शहीद भगत सिंह और जलियाँवाला बाग के कुछ अनछुए प्रसंग

प्रो.जगमोहन सिंह और सुरेन्द्रपाल सिंह

लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता सुरेन्द्रपाल सिंह द्वारा प्रसिद्ध चितंक व शहीद भगत सिंह के भानजे प्रो.जगमोहन सिंह जी का साक्षात्कार।

13 अगस्त 2019 की सुबह हरिजन सेवक संघ, गांधी आश्रम, किंग्सवे कैम्प दिल्ली से हिंद पाक दोस्ती का पैग़ाम लिए, आग़ाज़ ए दोस्ती का बैनर उठा कर वाघा बॉर्डर तक के लिए एक बस यात्रा शुरू हुई जिसमें प्रो. जगमोहन सिंह के साथ सीट साँझी हुई तो लगा कि पिछली हर बार की मुलाक़ात में जो अधूरा सा रह जाता था उसकी कमीपूर्ति अब की जा सकती है। सवाल केवलमात्र उनके शहीद भगत सिंह का भानजा होने का ही नहीं है बल्कि क्रांतिकारी आंदोलन के साथ साथ इतिहास और सामाजिक आंदोलनों पर उनकी पैनी दृष्टि का भी है। तो ना केवल बस यात्रा के दौरान बल्कि अमृतसर में गुरु तेग़ बहादुर निवास में एक ही कमरे में टिके रहने के दौरान भी सवाल जवाब का सिलसिला चलता रहा जिसे यहाँ साँझा किया जा रहा है ताकि पाठकों को भी कुछ नया दृष्टिकोण मिल सके। 

सुरेंद्रपाल सिंह : इस वर्ष जलियाँवाला बाग़ के क़त्ल-ए-आम का सौवां साल है। सौ साल पहले हुए उस नरसंहार को आप किस प्रकार से देखते हैं? क्या यह जनरल डायर के दिमाग़ी असंतुलन का नतीजा था या इसके दूसरे आयाम भी थे। 

प्रो. जगमोहन सिंह : जलियाँवाला बाग़ की घटना किसी जुनून या मानसिक अस्थिरता की वजह से नहीं घटी थी बल्कि यह देश की जनता को एक बड़ा सबक़ सिखाने की जहनियत का नतीजा था। अगर हम उस दौर में रौलेट क़ानून के विरोध में हो रहे आंदोलनों और हड़तालों पर नज़र डालें तो अंग्रेज़ सरकार की बौखलाहट का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। जलियाँवाला बाग़ के क़त्ल-ए-आम ( 13 अप्रैल 1919) से पहले रौलेट ऐक्ट के विरोध में 30 मार्च को दिल्ली में स्वामी श्रद्धानंद की लीडरशिप में एक कामयाब हड़ताल हुई थी जिसमें पुलिस की गोलीबारी से एक मुस्लिम नौजवान शहीद हुआ था। इसके बाद 6 अप्रैल को पूरे देश में विरोधस्वरूप हड़ताल रही. इन हड़तालों में हिंदू-मुसलमान एकता बेमिसाल थी। इसी दौरान महँगाई और राशन की क़िल्लत के मद्देनज़र साँझे लंगर की शुरुआत हुई जिसमें जात-पात और हिंदू-मुसलमान के भेद कम होते जा रहे थे। लाहौर  में साँझे लंगर के लिए और 13 अप्रैल को होने वाली सभा की मुनादी करने वाले लड़के को पुलिस ने गोली मार दी थी। कीर्ति में शहीद भगत सिंह ने अपने आर्टिकल ‘मार्शल लॉ का पहला शहीद’ में इस का ज़िक्र किया है। यह जानना दिलचस्प लगेगा कि इस विरोध को संगठित करने के लिए जो बैठक हुई थी वो लाहौर की बादशाही मस्जिद में हुई थी।

   6 अप्रैल 1919  की सफल हड़ताल के बाद 9 अप्रैल को रामनवमी के त्योहार को मिलजुल कर मनाने के लिए अमृतसर की मस्जिद में फ़ैसला लिया गया। डॉक्टर बशीर ने रामनवमी के जुलूस का नेतृत्व किया और मुसलमानों ने खाने पीने की छबील लगाई। नतीजन, डॉक्टर किचलू और डॉक्टर सतपाल को गिरफ़्तार करके पंजाब से बाहर ले जाया गया। इनकी गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ 10 अप्रैल को लोग मार्शल लॉ के बावजूद निर्भय हो कर प्रोटेस्ट में निकल पड़े थे, जिस पर पुलिस ने गोलीबारी की और बैंक को बंद करवाने के लिए आए एक सत्याग्रही को बैंक मैनेजर ने अपनी पिस्तौल से गोली मार दी, बदले में लोगों ने लाठी से उस मैनेजर को मार दिया और इसके बाद पंजाब में लाठी एक ख़तरनाक हथियार के रूप में बैन कर दी गई थी ।

सुरेंद्रपाल सिंह : शहीद उधम सिंह और जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के बीच के रिश्ते को आप किस प्रकार से देखते हैं?

प्रो.जगमोहन सिंह:  शहीद ऊधम सिंह ने इंग्लैंड में गिरफ़्तारी के बाद अपना नाम मुहम्मद सिंह आज़ाद बताया। अपनी कलाई पर भी यही नाम गुदवाया हुआ था। अंग्रेजो को इस नाम के लोकप्रिय होने का डर लगता था और पूरा प्रयास किया गया कि यह बात भारतीयों को पता ना लग पाए। ऊधम सिंह की यह भावना जलियाँवाला बाग़ से उपजी साँझेपन की भावना का परिणाम थी। यह अफ़सोस की बात है कि शहीद ऊधम सिंह ने जिस हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक  के तौर पर अपनी जान दी थी वह भावना ग़ायब की जा रही है।

सुरेंद्रपाल सिंह : भगत सिंह के पारिवारिक जीवन में कौन सी ऐसी विशेष बातें थी जिनका उनके विचारों पर प्रभाव पड़ा? 

प्रो. जगमोहन सिंह: अगर भगत सिंह के परिवार की विरासत को समझने का प्रयास किया जाए तो उसकी सोच पर प्रभाव डालने वाली बहुत सी बातें आपको समझ आएगी। भगत सिंह के दो दादा नामधारी यानी कूका आंदोलन से प्रभावित थे। सन 1872 में मलेरकोटला में 68 नामधारियों को अंग्रेज़ों ने पटियाला के महाराजा द्वारा दी गई तोपों से उड़ा दिया था। बग़ावत की इस लहर को दबाने के लिए अंग्रेज़ों ने अपनी समर्थक सिंह सभा को पैदा किया जिसके पेट्रन कमांडर-इन-चीफ़ और लेफ़्टिनेंट गवर्नर होते थे। इस सबसे सबक लेते हुए भगत सिंह के दादा का रूख आर्यसमाज की ओर मुड़ गया जो उन दिनों राष्ट्रीय आंदोलन की लहर को मज़बूती दे रहा था।
यही वजह थी कि जब सरदार किशन सिंह (भगत सिंह के पिता ) की शादी गाँव मोरावाली में तय हुई तो वह गाँव सिंह सभा वालों का होने की वजह से विरोधस्वरूप उन्होंने शादी आर्यसमाजी तरीक़े से करवाई थी। बाद में उन्होंने अपनी पत्नी इंदक़ौर का नाम भी बदल कर विद्यावती रख दिया जो उस वक़्त के सामाजिक आंदोलन की भावना के अनुरूप था।

सरदार अजीत सिंह ( भगत सिंह के चाचा) की जब शादी होने लगी तो वे घर से भाग गए थे, क्योंकि उन्हें अपने क्रान्तिकारी जीवन में शादी एक व्यवधान लगता था। ख़ैर उस लड़की की शादी उनके भाई सरदार स्वर्ण सिंह के साथ कर दी गई थी। सरदार स्वर्ण सिंह ने 1857 की बग़ावत पर एक अंग्रेज़ कर्नल द्वारा लिखी गई किताब ‘Divide and Conquer’ का  उर्दू में ‘बाँदर बाँट’ के नाम से तर्जमा किया था जिसके लिए उनको जेल हुई और जेल में डेढ़ साल की क़ैद के दौरान दिए गए टॉर्चर की वजह सन 1910 में वे शहीद हो गए थे ।

बाद में क़सूर में बुल्लेशाह की मज़ार के पास रहने वाले बाबा धनपत राय ने गोद ली हुई एक यतीम लड़की हरनाम कौर के साथ शादी करने के लिए सरदार अजीत सिंह को मना लिया। ये शादी स्वयं बाबा धनपत राय ने अपने हाथों से सूफ़ी तरीक़े से करवाई थी और इस प्रकार से भगत सिंह की चाची हरनाम कौर उनके परिवार में सूफ़ी प्रभाव लेकर आयी।
मेजर इवान बेल ने एक पुस्तक लिखी थी ‘ Annexation of Punjab and Maharaja Daleep Singh’। सरदार अजीत सिंह जो आजन्म क्रांतिकारी रहे थे उन्होंने उस पुस्तक का उर्दू में तर्जमा करके बाँटना शुरू कर दिया था। इस पर तत्कालीन चीफ़ सेक्रेटेरी ने नोट लिखा कि अंग्रेज़ी में यह पुस्तक लाइब्रेरी में रखी हुई तो ठीक है  लेकिन उर्दू में पब्लिक द्वारा इसको पढ़े जाना ख़तरनाक हो सकता है। उल्लेखनीय है कि सरदार अजीत सिंह 38 वर्षों तक जलावतन रहे और इटली में उन्होंने इक़बाल मुहम्मद शैदाई के साथ मिलकर आज़ाद हिंद लश्कर की स्थापना की थी जो आई.एन.ए. से पहले का प्रयास था।

ग़दर आंदोलन में क़ुर्बानी का जज़्बा : करतार सिंह सराभा केवल मात्र 19 साल का था. जज ने पूछा अमेरिका और कनाडा से आए तुम आठ हज़ार लोगों के पास ऐसा क्या है जो ब्रिटिश निज़ाम को उखाड़ फ़ैकने का दावा कर रहे हो। सराभा के जवाब ने जज को लाजवाब कर दिया जब उसने कहा कि हमारे झण्डे के तीन रंग वाले तीन मूल्य आज़ादी, समानता और भाईचारा हमारी ताक़त का स्त्रोत है।

सुरेंद्रपाल सिंह : जलियाँवाला बाग़ की घटना के दौर में सिक्खों में भी बदलाव की लहर दिखाई देती हैं. उस वक़्त के घटनाक्रम पर आपकी कुछ टिप्पणियां !

प्रो. जगमोहन सिंह: जिस वक़्त जलियाँवाला बाग़ में क़त्ल-ए-आम हुआ था उस वक़्त स्वर्ण मंदिर का मुखिया अरूढ सिंह सरबरा था जो सिमरनजीत सिंह मान का नाना था और ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त किया हुआ था। क़त्ल-ए-आम के बाद जनरल डायर को स्वर्ण मंदिर में सिरोपा भेंट करके ना केवल सम्मानित किया गया बल्कि उसे एक सिक्ख के रुप में घोषित करने का भी प्रयास किया गया। डायर ने जब कहा कि वह पगड़ी नहीं पहन सकता तो ये भी स्वीकार्य था।वह सिगरेट नहीं छोड़ सकता तो कहा गया कि अगर साल में 5 हज़ार सिगरेट पीता है तो एक तो छोड़ सकता है।
उस वक़्त अरूढ सिंह वग़ैरा के समय में स्वर्ण मंदिर में निम्न जातियों के प्रवेश पर रोक थी।लेकिन साधारण सिक्खों को इस बात से तकलीफ़ भी थी। प्रतिक्रिया स्वरूप सन 1920 में अमर सिंह  चभवाल और  कुछ अकाली कार्यकर्ताओं ने 500 मजहबियों को स्वर्ण मंदिर की बजाय जलियाँवाला बाग़ में अमृत छका कर सिक्ख बनाया था। इसके बाद उन्हें जब स्वर्णमंदिर ले जाया गया तो छोटी जात के बहाने उनके प्रसाद को स्वीकार नहीं किया गया बल्कि अरूढ सिंह ने वहाँ से भाग कर अमृतसर के डीसी के पास शरण ली।
इसके बाद स्वर्ण मन्दिर पर क़ब्ज़े के सवाल पर मोर्चाबंदी का सिलसिला शुरू हो गया था जिसे चाबीयों का मोर्चा कहा जाता है। यही दौर था जब गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की शुरुआत हुई औरआख़िर में SGPC ऐक्ट बना।
फ़रवरी 1921 में ननकाना साहब गुरुद्वारा में महंत नारायण दास ने पठानों के हाथों 139 सिक्खों को  (थॉर्नबर्न ICS के अनुसार) या तो ज़िन्दा जलवा दिया था या मरवा दिया था क्योंकि उसे शक था कि वे उसे गद्दी से हटाना चाहते थे। भगत सिंह भी वहाँ गए और वापस आकर गुरमुखी सीखनी शुरू कर दी। अपनी बहन अमर कौर  (प्रो. जगमोहन सिंह की माँ) से गुरु ग्रन्थ साहब पर चर्चा करते थे और उनकी याददाश्त के अनुसार भगत सिंह ने उन्हें कबीर का ये दोहा सुनाया था- ‘चाहे रख लाम्बे केश, चाहे घरड़ बना, नितारा अम्ला ते होणा

सुरेंद्रपाल सिंह : अमृतसर के बारे में कुछ और जानना चाहूँगा।
 
प्रो. जगमोहन सिंह: अमृतसर में एक सड़क का नाम है कूपर रोड। कूपर 1857 की बग़ावत के दौरान अमृतसर का डिप्टी कमिश्नर था और उसने क़रीब 350 लोगों को डिसार्म ( बिना हथियार के) करके अजनाला में एक गुम्बज में ठूँस दिया था। अधिकतर की दम घुटने से मौत हो गई जिनकी लाशें बग़ल में ही एक कुएँ में डाल दी गई। कूपर ने नोट किया कि लोगों ने उसे मुक्ति घर कहके वहाँ दिया जलाना शुरू कर दिया था।कालांतर में जब हक़ीक़त सामने आयी तो दिया जलाने का सिलसिला ख़त्म हुआ।

भगतसिंह के लिए ब्रिटेन में समर्थन: भगत सिंह की फाँसी रोकने के लिए इंग्लैण्ड में दस हज़ार ब्रिटिश वर्कर और स्कॉटिश इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के चार एम.पी. ने दस्तखत करके ब्रिटिश सरकार को ज्ञापन दिया था।

प्रो. जगमोहनसिंह द्वारा बातचीत के दौरान कुछ अन्य टिप्पणियाँ: 

महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों के साथ हुई तीन लड़ाइयों को ऐंग्लो-सिक्ख वार कहा जाता है। ये नाम जानबूझकर कर अंग्रेज़ों ने दिया था ताकि सिक्खों के साथ मिलकर लड़ने वाले मुसलमानों की भूमिका को भूला दिया जाए। सच्चाई यह है कि लाहौर दरबार के अधिकतम तोपची मुसलमान थे।

ग़दर आंदोलन में क़ुर्बानी का जज़्बा : करतार सिंह सराभा केवल मात्र 19 साल का था. जज ने पूछा अमेरिका और कनाडा से आए तुम आठ हज़ार लोगों के पास ऐसा क्या है जो ब्रिटिश निज़ाम को उखाड़ फ़ैकने का दावा कर रहे हो।सराभा के जवाब ने जज को लाजवाब कर दिया जब उसने कहा कि हमारे झण्डे के तीन रंग वाले तीन मूल्य आज़ादी, समानता और भाईचारा हमारी ताक़त का स्त्रोत है। 

महाराजा रणजीत और अन्य सिक्ख रियासतों के आपसी रिश्तों के बारे में: लुधियाना और जालंधर के इलाक़े अंग्रेज़ों को सिक्ख रियासतों ने दिए थे ताकि लाहौर दरबार (महाराजा रणजीत सिंह) के ख़िलाफ़ सुरक्षा मिल सके।बातचीत के दौरान उन्होंने ये भी बताया कि लुधियाना में उनके पड़ोस में एक मुस्लिम सेक्ट मजलिस ए अहरार का हेड क्वॉर्टर है  मजलिस-ए- अहरार की विरासत को पैदा करने वालों ने 1857 की बग़ावत  में हिस्सा लिया, आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय रहा और बँटवारे का भी विरोध किया।

भगतसिंह के लिए ब्रिटेन में समर्थन: भगत सिंह की फाँसी रोकने के लिए इंग्लैण्ड में दस हज़ार ब्रिटिश वर्कर और स्कॉटिश इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के चार एम.पी. ने दस्तखत करके ब्रिटिश सरकार को ज्ञापन दिया था।

एक अंग्रेज़ अफ़सर का दर्द: Thornburn ICS पंजाब के फ़ायनैन्शल कमिश्नर रहे हैं जिन्होंने 1857 की बग़ावत के मद्देनज़र एक किताब लिखी थी ‘ Punjab in War & Peace’. किताब में ज़िक्र है कि स्यालकोट में क़रीब एक हज़ार लोगों को नि:शस्त्र करके उनको रावी नदी में फैंक दिया था। इस पर उसकी टिप्पणी है – ‘This was nothing less than a holocaust’. 

इसी किताब में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के बारे में उनकी एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है-‘ We have created a politically impotent class of moneylenders and set up a Chief Court to protect this class.’

इस बातचीत के दौरान अन्य अनेक टिप्पणियाँ भी सुनने और गुनने को मिली जिनको परिस्थितिवश नोट नहीं किया जा सका। बातचीत के इस सिलसिले को भविष्य में भी आगे बढ़ाने का प्रयास रहेगा।

सुरेन्द्रपाल सिंह

Contributors

सुरेंद्र पाल सिंह

सुरेंद्र पाल सिंह

जन्म - 12 नवंबर 1960 शिक्षा - स्नातक - कृषि विज्ञान स्नातकोतर - समाजशास्त्र सेवा - स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत लेखन - सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित सलाहकर - देस हरियाणा कार्यक्षेत्र - विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि-ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि। पताः डी एल एफ वैली, पंचकूला मो. 98728-90401

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