भैंस का स्वर्ग – बालमुकुंद गुप्त

सन् 1905 में ‘स्फुट कविताएं’ नाम से बालमुकुंद गुप्त की कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ। जिसमें उनकी समस्त कविताएं संकलित हैं। ‘भैंस का स्वर्ग’ गुप्त जी की पहली कविता है।

 1
भैंस के आगे बीन बजाई भैंस खड़ी पगुराती है।
कुछ कुछ पूंछ उठाती है और कुछ कुछ कान हिलाती है।
हुई मग्न आनन्द कुण्ड में बंधा स्वर्ग का ध्यान।
दीख पड़ा मन की आंखों से एक दिव्य अस्थान।।
                   2
केसों तक का जंगल है और हरी घास लहराती है।
हरयाली ही दीख पड़ै है दृष्टि जहां तक जाती है।
कहीं लगी है झड़बेरी और कहीं उगी है ग्वार।
कहीं खड़ा है मोठ बाजरा कहीं घनी सी है ज्वार।।
                   3
कहीं पे सरसों की क्यारी है कहिं कपास के खेत घने।
जिसमें निकले मनों बिनौले अथवा धड़ियों खली बने।
मूंग मोठ की पड़ी पतोरन और चने का खार।
कहीं पड़े चौले के डंठल कहीं उड़द का न्यार।।
                   4
कहीं सैंकड़ों मन भूसा है कहीं पे रक्खी सानी है।
कच्चे तालाबों में आधा कीचड़ आधा पानी है।
धरी हैं वां भीगे दाने से भरी सैंकड़ों नांद।
करते हैं भैंसे और भैंसें उछल-कूद और फांद।
                   5
वहां नहीं है मनुष्य कोई बन्धन ताड़न करने को।
है सब विधि सुविधा स्वच्छन्द विचरने को और करने को।
वहां करे है भैंस हमारी क्रीड़ केलि किलोल।
पूंछ उठाये भ्यां भ्यां रिड़के मधुर मनोहर बोल।।
                   6
कभी कहीं कुछ चरती है और कभी कहीं कुछ खाती है।
कभी सरपतों के झुण्डों में जाकर सींग लगाती है।
कभी मस्त होकर लोटे है तालाबों के बीच।
देह डबोये थूथन काढ़े तन लपटाये कीच।।
                   7
कभी वेग से फदड़क-फदड़क करके दौड़ी जाती है।
हलकी क्षीण कटीका सबको नाजुकपन दिखलाती है।
सींग अड़ाकर टीले में करती है रेत उछाल।
देखते ही बन आता है बस उस शोभा का हाल।।
                   8
पीठ के ऊपर झांपल बैठी चुन चुन चिचड़ी खाती है।
मेरी प्यारी महिषी उससे और मुदित हो जाती है।
अपने को समझे है वह सब भैंसों की सरदार।
आगे पीछे चलती है जिस दम पड़िया दो चार।।
                   9
सब भैंसें आदर देती हैं सब भैंसे करते हैं स्नेह।
महिषि राज्ञि का एक अर्थ है तब खुलता है निस्सन्देह।
तिस पर वर्षा की बूंदें जो पड़ती हैं दो एक।
तब तो मानो इन्द्र करे है स्वयं राज अभिषेक।।
                   10
डाबर की दलदल में घुटनों तक है दूब खड़ी।
वहां रौंथ करती फिरती है लिये सहेली बड़ी-बड़ी।
पूंछ हिलाती है प्रसन्न मन, मनो चंवर अभिराम।
मक्खी मच्छर आदि शत्रु की शंका का नहिं काम।।
                   11
पड़िया मुंह को डाल थनो में प्यार से दूध चुहकती है।
आप नेह से नितम्ब उसके चाटती है और तकती है।
दिव्य दशा अनुभव करती है करके आंखें बन्द।
महा तुच्छ है इसके आगे स्वर्ग का भी आनन्द।।

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