सिपाही के मन की बात – मंगतराम शास्त्री

कान खोल कै सुणल्यो लोग्गो कहरया दर्द सिपाही का।
लोग करैं बदनाम पुलिस का धन्धा लूट कमाई का।।

सारी हाणां रहूँ नजर म्ह मेरी नौकरी वरदी की
चौबिस घण्टे की ड्यूटी ना परवाह गरमी सरदी की
पड़ै राखणी हां म्हं हां मनै इस सिस्टम बेदरदी की
पेट की खातिर गाल़ी खाऊं के कीमत अणसरदी की
माम्मा कैह कै लोग खिजावैं पात्तर बणूं हंसाई का।

कलरक तै भी थोड़ी तन्खा घर का निर्बाह करणा हो
अफसर का हो हुकम बजाणा जी जी कैह कै डरणा हो
छुटभैये नेता आग्गै भी अणचाही म्हं फिरणा हो
बदमास्सां संग मुठभेड़ां म्हं बिन आई म्हं मरणा हो
फेर भी चा के कप का तान्ना सुणना पड़ज्या ताई का।

बेशक कोए छुटाकै भाज्जो नहीं हथकड़ी लाणी हो
ल्हाश कै धोरै खड़े खड़े कदे पड़ज्या रात बिताणी हो
करड़ी ड्यूटी इसी बैल्ट की सारी ढाल़ पुगाणी हो
एक म्हैस सौवां नै धांस्सै बदनामी की काहणी हो
जी जल़ज्या सै लोग कहैं जब नहीं पुलसिया भाई का।

रैल्ली धरणे प्रदर्शन म्हं जिब कोए बात बिगड़ज्या रै
जब मजदूर किसान मुलाजम शासन गेल्यां भिड़ज्या रै
बेशक सगी ब्हाण स्याहमी हो जी नै रास्सा छिड़ज्या रै
मजबूरी म्हं माँ जाई कै लट्ठ मारणा पड़ज्या रै
कड़ै करुं पछतावा लोग्गो बाप पै रफल चलाई का।

सेवा अर सहयोग सुरक्षा सै तालीम सिपाहियां की
पर म्हारै जुम्मै रखवाल़ी अपराधी बलवाईयां की
चै डेरयां के बाब्बे हों जो अकल हड़ैं अनुयायियां की
चहे गुण्डे हों राजनीति के उन्मादी दंगाईयां की
कानुन खात्तर फेर सामना करणा पड़ै लड़ाई का।

बेशक हो बदनाम पुलिस पर बिना पुलिस बेढंग होज्या
जै भै ना हो किते पुलिस का आम आदमी तंग होज्या
गरीब आदमी के सिर पै तो भों कोए ऊत मलंग होज्या
खुल्ले सांड मचादें रौल़ा पल म्हं शान्ति भंग होज्या
पुलिस के दम पै जिम्मा ले ले निर्बल ठोक गवाही का।

इन्क्रीमेंट कटण की चिंता सबतै घणी सिपाही की
नहीं सहुलियत पड़ै गुलामी सहणी अफसर शाही की
नहीं आजादी बोल्लण की ना छुट्टी घूम फिराई की
सुन्नी रहैं खुशी बच्यां की तीज बीतज्या ब्याही की
कहै मंगतराम सवेरा हो कद घुट घुट रात बिताई का।

मंगत राम शास्त्री

जिला जीन्द के टाडरथ गांव में सन् 1963 में जन्म। शास्त्री, हिन्दी तथा संस्कृत में स्नातकोतर। साक्षरता अभियान में सक्रिय हिस्सेदारी तथा समाज-सुधार के कार्यों में रुचि। अध्यापक समाज पत्रिका का संपादन। कहानी, व्यंग्य, गीत विधा में निरन्तर लेखन तथा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। बोली अपणी बात नामक हरियाणवी रागनी-संग्रह प्रकाशित।

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