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लोक साहित्य : प्रतिरोध की चेतना ही उसकी समृद्धि है – डॉ. अमरनाथ

लोक साहित्य में लोक जीवन का यथार्थ है, पीड़ा है, दुख है, मगर उस दुख और पीड़ा से जूझने का संकल्प भी है, मुठभेड़ करने का साहस भी है. यहां सादगी है, प्रेम है, निष्ठा है, ईमानदारी है और सुसंस्कार है. हमारे लोक साहित्य में लोक का जो उदात्त चरित्र चित्रित है वह शिष्ट साहित्य में दुर्लभ है. शिष्ट साहित्य और लोक साहित्य के बीच का फासला वस्तुत: दो वर्गों के बीच का फासला है.

डा. अमरनाथ

“छापक पेड़ छिहुलिया त बन अति गहबर हो,
तेहि तर ठाढ़ि हरिनियाँ त मन अति अनमन हो.
धरतई चरन हरिनवां त हरिनी से पूछहि हो,
हरिनी की तोर चरहा झुरान कि जल बिनु मुरझिउ हो.”
अवधी के इस लोक गीत में घने जंगल में उदास अनमन भाव से खड़ी हरिणी से उसका साथी हिरण पूछ रहा है – “प्रिये, क्या पानी के बिना तुम्हारा चेहरा मुरझाया हुआ है? अथवा चरहा ही सूख गया है? आखिर तुम उदास क्यों हो?”
हरिणी अपने साथी हिरण से अपनी उदासी का कारण बताती हुई कहती है कि, “न तो मेरा चरहा सूखा  है और न जल का ही अभाव है, मैं तुम्हारी चिन्ता में सूख रही हूँ। कल राजा दशरथ के घर उनके बेटे की छट्ठी है. उस दिन उनके यहां बहुत बड़ा भोज होगा, खुशी मनाई जायेगी. उस भोज में मांस  पकेगा और उसके लिए वे लोग तुझे मार डालेंगे. मैं उसी चिन्ता में उदास हूँ.”

अंतत: छट्ठी के भोज के लिए हिरण को मार डाला जाता है. उसका मांस बन रहा है. उसकी गंध दूर तक फैल रही  है. हरिणी  राजा दशरथ के घर उनकी प्रधान रानी कौशल्या के पास एक फरियाद लेकर जाती है. उसे उम्मीद है कि वे स्त्री हैं एक स्त्री का दुख जरूर समझेंगी.  रानी बड़े आसन ( मचिया ) पर बैठी हैं. हरिणी उनसे निवेदन करती है –
“मचिया पर बैठें कोसिल्ला रानी हरिनी अरज करे हो,
रानी मंसुआ त सीझे कड़हिया, खलरिया हमें देतिउ हो.”

अर्थात “हे रानी जी !  मेरे प्रिय साथी हिरण का मांस तो आप के यहां कड़ाही में पक ही रहा है. उसका स्वाद आप के यहां भोज में लोगों को मिलेगा ही. आप कृपा करके मेरे प्रिय साथी हिरण की चमड़ी हमें दे दे. मैं इसे ले जाकर पेंड़ पर लटका दूँगी और उसे देख-देख कर अपने मन को धीरज बंधाती रहूँगी मानो मेरा साथी हिरण जिन्दा है.”
“पेड़वा से टंगतीं खलरिया त हेरि-फेरि देखतिउं हो,
रानी देखि-देखि मन समुझइतीं जनुक हिरना जीअत हो.”

समस्त उत्तर भारत में राम कथा के प्रति जैसा आदर भाव है वैसा अन्य किसी भी मिथकीय वृत्त पर नहीं है. राम-सीता हमारे आराध्य हैं. उनसे हम चरित्र की भी शिक्षा लेते हैं. ऐसी राम कथा के प्रति जिस तरह की आलोचनात्मक दृष्टि इस लोक कवि की है वह हमें चकित करती है. रानी कौशल्या हरिणी के इस तुच्छ आग्रह को भी ठुकरा देती हैं. लोक कवि जानता है कि राजसत्ता शोषित पीड़ित प्रजा के प्रति तनिक भी उदार नहीं होती. कौशल्या हरिणी के इस आग्रह को ठुकराती हुई कहती हैं –
“जाहु-जाहु हरिणी घर आपन खलरिया नाहीं देइब हो,
खलरी से खजड़ी छवइबे त राम ओसे खेलिहें हो.”

हरिणी बेजारी उदास – दुखी लौट जाती है. हिरण की चमड़ी से खजड़ी बनती है, राम उससे खेलते हैं. जब जब खजड़ी बजती है हरिणी उसे अकनते हुए चुपचाप जहां की तहां खड़ी रह जाती है और अपने प्रिय साथी हिरण को याद करती है –
“जब-जब बाजे खजड़िया सबद सुनि अकनइ हो,
हरिणी ठाढ़ि ढेकुलिया के नीचे हरिनवा के बिसुरइ हे.”
निश्चित रूप से राम कथा के प्रति यह आलोचनात्मक दृष्टि लोक कवि की ही हो सकती है और ऐसे लोक कवियों की संवेदनाएं लोक भाषाओं में ही व्यक्त होती है.

हमारी स्पष्ट मान्यता है कि लोक साहित्य हमेशा प्रतिपक्ष का साहित्य होता है. वह व्यवस्था विरोध का साहित्य होता है. वस्तुत: किसी भी समाज में भाषा के तीन स्तर होते हैं, एक शासक वर्ग की भाषा जिसके माध्यम से मुख्यत: शासन संचालित होता है तथा जिसमें तथाकथित शिष्ट साहित्य का सृजन होता है, दूसरा स्तर जातीय भाषाओं का होता है और तीसरा जनपदीय भाषाओं और बोलियों का. ये स्तर भेद वैसे ही होते हैं जैसे समाज में वर्ग भेद. कहने के लिए समाज दो वर्गों में बँटा है -शोषक और शोषित. परन्तु इन दोनो वर्गों के बीच एक मध्य वर्ग भी होता है. इतिहास में इस मध्य वर्ग के चरित्र की बड़ी आलोचना की गई है- इसकी ढुलमुल नीति को लेकर.

बहरहाल, सबसे निचले स्तर पर जनपदीय भाषाओं अथवा बोलियों में रचा गया साहित्य होता है जिसमें बहुसंख्यक समाज की भावनाएं अभिव्यक्त होतीं हैं. यह साहित्य ज्यादातर मौखिक होता है. इसे ही लोक साहित्य कहते हैं क्योंकि मौखिक परंपरा से संचित होने के कारण अमूमन इसके रचनाकारों के बारे में पता नही होता. यहां इस तथ्य का उल्लेख करना भी जरूरी है कि आज की बोलियां कही जाने वाली जनपदीय भाषाएं भी उतनी ही पुरानी हैं जितनी की कोई भी जातीय भाषा.

 लोकभाषाओं में संचित लोक साहित्य और शासक वर्ग की भाषा में रचित शिष्ट साहित्य के बीच का चरित्रगत भेद उसके साहित्य में साफ दिखायी देता है भले ही उसपर अभी पंडितों की पैनी और वैज्ञानिक दृष्टि न पड़ी हो. लोक साहित्य बहती नदी के समान होता है, फलत: बहने के क्रम में धारा बहुत कुछ छोड़ देती है और इसी तरह नए तत्वों को अपने साथ बहाकर ले भी जाती है. लोक अपने आनंद में उसी तरह उत्फुल्ल होता है जैसे प्रकृति होती है. इसीलिए लोक का रचनात्मक आनंद कहीं भी व्यक्तिगत नहीं है. इस आनंद पर सबका अधिकार है. लोक गायकी में व्यक्तिगत गायकी है ही नही. औरत और पुरुष सामूहिक रूप से सोहर, फाग, कजरी, चैता आदि गाते हैं. अनेक सुरों की एकतानता से न किसी का अहंकार व्यक्त होता है न किसी की हीनता.

लोक की समस्त जीवन पद्धति और उसकी समस्त कला संरचनाओं का मूल लक्ष्य सत्य के करीब पहुँचने के साथ आत्म-मुक्ति के आनंद को प्राप्त करना होता है. अपनी भावनाओं के विस्तार के लिए उसने प्राकृतिक उद्दीपनों को अपनी काव्य चेष्टाओं में अभिव्यक्त किया है. वसंत, वर्षा, शरद्, ग्रीष्म आदि के अनुभवों ने उसके भीतर जो संवेदनाएं जागृत कीं उन्हीं संवेदनाओं के परिणाम स्वरूप उसने लोक कलाओं के स्फुरणों को समेटा है. चांचर, फाग, धमार, कजरी जैसी लोक गायकी  में ऋतु उद्दीपनों के साथ जैविक अनुभूतियों की अनुगूंज भी लय संरचना के रूप में रही होगी. उसके विषय वृत्त में क्रमश: फैलाव आता गया.

लोक और शिष्ट समुदाय के वाद्य भी अलग-अलग हैं. हुड़का, करताल, झाझ, मृदंग, ढोलक, नगारा, मजीरा, झाल, खजड़ी, सिंघा आदि प्रचलित लोक वाद्य हैं.

भक्ति काल को हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग कहा जाता है. रामविलास शर्मा ने इस काव्य को लोक जागरण का काव्य कहा है. यह लोक जागरण का काव्य भी वास्तव में लोक काव्य ही है. इसे लोक साहित्य के भीतर रखा जाना चाहिए. महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने तो हजारी प्रसाद द्विवेदी  का हवाला देते हुए हिन्दी के समूचे संत साहित्य को लोक साहित्य के भीतर समाविष्ट करने का प्रस्ताव किया है. वे लिखते हैं, “हिन्दी साहित्य के निर्माण में लोक साहित्य के तत्व प्रचुर परिमाण में पाए जाते हैं. अत कुछ विद्वानों के मतानुसार इन्हें लोक साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है. डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस विषय में गंभीर विवेचन करते हुए लिखा है,  “इन मध्य युग के संतों का लिखा हुआ साहित्य – कई बार तो यह लिखा भी नहीं गया, कबीर ने तो ‘मसि कागद’ छुआ ही नही था – लोक साहित्य कहा जा सकता है या नहीं? क्यों कबीर की रचना लोक साहित्य नहीं है? सच पूछा जाय तो कुछ थोड़े से अपवादों को छोड़कर मध्ययुग के संपूर्ण देशी भाषा के साहित्य को लोक साहित्य के अंतर्गत घसीटकर लाया जा सकता है.” ( जनपद, वर्ष-1, अंक-1, पृष्ठ-71). महापंडित राहुल सांकृत्यायन की तो स्पष्ट मान्यता है कि,  “हमारी सम्मति में हिन्दी साहित्य के वीरगाथा काल तथा भक्तिकाल की अधिकांश रचनाओं को लोक साहित्य में अंतर्भुक्त किया जा सकता है.” ( हिन्दी साहित्य का बृहद् इतिहास, षोडश भाग, संपादकीय, पृष्ठ-15)

बहरहाल, इस मुद्दे पर विवाद हो सकता है किन्तु भक्ति कालीन साहित्य का लोक साहित्य से अनिवार्य और अविभाज्य संबंध से इनकार नही किया जा सकता. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूरसागर के गीतों का वैशिष्ट्य निरूपित करते हुए संभावना व्यक्त की है कि उनका संबंध लोकगीतों की मौखिक परंपरा से था. वे लिखते हैं, “इन पदों के संबंध में सबसे पहली बात ध्यान देने की यह है कि चलती हुई ब्रज भाषा में सबसे पहली साहित्यिक रचना होने पर भी ये इतने सुडौल और परिमार्जित हैं. अत: सूरसागर किसी चली आती हुई गीत काव्य परंपरा का, चाहे वह मौखिक ही रही हो -पूर्ण विकास सा प्रतीत होता है.” ( हिन्दी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ- 113)

निस्संदेह हम कह सकते हैं कि लगातार मिटते रहने के बावजूद आज भी लोकगीतों, लोकगाथाओं, लोककथाओं, लोकनाट्यों और लोकोक्तियों-कहावतों आदि के रूप में विशाल साहित्य हमारे यहां मौजूद है जो पूरी तरह प्रतिपक्ष का साहित्य है, शोषित वर्ग का साहित्य है. उसमें अभाव का दर्द और दुख की टीस जरूर है किन्तु उल्लास की जीवंतता भी है.

मैथिली, मगही, भोजपुरी, अवधी आदि कई जनपदीय भाषाओं में एक फरगुद्दी ( गौरैया की ही एक जाति जो आकार में और छोटी होती है ) की कथा प्रचलित है. इस कथा में फरगुद्दी के चोंच की दाल के एक खूंटे में फँस जाने और उसे पुन: पाने के लिए उसके द्वारा किए गए अथक प्रयासों की दास्तान है. उस अपनी दाल के लिए वह बढ़ई, राजा, रानी, सांप, लाठी, आग, समुद्र, हाथी आदि सबके पास गुहार लगाती है किन्तु कोई सहायता  नहीं करता. अन्त में उसकी सहायता के लिए तैयार होती है एक चींटी. चींटी की पहचान लोकमानस में सबसे छोटे प्राणी की है. लोकमानस ‘चींटी से हाथी तक’ की अवधारणा पर ही चलता है.

 चींटी जिस आधार पर फरगुद्दी की सहायता के लिए तैयार होती है वह आधार है, “तूंहूं छोटी चाक के चिरई, हमहूं छोटी चाक के चिंउटी,” यानी, आकारगत समानता का आधार. पक्षियों में फरगुद्दी सबसे छोटी, कमजोर और निरीह होती है. चींटी भी है सबसे छोटी जीव. लोक कथाकार को विश्वास है कि फरगुद्दी की सहायता उसी की तरह का दलित-पीड़ित छोटा प्राणी ही कर सकता है. एक वर्ग-विभाजित समाज की अवधारणा समझे बगैर सहज अनुभव से अपने वर्ग- शत्रुओं और मित्रों की पहचान तथा लक्ष्य प्राप्ति में वर्ग-मित्र के सहयोग के प्रति लोक कथाकार की आस्था  उसके ‘आंखिन देखी’ का ही परिणाम है. इस लोक कथा से यह भी संदेश मिलता है कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ता है, हिम्मत कायम रखनी पड़ती है. सिर्फ गिड़गिड़ाने और सहयोग न मिलने पर चुप हो जाने से सफलता नही मिलती. ‘बिनु भय होय न प्रीति” लोक कवि के अनुभव का ही सार है.

लोक मानस में मनोरंजन का मुख्य आधार लोक गाथाएं होती हैं. भारत के कोने कोने के लोक जीवन में लोक गाथाएं बिखरी पड़ी हैं. अकेले भोजपुरी लोक में आल्हा, लोरिकायन, सोरठी बृजाभार, बिहुला विषधरी, गोपीचंद, राजा भरथरी, कुंवर बिजयमल, राजा ढोलन, नयकवा बनजारा, चनैनी, बाला लखंदर आदि अनेक लोकगाथाएं प्रचलित हैं. अनेक लोक कवियों, लोक कथाकारों और लोक नाटककारों ने अपनी रचनाओं से इस लोक साहित्य को समृद्ध किया है. भिखारी ठाकुर ने बिदेशिया के माध्यम से बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्सों में लोक जीवन पर जो असर डाला उसका अन्यत्र उदाहरण मिलना कठिन है.सच तो यह है कि इस लोक साहित्य का समुचित मूल्यांकन होना बाकी है.

1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम जिसे अंग्रेजों और कुछ ‘काले अंग्रेजों’ ने भी सिपाहियों का विद्रोह कहा है मुख्यत: सिपाहियों और किसानों द्वारा और खास तौर पर हिन्दी क्षेत्र में लड़ा गया. इस लड़ाई में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजानेवाले रणबांकुरों की वीरता के गीतों से लोक साहित्य भरा पड़ा है. बाबू कुंवर सिंह, अमर सिंह, राना बेनी माधो सिंह, रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे आदि पर असंख्य गीत लोक कवियों द्वारा रचे गए. शासकों के इतिहास से अलग यह जनता का इतिहास है. वे क्रान्तिकारी जो शासकों के लिए डकैत, बलवाई या गुंडे थे, जनता के लिए नायक थे. उल्लेखनीय है कि कोलकाता से मात्र बीस किलोमीटर दूर बैरकपुर में मंगल पाँडे ने अंग्रेजों के विरुद्ध गोली दागकर क्रांति की शुरुआत की थी परन्तु बंगला नवजागरण के रहनुमाओं को इसकी कोई खबर नहीं थी. वस्तुत: बंगला नवजागरण ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ नहीं था जबकि 1857 का विद्रोह सीधे ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध था.

सामाजिक यथार्थ और ईमानदारी लोक साहित्य का प्राण है. पितृसत्तात्मक समाज होने के कारण सदियों से नारी जाति  पुरुष के अंकुश में रही है, भोग्या रही है. स्त्री-पुरुष संबंधों के इस सत्य को लोक कवियों ने तरह- तरह से व्यक्त किया है. ब्रज के एक लोक गीत में विवाह के अवसर पर इस यथार्थ को इस तरह प्रकट किया गया है-
“काए कूं धाए परदेस रे सुनि बाबुल मेरे………
हम तो रे बाबुल तेरी अंगना की चिरियां, चुगि चुगि के उड़ि जाहिं रे सुनि बाबुल मेरे.
हम तो रे बाबुल तेरे खूंटा की गइया, जिती हाँकि हँकि जाहि रे सुनि बाबुल मेरे.

उपर्युक्त गीत में ‘अंगना की चिड़िया’ और ‘खूँटा की गइया’ भारतीय सामंती समाज में नारी जाति की हकीकत का सबसे प्रामाणिक बयान है.  

इसी तरह एक राजस्थानी लोकगीत में गाया जाता है कि यदि गर्भवती स्त्री पुत्र को जन्म देगी तो उसकी खाट ओबरिए ( घर के केन्द्रीय कक्ष) में बिछायी जाएगी और उसकी हर तरह की देखभाल की जाएगी किन्तु यदि वह पुत्री को जन्म देगी तो उसका कोई ख्याल नहीं करेगा.-
“जे थै जनमौली डावड़ों (लड़का) जी / थारी ओबरिए खाट घलांय, चिन्ता थारी म्हें करौं जी.
जे थै जनमौली डावड़ी (लड़की) जी / थारी चौड़ा मे खाट घलाँय, चिन्ता थारी कुण करै जी.”

भोजपुरी वह क्षेत्र है जहाँ के मेहनतकश लोग दुनिया के कोने-कोने में रोजी-रोटी की तलाश में गए या धोखे से ले जाए गए, परन्तु जहां भी गए वहां जंगल काटे, पहाड़ तोड़े और जमीन को सोना उगलने वाली बना दिया. भारत के अलावा मारीशस, फिजी, गुयाना, ट्रीनीडाड, सूरीनाम आदि मुल्कों की हरीतिमा इन्हीं के श्रम का परिणाम है. भोजपुरी क्षेत्र की एक नारी का पति परदेश चला गया है. क्यों गया? इसे वह अच्छी तरह समझती है. पैसे के लिए आदमी को क्या क्या उद्यम नहीं करना पड़ता? कहां कहां नहीं जाना पड़ता?
“रेलिया न बैरी, जहजिया न बैरी हई पइसवा बैरी ना. 
पिया के देसवा- विदेसवा घुमावे हई पइसवा बैरी ना.”

दहेज और गरीबी अनमेल विवाह के मूल कारण हैं. आम तौर पर बेटी की शादी में मां की भूमिका  नगण्य रहती थी. कभी कभी तो शादी के लिए दरवाजे पर आने के समय ही बेटी और मां दूल्हे को देख पाती थीं. ऐसे ही एक अनमेल विवाह को एक मां शिव- पार्वती के माध्याम से इस तरह खारिज कर रही है -“धिया ले के उड़बें, धिया ले के बुड़बें, धिया ले के जइबें पताल.
अइसन तपसिया के गउरा न देबें बरु गउरा रइहें कुँवार.”

शिष्ट समाज के प्रतिनिधि महाकवि कालिदास को भले ही शिव- पार्वती की जोड़ी ( पार्वतीपरमेश्वरौ ) आदर्श प्रतीत होती हो किन्तु एक लोक कवि की प्रत्यक्ष दृष्टि कभी धोखा नहीं खा सकती और उसकी साफगोई के क्या कहने? वह शिव -पार्वती की जोड़ी को आदर्श नही  मान सकती.

अपने जीवन की दर्दभरी दास्तान से ऊब चुकी नारी को दैव से यह बिनती, उसकी कारुणिक दशा का स्वत: बयान कर देती है.-
“चांद सुरुज तोरे पइयां लागूं, तिरिया जनम जनि देहु.”

भारतीय लोक जीवन में विखरे इस विशाल लोक साहित्य का अनुशीलन करने से पता चलता है कि इसमें लोक जीवन का यथार्थ है, पीड़ा है, दुख है, मगर उस दुख और पीड़ा से जूझने का संकल्प भी है, मुठभेड़ करने का साहस भी है. इस लोक साहित्य में कोई बड़ा दर्शन, काव्यगत कलात्मकता, चमत्कार आदि नहीं मिलेगा. यहां सादगी है, प्रेम है, निष्ठा है, ईमानदारी है और सुसंस्कार है. हमारे लोक साहित्य में लोक का जो उदात्त  चरित्र चित्रित है वह शिष्ट साहित्य में दुर्लभ है. शिष्ट साहित्य और लोक साहित्य के बीच का फासला वस्तुत: दो वर्गों के बीच का फासला है. यह दूसरा वर्ग समाज का बहुसंख्यक वर्ग है और इसके पास संवेदनाओं से सराबोर अपार साहित्य है. अवश्य ही यह लोक साहित्य है किन्तु अपनी समृद्धि में किसी भी तरह शिष्ट साहित्य से कमतर नहीं है.

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