हे तूं बालम के घर जाइये चंद्रमा – धनपत सिंह

हे तूं बालम के घर जाइये चंद्रमा,
जाइये चंद्रमा और के चाहिये चंद्रमा

आज सखीयां तैं चाली पट, दो बात सुणैं नैं म्हारी डट
घूंघट तणना मुश्किल, बोहड़ीया बणना मुश्किल, जमणा मुश्किल
हे ईश्वर का सुकर मनाईये चंद्रमा

दिए पीट गुस्से से मुंडी, किसमत की खुलगी घुंडी
आच्छी भुंड़ी सहिए, मतना उल्टी कहिए, सब की दासी रहिए
म्हारा इतणा कहण पुगाईये चंद्रमा

घणी सुणकै होज्या थोड़ी, तूं जौहरी यो लाल करोड़ी
जोड़ी मिलगी सही, ऐसी देखी नहीं, कसर इब कौणसी रही
हंस खेल कूदिए खाईये चंद्रमा

ढंग धनपत सिंह बदले हर सन, बनवारी लाल हो प्रसन्न
दर्शन मेली रहिए, ना अकेली रहिए, तूं सब की चेली रहिए
फेर नाम देश म्हं पाइये चंद्रमा

(जिला रोहतक के गांव निंदाणा में सन् 1912 में जन्म। जमुआ मीर के शिष्य। तीस से अधिक सांगों की रचना व हरियाणा व अन्य प्रदेशों में प्रस्तुति। जानी चोर, हीर रांझा, हीरामल जमाल, लीलो चमन, बादल बागी, अमर सिंह राठौर, जंगल की राणी,रूप बसंत, गोपीचन्द, नल-दमयन्ती, विशेष तौर पर चर्चित। 29जनवरी,1979 को देहावसान।)

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