कैसे मिटे गांव की प्यास – भारत डोगरा

ग्रामीण पेयजल की समस्या बढ़ती जा रही है। सरकारी आंकड़े चाहे उपलब्धियों का कुछ भी दावा करें, पर वास्तविक स्थिति बहुत चिंताजनक है। इस कारण स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा, महिला कल्याण आदि विभिन्न क्षेत्रों की क्षति हो रही है।

दूरस्थ इलाके के गांवों में जब लोगों से उनकी प्राथमिकता पूछी जाती है, तब प्रायः वे साफ पेयजल की संतोषजनक व्यवस्था को ही अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता बताते हैं। उन गांवों की महिलाओं से बातचीत में तो यह प्राथमिकता और भी स्पष्ट रूप से उभरती है। इसके बावजूद राष्ट्रीय नीतियों और बजट-आवंटन में ग्रामीण पेयजल को वह महत्व नहीं मिल सका है जिसकी जरूरत है। केंद्र सरकार में स्वच्छता और ग्रामीण पेयजल एक ही मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं। हाल के कुछ वर्षों में जब स्वच्छता अभियान के बजट में तेजी आई, तब इस मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के बजट में पहले तो कमी कर दी गई, और बाद में भी उपेक्षित वृद्धि नहीं की गई। यह ऐसे समय हुआ, जब ग्रामीण पेयजल का बजट तेजी से बढ़ाने की जरूरत थी।

अनेक ग्रामीण क्षेत्रों और वन-क्षेत्रों में पर्यावरण की बहुत तबाही हुई है। जंगल नष्ट किए गए हैं, पेड़ों को बहुत निर्ममता से काटा गया है और पर्यावरणीय नियमों की व्यापक अवेहलना कर खनन को बढ़ाया गया। इस तबाही से वर्षा जल का धरती में संरक्षण बहुत कम हुआ है। अनेक जल-स्रोत सूख गए हैं, या उनमें पहले की अपेक्षा कम पानी उपलब्ध हैं। हिमालय देश की बहुत-सी नदियों का स्रोत है, पर वहां भी अनेक गांवों की प्यास बुझाने वाले झरने सूख गए हैं। यही स्थिति अनेक पर्वतीय और पठारी क्षेत्रों की भी है।

प्रायः गांवों में हैंडपंप लगाकर या पाइप लाइन बिछाकर मान लिया जाता है कि जलापूर्ति संतोषजनक हो गई, पर कुछ ही समय बाद देखा जाता है कि जल- स्तर नीचे जाने से हैंडपंप में और जल-स्रोत सूख जाने से पाइप लाइन में पानी नहीं आ रहा। जल-स्रोतों के सिमटते पानी को भी प्रायः औद्योगिक संयंत्रों और शहरों की ओर मोड़ दिया जाता है, जिससे गांवों का पेयजल संकट और विकट हो जाता है।
गांवों की आंतरिक विषमता भी चौंकाने वाली है। जल संकट विकट होने के बावजूद अनेक स्थानों पर बहुत अधिक जल का उपयोग करने वाली फसलें बढ़ती जा रही हैं।
बजट की कमी के बावजूद अनेक ऐसी पेयजल योजनाएं लाई जा रही हैं, जो महंगी हैं। यह भ्रष्टाचार के कारण हो रहा है। अनेक योजनाएं बिजली न मिलने या अन्य कारणों से ठप पड़ी हैं। दूसरी ओर, मंगल टरबाइन जैसी सस्ती और भारतीय स्थितियों में उपयुक्त तकनीकों की उपेक्षा हो रही है।

विभिन्न कारणों से ऐसे गांवों की संख्या बढ़ रही है, जिनका जल फ्लोराइड और आर्सेनिक की अधिकता से प्रभावित है। गुणवत्ता संबंधी अन्य समस्याएं भी हैं। फ्लोराइड और आर्सेनिक प्रभावित पेयजल पर एक उप-मिशन केंद्र सरकार ने कुछ समय पहले गठित किया था, पर इसकी प्रगति के विषय में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। जबकि आर्सेनिक व फ्लोराइड प्रभावित गांवों की संख्या बढ़ती ही जा रही है।

ग्रामीण पेयजल की समस्या बढ़ती जा रही है। सरकारी आंकड़े चाहे उपलब्धियों का कुछ भी दावा करें, पर वास्तविक स्थिति बहुत चिंताजनक है। इस कारण स्वास्थ्य, स्वच्छता, शिक्षा, महिला कल्याण आदि विभिन्न क्षेत्रों की क्षति हो रही है। अब समय आ गया है कि ग्रामीण पेयजल उपलब्धता को पहले से कहीं अधिक महत्त्व दिया जाए। इसके लिए पहले से कहीं अधिक बजट की व्यवस्था होनी चाहिए तथा बजट का बेहतर उपयोग भी होना चाहिए। यह बहुत जरूरी है कि जिस पर्यावरण विनाश से जल-स्रोत सूख रहे हैं, उसे नियंत्रित किया जाए तथा जल संरक्षण-संग्रहण के कार्यों में सुधार करते हुए उन्हें बढ़ाया भी जाए।

साभार – अमर उजाला

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