घाणी फोड़ रही थी जोट न्यूं आपस में बतलाई – मंगतराम शास्त्री

(प्रचलित तर्ज- होळी खेल रहे नन्दलाल…)
घाणी फोड़ रही थी जोट न्यूं आपस में बतलाई
हम रहां माट्टी संग माट्टी, म्हारी जड़ चिन्ता नै चाट्टी
पाट्टी पड़ी खेस की गोठ, दे म्हैं को राम दिखाई
म्हारे अणपढ़ रहग्ये बच्चे, और ढूंढ पड़े सैं कच्चे
सच्चे मोती मारैं लोट, जणूं रेत में चिडिय़ा न्हाई
हम देही तोड़ कमावां, पन्द्रही पै राशन ल्यावां
खावां रूखे सूखे रोट, ना मिलता दूध मलाई
सही मंगतराम कहै सै, म्हारे हिरदे डीक दहै सै
रहै सै सारी हाण कचोट, म्हारी देही रंज नै खाई

मंगत राम शास्त्री

जिला जीन्द के टाडरथ गांव में सन् 1963 में जन्म। शास्त्री, हिन्दी तथा संस्कृत में स्नातकोतर। साक्षरता अभियान में सक्रिय हिस्सेदारी तथा समाज-सुधार के कार्यों में रुचि। अध्यापक समाज पत्रिका का संपादन। कहानी, व्यंग्य, गीत विधा में निरन्तर लेखन तथा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। बोली अपणी बात नामक हरियाणवी रागनी-संग्रह प्रकाशित।

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