पंजाब का सांस्कृतिक त्यौहार लोहड़ी – डा. कर्मजीत सिंह अनुवाद – डा. सुभाष चंद्र

लोहड़ी पंजाब के मौसम से जुड़ा ऐसा त्यौहार है, जिसकी अपनी अनुपम विशेषताएं हैं। जैसे यह त्यौहार पौष की अंतिम रात को मनाया जाता है, जबकि भारत के दूसरे भागों में अगले दिन ‘संक्रांति’ मनाई जाती है। इस त्यौहार पर पंजाब के लोग आग जलाते हैं। संक्रांति पर ऐसा नहीं होता, केवल नदियों-सरोवरों में स्नान किया जाता है। लोहड़ी में तिलों और तिलों की रेवड़ियों की आहूति दी जाती है।

लोहड़ी पंजाब के मौसम से जुड़ा ऐसा त्यौहार है, जिसकी अपनी अनुपम विशेषताएं हैं। जैसे यह त्यौहार पौष की अंतिम रात को मनाया जाता है, जबकि भारत के दूसरे भागों में अगले दिन ‘संक्रांति’ मनाई जाती है। पंजाबी पौष मास की आखिरी रात को माघी के पहले दिन के साथ मनाते हैं। ‘पोह रिधी माघ खाधी’ का यही संकल्प है। इस त्यौहार पर पंजाब के लोग आग जलाते हैं। संक्रांति पर ऐसा नहीं होता, केवल नदियों-सरोवरों में स्नान किया जाता है। लोहड़ी में तिलों और तिलों की रेवड़ियों की आहूति दी जाती है। लोहड़ी पर ऐसा सगुन कहीं और मौजूद नहीं। इन विशेषताओं से नए सवाल भी उभरते हैं, जिनके जवाब यह मानकर ढूंढे जा सकते हैं कि लोहड़ी के त्यौहार की अपनी विशिष्ट पहचान है, परंतु पंजाबी के विद्वान इस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं देते। कुछ विद्वानों के विचारों का विश्लेषण के उपरांत यह बात अधिक स्पष्ट हो जाएगी।

डा. वनजारा बेदी ने लोहड़ी संबंधी विचार व्यक्त करते हुए कुछ नुक्ते सामने रखे हैं। पहला यह कि लोहड़ी मांगना ‘खैर नहीं लाग है’ क्योंकि इस दिन लोहड़ी मांगने आए बच्चों को घरों से खाली मोड़ना अपसगुन माना जाता है। इस तरह इसे लाग के स्थान पर सगुन का हिस्सा या बधाई ही कहना चाहिए, जो लड़के-लड़कियां लोहड़ी के बालण (लकड़ी) के साथ लेते हैं। यह गौर करना बड़ा दिलचस्प होगा कि संसार भर में अग्नि-पूजा के त्यौहारों पर बच्चे ही बालण (लकड़ियां) इकट्ठी करते हैं। कई स्थानों वे गाडियों और रेहड़ियों पर बालण लादकर लाते हैं। यह भी तथ्य है कि शोक वाले घरों से लोहड़ी नहीं मांगी जाती और न ही गमगीन परिवार लोहड़ी देता है। इसलिए यह स्पष्ट ही है कि लोहड़ी खुशियों का त्यौहार है। लोहड़ी को एक तरह से ‘देवी’ माना जाता है। हड़प्पा मोहनजोदड़ो की संस्कृति में दो लाठियों की रगड़ से उपजी आग को देवी माना गया है। परन्तु वैदिक काल में वह पुरुष बन जाता है और आखिर में जाति-व्यवस्था के अधीन ब्राह्मण का दर्जा प्राप्त कर लेता है। यहां देवताओं को भी जाति के आधार पर बांट दिया गया है। अग्नि के साथ बृहस्पति भी ब्राह्मण देवता है। इंद्र, वरुण, सोम और यम क्षत्रिय कहे गए हैं। 4. रामायण, महाभारत और पुराणों में एक मिथ है कि शिव के ससुर दक्ष ने शिव को भोज पर निमंत्रण नहीं भेजा। उसकी अनुपस्थिति में उसको दी भेंट पूषण देवता खाने लगा। शिव ने तीर के साथ उसका दांत तोड़ दिया। 5. अग्नि से यह मांग की जाती है कि अगर वह पुत्र का वरदान देगा, तो अगले साल उसको चरखा भेंट किया जाएगा। चरखा ही क्यों?

डा. वनजारा बेदी लोहड़ी का आरंभ ‘सूर्य पूजा से ही जुड़ा’ मानते हैं। मानव वैज्ञानिकों ने अग्नि पूजा का अर्थ के दो सिद्धांत दिए हैं। उनमें एक है ‘सूर्य सिद्धांत’। यह सिद्धांत मैनहरट ने दिया। जिसकी व्याख्या करता हुआ जेम्स फ्रेजर लिखता है कि ‘अग्नि पूजा की रस्मों की और विश्वासों की एक व्याख्या यह की जाती है कि यह जादू की रस्में या सूर्य के जादू हैं, जिसका आधार अनुकरण-जादू से जुड़ा हुआ है। सूरज की रोशनी मानवों,  पशुओं और पौधों के लिए सुनिश्चित करने के लिए आग जलाना, धरती पर आकाश के बीच रोशनी और गर्मी के महान स्रोत सूरज की नकल करना ही है। 6. डा. वनजारा बेदी किसी भी सिद्धांत का हवाला तो नहीं देते, परन्तु उनकी ओर से दिया विचार सूर्य-जादू-सिद्धांत की ओर इशारा करता है। इस विचार को आगे विस्तार की जरूरत थी, परन्तु यह विचार डा. वनजारा बेदी तक ही सीमित होकर रह गया है।

डा. वनजारा बेदी ने कुछ और महत्वपूर्ण विचार पेश किए हैं। जैसे सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण में प्रवेश करता है। देवते नींद से जाग पड़ते हैं। इसी खुशी में संक्रांति का त्यौहार मनाया जाता है, परन्तु लोहड़ी के लिए अन्य विचार की जरूरत महसूस होती है। डा. वनजारा बेदी एक रस्म का उल्लेख करते हैं, जो पंजाब में लोहड़ी के अवसर पर की जाती रही है, जो बेहद महत्वपूर्ण है। उस अनुसार, ‘लोहड़ी पर हर साल एक बड़ी आग जलाई जाती है, जिस के लिए न केवल सबके घरों से लकड़ी ही आती थी, बल्कि आग भी और इस सांझी आग में से नई आग लेकर फिर चुल्हे में दबा दी जाती थी। यह रिवाज अभी तक चला आ रहा है। 7. इस रस्म का एक और रूप यह भी रहा है इस संबंध में मुझे एक विद्यार्थी ने बताया था कि खरड़ के नजदीक के गांवों में लोहड़ी वाले दिन सारे गांव की आग बुझा दी जाती थी और लोहड़ी की आग में से आग लेकर फिर से घरों में दबा दी जाती थी। ‘भारत में छोटा नागपुर के बिहोंस कबीलों में दो लाठियों को रगड़ कर आज भी आग पैदा की जाती है। नीचे रखी लकड़ी को औरत और तीखी नोक वाली लकड़ी जिसको घुमाने से आग प्रज्जवलित होती है, को पुरुष माना जाता है।’ यह रस्म कई कबीलों (यूरोप) के इस विचार से मेल जाती है कि इस समय अग्नि बहुत क्षीण हो जाती है और रगड़ कर रस्मों के साथ दोबारा पैदा की गई आग पूरी शक्ति वाली होती है, जिसे पूरे साल इस्तेमाल करना होता है।

सुखदेव मादपुरी अपनी पुस्तक ‘फूलों भरी चंगेर’ में लोहड़ी से नए साल का आरंभ मानते हैं। इस समय बनने वाली चीजों में उसने तिलोए, रस की खीर,  साग,  खिचड़ी और गाजर के हलवे (गजरेला) का उल्लेख किया है। इसी तरह इस समय रेवड़ि़यां, गज्चक, मूंगफली बांटने का भी रिवाज है। इसी दिन यह बोला जाता है कि ‘ईसर आए दलिदर जाए, दलिदर की जड़ पट्टी जाए।’ तिल गिराते समय बोला जाने वाला एक आख्यान विचारणीय है कि ‘जितने जेठानी तिल सुटेगी, उतने दरानी पुत्त जनेगी।’ यहां तिलों को संतान-उत्पति के साथ जोड़ दिया गया है। यह विचार हजारों साल पुराना है। तिलों के बीज को सबसे पुराना बीज माना गया है। इसको 5 हजार वर्ष पुराना माना जाता है। भारतीय मिथक के अनुसार तिल अमर होने का प्रतीक है। महाविष्णु की पत्नी महाश्रीदेवी में भी तिलों के गुण हैं। घी के बाद तिलों को सबसे पवित्र माना गया है। अथर्ववेद में मांसाहारी पिशाचों, राक्षसों व बुरी आत्माओं को अग्नि देवता दूर भगा देता है। ऐसा करने के लिए यज्ञ में अग्नि देवता को देसी घी और तिलों के तेल की आहूति दी जाती है। अशीरीयन मिथक के अनुसार सृष्टि रचना के लिए एकत्रित हुए देवताओं ने तिलों से बनी शराब का सेवन किया। लोहड़ी के त्यौहार को समझने के लिए तिलों की ऐसी जानकारी हमें सुदूर अतीत तक ले जाती है। लोहड़़ी पर तिलों की आहूति देने के पीछे इसकी उत्पादक शक्ति का विचार ही है। इनको आग को अर्पित करना एक तरह से महांश्रीदेवी को अर्पण है, जिससे वरदान मांगा जा रहा है। गुरदित्त सिंह ने तिलों संबंधी एक ओर आख्यान दिया है, ‘तिल तिड़कन ते दिन सरकन’। यह माना जाता है कि लोहड़ी को दिन एक घड़ी बड़ा हो जाता है। वेदों में अग्नि देवता पुरुष है, पर पंजाबी में आग स्त्री लिंग है, जो लोहड़ी की देवी मानी जाती है। यह तथ्य इसकी ओर इशारा करता है कि लोहड़ी का त्यौहार पुरुष प्रधान समाज से भी प्राचीन है।

सर जेम्स फ्रेजर ने अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ ‘दा गोल्डन बोअ’ (स्टडी इन मैजिक एंड रिलीजन) में सारे यूरोप में अग्नि त्यौहारों को 7 भागों में बांटा है। 1. दा लेंटन फायर्ज 2. दा इस्टर फायर्ज 3. दा बेलटेन फायर्ज 4. दा मिड-समर फायर्ज 5. दा हैलोविन फायर्ज 6. दा मिड विंटर फायर्ज और 7. दा नीड फायर्ज। इन सब त्यौहारों का निष्कर्ष निकालता हुआ फ्रेजर लिखता है कि मार्के की बात यह है कि इन त्यौहारों में यह सांझा विश्वास है कि बलूत की गेली ( ) की अग्नि से बनी राख को सारा साल संभाल कर रखा जाता है, क्योंकि इससे घर सुरक्षित रहता है। विशेष रूप से आसमानी बिजली से बचाव होता है। फ्रेजर यह संभावना भी व्यक्त करता है कि शायद यह आर्यों के विश्वासों के चिन्ह हों, जो बलूत को (सीता-वृक्ष, जिसको सीता फल लगते हैं) गर्जना के देवता समान स्वीकारते हैं। बलूत-गेली की राख पशुओं व मनुष्यों को निरोगी बनाती है। यह गायों को बछड़े पैदा करने की शक्ति देती है,  इसके माध्यम से धरती शक्ति ग्रहण करके ज्यादा उपज देती है।

इसके उपरांत फ्रेजर अग्नि पूजा के दो सिद्धांतों का उल्लेख करता है। पहला अग्नि का सूर्य- सिद्धांत और दूसरा शुद्धिकरण सिद्धांत। परंतु हमारे लिए सूर्य सिद्धांत ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में भी सूर्य को प्राथमिकता दी जाती है। प्राग्ऐतिहासिक काल से ही सूरज के प्रतीक मिल जाते हैं। उत्तर-ऐतिहासिक काल और हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की सभ्यता में भी यह चिन्ह मिलते हैं। आदिकालीन मनुष्य सूर्य की रोशनी प्राप्त करने के लिए जादू टोने करता है। इस जादू का प्रभाव मौसम और वनस्पति पर पड़ता माना गया है। सूर्य जब धरती से सबसे ज्यादा दूर या फिर सबसे निकट होता है, तो अग्नि पूजा के त्यौहार मनाए जाते हैं। पोष महीने में सूर्य धरती से सबसे दूर माना जाता है और इसी दिन से दिन बड़े होने शुरु माने जाते हैं। यह एक तरह से परिवर्तन बिंदू है। ईसाई मत से पहले भी नास्तिक त्यौहारों पर सूर्य के जन्म का जश्न मनाया जाता था और यह भी माना जाता था कि वर्ष के सबसे छोटे दिन सूर्य  दोबारा जन्म लेता है। हंगरी, सवाबीया, ओबरमेडलिंगम में 15 जून को सेंट विटरस डे पर गाड़ी के पहिए को तारकोल लगाकर, घास-फूंस बांधकर, 12 फुट खंभे पर टांग कर आग लगाई जाती थी। खंभे को लट्ठ की जगह लगाया जाता था। इस रस्म को पहाड़ की चोटी पर पूरा किया जाता था। लोहड़ी के मौके पर चरखे का जलाना इसका प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति ही है। चरखे का चक्र सूर्य के साथ मेल खाता है और इसे घुमाने की दिशा भी सूर्य वाली ही है।

सूर्य और अग्नि उत्पादन को बढ़ाते हैं। यह विश्वास वनस्पति / साग सब्जियों तक ही सीमित नहीं,  इनका प्रभाव पशुओं और मनुष्यों पर भी माना गया है। मोराक्को मे निःसंतान दम्पति वह गर्मी के मौसम में अग्नि के ऊपर से गुजरते हैं, ताकि उनके घर में औलाद हो। अग्नि की राख खेतों में बिखेरी जाती है, क्योंकि ऐसा करने से फसलों की उपज बढ़ोतरी मानी गई है। आग से जलाई मशाल फलदार वृक्षों के नीचे घुमाई जाती है। पशुओं को आग के ऊपर से गुजारा जाता है, ताकि उनमें और ज्यादा बढ़़तरी हो।

दूसरा सिद्धांत शुद्धिकरण सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार शुद्धिकरण करती है। यह भूत प्रेतों को जला देती है और बुरी आत्माओं का नाश करती है। जेम्स फ्रेजर ने यूरोप से इसकी अनगिनत मिशालें दी हैं, परन्तु जैसे कि हमने कहा है कि हमारा लोहड़ी का त्योहार सूर्य सिद्धांत के साथ जुड़ा है। इसलिए हम यहां शुद्धिकरण सिद्धांत पर चर्चा नहीं कर रहे।

भारत में हड़प्पा-मोहनजोदड़ो के पड़ाव से भी पहले (3500 बी.सी.-2500 बी.सी.) अग्नि पूजा के चिह्न मिलते हैं। पहले पड़ाव को कालीबंगा-1 या पहला पड़ाव कहा जाता है। यहां से अग्नि कुंड प्राप्त हुए हैं, यहां से अग्नि पूजा किए जाने के प्रमाण मिलते हैं। साथ ही बलि दी जाने वाला स्थान भी मिलता है। कुंड में टैराकोटा-पिंड भी मिलते है, जिनकी बलि दी जाती होगी। कुछ कुंडों के पास से पशुओं के अवशेष मिले हैं,  जिनसे पशुओं की बलि दिए जाने की संभावना भी दिखाई देती है। यहां घरों में की जाने वाली अग्नि-पूजा का स्थान भी मिला है और सामूहिक अग्नि पूजा का भी। लोहड़ी का संबंध सामूहिक अग्नि पूजा के साथ जुड़ जाता है।

वैदिक काल में यज्ञ में अग्नि का प्रमुख स्थान है। अग्नि पुजारी और देवते के बीच का कार्य करती है। वैष्णव मत में अग्नि को महांनारायण की जिह्वा माना गया है। इसलिए अग्नि को दी भेंट महांनारायण को पहुंचती मानी जाती है। आयुर्वेद में अग्नि को अग्नेयास्त्र का निर्माता माना गया है। ऋग्वेद में 200 ऋचाएं अग्नि की स्तुति में मिलती हैं। यहां यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि अग्नि पूजा ऋषि ही करते थे, आम आदमी नहीं। यज्ञ इतने सख्त अनुशासन की मांग करते थे कि इनमें हर तरह के पशु की बलि दी जाती थी। यह आम लोगों से दूर हो गए, इसलिए बुद्ध धर्म और जैन मत इसके विरुद्ध खड़े हुए। अग्नि का मुंह पूर्व की ओर होगा, जब देवते को बलि देने के लिए अग्नि जलाई जाएगी। आत्माएं और मृतकों को बलि देने के लिए इसकी दिशा दक्षिण की ओर होगी और खाना पकाने के लिए अग्नि का मुंह पश्चिम की ओर होगा। अग्नि के तीन जन्म माने गए हैं, एक बार स्वर्ग में सूर्य के रूप में, दूसरा आसमानी बिजली के रूप में और तीसरा धरती पर आग के रूप में। आग की पत्नी स्वाहा है, जिसका नाम लेकर आहूति दी जाती है। भारतीय अग्नि को पवित्र करने वाली मानते हैं। इसलिए अगली परीक्षा का विचार भी प्रचलित है। इस तरह हम देखते हैं कि भारत में सूर्य सिद्धांत और शुद्धिकरण सिद्धांत मिश्रित रूप में प्रचलित है। सूर्य-अग्नि धरती के मनुष्यों, जीव-जंतुओं और वनस्पति के लिए जरूरी है, आसमानी बिजली तबाही करती है और घरेलू अग्नि मनुष्य के बस में आकर खाना बनाने से लेकर सारी जिंदगी को प्रभावित करती है।

पुराणों में आग काम का प्रतीक भी है और मानवीय अंश को आगे ले जाने के लिए सहायक। एक मिथक है कि एक बार पार्वती ने देवताओं को श्राप दिया कि वह निस्संतान रहेंगे। जब यह श्राप दिया गया, उस समय देवताओं में अग्नि देवता उपस्थित नहीं थे। एक समय देवताओं को जरूरत हुई कि वह विरोधियों पर जीत हासिल करें। देवताओं ने आग को ढूंढना शुरू किया। जिस भी जीव-जंतु ने आग का पता दिया, उसको भी श्राप मिला। मेंढक ने बताया कि अग्नि पानी में है, तो उसको जीभ न होने का श्राप दिया। हाथी ने देवताओं को कहा कि अस्पथ (सूरज का नाम) आग का ही रूप है। आग ने उसको भी उल्टी जीभ वाला बना दिया। तोते ने बताया कि आग जांड के वृक्ष के नीचे है तो उसको भी उल्टी जीभ लगा दी। देवताओं ने जांड में अग्नि के दर्शन करके उसको पुत्र पैदा करने के लिए कहा ताकि तारकासुर राक्षस को मारा जा सके। अग्नि देव ने शिव के बीरज को गंगा में लाकर गिरा दिया, जिससे कार्तिकेय का जन्म हुआ। उसने तारकासुर का खात्मा किया। इस मिथक के कई विस्तार हैं, पर इसका प्रतीक यह भी बनता है कि अग्नि देवता पुत्र पैदा करने का साधन बनता है। शिव जी के पास जाने के लिए अग्नि ने तोते का रूप धारण किया, जिस कारण तोता भी काम का वाहन बनता है। उपरोक्त विस्तृत विचार के बाद हम लोहड़ी के समस्त पक्षों पर विचार करने में समर्थ हो गए हैं। लोहड़ी अग्नि पूजा का त्यौहार है, जिसका संबंध पूर्व-हड़प्पा संस्कृति के साथ जुड़ता है। वहां अग्नि की सामूहिक पूजा को लोगों ने संभाल कर रखा। अग्निहोत्रियों ने अग्नि पूजा या यज्ञ करने के लिए एक अलग ब्राह्मण वर्ग तैयार कर लिया, जिसमें आम लोगों का कोई योगदान नहीं था, परन्तु आम लोगों ने अग्नि पूजा को अपने ढंग से जीवित रखा। पंजाबी लोगों ने इसको लोहड़ी के रूप में संभाला। उन्होंने इसको पोष की अंतिम रात के लिए रखा। ब्राह्मणवादी रस्मों ने संक्रांति को पहल दी, परन्तु आम लोगों ने अपने दिन का त्याग नहीं किया। अग्नि देव की पूजा इसलिए भी की जाती है कि यह पुत्र का वरदान देता है। नव दम्पतियों को बच्चे पैदा करने की ताकत देता है। आग में तिलों जैसे पवित्र बीजों की आहूति दी जाती है, जो फिर उत्पादकता का प्रतीक हैं और मानव विरोधी काली ताकतों का नाश करता है। जेठानी द्वारा ज्यादा तिल गिराए जाने से देवरानी के घर में ज्यादा संतान होने की संभावना है। सूर्य के प्रतीक चरखे को भी अग्नि को सौंपा जाता है। रामसरूप रिखी और उसकी पत्नी (सिरसा) ने जानकारी दी कि लोहड़ी के समय गाय के गोबर के पांच पाथे लोहड़ी जलाने से पहले नीचे रखे जाते हैं। इनकी राख बच्चों के तालू को लगाकर उनकी कौडी उठाई जाती है। आग पर पांच गन्नों को भी गर्म किया जाता है। और दूसरे दिन गन्ने को चूसा जाता है। पांच मूलियों को आग पर से वार कर अगले दिन खाया जाता है।

ज्ञानी गुरदित्त सिंह ने लोहड़ी के एक और पक्ष की ओर ध्यान दिलवाया है। वे लिखते हैं, ‘सवेरा होने तक उसकी धूनी की स्वाह भी नहीं मिलती। उस पवित्र स्वाह को लोग मुंह अंधेरे ही उठा ले जाते हैं।’ गुरदित्त सिंह ने यह तो नहीं बताया कि इस धूनी की स्वाह का प्रयोग किस मकसद के लिए किया जाता है। प्रो. बूटा सिंह बराड़ (रिजनल सेंटर बठिंडा) द्वारा दी जानकारी अनुसार बठिंडे के क्षेत्र में यह राख पशुओं के नीचे बिछाई जाती है और लुधियाना के आसपास इसको खेतों में बिछाया जाता है। पशुओं के नीचे बिछाने से पशुओं में बढ़ौतरी होती है और खेतों में गिराने से फसलों का झाड़ (उपज) ज्यादा निकलता है। यह प्रताप अग्नि देवता का ही है। इसको घर में रखने के साथ ही बाहरी दुश्मनों से रक्षा होती है। दोआबे में लोहड़ी की राख को पैरों के नीचे दबाने से बचाने के लिए इसको जल में प्रवाहित किया जाता है।

पंजाबी लोकधारा में अग्नि देव के साथ अनेक विश्वास जुड़े हुए हैं। अग्नि को बुझाने के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाता है। पूर्व समय में चूल्हे में फूंक मारने की बजाए पंखा आदि चलाकर इसको जलाया जाता था। आग के रूप दीए को बुझाना नहीं कहा जाता, बड़ा करना कहा जाता है। श्री अखंड पाठ के समय लगातार देसी घी की ज्योति जगाई जाती है। अग्नि देव को साक्षी मानकर हिन्दू परिवारों में फेरे लिए जाते हैं। सिखों के एक सम्प्रदाय नामधारियों में श्री गुरु ग्रंथ साहिब के साथ-साथ अग्नि (वेदी) के साथ ही फेरे पूरे किए जाते हैं। सारे भारत में अग्नि के मंदिरों में इसकी पूजा होती है। पंजाब में वैष्णों देवी की लाट प्रसिद्ध है। ज्वाला जी के नाम से ही स्पष्ट है। मंदिरों-गुरुद्वारों में अखंड ज्योति जगाना भी अग्नि पूजा के विश्वासों के साथ ही जुड़ा हुआ है। आरती लेनी भी इसी का ही रूप है।

लोहड़ी पर बच्चे अग्नि प्रज्जवलित करने के लिए लकड़ी का प्रबंध करते हैं। लोहड़ी अग्नि पूजा का त्यौहार शायद दुनिया का केवल एक ही त्यौहार है, जिस पर बच्चे गीत भी गाते हैं। इन गीतों का अध्ययन अपने-आप में दिलचस्प है। इन गीतों में प्रमुखता लकड़ी इकट्ठा करने की है, जिसके साथ अग्नि प्रज्जवलित करना होता है। ‘दियो लकड़ी दा छज्ज, लिआयो गोहियां का छज्ज, लिया माई लकड़ी, लिया लकड़ी का गड्ढा, लिया माई गोहा/माई का बचड़ा नवां नरोआ, असी पाथी ले के हिलांगे’ लोहड़ी के गीतों में दूसरी चीज डाली जाती है, गुड़। ‘न शक्कर (शक्कर तेरी कौड़ी) न ही कोई होर वस्तु सिरफ गुड़ दी रोडी।’ किसी भी शगुन व्यवहार पर पंजाबी संस्कृति में या तो गुड़ दिया जाता है या फिर लड्डू। इसलिए यह सगुनों के साथ जुड़ी वस्तुएं मानी जाती हैं। गुड़ तिलों में मिलाया जाता है, इसलिए भी इसका महत्व है। लोहड़ी के गीतों में तीसरा पक्ष है वर या आशीर्वाद देने का। अग्नि देवता के नाम पर दी जाने वाली वस्तुओं का फल तो मिलता ही है। इसलिए नव जन्मे शिशु, उसके पिता, नाना, यहां तक कि बड़े होके बनने वाले ससुराल को भी लंबी उम्र भोगने का वर दिया जाता है। ‘तेरे मुंडे होनगे चाली, तेरे मुंडे जम्मन सत’, आऊन बहुआं चाली, घर वोहटी आवे छनकदी’ आदि वचनों के द्वारा आशीशें दी जाती हैं। ज्ञानी गुरदित सिंह के अनुसार लोहड़ी पर ‘हरिया भागी भरिया’ जैसे जन्म समय के गीत भी गाए जाते हैं।

दोआबे में कृषि कार्य करते समय उपरोक्त गीतों के अतिरिक्त मुझे लड़कियों द्वारा गाए जाने वाले लंबे गीत भी मिले हैं। इन गीतों में भाई को बहन की ओर से अपने देश आने का निमंत्रण दिया जाता है, साथ ही सास की बेरुखी की उदासी भी झलकती है। असल में लोहड़ी लड़कियों के लिए ऐसा त्यौहार है, जिसमें माता-पिता की ओर से अपनी बेटियों को सौगातें दी जाती हैं। त्योरां (तीन कपड़े) के साथ-साथ समूचे परिवार के लिए कुछ-न-कुछ भेजा जाता है। इन गीतों में इस सब का विस्तृत वर्णन मिल जाता है। ‘लोहड़ी दा महीना चढ़िया मिल जाईं वीर वे’ की भावना बिरहमयी है। अगर भाई फौज में है, तो उसको दूध पीकर जाने की इच्छा है। परंतु दूर गई फौजों का वास्ता पाकर भाई बिना दूध पिए ही चला जाता है। भाई की ओर से लोहड़ी लेकर आने का बहनों का चाव भी इन गीतों में शामिल है और साथ ही भाइयों की सुख शांति भी मांगी गई है। नीचे लिखे पूरे गीत को समझने की जरूरत है, जिसमें भाई की ओर से लाई गई सौगातों के चाव के अतिरिक्त बंदरबांट (कानी वंड) करने के कारण एक बहन की ओर से पाए गए नाराजगी (भड़थू) का जी उल्लेख है। इन गीतों में सौगात के रूप में गहने लाने का हवाला भी आया है। गीत है:

लोहड़ी दा महीना चढ़िया, वीर प्राहुना आया।
आऊंदा आऊंदा मंजी ते बैठा, कच्ची लस्सी लियाया।
कच्ची लस्सी बाहर कढावा, कढ़िया दूध पिलाया।
कढ़े होए दूध विच मिसरी पावां, पी मेरी अम्मा जाया।
हत्थां नूं गजरे पैरां नूं सगले, सत-सत सूट लियाया।
एक भैन नू थोड़ा आया, ओहने भड़थू पाया।

लड़कियां जब किसी घर पर जाकर लोहड़ी मांगते गाने की लंबी हेक लगाती हैं, तो उनकी आवाज सारे गांव में सुनाई देती है। इसलिए कहा जा सकता है कि लोहड़ी पर बधाई लेने के तुकांत गीत ही शामिल नहीं, बल्कि बड़े मार्मिक भावना वाले गीत भी शामिल हैं।

इन सारे कारणों के कारण ही लोहड़ी पंजाबियों का सांझा पर्व है। सदियों बाद भी इस पर्व पर किसी किस्म का सांप्रदायिक रंग नहीं चढ़ सका। केवल एक दंतकथा ही इसके साथ जुड़ती है। उसका रंग भी मानवतावादी है। यह है दुल्ला भट्टी की दंत कथा। लोहड़ी अग्नि पूजा का त्यौहार है जिसकी जड़ें पूर्व-हड़प्पा काल में हैं। उसके साथ अकबर काल की दंतकथा का जुड़ना दो संस्कृतियों के समन्वय का ही प्रतीक है। उम्मीद की जानी चाहिए कि उपरोक्त विचारों की रोशनी में लोहड़ी संबंधी कुछ अनसुलझे प्रश्नों को भी सुलझाने का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा।

पूर्व प्रोफेसर व चेयरमैन, पंजाबी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र, संपर्क -098763-23862

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