बाह्मण – रविंद्रनाथ टैगोर, अनु – प्रोफेसर सुभाष चंद्र

‘मेरे लाडले,
द्विजां म्हं सै तू सबतै ऊपर,
सत्य सै तेरा बंश।’

 बाह्मण
(छांदोग्य उपनिषद तै)
रविंद्रनाथ टैगोर, अनु - प्रोफेसर सुभाष चंद्र
 
सुरसती के कंठारे
जंगळ की घुप्प अंधेरी छांह में
सांझे बखत सूरज छिपग्या।
 
ऋषियां के जाकत
सिरां पे समिधा के गट्ठड़ ठांए
सूं सां आश्रम में बोहड़गे।
 
ऋषियां के जाकत
प्यारी अर सीळी आंख्यां आळी थकी गांयां नै बी
बुला बुला कै ल्याए गौसाळ म्हं।
 
सांझे का नहाण करके सारे जणे,
होम की आग तै जगमग आंगण म्हं,
गुरु गौतम कै चारों कान्नी बैठगे।
 
सून्ने, खुले अकास में
महाश्यांति ध्यान मगन।
जड़ै लैन-की-लैन ग्रह-मंडळी बैठी
कौतुहली चुप्प बैठे चेल्यां की तरां।
 
चुप-चप्पीता आश्रम एकदम हरकत में आग्या।
महर्षि गौतम बोले,
‘बाळको, ध्यान तै सुणो
ब्रह्म-बिद्या की बात’।
 
उसे टेम
अर्घ का ऊंजळा भरे
एक बाळक आंगण म्हं आग्या।
फळ, फूल अर पत्ते गलै
महर्षि के पैर नचक्यारके,
सरदा तै महर्षि को पा लागन करके,
कोयल बरगे गळै तै
ईमरत भरी मीठी बोली म्हं बोल्या
‘सत्यकाम मेरा नां
कुसाछेत्र का बसिंदा
ब्रह्म बिद्या सीखण खातर,
दीक्षा लेण आया’।
 
सुणके, मुस्काया
प्यार भरे लहजे म्हं महर्षि बोल्या,
‘जिउंदा रह, बेटे,
बिद्या का हक सिरप बाह्मण का’
तेरा के गोत ?
 
बाळक सहज दे सी बोल्या,
‘गुरू जी, गोत का मनैं बेरा कोनी।
इब जाऊं, काल्ह नै आऊंगा मेरी मां तै पूछके।’
 
इतनी कहकै ऋषि के पैरां के हाथ लाके
सत्यकाम चल्या गया
घणे बीह्ड़ जंगळ के रस्ते।
उन्नें पैदले पार करी
शांत, नितरी, पतळी सी सुरसती।
नदी कंठारे
नींद म्हं श्यांत गाम के बाहरले कानी
अपणी मां की छान म्हं आग्या।
 
छान म्हं
सांझ का बाळ्या दीवा इब्ब ताहिं बळै
बेटे की बाट देखदी मां जाबाला
खड़ी थी दरवाज्जा पकड़े।
देखदे ही
बेटा ला लीया छाती कै
माथा चूम्ब्या अर निचकार्या।
सत्यकाम ने पूछ्या,
‘मां, न्यू बता,
मेरे बाप का के नाम ?,
मेरा के गोत ?
मैं गौतम पे गया था दीक्षा लेण
गुरू मनैं बोल्या, बेटे,
ब्रह्म बिद्या का हक सिरप बाह्मण का’।
मां, मेरा के गोत ?
 
सुणके बात, नाड़ तळां नै करके
मां सहजदे सी बोली,
जवानी म्हं गरीबी के संकट म्हं
बहोत लोगां की टहल बजाई।
जिब मनैं तों गर्भ में धार्या।
तों जाम्या था, कुंवारी जाबाला कै,
बेटा, मनैं नी पता तेरा गोत।’
 
आगले दिन
सुहांदा सुहांदा तड़का लिकड़्या
आश्रम के पेड़्यां की चोटियां पे।
सारे चेले
पुराणे बड़ तळे
गौतम के चारों कानी बैठे।
न्यूं लागैं थे
जणों ओस म्हं भीजी किरण हों,
 
जणों, भगत के आंजुआं तै धोए होए
नवे पुन्न के सौंदर्य हों।
सबेरे नहाण तै
उनकी सुथराई चमकगी
उनके बाळ इब्बे गीले पड़े।
उनकी सुंथराई पवित्र, रूप छैल्ले
अर शरीर उजळा है।
 
पंछियों की चहचहाट
भौंरों का गुंजन
अर बहंदे पाणी की कलकल
सामवेद के गीतां का
चेल्यां की एक सुर म्हं गाणे
की मीठी धुन 
  
ऐन इसे टेम
सत्यकाम नै आके महर्षि तै पा लागन किया –
अनछळ आंखां खोले
चुप्प-चपीता खड़्या रह्या।
 
गुरु ने असीरवाद दीया अर बोल्या,
‘लाडले बच्चे, तेरा गोत के है ?’
सिर ठाके बाळक नै जवाब दिया,
‘गुरु जी, मनैं कोनी पता।
मनैं आपणी मां तै पूछ्या था
उन्नैं बताया –
बहोत लोगां की टहल बजाई।
जिब मनैं तैं गर्भ में धार्या।
तूं जाम्या था, कुंवारी जाबाला के,
बेटा, मनैं नी पता तेरा गोत।’
इतणी सुणदैं सार
चेल्यां म्हं होई खुसर पुसर,
जणों, माळ के छाते म्हं किसे नै डळा मार्या हो
अर माळ की माक्खी कुणट गी हों।
 
अनार्य बाळक का दुस्साहस देखकै
सारे चंभे में पड़गे।
किसे नै हांसी डाई,
किसे नै धिक्कार्या
खड़े होए गौतम ऋषि
बांहां खोलके बाळक नै जाफ्फी म्हं भरके बोले
‘मेरे लाडले, अबाह्मण नहीं सै तू।
द्विजां म्हं सै तू सबतै ऊपर,
सत्य सै तेरा बंश।’
 
18 फरवरी 1895
(चित्रा)

जंगळ की घुप्प अंधेरी छांह में

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One comment

  • Vikas Sharma says:

    अद्भुत!
    कमाल है ऐसा करने का विचार भी कितना कमाल का है और ऊपर से जिस सहजता से येे हुआ है,
    वाह!!

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