कविता हमारे भीतर की देवतुल्य मौजूदगी के प्रति एक संकेत है – बेन ओकरी

कविता हमारे भीतर की देवतुल्य मौजूदगी के प्रति एक संकेत है और हमें अस्तित्व के उच्चतम स्थानों तक ले जा एक गूंज में बदल जाने का कारण बनती है। कवि आपसे कुछ नहीं चाहते, सिवाय इसके कि आप अपने आत्म की गहनतम ध्वनि को सुनें।

नाइजीरियाई कवि और उपन्यासकार बेन ओकरी, फोटो- जनसत्ता

कविता की असाधारणता का कारण बहुत स्पष्ट है। कविता उस मूल शब्द का वंशज है, जिसे हमारे संतों ने सृष्टि की उत्पत्ति का कारक माना है। कविता अपने उच्चांक पर सृष्टि की सर्जनात्मक शक्ति को अपने भीतर जीवित रखती है। वे सभी चीजें, जिनके पास आकार होता है, जो परिवर्तित होती हैं, जो अपना कायांतरण कर लेती हैं – कविता उन सभी चीजों का सशरीर अवतार है। शब्द का वजन कौन माप सकता है, भले एक पलड़े में आप सत्य का हल्का पंख रख दें, दूसरे में शब्द – क्या वैसा संभव है? फिर भी हृदय के भीतर शब्दों का कितना वजन होता है, हमारी कल्पनाओं, स्वप्नों में, युगों-युगों से चली आ रही अनुगूंजों में, उतने ही टिकाऊ जितने कि पिरामिड।

हवा से भी हल्के होते हैं शब्द, फिर भी उतने ही रहस्यमयी तरीके से चिरस्थायी, जितना कि जिया गया जीवन। कविता हमारे भीतर की देवतुल्य मौजूदगी के प्रति एक संकेत है और हमें अस्तित्व के उच्चतम स्थानों तक ले जा एक गूंज में बदल जाने का कारण बनती है। कवि आपसे कुछ नहीं चाहते, सिवाय इसके कि आप अपने आत्म की गहनतम ध्वनि को सुनें। वे राजनेताओं की तरह आपसे वोट नहीं मांगते। सच्चे कवि सिर्फ यही चाहते हैं कि आप इस पूरी सृष्टि के साथ किए गए उस अनुबंध का सम्मान करें, जो आपने इसकी वायु के अदृश्य जादू से अपनी पहली सांस खींचते समय किया था।

कविता हमें, हमारे यकसांपन के अचंभे की ओर ले आती है। यह हमारे भीतर विलीन हो चुके उस बोध को फिर से जगा देती है कि अंततः हम सब एक अनंत परिवार के ही हिस्से हैं और उन अनुभूतियों को एक-दूसरे से साझा कर रहे हैं, जो नितांत हमारे लिए अद्वितीय हैं, और उन अनुभूतियों को भी, जो सिर्फ हमारी नहीं, हर किसी की हैं। जब तक कविता हमारी बुद्धि को सवालों के दायरे में भेजती रहेगी, हमारी मुलायम मनुष्यता को गहरे से छूती रहेगी।

नाइजीरियाई कवि और उपन्यासकार

साभार – अमर उजाला

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