मेरा जोबन, तन, मन बिघन करै, कुछ जतन बणा मेरी सास – धनपत सिंह

मेरा जोबन, तन, मन बिघन करै, कुछ जतन बणा मेरी सास
दिन रैन चैन नहीं पिया बिना, छ: ऋत बारहा मास

चैत चाहता चित चोर को चले गए चतर सुजान
चित के मिले ना चौधरी हुई चिंता म्हं गलतान
चंदा दूर चकोर चकूर म्हं क्यूकर जा असमान
चक चांद अचानक आण चढ्या हुई चमक पै कुरबान
जिसको चैत चंचल चाहता चल जे चल पिया के पास

बसाख म्हं बसणा मुश्कल हो टाळे नहीं टळै
बसाख म्हं बीवी बालम मिलकै नाहण चलै
बसाख म्हं भारी भ्रम हुआ जो बालम बिन नहीं जळै
हम सारी मुरझा गई और फुलवाडी फूल खिलै
बसाख म्हं भंवरा गूंज रह्या हो सख्त पिया की ख्यास

जेठ जटा सिर के खुले किते कल्प राजकंवार
निरजला एकादसी गंगा जन्म का गलती होया त्यौहार
जेठ जुल्म की धूप पड़ै कितै तपता हो भरतार
सरद सुराही शीतल जल की पी बिन जहर सुमार
बिन ब्याहे के प्यासे बिन ना मिटै देह की प्यास

साढ पिया बिन ठाढ नहीं जीवन काढ कमाल
भंवरे देत गुंजार सरद शीतली जल के भरे ताल
गुलरंग हजारा देक्खूं नो बालम की शकल पर ख्याल
बिजळी की चमक पर नजर पड़ै तो याद करूं भोपाल
बालम बिना बिलक कै देक्खूं बालम चढ़े अकाश

सामण समो सुहावनी सब सिंगरी सखी सहेली
झूल्लण चाली बाग्गां के म्हं पीछे पाटड़ी ले ली
सब सिंगरी हांडै बीर सास्सू जिनके मन के गेली
हम सोळा निर्भाग चंदड़ी पी बिन किसी अकेली
दिलबर की हरियाली बिन सब सूखे बण, फळ, घास

भादों भिष्ट की खान री जगत म्हं मरता गिन वके निशानी
पी-पी करै पपीहा कोयल बोल्लै बानी
सब जन्माष्टमी व्रत करैं हम नैं मोटी किलकानी
भादु की रात अंधेरी म्हं डरै पिया की राणी
भादु म्हं भरतार बिना भ्रमत का मन बणोवास

आसौज ऐश असरत गई पिया प्यारे के साथ
दिन पर्वत सा दीखता सर सागर सी रात
हर जगह न्यौरते बंटते हैं हम सोळा खाली हाथ
पिया दर्शन बिना किसा दशहरा दिशा चढी सिर गात
क्यूकर सुणां रामायण राम बिन सीता हुई उदास

कंथ म्हं बिना कातिक म्हं कोतुक यो दुख होया धनेरा
कोयल कूकै कोकिला बोलै जी लिकड़ जा मेरा
आई दिवाळी लक्ष्मी पूजा सुन्ना रहग्या डेरा
सब लीपै पोतै दीवे लावैं पी बिन म्हारै अंधेरा
दिलबर बिना देव ना जागे आई देवठणी ग्यास

मंगसर फाड्डा रंगसर री बालम बिन कहो के ढंग हो
मन मचल मरोड़ मारै सै साजन बिन कहो के ढंग हो
जब मंगसर म्हं मन मस्त रहै मन मोहन मोहकै  संग हो
जिनके मंगसर म्हं पिया पास नहीं उनकी करणी म्हं भंग हो
मंगसर म्हं रही पिया बिना मिटी सरदी की चास

पोह पाळा पल-पल पड़ता है थर-थर कांपण लागी
पिया बिना पार पडै़ ना आतिस की अंगीठी जागी
हम सिर मार के मरां सेज साजन बिन सुन्नी लागी
पोह म्हं भी रही पिया बिना हम सोळा निर्भागी
पोह म्हं भी पास नहीं के इसतैं बद्त्ती नाश

माह में जब मस्त रहे महाराज पास रणधीर
आई बसंत पंचमी पूज्जैं सिंगरी हांडैं बीर
पिया बिना हम किसपै ओड्डां जरद बसंती चीर
सोळा रहगी शीत मारती माह का भी हुआ आखिर
बिन भरतार भला ना होता भड़क भ्रम विश्वास

फाग फगुवा फुलग्या पिया संग खेल्लैं फाग
लाल गुलाल हरे रंग धोळे जन्म सुफल सुहाग
मृदंग पखावज ढप्प बाजैं गावैं होळी के राग
कहै धनपत सिंह रही पिया बिन री हम सोळा निर्भाग
जमवा मीर बीर का पी बिन सब फीका रंगरास

जिला रोहतक के गांव निंदाणा में सन् 1912 में जन्म। जमुआ मीर के शिष्य। तीस से अधिक सांगों की रचना व हरियाणा व अन्य प्रदेशों में प्रस्तुति। जानी चोर, हीर रांझा, हीरामल जमाल, लीलो चमन, बादल बागी, अमर सिंह राठौर, जंगल की राणी,रूप बसंत, गोपीचन्द, नल-दमयन्ती, विशेष तौर पर चर्चित। 29जनवरी,1979 को देहावसान।

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