भारत की पहली शिक्षिका – माता सावित्रीबाई फुले

दिनांक 03-01-2019 को जोतिबा-सावित्री बाई फुले पुस्तकालय, सैनी समाज भवन, कुरूक्षेत्र में माता सावित्री बाई फुले के जन्मोत्सव पर सत्य शोधक फाउंडेशन की ओर से एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें देस हरियाणा के संपादक और कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग प्रोफेसर डॉ. सुभाषचन्द्र द्वारा लिखित सावित्री बाई फुले के जीवन और चिंतन पर केन्द्रित पुस्तक ‘भारत की पहली शिक्षिका माता सावित्रीबाई फुले’ का विमोचन किया गया।

दिनांक 03-01-2019 को जोतिबा-सावित्री बाई फुले पुस्तकालय, सैनी समाज भवन, कुरूक्षेत्र में माता सावित्री बाई फुले के जन्मोत्सव पर सत्य शोधक फाउंडेशन की ओर से एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसमें देस हरियाणा के संपादक और कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग प्रोफेसर डॉ. सुभाषचन्द्र द्वारा लिखित सावित्री बाई फुले के जीवन और चिंतन पर केन्द्रित पुस्तक ‘भारत की पहली शिक्षिका माता सावित्रीबाई फुले’ का विमोचन किया गया। इस कार्यक्रम में मुख्यवक्ता डॉ.सुभाषचन्द्र ने सावित्री बाई फुले के जीवन और विचारों के बारे में विस्तार से बताया। सावित्री बाई फुले न केवल भारत की पहली महिला शिक्षिका थी बल्कि वह सामाजिक क्रांति की भी अग्रदूत थी। सावित्रीबाई फुले पूरी मानवता को शीशा दिखाने वाली शख्सियत थी उनके उस समय के संघर्ष के कारण ही आज हम यहां खड़े होकर बोल रहे है। सावित्री बाई फुले ने उस समय में पुणे में शिशु हत्या प्रतिबंधित गृह खोला और उसमें पैतिंस बच्चों ने जन्म लिया था और उनमें से एक बच्चा यशवंत राव था जिसे जोतिबा-सावित्री फुले ने गोद लिया।


सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को सतारा, महाराष्ट्र में हुआ था। उनका विवाह 9 वर्ष की उम्र में जोतिबा फुले के साथ हुआ और उस समय तक माता सावित्री बाई फुले अनपढ़ थी।उन्होंने 1848 में पुणे में 9 छात्राओं के साथ भारत के पहले बालिका विद्यालय की स्थापना की एवं प्रथम प्राचार्य के रूप में कार्य किया। उस समय में महिला शिक्षा और दलित जातियों की शिक्षा को लेकर कोई प्रावधान नहीं था बल्कि जब सावित्री बाई फुले ने अपना स्कुल चलाया तो उनके ऊपर लोग पत्थर और कीचड़ फैंकते थे। सावित्री बाई फुले ने सारा जीवन महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष, विधवाओं के लिए एक केन्द्र की स्थापना, विधवा पुनर्विवाह के लिए प्रोत्साहन, छुआ-छूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षा दिलाने के लिए निरन्तर संघर्ष किया। एक समाजसेविका के साथ-साथ सावित्री बाई फुले उच्च कोटि की कवियत्री और साहित्यकार थी, उन्होने ‘काव्यफुले’, ‘बावनकशी’ तथा सुबोध रत्नाकर का लेखन किया। 1852 में ब्रिटिश सरकार के द्वारा महिला शिक्षा के लिए सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया था। प्लेग प्रभावित बच्चों की सेवा के कारण प्लेग से ग्रसित होकर 10 मार्च 1897 को सावित्री बाई फुले का देहांत हो गया था।
जोतिबा फुले के विचारों पर प्रकाश डालते हुए उनकी पंक्तियों जिक्र किया-
विद्या बिना मति गई
मति बिना नीति गई
नीति बिना गति गई
गति बिना वित गया
वित बिना शुद्र गए
इतने अनर्थ किए एक अविद्या ने।

महात्मा जोतिबा फुले ने बताया कि किसान तीन प्रकार के होते है एक वो जो मोटा अनाज पैदा करते है, दूसरे वो जो भेड़ बकरी मवेशी आदि पालते थे और तीसरे वो जो फल-फुल की खेती करते थे जिन्हे माली कहते थे। उस समय किसानों में चेतना पैदा करते हुए सबको एकत्रित किया और किसानों को लगान न देने को बोला और उस समय में किसानों के साथ मिलकर हड़ताल की।


सावित्री बाई फुले के विचारों को स्पष्ट करते हुए डॉ.सुभाषचन्द्र ने बताया कि सावित्री बाई फुले का लोगों के लिए आह्वान था कि “जाओ जाकर पढ़ो लिखो, आत्मनिर्भर बनों, काम करो, ज्ञान और धन इक्ट्ठा करों, ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है, इसलिए खाली न बैठो, जाकर शिक्षा लो, तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है, इसलिए सीखो”। सावित्री बाई फुले और जोतिबाराव फुले ने सत्यशोधक समाज नाम से एक संस्था चलाई थी और अकाल के समय में 52 रसोई चलाई थी ताकि भूख से लोगों को बचाया जा सके।
विजय विद्यार्थी ने बताया सावित्री बाई फुले आधुनिक भारतीय समाज के अग्रदुत थे। आज महिला सशक्तिकरण का बड़ा जौर दिया जा रहा है परन्तु सावित्रीबाई फुले के विचारों और संघर्ष के कारण ही भारत जैसे देश में महिलाएं राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे पदों पर पहुंच गई है।
इस मौके पर, विजय विद्यार्थी, राजविन्द्र चंदी, रविन्द्र गासो, कमलेश चौधरी, हरपाल गाफिल, अरूण कैहरबा, ओमप्रकाश करूणेश, आदि मौजूद थे।

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