जाति प्रथा से भीषण है लैंगिक विषमता – तस्लीमा नसरीन

धार्मिक कट्टरवाद तो पहले से ही दुनिया के अनेक देशों में है। अब भारत में भी धर्म को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा है। जब कि इतिहास गवाह है कि जहां-जहां धार्मिक कट्टरवाद को बढ़ावा मिलता है, वहां वहां समाज के कमजोर वर्गों, जैसे निचली जातियों और महिलाओं, का शोषण और बढ़ जाता है।

आर्टिकल 15 – फोटो : a

जाति प्रथा पर आधारित फिल्म आर्टिकल 15 की इन दिनों काफी चर्चा है। दुनिया में जितनी भी निकृष्टतम प्रथाएं हैं, जाति प्रथा उनमें एक है। निचली जातियों के पुरुष और स्त्री, दोनों का ऊंची जातियां शोषण करती हैं। उसमें भी निचली जातियों की स्त्रियों का सर्वाधिक शोषण होता है। उनका सामूहिक बलात्कार कर उनके गले में रस्सियां बांधकर उन्हें पेड़ की डालियों से लटका दिया जाता है। मानो यह बर्बरता कम न हो, उनके बारे में अफवाह फैला दी जाती है कि वे गलत रास्ते पर चल पड़ी थीं, पकड़े जाने पर उन्होंने आत्महत्या कर ली।पिछड़ी और निचली जातियों के लोगों में खुद को हीन समझने की मानसिकता है। हालांकि शिक्षा के प्रसार और बढ़ती जागरूकता के कारण इस समाज के युवाओं की सोच बदल रही है। वे खुद को दूसरों के बराबर समझते हैं और अपना अधिकार भी मांगते हैं। लेकिन कुल मिलाकर निचली जातियों में सदियों से यह सोच बनी हुई है कि सवर्णों के सामने उन्हें कुर्सी पर नहीं बैठना चाहिए, अमीरी का प्रदर्शन करते हुए ऊंची जातियों के लोगों के सामने से नहीं निकलना चाहिए।

कुछ-कुछ जगह निचली जातियों के बीच यह अंधविश्वास तक व्याप्त है कि सवर्णों की जूठन पर लेटने से उनकी बीमारियां और दूसरी समस्याएं दूर होती हैं। ऐसे न जाने कितने अंधविश्वासों और गलत धारणाओं से हमारा समाज ग्रस्त है। जाति प्रथा और उससे जुड़ी मान्यताओं को ईश्वर का विधि-विधान माना जाता है। ऊंची जातियां इन प्रथाओं को जिस तरह ईश्वर का विधान कहती हैं, नीची जातियां भी इन्हें उसी तरह चुपचाप स्वीकार कर लेती हैं।संविधान में जाति प्रथा की बुराइयों को दूर करने की बात कि जाने के बावजूद व्यवहारिक धरातल पर लोग जाति से जुड़ी मान्यताओं को जस का तस स्वीकार करते हैं। जो लोग सार्वजनिक तौर पर जाति प्रथा की बुराइयों के बारे में बात करते हैं, मैंने उन्हें भी भीतरी तौर पर जाति प्रथा के घनघोर समर्थकों के रूप में पाया है। 

ऐसे लोगों के दलित दोस्त होते हैं, वे उनके साथ एक साथ भोजन भी कर लेते हैं, लेकिन जैसे ही शादी- ब्याह से जुड़ी बात सामने आती है, उनके भीतर का जातिवाद भीषण रूप से जाग जाता है। और अगर ऐसी दो जातियों के बीच शादी हो भी जाती है, तो समाजिक बहिष्कार की जगह परिवार और समाज के लोगों द्वारा उनकी हत्या करा देने की आशंकाएं जोर पकड़ने लगती हैं।

भारतीय संविधान अनुच्छेद 15 (Article 15 in Hindi) – धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध

आर्टिकल 15 के प्रमुख चार बिंदु –


(a) राज्य किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान और वंश के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता।
 (b) किसी भी भारतीय नागरिक को जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान और वंश के आधार पर दुकानों, होटलों, सार्वजानिक भोजनालयों, सार्वजानिक मनोरंजन स्थलों, कुओं, स्नान घाटों, तालाबों, सड़कों और पब्लिक रिजॉर्ट्स में जाने से नहीं रोका जा सकता।
 (c) देश के सभी नागरिक समान हैं, उनसे भेदभाव नहीं किया जा सकता, लेकिन महिलाओं और बच्चों को इस नियम में अपवाद के रूप में देखा जा सकता है। अगर महिलाओं और बच्चों के लिये विशेष उपबंध किये जा रहे हैं तो आर्टिकल 15 ऐसा करने से नहीं रोक सकता। महिलाओं के लिये आरक्षण या बच्चों के लिये मुफ्त शिक्षा इसी उपबंध के तहत आते हैं।
 (d) राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े तथा SC/ST/OBC के लिये विशेष उपबंध बनाने की छूट है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है कि जाति, धर्म, लिंग, वर्ण और जन्मस्थान के आधार पर किसी के साथ भेदभाव तो नहीं किया जा सकता, दूसरे किसी आधार पर भी भेदभाव की इजाजत नहीं दी जा सकती। पर मुश्किल यह है कि ज्यादातर लोगों के लिए राष्ट्र से भी धर्म बड़ा है। धार्मिक कट्टरवाद तो पहले से ही दुनिया के अनेक देशों में है। अब भारत में भी धर्म को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा है। जब कि इतिहास गवाह है कि जहां-जहां धार्मिक कट्टरवाद को बढ़ावा मिलता है, वहां वहां समाज के कमजोर वर्गों, जैसे निचली जातियों और महिलाओं, का शोषण और बढ़ जाता है।

आर्टिकल 15 में सामूहिक बलात्कार में ऊंची जातियों के लोगों के साथ-साथ पुलिस की भी लिप्तता दिखाई गई है। पुलिस से लोग डरते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सभी पुलिस वाले गलत ही होते हैं। बेईमानी से भरती जा रही इस पृथ्वी में कम रह गए ईमानदार लोग अपनी ही तरह की इमानदार पुलिस, ईमानदार वकील और ईमानदार राजनेता की उम्मीद करते हैं।

‘आर्टिकल 15’ में सामूहिक बलात्कार में ऊंची जातियों के लोगों के साथ-साथ पुलिस की भी लिप्तता दिखाई गई है। पुलिस से लोग डरते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि सभी पुलिस वाले गलत ही होते हैं। बेईमानों से भरती जा रही इस पृथ्वी में कम रह गए ईमानदार लोग अपनी ही तरह की ईमानदार पुलिस, ईमानदार वकील और ईमानदार राजनेता की उम्मीद करते हैं। 

‘आर्टिकल 15’ फिल्म देखने वालों में से बहुतेरे लोगों ने इसकी प्रशंसा की है। यह फिल्म देखने वाले ऊंची जाति के लोग क्या जाति प्रथा में विश्वास नहीं करते? क्या वे स्त्री के समान अधिकारों का समर्थन करेंगे? मुझे नहीं लगता कि बचपन से जाति प्रथा में दीक्षित लोग अब अचानक इसके विरूद्ध हो जाएगें। लेकिन इससे फिल्म, साहित्य और दूसरे कला रुपों के उद्देश्यों को कमतर नहीं किया जा सकता। ‘आर्टिकल 15’ ने वही काम किया है, जो किसी भी संवेदनशील और उद्देश्यपरक फिल्म को करना चाहिए। सभ्य, शिक्षित मनुष्य को भी इसी तरह बिना किसी त्वरित परिणाम की उम्मीद किए मनुष्यता के पक्ष में और बाड़ेबंदियों के विरुद्ध अपना अभियान जारी रखना चाहिए। 

भारत में मुस्लिमों के साथ जिस तरह की राजनीति होती है, ठीक वैसी ही राजनीति पिछड़ों और दलितों के साथ भी होती है। संविधान या कानून जाति प्रथा को स्वीकार नहीं करता, लेकिन समाज करता है। सदियों तक दलितों को उनके अधिकारों से वंचित करने के बाद अब उनकी क्षतिपूर्ति का दौर चल रहा है। शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में उन्हें आरक्षण की सुविधा दी जाती है। किंतु समाज में आज भी उन्हें घृणित माना जाता है और उनसे परहेज किया जाता है। 

भारत में मुस्लिमों के साथ जिस तरह की राजनीति होती है, ठीक वैसी ही राजनीति पिछड़ों और दलितों के साथ भी होती है। संविधान या कानून जाति प्रथा को स्वीकार नहीं करता, लेकिन समाज करता है। सदियों तक दलितों को उनके अधिकारों से वंचित करने के बाद अब उनकी क्षतिपूर्ति का दौर चल रहा है। शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में उन्हें आरक्षण की सुविधा दी जाती है। किंतु समाज में आज भी उन्हें घृणित माना जाता है और उनसे परहेज किया जाता है। 
 समग्रता में देखें, तो ‘आर्टिकल 15’ कोई असाधारण फिल्म नहीं है। जापानी फिल्म ‘शॉपलिफ्टर्स’ की तुलना में, जिसे पिछले साल कान्स फिल्म फेस्टिवल में पाम ड्योर पुरस्कार मिला, ‘आर्टिकल 15’ को एक मेलोड्रामा ही कहा जा सकता है। यह फिल्म सच्ची घटनाओं पर आधारित है। जातिगत शोषण, सामूहिक बलात्कार के बाद गला दबाकर लड़कियों की हत्या कर देना या उन्हें बस से फेंक देना, जिंदा ही पेड़ पर लटका देना या टुकड़े-टुकड़े कर देना- ये सब कुछ आज की सच्चाई है। कभी-कभी मैं सोचती हूं कि स्त्री शोषण पर उपन्यास लिखने या फिल्म बनाने के लिए कल्पना की सहायता लेने की जरुरत नहीं है, सच्ची घटनाओं को जस का तस उतार देना ही काफी होगा। 

हालांकि मैं जाति प्रथा को उतने सीमित ढ़ंग से नहीं देखती। ऊंची जाति के पुरुष जिस तरह निचली जातियों की महिलाओं के साथ बर्बरता को अपना अधिकार मानते हैं, वैसे ही निचली जाति के पुरुष भी ऊंची जातियों की महिलाओं को अपना शिकर बनाते हैं, बेशक ऐसे मामले कम होते है। इसलिए समस्या सिर्फ जाति नहीं है, समस्या पुरुषवर्चस्ववादी सोच है। भारत में जातिगत विषमता मिटाने की जितनी कोशिशें हुई हैं, लैंगिक विषमता मिटाने के प्रयत्न, दुर्योग से, उतने नहीं हुए। जब तक महिलाओं के प्रति सोच नहीं बदलेगी, तब तक अपराध में कमी नहीं आएगी।

साभार – अमर उजाला

One comment

  • Vikas sharma says:

    कुछ बहुत जरूरी बिन्दु जुड़ते हैं हमारी समझ में
    एक ही बात जैसे फिर हमे वो नहीं रहने देती जो हम हैं
    जूठन पर लेटना पहली बार जान पाया हूँ
    दिखाता है कुछ और खोल कर हमारा हम हमें

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