मैं हिन्दू, मेरा देश हिंदुस्तान पर यह हिन्दू राष्ट्र न बने – राजेंद्र चौधरी

असली लड़ाई सब के लिए शांति, सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और न्याय की है. रोज़गार की है, सरकारी नौकरी की नहीं अपितु गरिमामय एवं सुरक्षित रोज़गार एवं व्यवसाय की है. और शायद अब तो सब से बड़ी लड़ाई साफ़ हवा और पानी की है. पर हिन्दू राष्ट्र जैसे मुद्दे हमें इन मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित ही नहीं करने देते. कभी मंदिर, कभी घरवापसी, कभी लव ज़िहाद इत्यादि मुद्दों पर ही हमारा ध्यान लगा रहता है.

मैं जन्मना हिन्दू हूँ. न मैंने धर्म बदला है और न धर्म बदलने का इरादा है. बचपन में मैं नियमित पूजा पाठ भी करता था. होस्टल में जा कर भी बिना गीता पाठ किये भोजन नहीं किया. धीरे धीरे यह पूजा पाठ बंद हो  गया. सब से पहले मुझे दिक्कत हुई छुआ छूत से. मेरे परिवार में, ख़ास तौर से मेरी विशुद्ध गृहणी मां बहुत छुआ छूत मानती थी पर स्कूल की किताबों में जात पात विरोधी पाठ थे. सब देशवासी मेरे भाई बहन हैं यह पढाया जाता था. स्कूल में तर्क शीलता और विवेक को बढ़ावा दिया जाता था. मेरे स्कूल में समझने पर जोर था, रटने पर नहीं. इस लिये धीरे धीरे मेरे मन में यह सवाल उठने लगा कि किताब सही है या मेरी मां? यह सवाल उठा कि पृथ्वी के बारे में प्रस्ताव लिखते हुए मैं क्या लिखूं; कि यह सूर्य के चारों और घूमती है या ये लिखूं कि इसे शेषनाग ने अपने फन पर उठाया हुआ है? विज्ञान की परीक्षा में मानव का विकास बन्दर से हुआ है यह लिखूं या लिखूं कि इसे ब्रह्मा ने बनाया है और अलग अलग वर्ण को अलग अलग अंग से बनाया है? स्कूल ने मुझे विवेक एवं तर्क की कसोटी को मापदंड बनाना सीखाने के साथ सत्य का पाठ भी सिखाया. इस लिए मेरे लिए यह मुश्किल हो गया कि मैं अपने जीवन में कुछ और करूं या मानूं पर परीक्षा में कुछ और लिखूं. पास होना भी ज़रूरी था इस लिए किसी भी घटना की चर्चा करते हुए उस का कारण प्रभु इच्छा भी नहीं लिख सकता था. यह सवाल भी था कि भगत सिंह की बात मान कर नास्तिक बनूँ या धार्मिक बन कर जीवन की हर घटना को हरी इच्छा मान कर स्वीकार करूं. बाद में एक अर्थशास्त्री के रूप में यह सवाल भी उठा कि देश की बेरोज़गारी के लिए देश की आर्थिक नीतियों को बदलने का प्रयास करना चाहिए या मंदिर में जा कर बेरोज़गारी दूर करने की प्रार्थना करनी चाहिए?

समय के साथ भगवान, पूजा पाठ में मेरा विश्वास ख़त्म हो गया. अब खतरा यह है कि मुझे हिन्दू राष्ट्र में समान नागरिक के तौर पर रहने का अधिकार मिलेगा या नहीं. क्योंकि हूँ तो मैं केवल नाममात्र का हिन्दू वास्तव में तो मैं नास्तिक हूँ. अगर भारत अक्षरक्ष:, पूरी तरह से, वास्तव में हिन्दू राष्ट्र बन जाता है तो मेरे जैसे नास्तिकों को तो दोयम दर्जे का नागरिक बन कर रहना होगा.

जब समान नागरिक बन कर, बल्कि तथाकथित उच्च जातीय उच्च दर्जे तक शिक्षित एवं अंग्रेजी बोलने में सक्षम पुरुष होने के कारण वास्तव में आम नागरिक, और महिलाओं से कहीं अधिक प्रभावशाली होने के बावज़ूद, जीना दूभर हो गया है, अकेले थाने में जाने से डर लगता है (शायद ही कोई रपट लिखवाने अकेले थाने में जाता हो), तो हिन्दू राष्ट्र में दोयम दर्जे का नागरिक बनने पर मेरा क्या हाल होगा, यह सोच कर ही डर लगता है. फिर भी मेरे पास एक रास्ता तो होगा अपनी नास्तिकता छुपा कर बचने की कोशिश कर सकता हूँ, संशय होने के बावज़ूद चुपचाप यह सुन सकता हूँ कि भगवान राम का जन्म यहीं, इसी स्थान पर हुआ था (वैसे भी आज कोई कहाँ कोई सवाल करता है; कक्षा तक में शांति बना कर रखनी होती है और याद करना होता है) पर सिक्खों का क्या बनेगा? भले ही संघ उन्हें हिन्दू परिवार में शामिल करने का आश्वासन दे पर बहुत से सिक्ख तो ऐसा नहीं मानते. सिक्ख क्या कई हिन्दू भी सिक्खों को हिन्दू नहीं मानते वरना 1984 और उस के पहले और बाद के सिक्ख विरोधी दंगे तो नहीं होने चाहियें थे. मेरे दो (जन्मना) सिक्ख दोस्त सीधे सीधे 1984 की इस हिंसा का शिकार हुए. एक का तो सड़क से उठाया कुछ समान अब भी मेरे पास पड़ा है क्योंकि वो बहुत ज़रूरी भी नहीं था और उस को वापिस करके उस के जख्म कुरेदने का काम करने से मैं आज तक बचता रहा हूँ पर जब भी मैं अपने पास पड़े उस सामान को देखता हूँ तो दिल्ली की सड़कों का वो मंज़र मुझे याद हो आता है. और दूसरे दोस्त ने हमेशा के लिए अपने बाल कटा लिए और फिर देश भी छोड़ दिया. सवाल यह उठता है कि अगर हिन्दुस्तान हिन्दू राष्ट्र बन गया तो क्या सब सिक्खों को देश छोड़ना पडेगा या बाल कटाने पड़ेंगे या पंजाब हिन्दुस्तान से अलग हो जाएगा या उन्हें दोयम दर्ज़े का नागरिक बन कर रहना पड़ेगा?

इसी प्रकार जैन और बौद्धों का क्या होगा? जैन और बौद्धों की बात छोड़ों, वैष्णव हिन्दू मंदिरों के गढ़ मथुरा में जा कर मुझे यकायक याद आया कि स्वामी दयानंद सरस्वती की शिक्षा भी मथुरा में ही हुई थी. उन के गुरु का आश्रम यहीं था. मेरा मन हुआ कि उस आश्रम को जा कर देखा जाए तो सनातनी मथुरा में किसी को उस का पता ही नहीं था. किसी तथाकथिक ‘अर्बन नक्सल’ एवं नास्तिक को फ़ोन कर के उस आश्रम का पता ठिकाना मालूम करना पड़ा. हरियाणा में रहते हुए आर्यसमाज जितना बड़ा मालूम पड़ता है उतनी ही निराशा मथुरा के उस आश्रम में जा कर हुई क्योंकि आर्यसमाज का शायद की कोई चिन्ह वहाँ था. तो यह भी सवाल उठता है कि आर्य समाजी भी हिन्दू राष्ट्र में सुरक्षित होंगे या नहीं या उन्हें भी दोयम दर्जे का नागरिक बन कर रहना होगा?

एक बार केरल के एक गाँव में शाम को पटाखे चलने लगे. दिवाली गुज़रे बहुत दिन हो चुके थे. पूछताछ करने पर पता चला कि यहाँ मंदिर में हर शाम पटाखे चलाये जाते हैं. फिर पता चला कि हरियाणा में कुछ इलाकों में हिन्दुओं को जलाया नहीं दफनाया जाता है. अब जिन को दफनाया जाता है उन्हें हिन्दू राष्ट्र में समान नागरिक माना जाएगा या नहीं? और गाय का मास खाने वाले हिन्दुओं का क्या होगा? वैसे तो आज ये सब आराम से हिन्दुस्तान में रहते हैं और हिन्दू कहाते हैं. और अगर यह सब हिन्दू राष्ट्र बनने पर भी चलता रहेगा, तो फिर इस को हिन्दूराष्ट्र बनाने पर इतना ज़ोर क्यों है? हिन्दुस्तान को हिन्दुस्थान बनाने पर इतना ज़ोर क्यों है? जब भारत हिन्दू राष्ट्र कानूनी तौर पर बन जाएगा तो देर सवेर हिन्दू राष्ट्र में हिन्दू को परिभाषित तो करना ही होगा और जब कानूनी परिभाषा की बात आती है तो समरूपता थोपे जाने की संभावना बढ़ जाती है.

हिन्दुस्तान में जितनी विविधता स्वीकार्य है, कहीं जय श्री राम है, तो कहीं राधे राधे है, तो कहीं ओम शांति है, कहीं एक गाँव में शादी स्वीकार्य है (हाँ हिन्दूओं में भी) तो कहीं आस पास के गाँव में भी शादी स्वीकार्य नहीं है, हिन्दू राष्ट्र में तो इतनी विविधता नहीं रह सकती. हिन्दू राष्ट्र बनने पर तो संविधान में हिन्दू को परिभाषित करना पड़ेगा और कुरान, बाइबिल, गुरु ग्रन्थ साहिब जैसी एक पुस्तक भी अपनानी पड़ेगी या बनानी पड़ेगी.

हिन्दूओं की बाइबल या कुरआन कौन सी किताब बनेगी, इस बारे में भी चिंतित होना लाजमी है विशेष कर से महिलाओं का. महाराजा दशरथ वाला बहु पत्नी वाला हिन्दू राष्ट्र वापिस आयेगा या सती प्रथा वाला हिन्दू राष्ट्र? माहवारी के दिनों में महिला अस्पर्श्य होती है, उस का रसोई और मंदिरों में प्रवेश वर्जित होना चाहिए वाले हिन्दू ग्रन्थ/प्रथाएं अगर लागू हुई तो महिलाओं को वापिस घर की चारदीवारी में बंद होना होगा. अगर फिर से मीराओं को विष का प्याला पीना पड़ा तो क्या फायदा होगा हिन्दुस्तान को हिन्दू राष्ट्र बना के?

एक बात और. हमारे आस पास के किस देश में एक धर्म का वर्चस्व होने के बावज़ूद वहाँ शान्ति और समृद्धि है?  फिर चाहे वह बौध धर्म के वर्चस्व वाला श्री लंका या मयन्मार हो या हिन्दू राष्ट्र नेपाल हो. अगर एक धर्म का वर्चस्व होने के बावज़ूद, अगर शान्ति, सम्पन्त्ता और सुरक्षा नहीं मिलती तो फिर हिन्दू राष्ट्र बनने पर क्यों जोर लगाएं. क्यों न सीधे सीधे सब के लिए रोज़गार, न्याय, शांति, शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा पर अपनी ऊर्जा लगाएं? क्यों न देश के संसाधन इस बात पर लगें कि हर महिला, हर समय, घर के अन्दर और बाहर, दोनों जगह सुरक्षित महसूस करे. हर बच्चा अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त हो. क्यों अपने छात्रों द्वारा मिठाई खिलाते हुए यह सूचना देने पर कि उन की नौकरी लग गई है, मुझे यह न पूछना पड़ें कि तुम ने एमए कब की थी (क्योंकि जब तक वो मिठाई खिलाने आते हैं मैं स्वयं भूल चुका होता हूँ कि वे कब मेरे छात्र/छात्रा थे?) अगर एक धर्म के वर्चस्व वाले हमारे किसी पड़ोसी राष्ट्र में ये सब समस्याएं हल हो गई हैं, फिर तो भारत के हिन्दुओं को हिन्दू राष्ट्र के सपने देखने चाहिए वरना तो इस के लिए तैयार रहना चाहिए कि हिन्दू राष्ट्र बनने पर ये समस्याएं और भी बढ़ जायेंगी. ऐसा इस लिए होगा क्योंकि देश की लगभग 20 % आबादी गैर-हिन्दू है. इस का अर्थ हिन्दू राष्ट्र बन जाने पर हर 5 में से एक व्यक्ति को अलगाव महसूस होगा.  और जब हर 5 लोगों में से 1 व्यक्ति या हर 5 गांवों में से एक गाँव को अलगाव महसूस होगा, हर 5 जिलों में से एक जिले को अलगाव महसूस होगा, तो कितने बड़े पैमाने पर अंदरूनी फूट होगी.

हमारी इतिहास की किताबें आम तौर पर कहती हैं कि आंतरिक फूट के कारण विदेशी आक्रान्ता भारत में विजयी हुए थे. हिन्दुस्तान का हिन्दू राष्ट्र बनाना इस फूट को बढ़ाएगा या घटाएगा?  और अगर अलगाव इतने बड़े पैमाने पर होगा तो देश में समस्याएं, अशांति बढेंगी, घटेगी नहीं, पुलिस फ़ौज पर खर्चा बढेगा, घटेगा नहीं; पुलिस फ़ौज पर खर्चा बढेगा तो शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर खर्चा घटेगा, बढेगा नहीं, कर बढ़ेंगे, घटेंगे नहीं.

अगर हिन्दू होना ही हमारे लिए सब से महत्वपूर्ण है, हमारी बुनियादी पहचान है तो उतराखंड उत्तर प्रदेश से और तेलंगाना आंध्रप्रदेश से क्यों अलग हुआ? क्यों महाराष्ट्र में अलग विदर्भ राज्य की मांग लगातार उठती रहती है? क्यों हरियाणा पंजाब से अलग हुआ? क्यों हर राज्य में अलग जिले की मांग उठती रहती है? क्यों प्रादेशिक भेदभाव की बात उठती है? क्यों जातीय हिंसा और झगड़े होते हैं?  क्यों आसाम के लोगों को बांग्ला भाषी लोगों का बढ़ता वर्चस्व, फिर चाहे वे हिन्दू हों या न हो, भारतीय भी हों या न हो, चिंता का विषय है? क्यों हर राज्य में स्थानीय लोगों को ही दाखिला और रोज़गार देने की मांग उठती रही है और उठ रही है. क्यों नागरिकता कानून में बदलाव का आसाम और पूर्वोतर भारत में इतने बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है. ऐसा इस लिए है कि उन के लिए मुद्दा धर्म का न हो कर भाषा और संस्कृति का है.  

आज जब भारत के लोग इंग्लैंड, अमरीका, कनाडा में जा कर जो मंत्री बन रहे हैं, और आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में बनने की आशा कर रहे हैं, एवं इस पर हम गोरवान्वित भी महसूस करते हैं, अगर वो देश भी एक धर्म के वर्चस्व वाले देश बन गए तो इन देशों में रहने वाले हमारे हिन्दू बहन भाइयों का क्या होगा?

असली लड़ाई सब के लिए शांति, सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और न्याय की है. रोज़गार की है, सरकारी नौकरी की नहीं अपितु गरिमामय एवं सुरक्षित रोज़गार एवं व्यवसाय की है. और शायद अब तो सब से बड़ी लड़ाई साफ़ हवा और पानी की है. पर हिन्दू राष्ट्र जैसे मुद्दे हमें इन मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित ही नहीं करने देते. कभी मंदिर, कभी घरवापसी, कभी लव ज़िहाद इत्यादि मुद्दों पर ही हमारा ध्यान लगा रहता है. जैसे बच्चों का ध्यान पढाई पर केन्द्रित करने के लिए हम परीक्षा के दिनों में टीवी/कंप्यूटर इत्यादि बंद कर देते हैं, उसी प्रकार हर व्यक्ति के जीवन को छूने वाले वास्तविक मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए, ज़रूरी है कि हिन्दू राष्ट्र जैसे ध्यान भटकाने वाले मुद्दों से हम किनारा कर लें. हिन्दुस्तान हमारे लिए, हिन्दुओं के लिए काफी है, इसे हिन्दू स्थान बनाने की आवश्यकता नहीं है.

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