सामाजिक सुरक्षा के नाम पर – रीतिका खेड़ा

अफसोस की बात यह है कि हमारे यहां अभिजात वर्ग के बीच सामाजिक सुरक्षा पर सहमति और समर्थन कमजोर है। हम यह भूल जाते हैं कि खुद की सफलता में सौभाग्य या लॉटरी का उतना ही हाथ है, जितना खुद के जतन या मेहनत का है।

दुनिया भर में सरकारें सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रम चलाती हैं। इसका उद्देश्य है पुनर्वितरण के माध्यम से समाज में असमानताओं को कम करना। इनके पीछे यह सोच है कि समाज में गरीबी ऐसे कारणों से उत्पन्न होती है, जिन पर काफी हद तक व्यक्ति का नियंत्रण नहीं है।

दुनिया भर में सरकारें सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रम चलाती हैं। इसका उद्देश्य है पुनर्वितरण के माध्यम से समाज में असमानताओं को कम करना। इनके पीछे यह सोच है कि समाज में गरीबी ऐसे कारणों से उत्पन्न होती है, जिन पर काफी हद तक व्यक्ति का नियंत्रण नहीं है। हम किस परिवार में पैदा होते हैं, वह एक लॉटरी के समान है। और हमारा जन्म जिंदगी में हमारी नियति तय कर देता है। इसे इस तरह से समझा जा सकता है : जिंदगी की दौड़ में हम सबके लिए स्टार्टिंग लाइन या शुरुआती रेखा एक ही जगह नहीं है।

कुछ लोग पैदाइश से ही आगे शुरुआत करते हैं; यदि आप ग्रामीण परिवार में पैदा होंगे, तो शहरी लोगों से पिछड़ने की आशंका ज्यादा हो जाएगी। यदि आप लड़की के रूप में पैदा होंगी, तो स्वाभाविक ही लड़कों की तुलना में कम तरक्की कर पाएंगी। क्षेत्र, लिंग, वर्ग, जाति-ये वस्तुतः ऐसे लक्षण हैं, जो हम नहीं चुनते, लेकिन सच्चाई यह है कि इन्हीं से हमारी जिंदगी का सफर काफी हद तक तय हो जाता है। इसका असर हमारे स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार आदि यानी जिंदगी के हर पहलू पर पड़ता है। ऐसी स्थिति में  सरकारों की ओर से सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाएं इस उद्देश्य से चलाई जाती हैं कि जन्म से जुड़ी प्रतिकूल परिस्थितियों पर कुछ हद तक विजय पाई जा सके।

अफसोस की बात यह है कि हमारे यहां अभिजात वर्ग के बीच सामाजिक सुरक्षा पर सहमति और समर्थन कमजोर है। हम यह भूल जाते हैं कि खुद की सफलता में सौभाग्य या लॉटरी का उतना ही हाथ है, जितना खुद के जतन या मेहनत का है। इस वजह से बजट में जब भी सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों के लिए आवंटन बढ़ाया जाता है, तब मीडिया में काफी लोग इस तरह के खर्च की आलोचना करते हैं, इसे फिजूलखर्ची, गैर जिम्मेदार खर्च या लोकलुभावन कदम करार देते हैं। इस तरह की भी धारणा बन गई है कि (जिसे मीडिया का एक वर्ग तूल देता है) अपने देश में जनहित के कार्यक्रमों पर पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। ऐसे कार्यक्रमों के बारे में यह भी छवि बन गई है कि इनमें भ्रष्टाचार बहुत होता है।

सोचने की बात यह है कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में हमें किससे ज्यादा सुरक्षा की आवश्यकता है। बीमारी, अशिक्षा, लाचारी, इन सबसे बचाव शायद उतना ही आवश्यक है, जितना बाहरी दुश्मन से।

वास्तविक स्थिति इससे कुछ हटकर है। मौजूदा बजट की ही बात करें, तो सामाजिक सुरक्षा की पांच मुख्य योजनाओं पर सरकार ने जीडीपी का मात्र 0.53 प्रतिशत खर्च करने का वादा किया है। इन पांच योजनाओं में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा), मध्याह्न भोजन, आंगनवाड़ी, मातृत्व लाभ और सामाजिक सुरक्षा पेंशन शामिल हैं। अगर खाद्य सब्सिडी जोड़ दी जाए, तब भी सामाजिक सुरक्षा पर खर्च जीडीपी का 1.5 प्रतिशत होगा। सरकार रक्षा क्षेत्र पर भी लगभग इतना ही (1.49 प्रतिशत) खर्च कर रही है। सोचने की बात यह है कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में हमें किससे ज्यादा सुरक्षा की आवश्यकता है। बीमारी, अशिक्षा, लाचारी, इन सबसे बचाव शायद उतना ही आवश्यक है, जितना बाहरी दुश्मन से। इस तरह की तुलना करना कुछ पाठकों को भले जायज न लगे, लेकिन यह भी याद रखना आवश्यक है कि नफरत और जंग का माहौल ‘बनाया’ जाता है, ताकि हम असली मुद्दों की अनदेखी करें।

सामाजिक सुरक्षा के नाम पर कल्याणकारी योजनाओं के जरिये लोगों को आखिर क्या मिलता है? पेंशन के नाम पर केंद्र सरकार वृद्धों को दो सौ रुपये प्रति महीने दे रही है। चूंकि कुछ राज्यों में इसे अपमानजनक राशि माना जाता है, इसलिए वे खुद के बजट से इसमें और पैसे जोड़ रहे हैं। ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे गरीब राज्य भी इसमें अपनी तरफ से तीन-चार सौ रुपये जोड़कर वृद्धों को दे रहे हैं। पिछले साल मनरेगा के तहत प्रति पंजीकृत व्यक्ति को साल में औसतन 10 दिन का ही रोजगार प्राप्त हुआ, जबकि कानून के अनुसार प्रति परिवार को 100 दिन का रोजगार मिलना चाहिए। केवल चार प्रतिशत परिवार ही ऐसे थे, जिन्हें 100 दिन रोजगार मिला। इसमें भी मजदूरी मिलने में लोगों की दिक्कतें बढ़ ही रही हैं। देरी से भुगतान और किसी अन्य के खाते में पैसे चले जाने जैसी समस्या व्यापक रूप से सामने आ रही है। खाद्य सुरक्षा कानून के तहत प्रति व्यक्ति प्रति महीने पांच किलो अनाज दिया जाता है। जब यह कानून लागू किया गया था, तब उम्मीद की एक किरण जगी थी, क्योंकि कानून के तहत जन वितरण प्रणाली का दायरा बढ़ाने की बात की गई थी। यह कानून आने से पहले लगभग 50 फीसदी लोग इसमें शामिल थे; कानून में इसका दायरा बढ़ाकर 75 प्रतिशत किया गया। लेकिन इसका पूरी तरह से लोगों को लाभ मिले, उससे पहले ही जन वितरण प्रणाली में आधार को लागू कर दिया गया, जिससे लोगों की तकलीफें फिर से बढ़ गईं। कहीं-कहीं तो अनाज से वंचित परिवार के सदस्य की मौत भी हो गई (अकेले झारखंड में ही 20 से अधिक मौतें हुई हैं; उत्तर प्रदेश में भी इस तरह की खबर आई हैं)।

लाभ प्राप्त करने की प्रक्रिया इतनी जटिल कर दी गई है कि लोग आवेदन और अन्य कागजी औपचारिकताओं में ही फंसे रह जाते हैं।

मध्याह्न भोजन, आंगनवाड़ी और मातृत्व लाभ जैसी योजनाओं के लिए, जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत बच्चों और महिलाओं का हक है, इस बार के बजट में आवंटित राशि नहीं बढ़ी। बल्कि गौर करें, तो पिछले साल इन मदों में आवंटित राशि भी खर्च नहीं हुई। कुछ योजनाओं में खर्च इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि लाभ प्राप्त करने की प्रक्रिया इतनी जटिल कर दी गई है कि लोग आवेदन और अन्य कागजी औपचारिकताओं में ही फंसे रह जाते हैं। जैसे, मातृत्व लाभ योजना के तहत मिलने वाली 5,000 रुपये की राशि तीन किस्तों में दी जाती है; प्रत्येक किस्त के लिए अलग से फॉर्म भरना आवश्यक है, और हर फॉर्म के लिए अलग दस्तावेज देने जरूरी हैं। ये काम ऐसी महिलाओं से करवाए जा रहे हैं, जिन्हें मातृत्व लाभ देने का मकसद यह है कि गर्भावस्था और उसके तुरंत बाद वे आराम कर सकें!

कुल मिलकर देखें, तो देश में सामाजिक सुरक्षा पर खर्च जरूरत से कम हो रहा है। पिछले कुछ साल से यह खर्च न सिर्फ कम हुआ है, बल्कि अपना हक पाने की प्रक्रिया को इतना पेचीदा बना दिया गया है कि सम्मान की जिंदगी मुहैया कराने के बजाय इन योजनाओं की औपचारिकताएं थका रही हैं और ‘माई-बाप सरकार’ की ओर ले जा रही हैं।

साभार – अमर उजाला

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