खाली हाथ – जयपाल

वे दिन भर शहर की सूरत संवारते हैं
और अपनी सूरत बिगाड़ते हैं
दिन ढलने पर
सिर नीचा कर
मुंह लटकाए
चल पड़ते हैं वापिस
अपने घरों की तरफ
हताश-निराश
जैसे शमशान से लौटते हैं लोग
खाली हाथ
 

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