कलम घिसे और दवात सुकज्या हरफ लिखणियां थक ले – धनपत सिंह

कलम घिसे और दवात सुकज्या हरफ लिखणियां थक ले
रै मेरी इसी पढ़ाई नैं कौण लिखणियां लिख ले

इतणै भूक्खा मरणा हो इतणै वा झाल मिलै ना
गुमसुम रहैगा बंदा इतणै ख्याल में ख्याल मिलै ना
जब तक सागर ताल मिलै ना, बता हंस कड़े तैं छिक ले

इश्क बिमारी हो खोटी मरणे म्हं कसर करै ना
इसा बहम का नाग बताया लड़ज्या वो निसार करै ना
दवा, इंजैक्सन असर करै ना जब गुप्त गुमड़ा पक ले

चोर, जार, बदमाश, ऊत मनैं दुनियां कहै लुंगाड़ा
जीवै ना मरै रहै तडफ़ता जिकै लाग्गै नैन दुगाड़ा
बहम का बरतन इसा उघाड़ा, कौण ढकणियां ढक ले

एक कातिल एक कतल करावै दोनों म्हं धर्म करकै
धनपत सिंह कहे जा साच्ची, साच्ची म्हं शर्म करकै
कर्म के आग्गै भरम करकै चाहे जमाना बक ले

(जिला रोहतक के गांव निंदाणा में सन् 1912 में जन्म। जमुआ मीर के शिष्य। तीस से अधिक सांगों की रचना व हरियाणा व अन्य प्रदेशों में प्रस्तुति। जानी चोर, हीर रांझा, हीरामल जमाल, लीलो चमन, बादल बागी, अमर सिंह राठौर, जंगल की राणी,रूप बसंत, गोपीचन्द, नल-दमयन्ती, विशेष तौर पर चर्चित। 29जनवरी,1979 को देहावसान।)

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