हिन्दी आलोचना में विसंगतियाँ – डॉ. अमरनाथ

हिन्दी आलोचना का इतिहास विसंगतियों से भरा हुआ है और हमारा हिन्दी समाज अब उसके दुष्परिणाम भी झेल रहा है किन्तु हमारे वरिष्ठ आलोचकों की नजर भी उन विसंगतियों की ओर नहीं पड़ रही है. हम उनमें से कुछ विसंगतियों की ओर पाठको का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश करेंगे.

हिन्दी आलोचना का इतिहास विसंगतियों से भरा हुआ है और हमारा हिन्दी समाज अब उसके दुष्परिणाम भी झेल रहा है किन्तु हमारे वरिष्ठ आलोचकों की नजर भी उन विसंगतियों की ओर नहीं पड़ रही है. हम उनमें से कुछ विसंगतियों की ओर पाठको का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश करेंगे.

एक सामान्य अवधारणा है कि हिन्दी आलोचना का विकास आधुनिक काल में गद्य के विकास के साथ हुआ. प्रश्न यह है कि हिन्दी में साहित्य का सृजन जब नवीं-दसवीं सदी से ही होने लगा था तो फिर आलोचना का विकास अठारहवीं सदी से क्यों? क्या हजार साल तक सिर्फ रचनाएं होती रहीं और उनपर प्रतिक्रयाएं नहीं होती थी? यदि रचना के साथ-साथ ही आलोचना का विकास भी होता है तो क्या हिन्दी साहित्य के आदि काल से आधुनिक काल के भारतेन्दु युग तक लोग सिर्फ रचनाएं पढ़ते और सुनते रहे हैं और उनपर प्रतिक्रियाएं देने से परहेज करते रहे हैं? भला ऐसा कैसे संभव है?

दरअसल आलोचना का विकास रचना के साथ ही होता है. रचना पर संतुलित प्रतिक्रिया ही आलोचना होती है. इसलिए जिस समय से हम हिन्दी साहित्य के सृजन का इतिहास स्वीकार करते हैं उसी समय से उसकी आलोचना का इतिहास भी स्वीकार करना होगा. खेद है कि इसका व्यवस्थित अध्ययन अब तक नही हुआ है और हम मानते चले आ रहे है कि हिन्दी आलोचना का विकास आधुनिक काल में गद्य के विकास के साथ हुआ. यह भ्रामक अवधारणा है. सचाई यह है कि हिन्दी साहित्य के इतिहास के साथ ही हिन्दी आलोचना के विकास का इतिहास भी जुड़ा हुआ है और आलोचना की परंपरा भी हिन्दी के रचनात्मक साहित्य की तरह ही समृद्ध है. आज उसके विस्तृत अध्ययन और उसके कारणों के विश्लेषण की जरूरत है.

हिन्दी आलोचना की विरासत संस्कृत में निहित है. संस्कृत के आचार्यों ने काव्य के स्वरूप, काव्य की आत्मा, काव्य गुण और काव्य दोष आदि का तो विस्तृत विश्लेषण किया ही है, उन्होंने संस्कृत साहित्य के मूल्यांकन के लिए रस, अलंकार, ध्वनि, रीति, वक्रोक्ति और औचित्य जैसे सिद्धांत भी विकसित किए जिनमें रस, अलंकार और ध्वनि सिद्धांत का महत्व आज भी बना हुआ है. इसलिए हिन्दी के आलोचना शास्त्र को समझने के लिए संस्कृत की अपनी इस महान विरासत को समझना और सहेजना बहुत जरूरी है.

संस्कृत की व्यावहारिक समीक्षा भी बहुत समृद्ध है और सैद्धांतिक मानदंडों पर ही आधारित है. इसकी मुख्यत: तीन पद्धतियां हैं पहली व्याख्यात्मक आलोचना अथवा टीका पद्धति, दूसरी सूक्तियों के रूप में की जाने वाली साहित्यकारों पर आलोचनात्मक टिप्पणियां और तीसरी काव्यशास्त्रीय ग्रंथों में अपनी स्थापनाओं की पुष्टि में आचार्यों द्वारा उद्धृत कवियों की उक्तियाँ. इनमें टीका या भाष्य लिखने की परंपरा बहुत ही समृद्ध और पुरानी है. संस्कृत के लगभग सभी महान ग्रंथों की कई कई टीकाएं उपलब्ध हैं. इन टीकाओं में कविताओं की विद्वत्तापूर्ण व्याख्याएं तो की ही जाती थीं, इसी बहाने कवियों की काव्य कला के ऊपर भी सटीक और आलोचनात्मक टिप्पणियां टीकाकार कर देता था. हकीकत तो यह है कि संस्कृत के कई ऐसे महाकवि या आचार्य हैं जिनके साहित्य का आस्वाद, सुबुद्ध और सहृदय पाठकों को तभी मिला जब उनके व्याख्याकारों ने उनपर भाष्य लिखे. कालिदास के भाष्यकार मल्लिनाथ ने तो कहा ही है कि कालिदास की वाणी बिना भाष्य के “दुर्व्याख्याविषमूर्छिता” हो गई थी. मल्लिनाथ ने उसका भाष्य लिखकर उसे सहृदय पाठको के लिए सुगम बनाया. इसी तरह आन्दवर्धन के महान ग्रंथ ‘ध्वन्यालोक’ की महत्ता से लोग लगभग एक सौ साल तक अपरिचित ही रहे. लोगों को इस ग्रंथ का महत्व तब समझ में आया जब अभिनव गुप्त ने उसकी ‘ध्वन्यालोकलोचन’ नाम से टीका लिखी.

वास्तव में रचना को सहृदय पाठकों के लिए बोधगम्य बनाने के उद्देश्य से ही टीकाएं लिखी जाती थीं. टीका या भाष्य लिखने वाला ही सही अर्थों में आलोचक होता है. आलोचक का पहला काम होता है रचना को भली भाँति समझना, उसके गुण-दोष का विवेचन करना और उसे पाठकों को समझने में मदद पहुँचाना.  भाष्यकार का यही काम होता है. भाष्यकार काव्य की टीका करते -करते कवियों के विषय में भी आलोचनात्मक उक्तियां कह दिया करते थे. संस्कृत साहित्य के अलावा इस प्रकार की आलोचना हिन्दी में ‘रामचरितमानस’ और ‘बिहारी सतसई’ की टीकाओं, कुलपति, श्रीपति, चिन्तामणि और सोमनाथ द्वारा लिखी गई वचनिका-वार्ता, तिलक आदि के रूप में मिलती हैं. मध्यकालीन भक्ति और रीतिकाव्य पर ब्रजभाषा गद्य में अनेक टीकाएं मिलती हैं. जैसे ‘चौरासी’ और ‘दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता’ पर गुसाईं हरिराय की ‘भाव प्रकाश’ टीका, ‘साहित्य लहरी’ पर सरदार कवि कृत टीका, भक्तमाल पर प्रियादास की टीका, हित हरिवंश के चौरासी पद पर तथा ‘बिहारी सतसई’ पर अनेक टीकाएं लिखी गई हैं. ‘रामचरितमानस’ पर भी अनेक टीकाएं उपलब्ध हैं. रीति काल के अन्तिम चरण में सरदार कवि कृत ‘मानस रहस्य’ को रीतिकालीन व्यावहारिक आलोचना में टीका पद्धति का श्रेष्ठ उदाहरण स्वीकार किया जा सकता है. टीका पद्धति या व्याख्यात्मक आलोचना की यह परंपरा आधुनिक काल तक प्रचलित थी. बाबू जगन्नाथदास रत्नाकर ने ‘बिहारी रत्नाकर’ नाम से ‘बिहारी सतसई’ की अथवा वियोगी हरि ने तुलसी के ‘विनय पत्रिका’ की अथवा आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने घनानंद के कविताओं की जो टीकाएं लिखी है उनसे बिहारी, तुलसी अथवा घनानंद को समझने में जितनी मदद मिलती है वह अन्य स्रोतों से संभव नहीं. लोग पहले से लिखी गई टीकाओं का भी परिमार्जन करके उसे और भी अधिक प्रामाणिक बनाते थे. उदाहरणार्थ लल्लूलाल ने ‘बिहारी सतसई’ की टीका ‘लाल चन्द्रिका’ नाम से लिखी थी. यह टीका भारतेन्दु काल से कुछ पूर्व लिखी गई थी किन्तु भारतेन्दु युग में इसका पुन: परिष्कार हुआ और यह परिष्कार पंडित सुधाकर द्विवेदी और जार्ज ग्रियर्सन ने मिलकर किया. शास्त्रीय व व्याख्यात्मक आलोचकों की परंपरा को आधुनिक युग में भी जिन आलोचकों ने समृद्ध किया है उनमें लाला भगवान दीन, पद्मसिंह शर्मा, कृष्णबिहारी मिश्र, रामशंकर शुक्ल रसाल, दीनदयालु गुप्त, ब्रजेश्वर वर्मा, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, जगन्नाथ प्रसाद शर्मा, कृष्णशंकर शुक्ल, रामकृष्ण शुक्ल शिलीमुख, गिरिजादत्त गिरीश, केशरीनारायण शुक्ल, भगवती प्रसाद सिंह, उदयभानु सिंह, बासुदेव पोद्दार, रामचंद्र तिवारी, राममूर्ति त्रिपाठी, आनंदप्रकाश दीक्षित आदि प्रमुख हैं. हिन्दी आलोचना की यह अत्यंत समृद्ध परंपरा रही है जिसकी धीरे धीरे उपेक्षा होती गई किन्तु
इसी उपेक्षा के कारण हिन्दी का उत्कृष्ट साहित्य, सहृदय पाठकों से दूर होता गया. निश्चित रूप से टीकाएं लिखने के लिए अत्यधिक साधना, श्रम और धैर्य की जरूरत होती है. उसकी तुलना में प्रतिष्ठा भी कम ही मिलती है. जबकि आज का युग कम से कम श्रम करके अधिक से अधिक प्राप्त करने का है. अगर भाष्यकारों को प्रतिष्ठा मिलने की परंपरा पूर्ववत जारी रहती तो पुस्तक समीक्षाएं अथवा औसत दर्जे के रचनाकारों पर प्रशंसात्मक लेख लिखकर लोगों को आलोचक के रूप में आसानी से प्रतिष्ठा कैसे मिल पाती? बड़े ही सुनियोजित तरीके से भाष्यकारों की उपेक्षा की गई और इस तरह आलोचना की एक अत्यंत पुष्ट और उत्कृष्ट पद्धति को यथासंभव कमजोर किया गया.

      हमारे यहां अबतक जितने भी हिन्दी साहित्य के इतिहास लिखे गए है उनमें सबसे पहले हमारा ध्यान आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास पर जाता है क्योंकि वह पहला विचार- श्रृंखला- बद्ध इतिहास है, जिसके पास एक इतिहास दृष्टि है और एक सुसंगत काल-विभाजन है. साहित्य के पाठकों में भी सबसे ज्यादा प्रचलित यही शुक्ल जी का इतिहास है. शुक्ल जी के इतिहास में भी अनेक कवियों पर की गई उनकी संक्षिप्त टिप्पणियां उनकी उत्कृष्ट आलोचनात्मक दृष्टि की परिचायक हैं.

आचार्य शुक्ल हिन्दी आलोचना के आधार स्तंभ है और हमें उनपर गर्व है किन्तु मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अपने इतिहास के प्रथम संस्करण की भूमिका लिखते समय शुक्ल जी ने हिन्दी साहित्य के प्रथम इतिहास के रूप में ख्यात गार्सां द तासी के इतिहास ‘इस्त्वार दल लितरेत्यूर ऐंदुई ए ऐंदुस्तानी’ का जिक्र तक नहीं किया है. वे शुरू करते हैं शिवसिह सेंगर से. उन्होंने लिखा है,’’हिन्दी कवियों का एक वृत्त संग्रह ठाकुर शिवसिंह सेंगर ने सन् 1883 ई. में प्रस्तुत किया था. उसके पीछे सन् 1889 मे डॉक्टर ( अब सर) ग्रियर्सन ने ‘माडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर आव नार्दर्न हिन्दुस्तान’ के नाम से एक वैसा ही बड़ा कविवृत्त संग्रह निकाला.‘’ ( हिन्दी साहित्य का इतिहास, प्रथम संस्करण का वक्तव्य)

गार्सां द तासी के इतिहास का पहला भाग 1839 ई. में छप चुका था और दूसरा भाग 1847 ई. में. उल्लेखनीय है कि तासी का इतिहास हिन्दुई और हिन्दुस्तानी का इतिहास है अर्थात इसमें हिन्दी- उर्दू दोनो के कवियों का उल्लेख है. यद्यपि उस समय तक फोर्ट विलियम कालेज के मंच से जॉन बोर्थविक गिल क्राइस्ट के निर्देशन में विलियम प्राइस, कैप्टन टेलर आदि के द्वारा हिन्दी –उर्दू का विभाजन किया जा चुका था और इन्हें मजहब से जोड़ा जा चुका था. इसके बावजूद तासी का दृष्टिकोण अधिक व्यावहारिक और वैज्ञानिक था. उसकी दृष्टि में यह एक ही भाषा का साहित्य था और इसीलिए एक ही जाति का साहित्य था.

शुक्ल जी ने जिस ग्रियर्सन का जिक्र आदर के साथ किया है. उसने अपने इतिहास ( प्रकाशित, प्रथम संस्करण 1888 ई.) की भूमिका में लिखा है, ‘’मैं न तो अरबी फारसी के भारतीय लेखकों का उल्लेख कर रहा हूँ और न ही विदेश से लाई गई साहित्यिक उर्दू के लेखकों का ही –मैंने इन अन्तिम को, उर्दू वालों को, अपने इस विचार से जानबूझकर बहिष्कृत कर दिया है क्योंकि इनपर पहले ही गार्सां द तासी ने पूर्ण रूप से विचार कर लिया है.‘’

 यहां उल्लेखनीय यह है कि गार्सां द तासी ने अपना इतिहास फ्रेंच में लिखा और पेरिस में रहकर लिखा. वे पेरिस में हिन्दुस्तानी के प्रोफेसर थे और कभी भारत नहीं आए किन्तु उन्हें अच्छी तरह पता था कि हिन्दुई और हिन्दुस्तानी अलग अलग भाषाएं नहीं है बल्कि एक ही भाषा की अलग अलग शैलियाँ है. शुक्ल जी को अपना इतिहास लिखते समय गार्सां द तासी का इतिहास पढ़ने को नहीं मिला था क्योंकि उनका इतिहास पेरिस में लिखा गया, पेरिस में छपा और और लंदन तथा पेरिस में ही बिकने के लिए भी रखा गया. हिन्दुस्तान में वह उपलब्ध ही नहीं था. उसका हिन्दी में अनुवाद भी बहुत बाद में लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने किया जो 1953 ई. में प्रकाशित हुआ. ऐसी दशा में होना तो यह चाहिए था कि आचार्य शुक्ल इस बात का उल्लेख करते कि हिन्दी का पहला इतिहास सुलभ न होने के कारण वे देख न सके थे, किन्तु ग्रियर्सन ने जिस तथ्य का ईमानदारी के साथ उल्लेख किया है कि उर्दू वालों को उन्होंने जानबूझकर इसलिए शामिल नहीं किया है क्योंकि गार्सां द तासी ने उनका उल्लेख अपने इतिहास मे कर दिया है. खेद है कि ग्रियर्सन की यह निराधार भेद दृष्टि शुक्ल जी सहित परवर्ती सभी इतिहास लेखकों ने यथावत स्वीकार कर ली. शुक्ल जी ने हिन्दुस्तानी के कवियों को अपने इतिहास में शामिल नहीं किया तो बाद के सभी इतिहासकारों ने शुक्लजी का ही अनुसरण किया और शासन के लिए जो भेद दृष्टि शासक अपनाते हैं वही साहित्यकारों ने भी अपनायी.

हिन्दी जाति के साहित्य की कोई भी अवधारणा क्या मीर, सौदा, गालिब, जॉक, जफर, आतिश, फैज और इकबाल को छोड़कर बन सकती है? ‘’मैं हिन्दुस्तानी तुर्क हूँ और हिन्दवी में जवाब देता हूँ।‘’ -का उद्घोष करने वाले अमीर खुसरो क्या हिन्दी जाति के साहित्यकार नहीं हैं? होली, दीवाली, महादेव जी के ब्याह और कन्हैया जी के जन्म पर कविताएं लिखने वाले नजीर अकबराबादी क्या हिन्दी के जातीय कवि नहीं हैं? फिराक गोरखपुरी, जोश मलीहाबादी, फैज अहमद फैज, अली सरदार जाफरी, साहिर लुधियानवी, अहसान दानिश, कैफी आजमी, निदा फाजली और जावेद अख्तर जैसे प्रगतिशील और हिन्दी जाति की सामासिक संस्कृति को पुख्ता करने में अपनी समूची जिन्दगी समर्पित कर देने वाले साहित्यकारों को हिन्दी के जातीय साहित्यकारों के भीतर जगह न देने वाले हिन्दी के साहित्यकारों की बुद्धि पर तरस आती है. ‘’हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा.’’ का तराना छेड़ने वाले डॉ. इकबाल की जगह यदि हिन्दी के जातीय साहित्य में नहीं है तो कहाँ है?

जब सभी भाषा वैज्ञानिक भी उर्दू और हिन्दी को अलग अलग भाषा नहीं मानते और उसे एक ही भाषा की दो शैलियाँ मानते हैं तो इसे विभाजित करके क्यों देखा जाता है?  उर्दू को अघोषित रूप से इस्लाम से क्यों जोड़ दिया गया है? क्यों तुलसी और निराला को पढ़ने वाला विद्यार्थी मिर्जा गॉलिब, फिराक और नजीर अकबरावादी को नहीं पढ़ सकता जबकि ये सभी एक ही जाति, हिन्दुस्तानी जाति के कवि हैं? आज जब भारत एक दूसरे विभाजन की ओर बढ़ रहा है तो हमारा दायित्व है कि हम अपनी सामासिक संस्कृति की विरासत को समृद्ध करने वाले साहित्य का एक बार फिर से आकलन करें. हमे अपनी आलोचना की परिधि इतनी विस्तृत और सुदृढ़ करनी चाहिए जिसके भीतर सूर, तुलसी, कबीर के साथ खुसरो, मीर, गॉलिब और फिराक भी समा सकें.

भारतीय साहित्य की जिस समृद्ध परंपरा पर हमें गर्व है उसका बहुलाँश अनेक जिज्ञासु अनुसंधित्सुओं की अनवरत साधना का प्रतिफल है, वर्ना अनेक बड़े रचनाकार काल के गाल में समा गए होते या हम पर्याप्त सूचना के अभाव में उनका समुचित मूल्याँकन ही न कर पाए होते.

हिन्दी में अनुसंधान की नींव ‘गार्सां द तासी’. ने ही रखी थी. उनके इतिहास की उपलब्धियां तथा गुणवत्ता विवादास्पद हो सकती हैं किन्तु इसमें 3224 हिन्दी- उर्दू के साहित्यकारों का परिचय एवं उनके विषय में सूचनाएं है. दृष्टि भी अनुसंधानपरक है. यह एक व्यक्ति का उपाधिनिरपेक्ष निजी प्रयास है. हिन्दी अनुसंधान के विकास में यह एक महत्वपूर्ण विन्दु है.

हिन्दी अनुसंधान के विकास में राष्ट्रीय और बौद्धिक जागरण का महत्वपूर्ण योगदान है. 1828 ई.से लेकर 1885 ई. तक का कालखण्ड इस दृष्टि से विशेष महत्व का है. 1828 ई. में ब्राह्म समाज की स्थापना, 1849 ई.में विधवा विवाह का विरोध, 1856 ई. में इस विषय पर कानून बनना, 1857 ई. में प्रथम स्वाधीनता संग्राम तथा आर्य समाज की स्थापना, अंग्रेजों की दमन नीति मे वृद्धि के फलस्वरूप जनता में प्रतिरोध की शक्ति का विकास,1885 में कांग्रेस की स्थापना आदि इस कालखण्ड की ऐसी घटनाएं हैं जिनके कारण भारत के बौद्धिक समुदाय में अपनी अस्मिता के प्रति जागरुकता का संचार हुआ. संचार व्यवस्था, रेल संपर्क, छापाखाने आदि भी इसी दौर में विकसित हुए. इससे साहित्य तथा ज्ञान- विज्ञान के क्षेत्र में नई चेतना का संचार हुआ. इन घटनाओं से बंगाल का समाज सबसे ज्यादा और सबसे पहले प्रभावित हुआ जिसे हम बंगला नवजागरण के रूप में जानते हैं. 

भारतेन्दु और उनके मंडल के लेखक निरंतर बंगाल के संपर्क में रहे. इन सबके परिणामस्वरूप हिन्दी भाषी क्षेत्र के बुद्धिजीवी भी हिन्दी साहित्य की समृद्ध परंपरा के अनुसंधान की ओर प्रवृत्त हुए. इस अनुसंधान कार्य में विदेशियों ने भी पर्याप्त भूमिका निभाई.  सर जार्ज ग्रियर्सन की ‘माडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर आफ नार्दर्न हिन्दुस्तान’ तथा एफ.ई.के. की ‘ए हिस्ट्री आफ हिन्दी लिटरेचर’ जैसी कृतियां इसी काल खण्ड में आईं. बाद में ‘कविवचन सुधा’ ( 1868), ‘हिन्दी प्रदीप’ ( 1877), ‘ब्राह्मण’ (1883) आदि पत्रिकाओं में विभिन्न नवीन विषयों पर अनुसंधानपरक लेख प्रकाशित होने लगे. स्वयं भारतेन्दु ने कालिदास, जयदेव, सूरदास तथा पुष्पदंताचार्य की चरितावली लिखी. पुरातत्व और भारत के सांस्कृतिक इतिहास पर अनुसंधानपरक निबंध लिखे. ‘नाटक अथवा दृश्यकाव्य’ शीर्षक उनका महत्वपूर्ण सिद्धांतनिरूपक निबंध उनकी अनुसंधान-दृष्टि का सूचक है.

शोध, समीक्षा नहीं है किन्तु समीक्षा के बगैर शोध संभव नहीं है. शोध मे जब तथ्यों का विश्लेषण किया जाता है तब उसका मूल्याँकन भी किया जाता है. इस तरह शोध में समीक्षा का समावेश अनिवार्य हो जाता है. आलोचना में आलोचक का आलोच्य कृति या कृतिकार के प्रति तटस्थता अनिवार्य नहीं होती जबकि अनुसंधानपरक आलोचना में तटस्थता अनिवार्य होती है. शुद्ध अनुसंधान और अनुसंधानपरक आलोचना में भी फर्क हो सकता है. अनुसंधान में परियोजना का प्रस्तुतीकरण विशिष्ट प्रविधि के अनुरूप होता है, किन्तु अनुसंधानपरक आलोचना में प्रस्तुतीकरण की कोई निर्दिष्ट प्रविधि नहीं होती. प्रत्येक आलोचक अपने ढंग से उसे प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र है.

अनुसंधानपरक आलोचना का व्यवस्थित रूप द्विवेदी युग में सामने आया. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी कृत ‘नैषधचरित चर्चा’ में अनुसंधानपरक समीक्षा का उन्नत स्वरूप ढलता हुआ दिखायी देता है. ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’( 1897 ई.) में बाबू राधाकृष्णदास का ‘नागरीदास का जीवन चरित्र’, बाबू श्यामसुन्दर दास का ‘बीसलदेव रासों’, किशोरीलाल गोस्वामी का ‘अभिज्ञान शाकुन्तल’ और ‘पद्मपुराण’, चंद्रधर शर्मा गुलेरी का ‘विक्रमोर्वशी की मूल कथा’ आदि अनेक गंभीर एवं गवेषणापूर्ण आलोचनात्मक निबंध सन् 1899 ई. और 1900 ई. के बीच प्रकाशित हुए. हमारे यहाँ अनुसंधानपरक आलोचना की बहुत ही समृद्ध परंपरा रही है जिसे वीरभारत तलवार और रामनिरंजन परिमलेन्दु जैसे आलोचक एकनिष्ठ भाव से आज भी समृद्ध कर रहे हैं. खेद है कि अनुसंधानपरक आलोचना को भी समुचित महत्व नहीं दिया गया और आज इस पद्धति का अनुसरण करने वाले भली भांति जानते हैं कि उनके जीवन काल में उन्हें प्रतिष्ठा मिलने की संभावना बहुत क्षीण है.    

सही अर्थों में आलोचना की एक वैज्ञानिक और महत्वपूर्ण पद्धति पाठालोचन भी है, जिसने हिन्दी साहित्य के भंडार को समृद्ध करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. अत्यंत श्रमसाध्य होने के कारण इस पद्धति की ओर विरले आलोचकों की ही रुचि हो पाती है. इस पद्धति की भी भरपूर उपेक्षा की गई और इसे आलोचना कहने में भी कोताही बरती गई ताकि प्रचलित अर्थ में जो आलोचक कहे जा रहे हैं उन्हें प्रतिष्ठा मिलने में सुविधा हो.

हमारे देश का प्राचीन साहित्य अलिखित था और श्रुति-परंपरा से पीढ़ी दर पीढ़ी संक्रमित होता रहता था क्योंकि लिपियों का विकास बहुत बाद में हुआ. इतना ही नहीं, लिपियों के विकास के बाद भी छापाखाना न होने के कारण तथा लेखन सामग्री अर्थात कागज आदि के न होने के कारण भी रचनाओं को लिपिबद्ध करना आसान कार्य न था और न तो यह सामान्य लोगों के बस की बात ही थी. समर्थ और सक्षम लोग ही प्रतिष्ठित रचनाओं की प्रतिलिपि, लिपिकारों द्वारा कराते थे. कभी कभी रचनाकार स्वयं अपनी कृतियों का ही संशोधन कर मूल प्रति तैयार कर लेते थे. राजशेखर ने अपने ‘काव्य मीमांसा’ में लिखा है कि कवियों को काव्यों की सुरक्षा के लिए उनकी कई प्रतिलिपियां तैयार करा लेनी चाहिए. अत: निश्चित रूप से रचनाकार के जीवन काल में ही उनके श्रेष्ठ ग्रंथों की प्रतिलिपियां अन्य व्यक्तियों द्वारा तैयार कर ली जाती रही होंगी और पुस्तकालयों में संग्रहीत होने पर पुस्तकालयाध्यक्ष भी उनकी प्रतिलिपि कराते रहे होंगे. छापाखाना विकसित होने के बाद पुस्तकों की हस्तलिखित प्रतियों के प्रकाशन के लिए उनके पाठानुसंधान की आवश्यकता महसूस हुई और अनेक मनस्वी आलोचक इस कठिन और श्रमसाध्य कार्य की ओर उन्मुख हुए.

हिन्दी में पाठानुसंधान की परंपरा का उल्लेख करते हुए डॉ. कन्हैया सिंह ने ‘पृथ्वीराज रासों’ की एक पुरानी प्रति का उल्लेख किया है जिसे सन् 1861 ई. में उदयपुर के महाराज ने आगरा कालेज को भेंट की थी, जिसका उल्लेख 2 सितंबर सन् 1861 ई. को कॉलेज के तत्कालीन प्राचार्य पीटर्सन ने उक्त प्रति के मुख पृष्ठ पर किया है. ( हिन्दी पाठानुसंधान, पृष्ठ- 17).  संप्रति यह प्रति नेशनल गैलरी आफ माडर्न आर्ट, भारत सरकार के पास सुरक्षित है. उक्त प्रति का पाठानुसंधान कक्का नामक कवि ने चित्रकूट के राणा अमरेश ( अमरसिंह ) की आज्ञा से किया था. राणा अमरसिंह का राज्यकाल सन् 1596 ई. से 1619 ई. तक था. निश्चित रूप से इसी बीच यह पाठानुसंधान कार्य हुआ होगा. इतने प्राचीन काल में पाठालोचन की प्रवृत्ति इस बात का प्रमाण है कि हमारे देश में पाठानुसंधान की परंपरा काफी पुरानी है.

हमारे देश में उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक चरण में मुद्रण कार्य का आरंभ हुआ. इसी सदी के उत्तरार्ध में इसाई धर्म प्रचारकों ने अपने धर्म के प्रचार के लिए पुस्तकों का प्रकाशन आरंभ किया. धीरे -धीरे विद्वानों का ध्यान अपने प्राचीन कवियों की रचनाओं के प्रकाशन की ओर गया जिसके लिए उन कृतियों का पाठ संपादन अनिवार्य था. अनेक मनीषी विद्वानों नें पूरे मनोयोग के साथ उस दौर में पाठ संपादन करके अनेक महान ग्रंथों का प्रामाणिक पाठ तैयार किया और उन्हें प्रकाशित करके हिन्दी की श्रीवृद्धि की.

कृतियों के पाठालोचन की जरूरत एकाधिक बार पड़ती है. जिन मध्ययुगीन कवियों की कृतियों का पाठ संपादन हो चुका है, यदि संयोगवश उन कृतियों की अशोधित पांडुलिपियां पुन: उपलब्ध हो जायँ तो इनका पुन: पाठालोचन हो सकता है. जायसी के ‘पदमावत’ का पाठालोचन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया था. उसके बाद डॉ. माता प्रसाद गुप्त ने वैज्ञानिक ढंग से उसका फिर से पाठालोचन किया. इतना ही नही, गुप्त जी के पश्चात डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल को नयी सामग्री मिली और उन्होंने भी उसका पाठालोचन किया. ‘रामचरितमानस’ के लगभग एक दर्जन पाठालोचित संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं. आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नागरी प्रचारिणी संस्करण बहुत समय तक आदर्श माना जाता रहा. उसके पश्चात गीताप्रेस ने अपना संस्करण प्रकाशित किया. इसके बावजूद अभी भी प्राचीन तथा मध्यकालीन कृतियों के प्रामाणिक संस्करणों की आवश्यकता बनी हुई है. इस क्षेत्र में अभी बहुत कार्य होना बाकी है. इस कष्ट साध्य कार्य को हाथ में लेने की हिम्मत कम लोग कर पाते हैं. इसका कारण यह है कि किसी ग्रंथ का पाठालोचन करने के लिए सर्वप्रथम उसकी पाठ प्रक्रिया से परिचित होना पड़ता है. इसके पश्चात आलोच्य -ग्रंथ की हस्तलिखित प्रतियों को प्राप्त करने में जिस श्रम, साहस और धैर्य की अपेक्षा होती है वह विरले अध्येताओं के पास होती है. किन्तु जिन्होंने पाठालोचन जैसे गंभीर कार्य किए हैं उनका समुचित सम्मान के साथ उल्लेख तो किया ही जाना चाहिए.

हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल के पूर्व का जो भी साहित्य उपलब्ध है वह सब पाठानुसंधान के बाद संभव हुआ है. इस दिशा में नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी और हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग का अप्रतिम योगदान है. अन्य संस्थाओं और व्यक्तियों ने भी इस क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है. इसके बावजूद हिन्दी में आज भी यह कार्य अपनी प्रारंभिक अवस्था में है. इस कार्य की जरूरत भी बहुत है क्योंकि देश के कोने कोने में आज भी हस्तलिखित ग्रंथों की हजारों पाण्डुलिपियां अपने उद्धार की बाट जोह रही हैं. उदाहरण के लिए आज भी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी, हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, ब्रज साहित्य मंडल मथुरा, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद पटना आदि संस्थाओं ने अपने यहां संरक्षित हस्तलिखित ग्रंथों की सूचियां प्रकाशित की हैं. राजस्थान के जैन मन्दिरों में हस्तलिखित ग्रंथों का विशाल भंडार है. हैदराबाद का सालारजंग पुस्तकालय, तंजावर ( आंन्ध्र ) ग्रंथागार, खुदाबख्श लाइब्रेरी पटना, नेशनल लाइब्रेरी कोलकाता, मैनुस्क्रिप्ट रिसोर्स सेन्टर, कलकत्ता विश्वविद्यालय कोलकाता, कलकत्ता विश्ववद्यालय केन्द्रीय ग्रंथालय, एशियाटिक सोसाइटी कोलकाता, राजस्थान प्राच्य विद्या संस्थान के कोटा, उदयपुर, अलवर, जयपुर, टोंक और चित्तौड़ की शाखाओं तथा राजस्थान की अनेक देशी रियासतों के ग्रंथालयों में असंख्य पाण्डुलिपियां आज भी मौजूद हैं जिनके उद्धार की ओर अब किसी का ध्यान नहीं है. इन पांडुलिपियों में अनेक महान साहित्यकार दबे हो सकते हैं.

       जिन लोगों ने पाठालोचन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है उनमें माताप्रसाद गुप्त, जार्ज ग्रियर्सन, राहुल सांकृत्यायन, भगवत दास छत्री, जगन्नाथ दास रत्नाकर, मुनि जिनविजय, किशोरीदास वाजपेयी, बाबूराम सक्सेना, शंभुनारायण चौबे, चंद्रबली पाण्डेय, उमाशंकर शुक्ल, पारसनाथ तिवारी, ब्रजरत्न दास, वासुदेव शरण अग्रवाल, रामवृक्ष बेनीपुरी, पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, प्रभुदयाल मीतल आदि प्रमुख हैं. खेद है, आज पाठालोचन जैसे गंभीर और श्रमसाध्य कार्य करने वाले मनीषियों की चर्चा बहुत कम होती है और उन्हें आलोचकों की श्रेणी में भी अमूमन नहीं रखा जाता है. इससे इस महान आलोचना कर्म की ओर हाथ बढ़ाने का साहस लोगों मे नहीं होता.

       मुझे बराबर लगता है कि हिन्दी में छायावाद के साथ साथ चलने वाली राष्ट्रीय चेतना धारा वाली हिन्दी कविता कम महत्वपूर्ण या कम लोकप्रिय नहीं रही है. क्या मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्राकुमारी चौहान और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे कवि, छायावादी कवियों की तुलना में कम लोकप्रिय रहे हैं? उल्लेखनीय है कि भारतीय राजनीति के रंगमंच पर महात्मा गांधी का पदार्पण और हिन्दी कविता में छायावाद तथा राष्ट्रीय चेतना धारा की कविता का आना लगभग साथ साथ हुआ है किन्तु हिन्दी के अधिकाँश आलोचकों की नजर छायावादी कविता पर अधिक मुस्तैदी से जमी रही और राष्ट्रीय चेतना धारा की कविता, छायावाद की तुलना में उपेक्षा का शिकार रही. जबकि महात्मा गांधी का सीधा और सर्वाधिक प्रभाव इसी काव्यधारा पर पड़ा. हमारी दृष्टि मे गाँधीवादी आलोचना की एक परंपरा हिन्दी में मौजूद रही है जिसकी कोई नोटिस नहीं ली गई. जब साहित्य की अन्य विधाओं पर गाँधीजी गहरा प्रभाव दिखाई देता है तो भला आलोचना उसके प्रभाव से वंचित कैसे रह सकती है ? हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि हिन्दी में मार्क्सवादी, मनोविश्लेषणवादी आदि विदेशी दर्शनों से परिचालित आलोचना पद्धतियों की चर्चा तो विस्तार से की गई है किन्तु गाँधीवादी आलोचना पद्धति का उल्लेख नहीं मिलता है, जबकि इस दौर के शान्तिप्रिय द्विवेदी, नंददुलारे वाजपेयी, रामस्वरूप चतुर्वेदी, नगेन्द्र, विजयदेवनारायण साही, बिजयबहादुर सिंह, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कृष्णदत्त पालीवाल जैसे प्रतिष्ठित आलोचकों पर गाँधी का ब्यापक प्रभाव दिखाई देता है.

        छायावादी आलोचक के रूप में सर्वाधिक प्रतिष्ठित वाजपेयी जी के चिन्तन पर गाँधी के विराट व्यक्तित्व और विचारधारा का गहरा प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है.  जब वे मार्क्सवाद से टकराते हैं तब सीधे सीधे उसके समानान्तर गाँधी के विचार-दर्शन का हवाला देने लगते हैं.  वे कहते है, “ आज के जनवादी लेखक को व्यक्तिगत त्याग और कष्ट सहिष्णुता अपनानी होगी.  उसे प्रेमचंद और टॉलस्टाय के मार्ग पर चलना होगा. वह किसी मार्क्सवादी नुस्खे को लेकर काम नहीं कर सकता. उसे अब भी चरित्र और आचरण की आवश्यकता है. महान आदर्शों के पीछे जीवन के क्षुद्र स्वार्थों को मिटा देने की साधना करनी होगी. हम जिस जनवादी राष्ट्र या मानव समूह की कल्पना करते हैं, वह केवल आर्थिक दृष्टि से सुखी नहीं होगा, उसे पूर्णत: सांस्कृतिक और नैतिक मानव भी होना चाहिए. यहाँ भी मार्क्सवादी शिक्षाएं और उपचार मुझे तो अधूरे दिखाई देते है.  उनसे तो गाँधी जी का सर्वोदय सिद्धान्त मुझे भारतीय जीवन के अधिक अनुरूप जान पड़ता है.” ( नया साहित्य : नये प्रश्न, पृष्ठ- 230)  उक्त वक्तव्य वाजपेयी जी पर गाँधी जी के गहरे प्रभाव को पुष्ट करता है.

            इसी तरह आचार्य द्विवेदी भी महात्मा गाँधी से गहरे प्रभावित थे जिसका उन्होंने स्थान- स्थान पर जिक्र किया है. गाँधी जी के निधन के बाद उन्होंने लिखा, “ वह जिधर मुड़ा जीवन लहरा उठा, वह जिधर झुका, प्रेम बरस पड़ा, वह जिधर चला, जमाना ढरक पड़ा. वह शक्ति का भंडार था, क्योंकि वह सच्चे अर्थ में भक्त था.”( ग्रंथावली, खंड-9, पृष्ठ-403)  

            हिन्दी में बहुत बड़ी संख्या ऐसे लेखकों की है जिन्होंने अपने लेखकीय जीवन का बड़ा हिस्सा हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा के लिए समर्पित कर दिया है. ऐसे लेखकों को हिन्दी के आलोचकों ने अपनी पाँत में नहीं रखा, दूसरी ओर तकनीकी दृष्टि से भाषाविज्ञान के क्षेत्र में न होने के कारण इनका लेखन भाषा विज्ञान के क्षेत्र में भी शामिल नहीं किया जाता. जबकि मेरी दृष्टि में साहित्य के आलोचकों की तुलना में इनका लेखन समाज के लिए अधिक मूल्यवान है. यदि भाषा ही नहीं बचेगी तो साहित्य भला कैसे बचेगा?. निश्चित रूप से ऐसे लेखकों के महत्व को देखते हुए उनकी एक अलग श्रेणी बनायी जानी चाहिए. उसका नाम भाषा आन्दोलन समीक्षा रखा जा सकता है क्योंकि इनमें से अधिंकांश लेखकों के लेखन का उद्देश्य हिन्दी को प्रतिष्ठित करना है.

       आज के युग में मीडिया की ताकत का आकलन भी संभव नहीं है. असीमित शक्ति से सपन्न हो चुकी है मीडिया. किन्तु मीडिया का माउस अब जिस किसी दिमागदार की मुट्ठी में नहीं रह सकता. पिछली सदी के अन्तिम दशक के बाद जो उदारीकरण आया उसने मीडिया को कारपोरेट घरानों के हाथों में सौंप देने के सारे रास्ते आसान कर दिए और उसकी स्वायत्ता खत्म कर दी. एक समय में इन माध्यमों ने व्यापक जन समुदाय के लिए ज्ञान और मनोरंजन के अनगिनत द्वार खोल दिए थे, किन्तु आज इन माध्यमों का उपयोग जनता को दिग्भ्रमित करने और उनका हर तरह से शोषण करने के लिए किया जा रहा है.

       मीडिया के दो रूप हैं- प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया. प्रिंट मीडिया का अस्तित्व तब से है जब छापाखाना विकसित हुआ. हाँ, पिछले दिनों वैश्वीकरण के नाते उसके चरित्र और रूप में आशातीत वैविध्य और विस्तार आया है. मिशनरी पत्रकारिता अब अतीत का विषय बन चुकी है. आजादी के पहले हमारी हिन्दी पत्रकारिता सामाजिक एवं राजनीतिक आन्दोलनों से जुड़कर ऊर्जा प्राप्त करती थी. आज वह जनान्दोलनों से कटकर मात्र सत्ताधीशों की वाणी एवं सत्ता संघर्ष का आईना भर बनकर रह गई है अथवा कारपोरेट घरानों के हितों को साधने की चाकर बन गई है. जो हिन्दी पत्रकारिता बाबूराव विष्णु पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, अंबिका प्रसाद वाजपेयी जैसे यशस्वी पत्रकारों की बनायी जमीन पर खड़ी थी वह देखते ही देखते सत्ताधीशों की चाकर बन गई. ज्यादातर संपादक अब प्रबंधन का काम देखते हैं और अपनी विचारधारा को अपने मालिकों के हाथों गिरवी रखकर ही पत्रकारिता करते हैं क्योंकि उनके पास समझौता करने के अलावा दूसरे विकल्प नहीं बचे हैं.

       बहरहाल, अब छोटी छोटी लघु पत्रिकाओं पर ही उम्मीद टिकी है जिन्हें अभिव्यक्ति की आजादी के लिए अपने अपने पेट काटकर छोटी- बड़ी जगहों से लेखक और प्रतिरोधी प्रकृति के बुद्धिजीवी निकाल रहे हैं अथवा फेसबुक, ट्विटर, ह्वाट्सअप जैसे संचार माध्यम हैं जिनका इस्तेमाल सर्वजन सुलभ है.

       पन्द्रह-बीस साल पहले तक पत्रकारिता और साहित्य का रिश्ता बहुत गहरा था. ‘दिनमान’, ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ जैसी पत्रिकाएं बड़े औद्योगिक घरानों की थीं, परंतु संपादकों की नैतिकता और ईमानदारी के बल पर समाज में अपनी सकारात्मक अमिट छाप छोड़ सकी थीं और इन पत्रिकाओं में स्तरीय साहित्य भी देखने को मिल जाता था किन्तु आज एक भी ऐसी स्तरीय पत्रिका देखने को नहीं मिलती जो किसी बड़े औद्योगिक घराने की हो और जिसमें सामाजिक यथार्थ के साथ साथ साहित्य के लिए भी समुचित जगह हो.

       इलेक्ट्रानिक मीडिया की दुनिया अपेक्षाकृत नयी है. इसमें सिनेमा का इतिहास सबसे पुराना है. यह नया दृश्य माध्यम असाधारण रूप से व्यापक जनसमुदाय को जोड़ने वाला है. इसके दर्शक शिक्षित और अशिक्षित सभी होते हैं, इसलिए इसके प्रभाव को लेनिन ने बहुत जल्दी पहचान लिया था और सोवियत संघ में सन् 1919 में ही इसका राष्ट्रीकरण कर लिया गया था. वे मानते थे कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का साधन मात्र नहीं है. इसका सामाजिक उपयोग किया जा सकता है. उस दौर में सोवियत संघ में अनेक सोद्देश्य उच्चकोटि की फिल्में बनीं, किन्तु ठीक इसी तरह जब जर्मनी में हिटलर और मुसोलिनी जैसे फासिस्ट हुए तो उस दौर में ऐसी फिल्में भी बनीं जिनमें हिटलर को महामानव की तरह पेश किया गया. इस तरह सिनेमा का उपयोग आरंभ से ही शासक वर्ग के हित में होता रहा. सन् 1945-50 के बाद यूरोप के सिनेमा का हालीवुड माडल विकसित हुआ और सिनेमा का व्यापक व्यावसायिक उपयोग होने लगा. विदेशी भाषाओं में बनने वाली फिल्मों को भी आस्कर पुरस्कार के लिए चुना जाने लगा. इसका व्यापक असर भारतीय फिल्म उद्योग पर भी पड़ने लगा. भारतीय फिल्मों में अपराध, हिंसा, सेक्स आदि को बड़े पैमाने पर जगह मिलने लगी.

       एक दौर में साहित्य और सिनेमा का बहुत गहरा संबंध था. हिन्दी की अनेक मशहूर कृतियों पर फिल्में बनीं और सराही गईं. प्रेमचंद की ‘दो बैलों की कथा’, ‘सद्गति’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर क्रमश: ‘हीरामोती’, ‘सद्गति’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ नाम से, मोहन राकेश के ‘उसकी रोटी’, ‘आषाढ़ का एक दिन’ और ‘आधे अधूरे’ पर क्रमश: इन्हीं नामों से, कमलेश्वर के ‘एक सड़क सत्तावन गलियां’ और ‘डाक बंगला’ पर क्रमश: ‘बदनाम गली’ और ‘डाक बंगला’ नाम से, मन्नू भंडारी के ‘यही सच है’ पर ‘रजनी गंधा’ नाम से, तथा ‘आप का बंटी’ पर इसी नाम से, फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मारे गए गुलफाम उर्फ तीसरी कसम’ और ‘मैला आंचल’ पर क्रमश:  ‘तीसरी कसम’ और ‘डाग्डर बाबू’ नाम से, विजयदान देथा की ‘दुविधा’ और ‘परिणति’ पर इन्हीं नामों से, चंद्रधरशर्मा गुलेरी के ‘उसने कहा था’ पर इसी नाम से, राजेन्द्र यादव के ‘सारा आकाश’ पर इसी नाम से, निर्मल वर्मा के ‘माया दर्पण’ पर इसी नाम से, भीष्म साहनी के ‘तमस’ पर इसी नाम से, शैवाल के ‘दामुल’ पर इसी नाम से, धर्मवीर भारती के ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ पर इसी नाम से, हसन अब्बास के ‘आनंदी’ पर ‘मंडी’ नाम से आदि फिल्में उल्लेखनीय हैं. इनपर फिल्में बनाने वाले सत्यजीत रे, ह्रृशीकेश मुखर्जी, मणि कौल, बासु चटर्जी, बासु भट्टाचार्य, प्रकाश झा, नवेंदु घोष, गोविन्द निहलानी, गौतम घोष, श्याम बेनेगल, मुजफ्फर अली जैसी मशहूर हस्तियां थी. उल्लेखनीय यह है कि इनमें ज्यादातर अहिन्दी भाषी फिल्मकार हैं. खेद है कि धीरे धीरे सिनेमा और साहित्य का यह रिश्ता कमजोर पड़ता गया और वैश्वीकरण की आंधी ने तो बची खुची डोरियां भी झटक डालीं.

       मेरा निश्चित मत है कि मीडिया समीक्षा के भीतर सिनेमा का अध्ययन भी रखा जाना चाहिए और हमारे समाज को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले इस माध्यम की समीक्षा करने वालों को हिन्दी आलोचकों की मुख्य धारा में शामिल किया जाना चाहिए.

हिन्दी के लोक साहित्य की परंपरा बहुत समृद्ध है. लोक जीवन में विखरे विशाल लोक साहित्य का अनुशीलन करने से पता चलता है कि इसमें लोक जीवन का यथार्थ है, पीड़ा है, दुख है, मगर उस दुख और पीड़ा से जूझने का संकल्प भी है, मुठभेड़ करने का साहस भी है. इस लोक साहित्य में कोई बड़ा दर्शन, काव्यगत कलात्मकता, चमत्कार आदि नहीं मिलेगा. यहां सादगी है, प्रेम है, निष्ठा है, ईमानदारी है और सुसंस्कार है. हमारे लोक साहित्य में लोक का जो उदात्त चरित्र चित्रित है वह शिष्ट साहित्य में दुर्लभ है. शिष्ट साहित्य और लोक साहित्य के बीच का फासला वस्तुत: दो वर्गों के बीच का फासला है. यह दूसरा वर्ग समाज का बहुसंख्यक वर्ग है और इसके पास संवेदनाओं से सराबोर अपार साहित्य है. अवश्य ही यह लोक साहित्य है किन्तु अपनी समृद्धि में किसी भी तरह शिष्ट साहित्य से कमतर नहीं है. यह इस देश की सत्तर फीसदी गांवों में रहने वाली आबादी का साहित्य है जिसपर सबसे कम काम हो रहा है.

हिन्दी के लोक साहित्य का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. राजस्थान से लेकर झारखण्ड और उधर हिमांचल प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक फैले इस व्यापक क्षेत्र में विविधता और बहुकेन्द्रियता तो होगी ही, जबकि यह सारा क्षेत्र अलग-अलग दस राज्यों में बँटा हुआ है. लोक-साहित्य, लोक-गीत, लोक-गाथा, लोक-नृत्य आदि की विविधता इस क्षेत्र का यथार्थ है किन्तु इनके बीच सतत प्रवाहित रस की एक सामान्य भावधारा स्रोतस्विनी की तरह बहती दिखायी देती है.  नौटंकी, रामलीला, रासलीला, भांड़, ख्याल, स्वांग, कीर्तनिया, बिदेसिया, जाट-जटिन, माच, नाचा, गम्मत, फड़, राई, गवरी, नकल आदि हिन्दी के जातीय लोकनृत्य हैं. इसी तरह कहँरवा, बिरहा, लोरिकायन, सोरठी बृजाभार, बाला लखंदर, आल्हा, फाग, माढ़, चंदैनी, पण्डवानी, पंथी, सुवा, करमा, ददरिया, पवाड़ा, जागर आदि हिन्दी क्षेत्र की प्रचलित लोक-गाथाएं हैं. उल्लेखनीय यह है कि लोक-रंग की इस परंपरा को हिन्दू और मुसलमान- दोनो ने मिलकर समृद्ध किया है.

इस लोक-साहित्य का अध्ययन करने वाले समीक्षकों की परंपरा बहुत क्षीण है क्योंकि इस साहित्य पर काम करने वाले आलोचकों को पर्याप्त प्रतिष्ठा नही मिलती. रामनरेश त्रिपाठी, कृष्णदेव उपाध्याय, राहुल सांकृत्यायन,  सत्येन्द्र,  राम नारायण उपाध्याय आदि ने इस क्षेत्र में काम किया है. इसलिए हिन्दी आलोचना की मुख्य धारा में इन आलोचकों का नाम भी पूरे सम्मान के साथ लिया जाना चाहिए.

आज की आलोचना का प्रमुख विषय दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श, आदिवासी-विमर्श आदि है. किन्तु हिन्दी साहित्य मात्र यही नहीं है. ऊपर जिन विषयों की मैने चर्चा की है वह सब भी हिन्दी साहित्य का अनिवार्य अंग है और इसीलिए वह सब भी हमारे आलोचना साहित्य का अभिन्न अंग है.

  ईई-164/402, सेक्टर-2,साल्टलेक, कोलकाता-9
ई-मेल : amarnath.cu@gmail.com मो: 9433009898
अमरनाथ, पूर्व प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय

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