हिटलर के नाम गांधी के पत्र

गांधी जी संवाद पूरा करने में विश्वास रखते थे। मन में कोई ग्लानि हो, किसी से शिकायत हो, अपनी बात किसी तक पहुंचाने की ज़रूरत हो या प्रायश्चित ही करना हो, वे जब तक सामने वाले तक अपनी बात न पहुंचा दें, उन्हें चैन नहीं पड़ता था। वे मौखिक संवाद न करके अपनी बात पत्र के जरिये कहना बेहतर समझते थे। महात्मा बनने से बाद तो उनका पत्राचार बहुत अधिक रहा। यहां पर हिटलर को लिखे गये उनके दो पत्र दिये जा रहे हैं। इन पत्रों से पता चलता है कि न केवल वे भारत की आज़ादी के लिए चिंतित थे, विश्व मंच पर शांति के लिए भी वे अपनी बात कहने में कभी पीछे नहीं रहे।

वर्धा, सी पी, भारत
23 जुलाई, 1939

प्रिय मित्र,

मित्र लोग मुझसे आग्रह कर रहे हैं कि मैं इन्सानियत के नाते आपको लिखूं। लेकिन मैं उनका अनुरोध इस भावना के कारण टालता रहा कि मेरी तरफ से आपको कोई भी पत्र गुस्ताखी माना जायेगा। कुछ है जो मुझे बता रहा है कि मैं गुणा भाग न करूं और ज़रूर ही अपील करूं भले ही उसकी कोई भी अहमियत हो।

ये बात तो एकदम स़ाफ है कि पूरी दुनिया में आज आप अकेले ऐसे शख्स हैं जो युद्ध को रोक सकते हैं। ऐसा युद्ध जो इन्सानियत को मटियामेट कर देगा। आपको उस चीज़ की कीमत चुकानी ही पड़ेगी चाहे वह आपको कितनी भी कीमती लगे? क्या आप एक ऐसे आदमी की अपील पर ध्यान देंगे जिसने काफी हद तक सफलता का ख्याल किये बिना युद्ध के तरीके को जानबूझ कर त्याग दिया है? खैर, मैं पहले से ही म़ाफी चाहूंगा अगर मैंने आपको लिखने की गलती की हो।

सदैव ही आपका मित्र

मोहनदास करमचंद गांधी

वर्धा

24 दिसम्बर, 1940

हमें आपकी बहादुरी या अपनी मातृभूमि के प्रति आपकी श्रद्धा में कोई शक नहीं है और न ही हम यह मान कर चल रहे हैं कि आप कोई दैत्य हैं, जैसा कि आपके विरोधी कहते हैं। लेकिन आपके खुद के और आपके मित्रों और प्रशंसकों के लिखे हुए शब्द और घोषणाएं शक की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते कि आपके कई कर्म दैत्यों वाले हैं और मानवीय गरिमा के खिलाफ जाते हैं, खासकर मेरे जैसे आदमियों के आकलन में जो विश्व मैत्री में विश्वास रखते हैं। आपने चेकोस्लोवाकिया को अपमानित किया, पोलेंड को तहस-नहस कर दिया और डेनमार्क को तो धूल में ही मिला दिया।मुझे पता है कि आप जिस तरह का ज़िंदगी का नजरिया रखते हैं, इस तरह की घटिया हरकतें आपके लिए बहुत बहादुरी के कारनामे हैं। लेकिन हमें बचपन से ही से सिखाया गया है कि इस तरह के काम मानवता को शर्मसार करने वाले काम होते हैं। इसलिए हम शायद आपकी सफलता की कामना नहीं कर सकते।

प्रिय मित्र,

मैं आपको मित्र के रूप में सम्बोधित कर रहा हूं, ये कोई औपचारिकता नहीं है। मेरा कोई शत्रु नहीं है। पिछले 33 बरस के दौरान मेरे जीवन का एक ही मकसद रहा है कि जाति, नस्ल या रंगभेद पर ध्यान दिये बिना पूरी मानवता से मैत्री कायम करके अपने मित्रों की संख्या बढ़ाता चलूं।

मैं यह विश्वास कर रहा हूं कि आपके पास यह जानने का समय और इच्छा होगी कि वैश्विक मैत्री के सिद्धांत के प्रभाव में जीने वाली मानवता का एक बहुत बड़ा हिस्सा आपके कामों को किस रूप में लेता है। हमें आपकी बहादुरी या अपनी मातृभूमि के प्रति आपकी श्रद्धा में कोई शक नहीं है और न ही हम यह मान कर चल रहे हैं कि आप कोई दैत्य हैं, जैसा कि आपके विरोधी कहते हैं। लेकिन आपके खुद के और आपके मित्रों और प्रशंसकों के लिखे हुए शब्द और घोषणाएं शक की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते कि आपके कई कर्म दैत्यों वाले हैं और मानवीय गरिमा के खिलाफ जाते हैं, खासकर मेरे जैसे आदमियों के आकलन में जो विश्व मैत्री में विश्वास रखते हैं। आपने चेकोस्लोवाकिया को अपमानित किया, पोलेंड को तहस-नहस कर दिया और डेनमार्क को तो धूल में ही मिला दिया।मुझे पता है कि आप जिस तरह का ज़िंदगी का नजरिया रखते हैं, इस तरह की घटिया हरकतें आपके लिए बहुत बहादुरी के कारनामे हैं। लेकिन हमें बचपन से ही से सिखाया गया है कि इस तरह के काम मानवता को शर्मसार करने वाले काम होते हैं। इसलिए हम शायद आपकी सफलता की कामना नहीं कर सकते।

लेकिन हमारी स्थिति थोड़ी अलग है। हम ब्रिटिश साम्राज्यवाद का मुकाबला कर रहे हैं। वे किसी भी मायने में नाज़ियों से कम नहीं हैं। अगर दोनों में कोई फर्क है तो वह मात्रा का ही है। पूरी मानव जाति का पांचवां हिस्सा ब्रिटिश शासन के दमन चक्र तले ले आया गया है और कोई सुनवाई नहीं है। इसके प्रति हमारा विरोध ब्रिटिश नागरिकों को नुकसान पहुंचाना नहीं है। हम उन्हें बदलना चाहते हैं न कि लड़ाई के मैदान में उन्हें हराना। ब्रिटिश शासन के खिल़ाफ हमारा यह निहत्थों का संघर्ष है। पता नहीं कि हम उनका हृदय परिवर्तन कर पाते हैं या नहीं, लेकिन ये हमारा दृढ़ निश्चय है कि हम अहिंसा और असहयोग के बल पर उनके शासन को असम्भव बना कर रहेंगे। यह तरीका अपनी प्रकृति में ही ऐसा है कि जिससे बचा नहीं जा सकता। यह इस ज्ञान पर आधारित है कि शोषक व्यक्ति शोषित व्यक्ति की स्वेच्छा से या ज़बरदस्ती, सहयोग की एक निश्चित मात्रा के बिना कुछ हासिल कर ही नहीं सकता। हमारे शासक हमारी ज़मीन हथिया सकते हैं, हमारे शरीरों पर राज कर सकते हैं लेकिन हमारी आत्मा उनके शिकंजे में नहीं फंस सकती। वे हमारा शरीर हर भारतीय- नर नारी और बच्चे को पूरी तरह से नष्ट करके ही पा सकते हैं। यह सही है कि सब लोग वीरता के उस अंश तक नहीं पहुंच सकते और यह भी सच है कि बहुत बड़ी मात्रा में डर की भावना भी विद्रोह को कमज़ोर कर सकती है, लेकिन यह तर्क मूल मुद्दे से अलग ही रहेगा। कारण यह है कि भारत में बड़ी संख्या में ऐसे स्त्री और पुरुष मिल जायेंगे जो अपने शोषक के ख़िलाफ बिना किसी दुर्भावना के अपनी जान देने को तैयार हो जायें बजाये उनके सामने घुटने टेकने के। ऐसे ही लोग हिंसा के तांडव के ख़िलाफ आज़ादी का बिगुल बजायेंगे। मेरी इस बात पर भरोसा करो कि भारत में आपको ऐसे अनगिनत पुरुष और महिलाएं मिल जायेंगी। वे पिछले बीस बरस से इसी तरह का प्रशिक्षण पा रहे हैं। हम पिछले पचास बरस से ब्रिटिश शासन तंत्र को उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहे हैं। आज़ादी का आंदोलन कभी भी इतना मजबूत नहीं हुआ था जितना इस समय है। सबसे अधिक शक्तिशाली राजनैतिक संगठन, मेरा मतलब इंडियन नेशनल कांग्रेस,  इस लक्ष्य को पाने के लिए जी जान से जुटा है। अपने अहिंसात्मक  प्रयासों के जरिये हमने काफी हद तक सफलता पा ली है। ब्रिटिश शासन तंत्र विश्व के सबसे अधिक संगठित हिंसक तंत्रों में से एक है और हम उससे निपटने के लिए सही तरीके खोजने में लगे हैं। आपने उसे चुनौती दी है। यह देखना बाकी है कि ब्रिटिश ज़्यादा संगठित हिंसक तंत्र है या जर्मन। हम जानते हैं कि ब्रिटिश सोच का मतलब हमारे लिए क्या होता है और दुनिया की गैर यूरोपीय देशों की जातियों के लिए क्या मतलब होता है। लेकिन हम जर्मन की मदद से कभी भी ब्रिटिश शासन से छुटकारा पाना नहीं चाहेंगे। हमने अहिंसा का रास्ता खोज लिया है। यह एक ऐसी ताकत है जो संगठित हो तो दुनिया की सबसे हिंसक ताकतों के मिले-जुले समूह का भी बिना किसी शक के मुकाबला कर सकती है। अहिंसा की तकनीक में, जैसा कि मैंने कहा, हार जैसी कोई चीज़ नहीं है। यह बिना मारे या घायल किये करो या मरो में विश्वास रखती है। मजे की बात यह है कि इसे बिना किसी धन के, और निश्चित ही विनाश के विज्ञान का सहारा लिये बिना, इस्तेमाल किया जा सकता है। आपने तो दोनों का सहारा ले कर देख ही लिया है। मैं यह देख कर हैरान हूं कि आप नहीं देख पा रहे कि अहिंसा किसी की बपौती नहीं है। न सही ब्रिटिश, निश्चित ही कोई और ताकत उभर कर आयेगी जो आपके तरीके का भंडाफोड़ करेगी और आपके हथियार से ही आपका खात्मा करेगी। आप कोई ऐसी विरासत छोड़ कर नहीं जाने वाले जिस पर आपके जाने के बाद आपकी जनता आप पर गर्व करे। क्रूरता के कामों का, चाहे वे जितने भी शानदार तरीके से अंजाम दिये गये हों, कोई भी कौम गुणगान नहीं ही करेगी। इसलिए मैं आपसे इन्सानियत के नाम पर गुज़ारिश करता हूं कि युद्ध को बंद करें। अगर आप अपनी साझी पसंद के किसी अंतर्राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल के पास अपने और ग्रेट ब्रिटेन के सभी विवादित मामले ले जाते हैं तो आप बिल्कुल भी नुकसान में नहीं रहेंगे। अगर आपको युद्ध में जीत मिलती भी है तो इसका यह मतलब नहीं होगा कि आप सही थे। इससे सिर्फ यही सिद्ध होगा कि आपके पास विनाश की ताकत ज़्यादा बड़ी थी। जबकि किसी तटस्थ ट्रिब्यूनल द्वारा दिया गया फैसला यह बतायेगा कि जहां तक मानवीय रूप से सम्भव रहा, कौन-सा पक्ष सही था।

आपको पता ही है कि कुछ ही अरसा पहले मैंने प्रत्येक ब्रिटिश नागरिक से यह अपील की थी कि मेरे अहिंसात्मक विरोध के तरीके को स्वीकार करे। मैंने ऐसा इसलिए किया कि ब्रिटिश मुझे एक दोस्त, बेशक बागी दोस्त, के रूप में मानते हैं। मैं आपके लिए और आपकी जनता के लिए अजनबी हूं। मुझमें इतना साहस नहीं है कि जिस तरह की अपील मैंने हर ब्रिटिश नागरिक से की है, उसी तरह की अपील आपसे कर सकूं। ऐसा नहीं है कि मेरी अपील का वैसा गहरा असर नहीं होगा जैसा कि ब्रिटिश लोगों के मामले में था। लेकिन मेरा यह वाला प्रस्ताव बहुत आसान है क्योंकि यह बहुत व्यावहारिक और जाना पहचाना है।

इस समय के दौरान जबकि यूरोप के लोगों के दिल में शांति की चाह ज़ोर मार रही है, हमने यहां तक किया है कि अपने खुद के शांतिपूर्ण संघर्ष भी स्थगित कर रखे हैं। क्या आपसे यह उम्मीद करना ज़्यादती होगी कि आप ऐसे समय में शांति के लिए प्रयास करें। इसका आपके खुद के लिए व्यक्तिगत रूप से कोई मतलब नहीं हो सकता लेकिन उन लाखों यूरोप वासियों के लिए ये बहुत बड़ी बात होगी, शांति के लिए जिनकी मूक पुकार मैं सुन पा रहा हूं। मेरे कान तो लाखों मूक पुकारें सुनने के आदी हो गये हैं। मैं चाहता था कि आपको और मुसोलिनी महाशय को एक संयुक्त अपील संबोधित करूं। गोलमेज सभा में एक प्रतिनिधि के नाते मैं इंग्लैंड गया था तो रोम में मुझे मुसोलिनी से मिलने का सौभाग्य मिला था। मैं आशा करता हूं कि वे इस पत्र को आवश्यक परिवर्तनों के साथ खुद को भी संबोधित ही मानेंगे।

सदैव ही

आपका मित्र

मोहनदास करमचंद गांधी

(अनुवाद और प्रस्तुति – सूरज प्रकाश)

One comment

  • Vikas sharma says:

    बहुत आभार ऐसी सामग्री को प्रकाशित करने के लिए।

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