1922 से अब तक दल की ओर से जितने पर्चे बँटे थे उनमें से यह पर्चा सबसे अधिक प्रभावशाली सिद्ध हुआ। इस पर्चे में जो तर्कसंगत विचार तथा गांधी जी की दलीलों के उत्तर दिए गए थे उससे शिक्षित जनता अत्यधिक प्रभावित हुईं।

(आभार -  क्रांतिमूर्ति दुर्गा भाभी - वचनेश त्रिपाठी व  अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद - विश्वनाथ वैशम्पायन)

 

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