भारत की पहली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले – सुभाष चंद्र

भारत की पहली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले ने भारतीय समाज में मौजूद धर्मभेद, वर्णभेद, जातिभेद, लिंगभेद के खिलाफ कार्य किया। वे जैविक बुद्धिजीवी थी, जिन्होंने अपने अनुभवों से ही अपने जीवन-दर्शन का निर्माण किया। सावित्रीबाई फुले ने समाज में सत्य, न्याय, समानता, स्वतंत्रता और मानव भाईचारे की स्थापना के लिए अनेक क्रांतिकारी कदम उठाए।

आज सार्वजनिक जीवन हर क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति दिखाई देती है। हमेशा से ऐसा नहीं था, इसके लिए समाज में अनेक समाज सुधारकों ने संघर्ष किया है। भारत की पहली शिक्षिका सावित्रीबाई फुले ने भारतीय समाज में मौजूद धर्मभेद, वर्णभेद, जातिभेद, लिंगभेद के खिलाफ कार्य किया। वे जैविक बुद्धिजीवी थी, जिन्होंने अपने अनुभवों से ही अपने जीवन-दर्शन का निर्माण किया। सावित्रीबाई फुले ने समाज में सत्य, न्याय, समानता, स्वतंत्रता और मानव भाईचारे की स्थापना के लिए अनेक क्रांतिकारी कदम उठाए। क्रांतिकारी कार्यों के लिए रूढ़िवादी समाज की प्रताड़नाओं को सहन किया, लेकिन पूरी जिंदगी दृढ़ संकल्प के साथ कार्य किया।

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र राज्य के सतारा जिले के नायगांव में हुआ। सावित्रीबाई फुले के पिता का नाम था – खंडो जी पाटिल और माता का नाम लक्ष्मी था। सावित्रीबाई के तीन भाई भी थे – सिदु जी, सखाराम और श्रीपति। सावित्रीबाई इनमें सबसे बड़ी थी। सन् 1840 में सावित्रीबाई फुले का विवाह जोतिबा फुले से हुआ। इस समय सावित्रीबाई की उम्र 9 साल थी और जोतिबा की 13 साल। सावित्रीबाई और जोतिबा फुले का विवाह दो महान शख्सियतों का मिलन था। इस जोड़ी ने मिलकर आधुनिक भारत का नक्शा बनाया।  सावित्रीबाई फुले को उनके पति जोतिबा फुले ने शिक्षा दी। उस समय में यह एक असामान्य बात थी। भारतीय समाज में धार्मिक व्यवस्था के तहत स्त्री और शूद्र को शिक्षा से वंचित रखा गया। वर्ण-धर्म की रूढ़िवादी धारणा समाज में स्थापित हो गई थी कि यदि स्त्री और शूद्र वर्ग शिक्षा प्राप्त करेंगे तो उन्हें विशेषतौर पर और पूरे समाज को घोर विपत्ति का सामना करना पड़ेगा।

सन् 1848 में जोतिबा फुले व सावित्रीबाई फुले ने पुणे के बुधवार पेठ में लड़कियों के लिए स्कूल खोला। इसी स्कूल में सावित्रीबाई शिक्षिका हुई और पहली भारतीय महिला शिक्षक होने का गौरव प्राप्त हुआ। इस स्कूल में कुल 6 लड़कियों ने प्रवेश लिया था। इसके बाद सावित्रीबाई फुले और जोतिबा फुले ने पूना के क्षेत्र में 18 स्कूल खोले। सावित्रीबाई का मानना था कि जब तक सामाजिक जीवन में अज्ञानता है तब तक सुधार और तरक्की संभव नहीं है। अज्ञानता को वह मानवता का सबसे घातक दुश्मन समझती थी और इसे अपने जीवन से ढूंढ ढूंढकर और पीटकर भगाने का आह्वान करती थी। अपनी ‘अज्ञान’ कविता में लिखा है कि 

एक ही दुश्मन है हम सबका
सब मिलकर खदेड़ो उसे पीटकर
नाम स्पष्ट है एक ही उसका
अज्ञान
कस के पकड़ो,
पीटो उसे अपने बीच से खदेड़ दो।

सावित्रीबाई फुले और जोतिबा फुले के लड़कियों और अछूतों के लिए शिक्षा के काम का रूढ़िवादी समाज ने विरोध किया। सावित्रीबाई फुले जब स्कूल के लिए निकलती तो उन पर गोबर-पत्थर फेंकते। गोबर से सावित्री बाई फुले की साड़ी गंदी हो जाती थी। इसकारण वह एक अतिरिक्त साड़ी अपने साथ लेकर जाती थी। स्कूल में जाकर साड़ी बदल लेती थीं। गोबर-पत्थर फेंकने वालों की इन हरकतों से वह निराश नहीं हुई। उनसे वह कहती 

‘मेरे भाइयो, मुझे प्रोत्साहन देने के लिए, आप मुझ पर पत्थर नहीं, फूलों की वर्षा कर रहे हैं, तुम्हारी इस करतूत से मुझे यही सबक मिलता है कि मैं निरंतर अपनी बहनों की सेवा में लगी रहूं।ईश्वर तुम्हें सुखी रखे।’

सन् 1863 में सावित्रीबाई और जोतिबा फुले ने ‘शिशु हत्या प्रतिबंधक गृह’ शुरू करके क्रांतिकारी कदम उठाया। उस जमाने में बाल-विवाह होते थे और अनेक कारणों से पति की मृत्यु के कारण बाल-विधवाओं की संख्या काफी थी। इन विधवाओं के यौन-शोषण के कारण ये गर्भवती हो जाती थी। सामाजिक सम्मान बचाने के लिए कई अमानवीय कदम उठाए जाते थे। गर्भ को गिराने के प्रयास किए जाते थे, जिससे महिलाओं का स्वास्थ्य खराब होता था। कई मामलों में महिलाएं आत्महत्या कर लेती थी। कई मामलों में नवजात शिशु की हत्या की जाती थी। कई मामलों में महिलाओं की हत्या कर दी जाती थी और कई मामलों में उन्हें घर से बाहर खदेड़ दिया जाता था। विशेषतौर पर गौर करने की बात यह है कि इसमें अधिकांश महिलाएं उच्च जाति से ताल्लुक रखती थी, क्योंकि शास्त्रीय परंपराओं व मान्यताओं को वही समाज अधिक मानता था। निम्न अथवा मध्यम जातियों पर शास्त्रीय परंपराओं की जकड़ अधिक नहीं होने के कारण विधवाओं का विवाह कर दिया जाता था।  सावित्रीबाई व जोतिराव फुले ने अपने घर में विधवाओं के लिए प्रसुति-गृह खोला।  इस बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की सूचना के लिए पूना में जगह-जगह पोस्टर लगाए गए। इन पोस्टरों पर लिखा थाः 

‘विधवाओं! यहां अनाम रहकर बिना किसी बाधा के अपना बच्चा पैदा कीजिए।अपना बच्चा साथ ले जाएं या यहीं रखें, यह आपकी मर्जी पर निर्भर रहेगा।’ 

यह समस्या कितनी भयंकर थी इसका अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि यहां 35 बच्चे पैदा हुए थे, जिनमें से केवल 5 बच्चे जिंदा बचे थे । क्योंकि गर्भ गिराने के प्रयास में उनको पहले ही चोट पहुंचाई जा चुकी थी।  सन् 1877 में महाराष्ट्र में भंयकर अकाल पड़ा। लोग अपने भूखों मर रहे थे। चारे के अभाव में पशुओं के गांव-देहात के लोग अपने पशुओं को भगा रहे थे। अपने घरों को छोड़कर शहर में आ रहे थे। सत्यशोधक समाज ने ‘विक्टोरिया बाल आश्रम’ की स्थापना की जिसमें हजारों लोग हर रोज खाना खाते थे।

सावित्रीबाई फुले को प्रकृति से गहरा प्रेम था। सावित्रीबाई फुले मनुष्य को प्रकृति का अंग समझती है। परस्परता के अभाव में मानव-जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। मूलतः किसान परिवार से ताल्लुक होने के कारण मिट्टी के रंग व खुशबू उसके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा था। जोतिबा फुले का परिवार फूलों के कारोबार संबंधित था विभिन्न किस्म के फूलों के रंगों, खुशबू व कोमलता को उनकी विशिष्टता में पहचानती थी। उनकी ‘पीला चम्पा’, ‘चमेली के फूल’, ‘जुही की कली’, ‘गुलाब का फूल’, ‘तितली और फूलों का कलियां’, ‘धरती का गीत’, ‘मानव और प्रकृति’ कविताओं पर सरसरी नजर डालने से ही इसका अनुमान हो जाता है।

सन् 1873 को पूना में जोतिबा फुले की अध्यक्षता में ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना हुई। सत्यशोधक समाज के काम की तीन दिशाएं थी। भक्त और भगवान के मध्य किसी बिचौलिये की जरूरत नहीं। बिचौलियों द्वारा लादी गई धार्मिक गुलामी को नष्ट करना, अंधश्रद्ध अज्ञानी लोगों को उस गुलामी से मुक्त करना। साहूकारों और जमींदारों के शिकंजे से किसानों को मुक्त करना। सभी जातियों के स्त्री-पुरुषों को शिक्षा प्राप्त करा देना।

जोतिबा फुले की मृत्यु के बाद सन् 1893 में सत्यशोधक समाज के सासवड़ में हुए अधिवेशन में सावित्रीबाई फुले को सत्यशोधक समाज का अध्यक्ष चुना गया। सावित्रीबाई फुले जब तक जिंदा रही तब तक सत्यशोधक समाज का नेतृत्व किया। 28 नवम्बर सन् 1890 को सावित्रीबाई फुले के पति जोतिबा फुले का देहांत हो गया। सावित्रीबाई फुले और जोतिबा फुले की अपनी संतान नहीं थी। इन्होंने अपने बाल हत्या प्रतिबंधक गृह में पैदा हुए बच्चे को गोद लिया था और इसका नाम यशवंत रखा था। जोतिबा फुले ने अपनी वसीयत में उत्तराधिकार के समस्त अधिकार यशवंत को दिए थे।  एक परंपरा यह थी कि जो व्यक्ति अंतिम यात्रा में ‘तित्वा’ (मिट्टी का छोटा घड़ा) उठाकर चलता, वही मृतक का उत्तराधिकारी माना जाता था और मृतक की संपति प्राप्त करता था। संपति के लालच में जोतिबा फुले के भतीजे (भाई के लड़के) ने यशवंत को दत्तक पुत्र बताकर ‘तित्वा’ उठाने पर विवाद किया और रक्त संबंधी होने के कारण इसे निभाने का दावा किया। इस विवाद में सावित्रीबाई फुले स्वयं ‘तित्वा’ उठाकर चली और अपने पति जोतिबा फुले का अंतिम संस्कार किया। शायद यह भारत की पहली महिला थी जिसने अपने पति को मुखाग्नि दी। जिस समाज में स्त्रियों का श्मशान भूमि में जाना तक वर्जित हो उसमें यह साहसिक कदम ही कहा जाएगा। 10 मार्च को 1897 को शहीद हुई। उनको शहीद की संज्ञा देना कुछ लोगों को एकबारगी शायद अजीब लगे। लेकिन उनको शहीद कहना अतिश्योक्ति नहीं है। क्योंकि उनको अच्छी तरह से मालूम था कि मानव भलाई का जो कार्य वे कर रही हैं इसमें उनकी जान भी जा सकती है। यही है शहादत का जज्बा।

1897 में पूना में प्लेग फैल गया था। लोग मर रहे थे धड़ाधड़। चारों तरफ त्राहि त्राहि मची थी। संक्रामक बिमारी होने के कारण लोग डरे हुए थे। अपने बेटा-बेटी, मां-बाप, भाई-बहन तक को छूने से डरते थे। कहीं प्लेग की चपेट में ना आ जाएं। सावित्रीबाई को पता चला कि महार बस्ती में पांडुरंग बाबाजी गायकवाड़ का लड़का प्लेग की चपेट में है। कोई उसे छू भी नहीं रहा। उसे अपनी पीठ पर बिठा कर हस्पताल लाई। प्लेग ने सावित्रीबाई को अपनी चपेट में ले लिया। चार महीने बाद 10 मार्च 1897 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

सावित्रीबाई फुले को यह बात अच्छी तरह से ज्ञात थी कि प्लेग जानलेवा बीमारी है और संक्रमण से फैलती है। मानव-सेवा की मूर्ति सावित्रीबाई फुले ने अपनी जान की परवाह न करते हुए मानव-सेवा के कार्य को अंजाम दिया। मानवता की सेवा के लिए शहीद सावित्रीबाई फुले को सलाम।

उन्नीसवीं शताब्दी में अनेक समाज सुधारकों ने समाज सुधार के अनेक आंदोलनों की शुरुआत की। राजा राम मोहन राय, केश्वचंद्र सेन, देवेंद्रनाथ ठाकुर, स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे महान सुधारकों ने भारतीय समाज की अनेक कुरीतियों पर कुठाराघात किया। इन समाज सुधारकों का संबंध मध्यवर्ग और उच्चवर्ण से था, इसलिए इनका प्रभाव भी इन्हीं वर्गों तक था। इन आंदोलनों का कार्यक्षेत्र स्त्री शिक्षा, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह, अनमेल विवाह तक सीमित था। 

फुले-दम्पति का संबंध समाज के निम्न-वर्ग से था और इनका प्रभाव समाज के निचले वर्गों शूद्रों-अतिशूद्रों और किसानों तक फैला था। जाति-व्यवस्था का खात्मा, छुआछूत का खात्मा, धार्मिक-पाखण्डों व अंधविश्वासों का निराकरण, भेदभावपूर्ण जातिगत व लैंगिक मूल्यों की सामाजिक जीवन से समाप्ति, धार्मिक आवरण में गरीबों का शोषण, सामाजिक विषमता, अज्ञानता, ब्राह्मणवादी सांस्कृतिक वर्चस्व के स्थान पर समाज में लैंगिक समानता, सामाजिक समानता, धार्मिक सहिष्णुता, वैज्ञानिक व तार्किकता की स्थापना इनके आंदोलनों के उद्देश्य था। 

सत्य और न्याय के लिए संघर्षरत लोगों के लिए सावित्रीबाई फुले का जीवन प्रेरणादायी है। इनके जीवन संघर्षों और चिंतन का भारतीय समाज पर विशेषकर दलितों-वंचितों-शोषितों के आंदोलनों और जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। फुले-दम्पति के संघर्ष मुक्तिदाता बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर की संघर्षों व चेतना की प्रेरणा बने। 

प्रोफेसर सुभाष चंद्र, हिंदी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र संपर्क 9416482156 

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