पंचकूला से मेलबॉर्न – सुरेन्द्रपाल सिंह

थेम्स नदी में कितने ही समुद्री जहाज एक ही स्थान पर खड़े हैं और उनमें सज़ायाफ्ता कैदियों को रखा जाता है। स्थिति यहाँ तक पहुंच चुकी है कि इन जहाजों से उठने वाली बदबू आसपास के वातावरण को दूषित करने लगती है। आखिरकार, वर्ष 1779 में इंग्लैंड की संसद इन कैदियों को अफ्रीका के पश्चिमी तट और न्यूजीलैंड जैसे दूर दराज इलाकों में भेजने के बारे में विचार करने के लिए एक कमेटी का गठन करती है। कुछ वर्षों के बाद 1786 में एक ऐसे ही जहाज में कैदी बगावत कर देते हैं। अंतत: इंग्लैंड के गृह सचिव लार्ड सिडनी ब्रिटिश खजाने से ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में बोटनी बे नामक स्थान पर सम्राट जॉर्ज तृतीय के नाम से उपनिवेश बनाए जाने की तैयारी करने का आग्रह करते हैं। और इस प्रकार कैप्टेन आर्थर फिलिप के नेतृत्व में 11 जहाजों का एक बेड़ा 8 महीने में करीब 25000 किलोमीटर की तकलीफ भरी समुद्री यात्रा नाविकों, सिपाहियों और 192 महिलाओं सहित 778 कैदियों को लेकर कुल 1000 लोग 17 जनवरी 1788 को उस स्थान पर पहुँचते हैं जिसे आज सिडनी कोय कहा जाता है। कुछ दिनों के बाद 26 जनवरी को वहाँ इंग्लैंड का राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है और तभी से 26 जनवरी के दिन को ऑस्ट्रेलिया दिवस के रूप में मनाया जाता है।

हमारे देश के क्षेत्रफल 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर के मुकाबले ऑस्ट्रेलिया का कुल रकबा 76.92 लाख वर्ग किलोमीटर है। हमारी 131 करोड़ जनसंख्या की तुलना में वहां की आबादी 2.45 करोड़ है। धर्म के आधार पर ऑस्ट्रेलिया में ईसाई 61.1, बौद्ध 2.5, मुस्लिम 2.2, हिन्दू 1.3, अन्य 1.2, अधार्मिक 22.3 व अस्पष्ट 9.4 फीसदी हैं। ये जानना महत्वपूर्ण है कि कुल जनसंख्या का 31.7 प्रतिशत हिस्सा वहाँ बिना किसी धार्मिक पहचान के जी रहा है।

हमारी बेटी ने पंचकूला निवासी एक बुजुर्ग विद्वान से सवाल किया क्या वे आस्ट्रेलिया आकर स्थायी तौर पर रहना चाहेंगे तो जवाब मिला – बिल्कुल नहीं क्योंकि ऑस्ट्रेलिया का कोई इतिहास नहीं है। खैर ऐसे देश में जून महीने में जाकर रहने का मौका मिला जिसके इतिहास का जिक्र ऊपर किया जा चुका है। इस दौरान के अनुभव साझा करने का एक प्रयास इस आलेख के माध्यम से किया जा रहा है।

सिडनी पहुंचने के बाद पहले ही दिन घूमने के लिए डार्लिंग हार्बर जाना हुआ। किश्तियां, स्टीमर, छोटे जहाज, कैप्टेन जेम्स कुक के जहाज का मॉडल, समुद्री संग्रहालय, साफ सुथरा पानी, चकाचक चमकते हुए किनारों के दोनों तरफ सैकड़ों फूड स्टॉल पर हजारों की संख्या में भोजन और ड्रिंक का आनंद लेते हुए महिला और पुरुष आदि पूरे वातावरण को रंगीन बनाए हुए थे। लेकिन कई हज़ार औरतों का दिन के वक्त खुले आम शराब पीना किसी को भी हैरान नहीं कर रहा था। सब कुछ सहज और इत्मीनान से चल रहा था। कुछ दिनों में ये बात ठीक तरह समझ में आ गई कि लिंग के आधार पर वहाँ महिलाओं में किसी प्रकार की ना तो कोई असुरक्षा की भावना है और ना ही कोई हीनग्रंथि। बच्चों और बुजुर्गों के लिए विशेष सरोकार ट्रेन में, बस में, मार्केट में और कहीं भी स्पष्ट दिखाई देता है।

सिडनी में मेरी पत्नी ने एक स्टोर से कुछ सामान खरीदा तो बाहर आकर हमारी बेटी ने अपनी मां के व्यवहार के बारे शिकायत की। बेटी का कहना था कि उसकी माँ ने दुकानदार से कुछ मांगते हुए प्लीज और थैंक्स का प्रयोग नहीं किया और ऐसा करना अगले व्यक्ति का अपमान माना जाता है। अनुभव में भी ये देखने में आया कि जब सवारी बस से उतरती है तो आमतौर पर ड्राइवर को थैंक्यू कहती हैं। वैसे वहां बसों में कन्डक्टर नहीं होता। ट्रेन, स्टीमर, बस सभी जगह एक ही कार्ड स्वाइप करके यात्रा हो जाती है। इसी प्रकार किसी भी ऑफिस या कार्यस्थल पर कोई कितना भी सीनियर हो वह अपने मातहत कर्मचारी को काम करने के लिए ऑर्डर नहीं कर सकता। उसके लिए प्लीज और थैंक्यू  कहना जरूरी है। बात जब बड़े छोटे या ऊँचे नीचे की चल पड़ी है तो आप किसी भी प्रकार से किसी की ऊँची हैसियत का अंदाजा नहीं लगा सकते। वस्त्रों से, गाड़ी से, चाल ढाल से , घर की लोकेशन या साइज अथवा किसी भी अन्य प्रकार से किसी की उच्च हैसियत का अनुमान लगाना करीब करीब असंभव है।

किसी होटल या फ़ूड स्टॉल पर टेबल को साफ रखना या करना ग्राहक का ही फर्ज़ है और इस मामले में सभी लोगों का व्यवहार ईमानदारी से भरा होता है। इसी प्रकार घरों में नौकर या नौकरानी रखने का चलन नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी है कि वे अपना खाना बनाए, वॉशिंग मशीन से कपड़े धोए और घर को साफ सुथरा रखे। एक महीने के दौरान एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया जो खुले में पेशाब कर रहा हो। साफ सुथरे शौचालयों की व्यवस्था हर जगह है।

सड़कों पर यातायात का अनुशासन देखते ही बनता है। पैदल व्यक्ति के सड़क क्रॉस करने के लिए व्यस्त इलाकों में लाइट सिग्नल्स की व्यवस्था है और बाकी सभी जगह सड़क पर निशान बने हैं। जब पैदल व्यक्ति निशान वाले स्थान से सड़क क्रॉस करता है तो सारा ट्रैफिक रुक जाएगा। क्रॉस करने का पहला हक़ पैदल व्यक्ति का है। स्कूटर, मोटरसाइकिल जैसे दुपहिया वाहन सड़कों पर दिखाई नहीं देते। पैदल चलने वालों के लिए मुख्य सड़क के साथ-साथ अलग से फुटपाथ बने हैं। सड़क दुर्घटनाएं ना के बराबर हैं। हमारे देश में करीब डेढ़ लाख सालाना मौतों के मुकाबले ऑस्टेलिया में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या लगभग डेढ़ हजार है। मेलबॉर्न से सिडनी तक के लगभग 900 किलोमीटर के सड़क मार्ग पर पूरे रास्ते हमें कोई चौरास्ता, ट्रैफिक लाइट, ट्रैफिक पुलिस, बैरियर, स्पीड ब्रेकर आदि नहीं मिला और ना ही हॉर्न की ‘मधुर’ ध्वनि सुनाई दी। जगह जगह पर रेस्ट रूम और सर्विस सेन्टर की व्यवस्था देखने को मिली।

कमर्शियल इलाकों को छोड़कर पूरे ऑस्ट्रेलिया में दूर दराज तक फैले सबर्ब बने हैं जहां अधिकतम घर टिन की ढलवां छत वाले विला के रूप में हैं। मेन गेट पर आमतौर पर फाटक नहीं होते। साइड में लॉन और सामने गैराज दिखाई देते हैं। अवारा पशु नहीं हैं इसलिए लॉन के घास, पौधों, फूलों को कोई खतरा नहीं हैं। धूल बिल्कुल नहीं होती। बाजार 6 बजे बन्द हो जाता है केवल कुछ मॉल और फ़ूड पॉइंट्स को छोड़ कर। दुकानों पर शटर नहीं होते। शीशे के दरवाजे बंद किये जाते हैं और अंदर एक दो लाइट जलती हुई छोड़ दी जाती है। ऐसे में रात को भी यूं लगता है कि बाजार खुला ही है। इतनी जल्दी बाजार बन्द होने का तर्क ये बताया गया कि 8 घंटे से अधिक काम करना यहां सख्ती से बंद है। फुरसत के क्षण अपने परिवार के साथ बिताने को प्रोत्साहित किया जाता है। ये बात तमाम कार्यस्थलों पर लागू है।

ड्रेस के मामले में यहाँ रंग बिरंगे परिधानों का प्रचलन नहीं है। काला रंग सर्वव्यापक है चाहे वो जैकेट हो या ओवरकोट। जीन्स और ट्राउजर का प्रयोग सभी करते हैं महिला हो या पुरुष। वस्त्रों के आधार पर किसी के रुतबे का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।  लड़कियों में फैशन के नाम पर सबसे अधिक लोकप्रिय घुटनों से घिसी हुई जीन्स होती है। मजे की बात है कि बाजार में घिसी हुई जीन्स ज्यादा मंहगी मिलती है। वस्त्रों और व्यवहार के मामले में सार्वजनिक स्थलों पर फूहड़पन या अश्लीलता ना के बराबर है। भीड़ वाले स्थान में अगर गलती से कोई किसी को छू जाता है तो तपाक से मुआफ़ी मांगी जाती है।

जिसे हमारे यहां छोटा काम कहा जाता है वहाँ उन कामों के लिए पर्याप्त आमदनी होती है और श्रम का पूरा सम्मान होता है। उदाहरण के तौर पर मेलबॉर्न पहुँचने पर मेरे एक फेसबुक मित्र हरमनदीप सिंह खालसा ने हमें एयरपोर्ट से पिक अप किया और अपने घर ले गया। हरमनदीप सिंह के पास वहां चार बैडरूम वाला घर और दो कारें थी। पंजाब में अपने गाँव मे वो एक बड़ा सा घर बनवा रहा है।  पेशे के तौर पर वह घरों में रंग रोगन का काम करता है। एक दूसरे मित्र ने बताया कि एक पेंटर की आमदनी एक डॉक्टर से कम नहीं होती। लेकिन ये भी आवश्यक है कि हर व्यक्ति काम करे। रिटायरमेंट की उम्र 65 साल है।

स्कूलों में बच्चे टीचर को सर या मैडम कहने की बजाए नाम से पुकारते हैं। जब स्कूल की छुट्टी होती है तो सारे टीचर गेट तक बच्चों को विदा करने आते हैं।

आधुनिक ऑस्ट्रेलिया की चर्चा करते हुए भूतकाल में इसके विकास का जिक्र आना जरूरी लगता है। 1788 से लेकर 1792 तक कैदियों की सँख्या 768 औरतों सहित 4312 हो गई थी। कालांतर में आने वाले 80 सालों में 1,60,000 से अधिक कैदियों को इंग्लैंड, आयरलैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स आदि देशों द्वारा ऑस्ट्रेलिया में भेजा गया। ये कैदी सजा की अवधि के दौरान अधिकारियों की मर्जी के अनुसार मेहनत करते थे और सजा पूरी होने के बाद वहीं पर फ्री सेटलर की तरह से जीते और काम धंधा करते थे।

आज आस्ट्रेलिया मूल के करीब बीस प्रतिशत व्यक्ति इन्हीं सज़ा याफ्ता कैदियों की पुश्तें हैं जिनमें से कितने ही लोग अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हैं। इस प्रकार 1788 से शुरू हुआ उपनिवेशवाद का सिलसिला बढ़ते बढ़ते 1859 तक पूरे ऑस्टेलिया महाद्वीप में फैल गया। 6 राज्यों की फेडरेशन ने 1 जनवरी 1901 को एक कॉमनवेल्थ का रूप ले लिया।  ये माना जाता है कि सन 1788 में ऑस्ट्रेलिया में एक अनुमान के अनुसार 3 से 7 लाख वनवासी थे जिन्होंने अभी खेती करना भी नहीं सीखा था। 1789 में एक अजीबोगरीब बीमारी ने बहुत से वनवासियों की जिंदगी लील ली। ये बीमारी अभी तक एक रहस्य है। उन वनवासियों को अबोरजिन के नाम से जाना जाता है। मेरे व्यक्तिगत प्रयासों के बावजूद मुझे ना के बराबर अबोरजिन लोग दिखाई दिए। आजकल ऑस्ट्रेलिया सरकार ने नौकरियों में अबोरजिन लोगों के लिए दो प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया हुआ है और मानव संसाधन विभाग में काम करने वाली एक महिला अधिकारी ने बताया कि दो प्रतिशत का कोटा पूरी तरह भरा हुआ है और अभी सरकार इस कोटे को दो  से दस प्रतिशत करने का विचार कर रही है। इसी संदर्भ में सन 1998 से लगातार 26 मई का दिन राष्ट्रीय सॉरी दिवस के रूप में मनाया जाता है जिस दिन अबोरजिन लोगों से उनके पूर्वजों के साथ की गई ज्यादतियों के बदले सार्वजनिक माफी मांगी जाती है। इस विषय पर अलग से विस्तार में प्रकाश डाला जा सकता है।

ऑस्ट्रेलिया विभिन्न जातीयताओं और राष्ट्रीयताओं का देश है। इसको समझने से पहले एक बार कुछ और आंकड़ों पर नजर डालना उचित रहेगा। यहां की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा दूसरे देशों की राष्ट्रीयताओं वाला है जिनमें से 50 हज़ार से अधिक संख्या वाले 26 देशों से हैं जिनमे मुख्यत: इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, आयरलैण्ड, चीन, भारत, पाकिस्तान, लेबनान, ईरान, इराक, जर्मनी, फिलीपींस, इंडोनेशिया, साउथ कोरिया, वियतनाम आदि हैं। लेकिन सभी राष्ट्रीयताओं के व्यक्तियों को समान और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। रास्ते में कहीं भी पैदल चलते हुए सामने से आए हर उम्र की महिला/पुरुष का मुस्करा कर अभिनंदन करना आम बात है। अनेक बस्तियां ऐसी हैं जहां राष्ट्रीयता विशेष के परिवार बहुतायत में बस चुके हैं जैसे कि सिडनी के ब्लैक टाउन में पंजाबी, ऑबर्न में तुर्की और लेबनानी, ईस्टवुड में चीनी। सभी के अपने अपने धार्मिक स्थल भी हैं। लेकिन लाउडस्पीकर, जलूस, शोभा यात्रा आदि का प्रचलन शून्य है। बिना धार्मिक पहचान के या नास्तिक व्यक्तियों को अपने बारे में ऐसा बताने में कोई दुविधा महसूस नहीं होती।

मेलबॉर्न से सिडनी तक सड़क से यात्रा करते हुए देखा कि दोनों तरफ बड़े बड़े फार्म हैं जहां किसी में भेड़ें, किसी में गाय और किसी में घोड़े घास चरते हुए दिखाई देते हैं। घोड़ों का उपयोग रेस कोर्स व दूर दराज के फार्म में होता है लेकिन भेड़ (लैम्ब) और गाय (बीफ़) पूरे आस्ट्रेलिया में सबसे पसंदीदा भोजन है। फिश और चिकन की पसंद दूसरे नम्बर पर है। ड्रिंक में वहाँ सर्दी के बावजूद बियर पीना वैसा ही है जैसे हमारे यहाँ निम्बू पानी। सिडनी में हमारी बेटी के पास हम जिस घर में रहे उसकी मालकिन एक चीनी महिला है। उस घर में एक ईरानी लड़की और एक आरएसएस की 20 साल के लिए डिक्टेटरशिप की वकालत करने वाला हिन्दू युवक भी है। इस प्रकार एक चीनी जो अभी चर्च से लगाव पैदा करने जा रही है, एक ईरानी मुसलमान, एक हिन्दू और हमारी नास्तिक बेटी एक ही घर में जहाँ साझी किचन है और ड्राइंग रूम भी एक है बिना किसी मनमुटाव के व एक दूसरे के खाने के बारे बिना नाक चढ़ाए रह रहे हैं।

अब एकबार फिर थोड़ा इतिहास की ओर मुड़ के देखा जाए। सन 1850 के आसपास गोल्ड रश की एक प्रक्रिया ऑस्ट्रेलिया में देखी गई। कितने ही स्थानों से सोना मिलने लगा। दूसरे देशों से किस्मत आजमाने वालों को तांता लग गया और धड़ाधड़ सोने की नई नई खान खोदी जाने लगी। उस वक्त करीब 40 हज़ार चीनी व्यक्ति गोल्ड फील्ड में आकर बस गए। छोटे छोटे नए कस्बे खुलने लग गए। आपसी नफरत और हिंसा का दौर चल पड़ा। अंतत: सरकार को  व्हाइट ऑस्ट्रेलिया को बचाने के लिए प्रत्यापर्ण नीति को नियमित करने पड़ा। इसके बावज़ूद इस दौर में ऑस्ट्रेलिया की जनसंख्या 3 गुणा हो गई और नतीज़े के तौर पर आर्थिक और ढाँचागत गतिविधियों ने एकदम से गति पकड़ी। साथ ही साथ अपराध और लूटमार का सिलसिला जोर पकड़े लगा। धीरे धीरे आर्थिक मंदी के दौर से गुजरते हुए नए खनिजों और नेचुरल गैस की खोज के साथ आज संसाधनों से भरपूर आधुनिक ऑस्ट्रेलिया हमारे सामने है।

एक पूँजीवादी राष्ट्र की अपनी सीमाएँ भी होती हैं जो आर्थिक उतार चढ़ाव और उससे जुड़ी हुई गुत्थियों से रूबरू होती रहती हैं लेकिन समानता, एकता, आज़ादी, भाईचारा, सहिष्णुता जैसे मानवीय मूल्यों के आधार पर ऑस्ट्रेलिया का समाज आज के दिन अपनी पराकाष्ठा पर है जो हमारे लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है।

इतने धर्मों, राष्ट्रीयताओं, रंग रूप, मान्यताओं से सम्बद्ध रखने वाले देश में एकता, अनुशासन, खुशहाली, समानता आदि के मूल्यों को संजोए हुए ऑस्ट्रेलियन समाज की गहराइयों को करीब एक महीने की अवधि में पूरी तरह समझना एक मुश्किल काम है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2017, अंक-12), पेज-

सुरेंद्र पाल सिंह

सुरेंद्र पाल सिंह

जन्म - 12 नवंबर 1960 शिक्षा - स्नातक - कृषि विज्ञान स्नातकोतर - समाजशास्त्र सेवा - स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत लेखन - सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित सलाहकर - देस हरियाणा कार्यक्षेत्र - विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि-ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि। पताः डी एल एफ वैली, पंचकूला मो. 98728-90401

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