लूकाच का वास्तविकतावाद – डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल

मार्क्सवाद के बारे में बहुत से पर्वाग्रह लोगों के मन में घर कर गये हैं। उनमें से एक मुख्य धारणाा यह है कि इस दृष्टिकोण से प्रतिबद्धता गंभीर साहित्यिक विवेचन में बाधा उपस्थित करती है। कहा जाता है कि व्यक्ति-स्वातन्त्र्य को नकारकर मार्क्सवाद मात्र समष्टिगत सूक्ष्मों को मान्यता देता है। सामाजिक जीवन के व्यापक आयाम में मात्र आर्थिक सम्बन्धों को प्रधानता देता है और सभी बौद्धिक, नैतिक एवं साहित्यिक मानों पर उन्हीं के निर्णायक प्रभाव को स्वीकृति देता है। इससे यह भी निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि किसी भी मार्क्सवादी आलोचक के लिए कला की स्वायत्तता को पहचान पाना बड़ा कठिन होगा, इस प्रकार की आशंका रखने वाले खामियाँ सामने आती हैं। बताया जाता है कि जहाँ साहित्यकार मानव-जीवन के विभिन्न पक्षों को खुले मन से तथा खुले दिमाग से ग्रहण करता है, वहाँ मार्क्सवादी विचार-प्रणाली एक सहज प्रतिबद्धता को कलाकार तथा आलोचक पर आरोपित कर देती है।

जीवन की जिन बारीकियों, पेचीदगियों, र्वग्ब्ताओं से एक समृद्ध साहित्यकार अथवा समर्थ आलोचक का सरोकार होता है वे सब मार्क्सवादी प्रतिबद्धता के सामने कुर्बान हो जाती हैं और विविध अनुभवपुन्जों का सही, सहृदयतापूर्ण मूल्यांकन सम्भव नहीं रह जाता। ऐसी विचारधारा के शिकंजे में जकड़े जाने पर जीवन के प्रति स्पन्दशीलता संकुचित हो जाती है। बहुत सारे अनुभव या तो गौण समझकर छोड़ दिये जाते हैं अथवा वे आहिस्ता-आहिस्ता चेतना की परिधि से पूर्णतया बाहर हो जाते हैं।

            ये सब भ्रान्तियाँ लगभग बेबुनियाद हैं। वास्तव में बौद्धिक, नैतिक एवं भाव सम्बन्धी धरातलों पर मार्क्सवाद एक सुसम्पन्न विचारधारा है और साहित्य के विषय में भी इस विचारधारा के सहारे हम उचित मानदण्डों की स्थापना कर सकते हैं तथा रूप सम्बन्धी व्याख्या के लिए विश्वस्त सूत्र प्राप्त कर सकते हैं। मार्क्सवाद एक ऐसा तर्कसम्मत एवं वैज्ञानिक जीवन दर्शन है जो मानवता की सम्पूर्ण संभावनाओं के प्रति विशेष रूप से जागरूक है।

            लूकाच की साहित्य-आलोचना मार्क्सवादी विचारधारा से सम्बन्धित विभिन्न भ्रान्तियों को दूर करने में बड़ी सहायक हो सकती है। साहित्यिक मसलों की व्याख्या करने के लिए उसने गत्यात्मक द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दृष्टिकोण को अपनाया है और साहित्य के स्वरूप की परिभाषा करते समय तथा विभिन्न साहित्यिक कृतियों का मूल्यांकन करते समय अपनी पैनी सूझबूझ का परिचय दिया है।

            लूकाच ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि सभी प्रमुख मार्क्सवादी चिन्तक पूर्ववर्ती साहित्य-सम्पदा की विशेष कदर करते थे और उसे मानवीय प्रगति की शक्तियों को मजबूत बनाने का एक मुख्य प्रेरणा-स्त्रोत मानते थे। मार्क्सवादी परम्परा की साहित्यक-विषयक संकीर्णता के झूठे आरोपों का खण्डन करते हुए लूकाच लिखते हैं, ‘केवल वही लोग जो मार्क्सवाद के बारे में जानकारी नहीं रखते अथवा केवल सुनी-सुनाई सतही जानकारी रखते हैं यह सुनकर विस्मित होंगे कि इस सिद्धांत को मानने वाले असली महान चिन्तक मानवता की प्राचीन भावसम्पदा को बड़े आदर की दृष्टि से देखते थे और विभिन्न संदर्भो में उसका र्जिग्ब् करते थे।’

            इस विचारधारा को साहित्य सम्बन्धी मसलों पर लागू करने का पहला लाभ तो यह होता है कि साहित्यिक प्रक्रिया पर इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण की तीखी रोशनी पड़ते ही वह एक अनोखा रहस्य नहीं बनी रह जाती, जैसा कि लूकाच ने बताया है, ‘मार्क्सवाद घटनाओं के भौतिक मूल को खोज निकालता है, उन्हें ऐतिहासिक संदर्भ में रखकर उनकी वास्तविक प्रवृत्ति को पहचानता है, उस प्रवृत्ति के वास्तविक नियमों को निर्धारित करता है, घटनाओं की मूल दशा से अन्तिम चरण तक पहुँचने तक के विकासक्रम को स्पष्ट करता है और इस प्रकार प्रत्येक घटना को थोथी भावुकता एवं तर्कहीनता के धुँधलेपने से बाहर निकाल विवेक की प्रखर रोशनी में ला खड़ा करता है।’

            साहित्य को केवल भावनाओं से जुड़ी हुई वस्तु मान लेने से इसके इर्द-गिर्द जो छद्म-रहस्य खड़ा हो जाता है, उसे मार्क्सवादी विचारधारा नष्ट कर देती है।

             लूकाच ने साहित्य को जीवन से काट देने वाले रूपवाद का विरोध किया है। उन्होंने इस बात पर तो जोर दिया कि प्रत्येक साहित्यिक कृति का अपना विशिष्ट रूप होता है और प्रत्येक साहित्यिक विधा के अपने विशिष्ट नियम होते हैं परन्तु रूप अथवा विधा के ये नियम दरअसल वस्तुपरक जीवन की मूल गतियों से ही निर्धारित होते हैं। इतिहास की गत्यात्मक-द्वन्द्वात्मक प्रक्रिया के दौरान जैसे-जैसे नये सवाल, नये मसले, नये अनुभव उभरते जाते हैं, उन्हें सफलतापूर्वक प्रतिबिम्बित करने वाले साहित्य में भी रूप विधा के नये परीक्षण दृष्टिगोचर होते जाते हैं। साहित्य जीवन की यांत्रिक प्रतिलिपि कदापि नहीं होता पर अच्छा साहित्य वही है जो सामयिक जीवन के एतिहासिक विकास-क्रम के साथ सभी सारभूत अनिवार्य तत्वों की प्रखर छाप लिये हुए हो। साहित्य की जवन से भिन्नता इस बात में नहीं है कि उसमें जीवन के सभी तत्व एक अनूठे ‘सौन्दर्य-तत्व’ में परिणत हो जाते हैं, बल्कि इस बात में कि यहाँ केवल सारभूत तत्व ही परिलक्षित होते हैं और उन तत्वों को साधारण जीवन से कहीं ज्यादा प्रगाढ़ एवं प्रखर रूप प्रदान कर दिया जाता है। साहित्य साधारण जीवन में पाये जाने वाली बहुत सारी सारहीन, तुच्छ अथवा गौण-चीजों को छोड़ देता है। वह तो जीवन की वास्तविकता के मुख्य ‘पैटर्न’ को पकड़ने का प्रयास करता है और उसे अपनी कृति के माध्यम से स्मरणीयता तथा मूर्तता प्रदान करता है। जीवन की वास्तविकता जटिल और बहुस्तरीय होती है, उसमें बहुत सारे अन्तर्विरोधी तत्व होते हैं। एक कुशल साहित्यकार जिस ‘पैटर्न’ की प्रखर छाप अपनी कृति में उतारता है उसमें जीवन की वास्तविकता की सारी जटिलता, बहुस्तरीयता एवं द्वन्द्वात्मकता अच्छी तरह झलक जानी चाहिए। सरसरी नजर देखने से पर अथवा कल्पनाशक्ति, बुद्धि तथा भावनाओं को केन्द्रित किये बगैर काहिली से देखने पर जीवन में हम काफी मात्र में बिखराव, विश्रृंखलता, असम्बद्धता तथा लक्ष्यहीनता पायेंगे। साहित्य जीवन को गहराई से जीने तथा एकाग्र होकर समझने का सुपरिणाम होता है। अत: यहाँ असम्बद्धता अथवा बिखराव की कोई गुजांइश नहीं होती, जीवन और साहित्य में यही मुख्य अन्तर है। इसके अतिरिक्त लूकाच के अनुसार कला और साधारण जीवन में एक और बात से भी अन्तर आ जाता है। साधारण जीवन में परिस्थितियों के गर्भ में पड़ी सभी संभावनाएं अपनी चरम सीमा को प्राप्त कर पाएं– यह आवश्यक नहीं होता, किन्हीं युगों में अथवा किन्हीं व्यक्तियों के जीवन में ही सारभूत मानवीय सम्भावनाएँ तीव्र रूप धारण करके सामने आती हैं, वरना द्वन्द्वात्मक सम्भावनाएँ या तो बिल्कुल दबी पड़ी रह जाती हैं या फिर साधारण परिस्थितियों में औसत आदमी की अनुभूतियों में धीमी बनी रहती हैं। गहराई, उभार, विस्तार अथवा तीव्रता की पराकाष्ठा जीवन में दुर्लभ होती है। साहित्यकार को यह विशेषाधिकार होता है कि वह धीमी पड़ी, दबी-छिपी मानवीय सम्भावनाओं को उभार दें, उनकी अधूरी प्रक्रिया को पूर्णता तक ले जाकर देखे, भविष्य में लटके अथवा वर्तमान में बिखरे पड़े लक्ष्यों को उजागर एवं संगठित करे। अपूर्ण को पूर्ण तथा धूमिल को प्रखर बनाने के इन प्रयासों से भी साहित्य और साधारण जीवन में अन्तर आ जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि लूकाच साहित्य की विशिष्ट स्वतंत्र सत्ता को भलीभाँति पहचानते हैं परन्तु वह उन सभी धारणाओं का खण्डन करते हैं जिनके अनुसार साहित्य को एक ऐसा कशीदा हुआ अनुपम अर्क मान लिया जाता है जिसके रसास्वादन से हम अलौकिकता एवं रहस्यमयता के क्षेत्र में पहुँच जाते हों। साहित्य जीवन से परे की कोई अनूठी वस्तु नहीं है और सौन्दर्य-शास्त्र के नियम जीवन के विभिन्न पक्षों से सम्बद्ध होते हैं। अच्छा आलोचक वही हेागा जो किसी भी साहित्यिक कृति को सामयिक जीवन की मूल शक्तियों के द्वन्द्वात्मक ड्रामे से जुड़ा हुआ देखता हो। जिस आलोचक के पास मानव इतिहास के बारे में सही परिप्रेक्ष्य नहीं है, वह न तो साहित्य की विधाओं के विवेचन के लिए सही सूत्र ढूँढ़कर निकाल सकता है, न किसी कृति के मूल्यांकन के लिए सही मानदण्ड।

            लूकाच पिछली दो-तीन शताब्दियों के मुख्य यूरोपीय साहित्यकारों की कृतियों का विवेचन एवं मूल्यांकन करते समय मार्क्सवादी ‘डाईलेक्टिक्स’ की मदद लेते हैं और उन कृतियों को तत्कालीन सामाजिक स्थितियों से सम्बद्ध करके देखते हैं। किसी लेखक के अपने मन्तव्यों के कारण भ्रम में पड़ने से बचने के लिए वह यह देख लेना चाहते हैं कि तत्कालीन सामाजिक जीवन की मुख्य धाराएं कौन-सी थीं। उनका रूख किस ओर था तथा उनके बीच अन्तद्र्वन्द्व किस प्रकार का था, फिर वे यह देखते हैं कि लेखक ने सामयिक जीवन की वास्तविकता का किस क्षमता से चित्रण किया हैं और ऐसा करते समय उसे किस प्रकार के सहित्यिक परीक्षण करने पड़े हैं। टालस्टाय की कृतियों के अपने अध्ययन की पद्धति को समझाते हुए उन्होंने लिखा है, ‘यह तरीका बहुत सीधा है, सबसे पहले तो पर्याप्त सावधानी के साथ देखना होता है कि टालस्टाय के जीवन के वास्तविक सामाजिक आधार कौन-से थे तथा वे वास्वतिक सामााजिक शक्तियां कौन-सी थीं जिनके प्रभाव के अन्र्गत इस लेखक के साहित्यिक व्यक्तित्व का विकास हुआ। फिर इसके साथ ही यह प्रश्न उठाया जाता है कि टालस्टाय की कृतियाँ क्या लक्षित करती हैं, उनका वास्तविक, आध्यात्मिक एवं बौद्धिक कथ्य क्या है और इस कथ्य को यथेष्ट रूप में अभिव्यक्त करने के संघर्षपूर्ण प्रयास में उसे कैसे सौंदर्यविषयक रूपों का निर्माण करना पड़ा है। निष्पक्ष परीक्षण द्वारा इस प्रकार इन सब वस्तुपरक सम्बन्धों का उघाड़ने और समझने के उपरान्त ही हम लेखक के अपने विचारों का सही अर्थ निकाल सकते हैं और साहित्य में उसके प्रभाव का ठीक मूल्यांकन कर सकते हैं।

            इस ऐतिहासिक-दार्शनिक दृष्टिकोण के सहारे लूकाच ने जिस सूझबूझ ओर ईमानदारी के साथ गोयटे, बाल्जाक, फ्रलाबेयर, जोला, टालस्टाय, दोस्तोवस्की, काफ्का तथा टामस मान आदि साहित्यकारों की कृतियों का विश्लेषण किया है उससे यह भ्रान्ति अवश्य दूर हो जानी चाहिये कि मार्क्सवादी आलोचक पक्षपातपूर्ण रवैया अख्तियार करके केवल उन्हीं लेखकों की प्रशंसा करता है जो समाजवादी विचारधारा को अपने साहित्य के माध्यम से आगे बढ़ाते हैं और बाकी सभी साहित्यकारों की कटु आलोचना करता है। इन प्रमुख लेखकों में से एक भी ऐसा नहीं है जिसकी कृतियों में समाजवादी दृष्टिकोण प्रतिपादित हुआ हो। इनमें से गोयटे, बाल्जाक, टालस्टाय और टामस मान को उच्च स्थान इसलिए नहीं दिया जाता कि वे समाजवाद के पक्षपाती थे वरन् इसलिये उनकी कृतियों में ‘वास्तविकतावाद की विजय’ परिलक्षित होती है। वास्तविकतावाद के अपने सिद्धांत के एक पक्ष को स्पष्ट करते हुए लूकाच लिखते हैं, ‘बाल्जाक और टालस्टाय जैसे वास्तविकतावादी लेखक अपनी कृतियों में असली प्रश्न उठाते समय जन-समुदाय की सबसे महत्वपूर्ण जीवन्त समस्याओं को आधार बनाते हैं। उस युग में जनता द्वारा सही जाने वाली सब से तीव्र पीड़ाओं से ही उनकी लेखकीय करुणा जागृत होती है। इन्हीं पीड़ाओं से उनके राग अथवा विराग की भावनाओं की दिशा निर्धारित होती है और उन्हें लक्ष्य मिलता है। अपनी रचनानुभूति के दौरान वे क्या कुछ देखते हैं, किस ढंग से देखते हैं, यह भी इन्हीं पीड़ाओं से निश्चित होता है। इस प्रकार यदि सृजन-प्रक्रिया के दौरान उनके सुपरिचित और स्पष्ट विचार उनकी रचनानुभूति के संसार के विरूद्ध पड़ते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जीवन की उनकी सच्ची परिकल्पना इन विचारों की पकड़ में पूर्णतया नहीं आ पाई थी और उनकी अनुभूति की गहराई तत्कालीन अहम मसलों से उनके गहरे सम्बन्ध की और जनता की पीड़ाओं से उनकी गहरी सहानुभूति की यथेष्टा अभिव्यक्ति हमें केवल उनके पात्रों के अस्तित्व तथा उनकी नियति में ही देखनी चाहिए।’

            वास्तविकतावाद की इस धारणा के आधार पर ही लूकाच, बाल्जाक और स्तैंदाल को फ्रांसीसी साहित्य के क्षेत्र में, तथा टालस्टाय को रूसी साहित्य के क्षेत्र में प्रथम कोटि के उपन्यासकार मानते हैं। केवल इन्हीं लेखकों की कृतियों से तत्कालीन सामाजिक जीवन की गतिविधियाँ सही रूप में अंकित हुई हैं। फ्रांस की क्रांति के बाद किस प्रकार बुर्जुआ-वर्ग सारे समाज पर छा गया, कैसे इस वर्ग ने थोड़ी जमीन के मालिक किसानों को उच्चवर्ग के विरूद्ध लड़ाया और फिर उन्हें दगा दिया, जनतन्त्रीय क्रांति की सफलता के साथ कैसे पूंजीवाद की सुदृढ़ स्थापना की गई और इससे विभिन्न वर्गों से सम्बन्ध रखने वाले व्यक्तियों के जीवन में किस प्रकार के तनाव उभरे, उच्च वर्ग की सभय एवं शिष्ट जीवन-प्रणाली कैसे तिरोहित हो गई और छोटे किसानों को कैसी भीषण त्रसदी झेलनी पड़ी, ये सब बातें बाल्जाक की ‘बामदी ह्यूमन’ उपन्यास श्रृंखला में विधिवत दिखायी गयी हैं। यद्यपि बाल्जाक की सहानुभूति उच्च वर्ग के साथ थी, फिर भी उसने स्पष्ट रूप में दिखाया कि क्रांति और उसके बाद की घटनाएँ ऐतिहासिक दृष्टि से अनिवार्य हो गई थी और वे समाज के प्रगतिशील विकास को सूचित करती थी। इस प्रकार बाल्जाक ने अपनी कृतियों में वस्तुपरक जीवन के सभी सारभूत तत्वों का सही ऐतिहासिक नक्शा उतारा है और फ्रांसीसी समाज में उस समय जो भी अन्तर्विरोध अथवा असंगतियाँ थीं उन्हें प्रखरता के साथ लक्षित किया है। ऐसा कर सकने के लिए जिस सही परिप्रेक्ष्य और निर्वैयक्तिकता की जरूरत होती है, वह बाल्जाक की कृतियों में मौजूद है। विवेकपूर्ण परिप्रेक्ष्य का साक्ष्य इस बात में है कि उसने केवल सारभूत घटनाओं को चुना तथा ऐसे पात्रों का निर्माण किया जो अपनी घनिष्ट वैयक्तिकता के प्रतिनिधित्व की छाप भी लिये हुए हों। बाल्जाक के पात्रों का यह प्रतिनिधित्व उन्हें औसत आदमी नहीं बना देता। औसत आदमी में तो विरोधी तत्वों की काट-छाँट के बाद एक धूमिल सा मिश्रण ही बच रहता है। इसके विपरीत बाल्जाक ने उन सभी विरोधी तत्वों को अपने चुने हुये पात्रों में सुकेन्द्रित कर दिया है जो ऐतिहासिक दृष्टि से अनिवार्य हो गये थे पर जो साधारण जीवन मेें या तो अधिक प्रखर नहीं हो पाये थे या फिर विभिन्न व्यक्तियों में बिखरे पड़े थे। इससे चित्रण में काव्यात्मकता आ जाती है और मानवीय सम्भावनाओं का कल्पना में स्थायी बना रहने वाला रूप प्रस्तुत हो जाता है। यदि बाल्जाक विभिन्न विरोधी तत्वों का ऐसा प्रखर सुकेन्द्रीकरण न करता तो वह सामयिक जीवन की वास्तविकता को समुचित रूप से उभार कर नहीं ला पाता। साधारण जीवन में पाये जाने वाले औसत आदमियों को अपने पात्रों के रूप में केवल वही साहित्यकार चुनता है जिसकी अनुभूति ऐतिहासिक प्रक्रिया में गतिमान मुख्य तत्वों के द्वन्द्वपूर्ण टकरावों को ठीक से ग्रहण नहीं कर पाई है। ऐसा कथाकार व्यौरेवार विवरणों तथा अकिंचन विशिष्टताओं में कुछ इस तरह उलझ बैठता है कि सारभूत तत्वों के द्वन्द्वपूर्ण अन्तर्विरोधों का सही नक्शा वह दे नहीं पाता। किन्तु बाल्जाक ने अपने उपन्यासों में पात्रें के साथ-साथ कथानक भी कुछ इस प्रकार के चुने हैं कि विरोधी तत्वों के टकरावों को और भी नाटकीयता के साथ पाठक के समाने रखा जा सके। पात्रों की वस्तुस्थिति को प्रदर्शित करने के लिये बाल्जाक ने अपने कथानकों में ऐसी घटनाओं का समावेश किया है, जहाँ टकराव विस्फोटक बिन्दु पर पहुँच कर अपने सही स्वरूप को उजागर कर जाते हों। उसके उपन्यासों के कथानक सनसनी पैदा करने वाले आत्मोत्कर्षों से भरे होते हैं। इतिहास की सही दिशा अंकित करने के लिये बाल्जाक ने जान-बूझकर अद्भुत तथा आत्यंतिक घटना-क्रमों की कल्पना की है तथा प्रखर व्यक्तित्व के धनी पात्रों का सृजन किया है ताकि तत्कालीन परिस्थितियों में अभिव्यक्ति पा सकने वाली मानवी संभावनाओं की चरम सीमा को परिलक्षित किया जा सके। अगर उसने सामाजिक जीवन की सतही विस्तार का ब्यौरेवार विवरण साधारण कोटि के पात्रों के माध्यम से दिया होता तो वास्तविकता का सही ‘पैटर्न’ उभर कर नहीं आ सकता था।

            ‘पैटर्न’ को पकड़ने के प्रयास में बाल्जाक विविधत अथवा वैयक्तिक विशिष्टता को कम नहीं होने देता। पूँजीवादी शक्तियों के हाथों फ्रांसीसी समाज का जो रूप परिवर्तन हुआ,उसकी पूर्ण विविधता एवं जटिलता को प्रस्तुत करने के लिए उसने एक ही वर्ग से विभिन्न पात्रों को चुना, उसके उपन्यासों में वास्तविक जीवन के सारभूत तत्व एक ‘फार्मूला’ बनकर नहीं रह जाते। ऐतिहासिक प्रक्रिया को प्रतिबिम्बित करने के लिये बाल्जाक संस्थाओं, ढांचों और प्रणालियों को पात्रों से अलग करके नहीं देखता, इसके विपरीत वह सभी सामाजिक घटनाओं को व्यक्तिगत क्रियाओं तथा नियतियों के रूप में प्रस्तुत करता है। बाल्जाक के उपन्यास ‘लास्ट एल्यूजन्स’ के विशय में लूकाच लिखते हैं ‘किन्तु यहाँ भी बाल्जाक की अन्य कृतियों की तरह ही, समाज का सामान्य संगठन सहज और सतही रूप में प्रस्तुत नहीं होता। इस लेखक के पात्र ऐसी मामूली हस्तियां नहीं होते जिनकी कल्पना केवल सामाजिक वास्तविकता के किंचित पक्षों को साधारण रूप में पाठक के सामने रखने के लिये की गई हो। सामाजिक जीवन के सभी निर्णायक तत्वों को लेखक ऐसे ‘पैटर्न’ के रूप में प्रस्तुत करता है जो सपाट नहीं बल्कि पेचीदा, उलझा हुआ एवं अन्तर्विरोधों से भरपूर होता है। इन निर्धारक तत्वों को प्रस्तुत करने के लिये लेखक व्यक्तिगत भावोद्रेकों तथा सांयोगिक घटनाओं का एक पूरा चक्रव्यूह-सा खड़ा कर देता है। पात्र तथा परिस्थितियां दोनों ही निर्णायक सामाजिक शक्तियों द्वारा निर्धारित किए हुए होते हैं पर किसी सहज अथवा सीधे ढंग से नहीं।

            इस प्रकार बाल्जाक अपनी कृतियेां में सामजिक जीवन के सारभूत अनविार्य तत्वों को मनोवैज्ञानिक सघनता प्रदान कर देता है तथा कथानकों में भी कृत्रिम अतिबद्धता का दोष नहीं आने देता। उत्कृष्ट कला के समूचे मानव को, उसकी समूची समाजिकता के साथ चित्रित करने वाले आदर्श को बाल्जाक की कृतियाँ लगभग छू लेती हैं।

            वास्तविकतावादी लेखकों की मुख्य विशषता है ‘टाईप’ का सृजन। ‘टाईप’ की परिभाषा देते हुये लूकाच लिखता है, ‘वास्तविकतावादी साहित्य में केन्द्रीय वस्तु और उसे पहचानने का प्रमुख मादण्ड है, ‘टाईप’ जिसका अर्थ है पात्रों और परिस्थितियों, दोनों में ही सामान्य एवं विशिष्ट को समवायी रूप में संगठित कर देने वाला एक विशेष संयोग प्रस्तुत कर देना। ‘टाईप’ की विशेषता औसत अथवा साधारण कोटि का होना नहीं है और न ही निरी वैयक्तिकता से ‘टाईप’ बनता है, चाहे उस वैयक्तिकता में कितनी ही गहराई क्यों न हो। ‘टाईप’ तो इस बात से बनता है कि वे सभी निर्धारक तत्व जिन्हें व्यक्तिगत एवं सामाजिक रूप से सारभूत माना जा सके, उसमें अपने विकास के चरम बिन्दु पर विद्यमान हों- ऐसे बिन्दु पर जहाँ उनकी आंतरिक संभावनाएं एकदम उद्घाटित हो उठें। इस प्रकार ‘टाईप’ आत्यंतिक सीमाओं की चरम अभिव्यक्ति करता है तथा मानवों एवं युगों की उपलब्धियों के उच्चतम तथा निम्नतम स्तर को मूर्त रूप देता है।’

            प्रतिनिधिक घटनाओं और पात्रों को प्रस्तुत करने में बाल्जाक की सफलता के पीछे उसकी अपनी योग्यता, ईमानदारी और साहस के अतिरिक्त कुछ ऐतिहासिक कारण भी थे। बाल्जाक का युग फ्रांस के इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्रांति का युग था जबकि मानव-स्वभाव को असाधाराण चुनौतियाँ मिली तथा ऐसी सामाजिक घटनाएँ घटती चली गई जो अनिवार्य रूप से व्यक्तियों की आन्तरिक सम्भावनाओं को सामने ला दें। बाल्जाक ने इस सारे जीवन प्रवाह में बड़ी प्रतिबद्धता के साथ भाग लिया और घटनाओं के विकासक्रम के प्रत्येक चरण को निकट से अन्दर जाकर देखा। इसी प्रतिबद्धता के कारण उसके साहित्य में वास्तविकतावाद का दूसरा गुण–विवेकपूर्ण परिपूर्ण परिप्रेक्ष्य भी देखने को मिलता है। ‘परिप्रेक्ष्य’ की परिभाषा देते हुए लूकाच ने लिखा है, ‘वस्तुपरक धरातल पर परिप्रेक्ष्य किसी भी ऐतिहासिक प्रक्रिया के प्रमुख प्रवाहों को परिलक्षित करता है। व्यक्तिगत धरातल पर और यह बात केवल कला संबंधी क्रियाओं तक ही सीमित नहीं – वह उन प्रवाहों के अस्तित्व को एवं उनके कार्यशील होने के ढंग को समझने की क्षमता का सूचक होता है।’

            1848 के बाद सारे यूरोप में बुर्जुआ आन्दोलन के स्वरूप में एक विशेष परिवर्तन आ गया। बुर्जुआ उदारवादी अथवा जनतन्त्रवादी उत्साह खो बैठे। अब इस वर्ग के सामने प्रमुख मसला, मानव अधिकारों के नाम पर उच्चवर्गीय समाज से लड़ना नहीं, बल्कि नये उभरते जा रहे सर्वहारा आन्दोलन से निपटना हो गया। 1848 के बाद पूंजीवादी समाज-व्यवस्था का असली रूप भी नग्न होकर सामने आ गया क्योंकि अब उसे ढके रखने वाले जनतन्त्रीय आदर्श छोड़ दिये गये। जिस प्रकार का समाज गठित हो रहा था उसमें ईमानदार और भावप्रवण व्यक्ति के लिये सामाजिक गतिविधियों से तादात्म्य रखना असंभव-सा हो गया और निर्वासन की भावना तीव्र होती गई। ऐसे थके, हारे वातावरण में बहुत से साहित्यकारों ने अपने को बचाकर रखने वाली तटस्थता का सहारा लिया, मायूसी और ग्लानि ने उनका विवेकपूर्ण परिप्रेक्ष्य नष्ट कर दिया। ‘सम्पूर्ण मानव को उसकी सम्पूर्ण सामाजिकता के साथ व्यक्त करने वाला आदर्श निभा पाना उनके लिये कठिन हो गया। ऐतिहासिक प्रक्रिया के प्रवाहों को समझना तथा सक्रिय रूप में काम करने वाले सभी विरोधी तत्वों को लक्षित करने वाले ‘पैटर्न’ को ढूँढ़ निकालना अब इन लेखकों की बुद्धि और कल्पना-शक्ति के बूते से बाहर हो चला। परिणामत: वास्तविकतावाद प्रकृतवाद में परिणत हो गया। प्रकृतवाद किस प्रकार वास्तविकतावाद के विघटन को सूचित करता है इसे लूकाच ने फ्लॉबेयर और जोला की कृतियों का विवेचन करते समय स्पष्ट किया है।

            प्रकृतवाद की मुख्य कमजोरियां इस बात में निहित हैं कि यहाँ सामाजिक जीवन की द्वन्द्वात्मकता एवं गत्यात्मकता की झलक नहीं मिलती और न यह भान हो पाता है कि कौन-सी वस्तु ज्यादा महत्व रखती है, कौन-सी कम। समाज विभिन्न मानवी भावनाओं तथा उद्गारों का (व्यक्तिगत एवं वर्गीकृत रूप में) तनावपूर्ण ड्रामा न होकर व्यक्तियों  से पृथक, उनके ऊपर थोपा हुआ एक ऐसा स्थिर ढाँचा बनकर, रह जाता है जो विभिन्न मानवी प्रयासों को धीमा बनाकर दबाये रहता है। सामाजिक ढाँचे और मानवी प्रवृत्तियों का यह अलगाव, कृत्रिमता एवं यथास्थितिवाद को जन्म देता है। पात्रों में व्यक्त होने वाली ऊर्जा भी अब अपनी सघनता खो देती है। वे तत्कालीन परिस्थितयों से अनिवार्यत: निर्मित होने वाली विविध मानवी संभावनाओं की प्रखर एवं आत्यान्तिक अभिव्यक्ति न होकर किंचित प्राथमिक ओर शाश्वत समझी जाने वाली भौतिक-मानसिक प्रवृतियों के पुन्ज बनकर रह जाते हैं। इन प्रवृतियों को अपरिर्वतनीय मानने से पात्रों के चित्रण में अमूर्तता आ जाती है क्योंकि पात्रों का तथा उनके ऊपर छाये हुये सामाजिक ढाँचे का एक बाहरी ‘वैज्ञानिक तटस्थतिा के साथ व्यौरेवार वर्णन ही किया जाता है। कृतियों में उत्साह, रागात्मकता एवं जीवन्तता कम पड़ जाती है और इस कमी को रूमानी शैली की खोखली गहराइयों से दूर करने का निष्फल प्रयास किया जाता है। जोला की ‘वैज्ञानिक’ पद्धति के दोष बताते हुये लूकाच ने लिखा है, ‘जोला की वैज्ञानिक’ पद्धति हमेशा औसत को ढूढ़ती है और ऐसे धूसर आँकड़ेबद्ध मध्यमान को जिसमें आकर सभी आंतरिक, विरोधी तत्व अपना तीखापन खो देते हैं तथा जिसमें महान और तुच्छ, उत्तम और निकृष्ट, सुन्दर और कुरूप सभी कुछ एक ही प्रकार की अति सामान्य ‘उत्पादित वस्तुएँ’ बनकर रह जाते हैं। यह निश्चय ही उत्कृष्ट साहित्य के विनाश को सूचित करता है।’

            पूंजीवादी समाज की बदरंग, जीवनविधि की यांत्रिक प्रतिलिपि पेश करने के ऐसे प्रयास से, मानव और उसकी परिस्थितियों में एक सीधा विभाजन डाल देने से साहित्यिक कृति में सपाटपन एवं एकांगिकता अनिवार्य रूप से आ जाती है। जैसे कि लूकाच कहते हैं, ‘सामाजिक जीवन के वास्तविक नाटकीय ओजस्वी प्रवाहों का लोप हो जाता है। ऐसे अकेले पात्रों की निजी रूचियाँ सामने बची रहती हैं जो बहुत ही मोटे तौर पर रेखांकित होते हैं और एक निर्जीव वस्तुस्थिति से घिरे गतिहीन खड़े होते हैं। ‘मानवों के बीच सभी वास्तविक सम्बन्ध जो अनजाने में उनके कृत्यों, विचारों तथा भावावेशों पर निरन्तर प्रभाव डालते रहते हैं, छिछले पड़ जाते हैं और लेखक इस छिछलेपन को आवेशपूर्ण अथवा भावुक व्यंग्यात्मकता से प्रदर्शित करता है या फिर लुप्त हो गये मानवी एवं सामाजिक सम्बन्धों के स्थान पर निर्जीव जड़ हुये, कृत्रिम भावुकता से युक्त प्रतीकों को ले खड़ा करता है। सामाजिक वास्तविकता के सारभूत अंशों के चित्रण तथा सामजिक प्रभावों द्वारा मानव व्यक्तित्व में आने वाले परिवर्तनों के वर्णन का स्थान बड़ी एहतियात से नोट की हुई और बड़े हुनर के साथ पेश की गई विवरणात्मक बारीकियां ले लेती हैं।’

            लेखक यदि सामाजिक प्रगति के समर्थक से केवल दर्शक अथवा पर्यवेक्षक बनकर रह गया तो इसमें भी तत्कालीन समाजिक शक्तियों और परिवर्तनों का हाथ था, पूँजीवादी समाज व्यवस्था के अन्तर्गत मानवीय मूल्य लुप्त होते गये और सामाजिक संगठनों की यांत्रिक जकड़ बढ़ती गई। जिस प्रकार की प्रगति साहित्यकार अपने आसपास देख रहा था उसमें वह आस्था न रख सका। उसमें विषाद और कटुता की भावना बढ़ गई इसीलिये वह केवल दर्शक के रूप में समाज के सपाट फैलाव को देखने लगा। उसकी निर्वासन भावना ने उसे ऊपर से तटस्थ आलेचक तो बना दिया पर वास्तव में अपनी कमजोरियों के कारण वह संकुचित बुर्जुआ दृष्टिकोण की परिधि से बाहर न निकल सका और दर्शक की आरोपित भूमिका ही निभाता रहा। इस संकुचित भूमिका से छुटकारा पाने के लिए जिस विस्तृत सहानुभूति की, तथा शोषित जनता के आन्दोलन के साथ एकात्म होने की तत्परता की आवश्यकता थी, उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बहुत से योरोपीय साहित्यकार वैसी सहानुभूति और तत्परता नहीं दिखा सके, इसीलिये वे पूँजीवादी समाज में उपजे प्रकृतवाद की जकड़ में फंसे रहे।

            केवल रूस और कुछ हद तक स्कैण्डेनेवियन देशों में सामाजिक परिस्थितियों की भिन्नता के कारण बुर्जुआ आन्दोलन की पहले जैसी उदारता एवं जनतंत्रीय भावना बची रही और वहां के लेखकों ने बुर्जुआ वास्तविकतावाद की परम्परा को आगे बढ़ाया। विशेषकर टाल्सटाय की कृतियों में हमें वास्तविकतावाद का सही रूप मिलता है। रूस में बुर्जुआ आन्दोलन अभी अपना कार्य पूरा नहीं कर पाया था, सामन्ती समाज-व्यवस्था से उसकी लड़ाई अभी चालू थी और इसके लिये आम जनता के सहयोग की विशेषकर कृषक वर्ग के सहयोग की आवश्यकता थी। 1862 से 1915 तक की अवधि, रूस में क्रांतिकारी परिवर्तनों का युग था। पूँजीवादी व्यवस्था वहाँ अभी इतनी जकड़ने वाली नहीं हो पाई थी। रूसी समाज के पिछड़ेपन के कारण वहाँ वैयक्तिक स्वछन्दता अभी बाकी थी। इसलिए टालस्टाय के उपन्यासों में विशेषकर उसकी आरम्भिक रचनाओं में, महाकाव्यात्मक विस्तार एवं सर्वांगीणता दृष्टिगोचर होती है परन्तु पूँजीवाद की सुदृढ़ नींव रूसी समाज में भी पड़ चुकी थी और दमनकारी राज्य व्यवस्था से जुड़ कर वह सामाजिक वस्तुस्थिति में जकड़ की भावना को तथा ढांचे के सख्त और पुख्ता होने की भावना को धीरे-धीरे बढ़ा रहा था। इसीलिये टालस्टाय की कृतियाँ वास्तविकतावादी होने के बावजूद ऊपर से प्रकृतवादी कला का रूप भी लिए होती हैं। बाल्जाक की तरह सम्भावनाओं के उग्रतम रूप को लक्षित करने वाले असाधारण और नाटकीयतापूर्ण व्यक्तित्व के धनी पात्र यहाँ कम मिलते हैं। घटनाएँ भी निरन्तर विस्फोटक द्वन्द्व को प्रदर्शित करती नहीं चलतीं। टालस्टाय समाज के ढाँचे को बाल्जाक की तरह हमारी आँखों के सामने व्यक्तित्व प्रयासों एवं प्रयोजनों के माध्यम से विकसित होते नहीं दिखाता। वह ढाँचा तो यहाँ आकर सख्त और ‘मुकम्मिल’ हो चला है। इसीलिए ऊपर से औसत लगने वाले पात्र, उनकी ढर्रे में बँधी जीवनचर्या की निरन्तर झलक दिखाने वाले छोटे-छोटे दृश्यों से निर्मित कथानक, परिस्थितियों के ब्यौरेवार विवरण, प्रकृतवादी साहित्य के ये कुछ लक्षण टालस्टाय के साहित्य में भी दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसा होना अनिवार्य भी था, क्योंकि तत्कालीन सामाजिक जीवन के दबावों में आकर इसप्रकार की कला का निर्माण हो रहा था।

            परन्तु प्रकृतवादी साहित्य की सपाटता, यथास्थितिवाद, निर्जीविता, एकरसता, अमूर्तता आदि टाल्स्टाय की कृतियों में नहीं आ पाती। क्योंकि बदरंग और खोखली वस्तुस्थिति के गर्भ में जो असंगतियां दबी पड़ी थीं, उनका प्रखर अनुभव वह पाठक को किसी-न-किसी तरह करा देता है और तत्कालीन समाज के सारभूत तत्वों को पूरी सघनता से चित्रित कर देता है। इसके लिये असाधारण पात्र चुनने की अथवा असाधारण रूप से नाटकीय घटनाओं को कथानक में भर देने की आवश्यकता उसे नहीं पड़ती। वस्तुस्थिति को सही परिप्रेक्ष्य में पेश करने के लिये एकाध सुख्य पात्र वह ऐसा जरूर ले आता है जिसके मन में अपनी स्थिति के प्रति गहरा असन्तोष भरा हो। उन साधारण पात्रों को भी जो सामयिक जीवन के दबावों के अधीन रहकर एक खोखला जीवन व्यतीत करते हैं, वह धीरे-धीरे ऐसे बिन्दु पर ला खड़ा करता है, जहाँ एक ‘चरम सम्भावना’ उनके सामने घूरती नजर आये। ऐसे पात्र इस संभावना के अनुसार कार्य कर पाएं या न कर पाएं पर इससे वस्तुस्थिति का असली स्वरूप पूरी प्रखरता के साथ उनके सामने आ जाता है, और दबे हुये सभी अन्तर्विरोध उनकी दृष्टि के सामने कौंध जाते हैं। टाल्स्टाय की कृतियों में कुछ ऐसे पात्र भी हैं जो साधारण होते हुए भी औसत प्राणियों की सपाटता को पार कर जाते हैं। औसत सामाजिक प्राणी जो कुछ धीमे रूप में करते हैं यही इन पात्रों के जीवन में अधिक सघन रूप में उभर आता है।

            टाल्स्टाय की कृतियों के पात्रों में तथा घटनाओं में यथेष्ट वैयक्तिकता एवं प्रतिनिधित्व का अच्छा संयोग पाया जाता है। पात्रों को सामाजिक परिस्थितियों से और परिस्थितियों को पात्रों से अलग करके नहीं देखा जाता। पर यह सब टाल्स्टाय के लिये सम्भव इसीलिए हो सका कि पूर्ववर्ती वास्तविकतावादी लेखकों की तरह उसने भी अपने युग के सबसे महत्वपूर्ण आन्दोलन से अपने आपकों सम्बद्ध रखा तथा जनसाधारण की पीड़ाओं से भी वह अभिभूत रहा। रूस में उस समय की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी कृषकों का मुक्ति-आन्दोलन। टाल्स्टाय की लेखकीय शक्ति इसी में है कि वह कृषक दृष्टिकोण को अपना सका। इसी कारण वह तत्कालीन समाज के अमानुषी एवं विकराल तत्वों को सही रूप में पहचान सका और ऐतिहासिक प्रक्रिया के बारे में कुछ अनिवार्य भ्रमों के बावजूद सही परिप्रेक्ष्य प्राप्त कर सका। उसके मुख्य पात्र कुछ भी कर रहे हों उनकी जीवन-प्रणाली का कृषकों के शोषण से जो सम्बन्ध है उसे न तो वे ही भूल पाते हैं, न उपन्यासकार। इस प्रकार हम देखते हैं कि लूकाच के अनुसार वास्तविकतावादी साहित्य सामायकि जीवन में प्रतिबद्धता के साथ उलझने से तथा सहानुभूति का विस्तार करने से संभव होता है।

            लूकाच ने जहां एक ओर वास्तविकतावाद की प्रकृतवाद साहित्य से भिन्नता पर जोर दिया है, वहीं दूसरी ओर एक अन्य साहित्य परंपरा की कमजोरियों को भी स्पष्ट किया है जो प्रत्यक्ष रूप से प्रकृतवाद का खण्डन करती हुई आगे बढ़ती है। यह साहित्य पंरपरा है, ‘मनोवैज्ञानिकतावाद’ अथवा ‘आधुनिकतावाद’ की। निर्वासित-मानव की चरम अभिव्यक्ति इस साहित्य-परम्परा में हुई है। यहाँ सामाजिक ढाँचे का विस्तारपूर्ण तथा चयन रहित विवरण नहीं मिलता क्योंकि इस परंपरा के अन्तर्गत आने वाले साहित्यकार व्यक्ति को समाज से अलग-थलग करके देखते हैं और उसकी आन्तरिकता पर ही ध्यान केन्द्रित करते हैं। इस साहित्य-परम्परा की मूल धारणा है व्यक्ति की नितांत नि:संगता। यहां यह मान लिया जाता है कि व्यक्ति दूसरे मानवों से सार्थक सम्बन्ध स्थापित करने में असमर्थ है। वस्तुजगत अथवा समाज के साथ व्यक्ति का केवल सतही पर आकस्मिक (accidental) संपर्क ही हो पाता है। आन्तरिकता पर बल देने का प्रयास हमें शायद प्रकृतवाद साहित्य की यान्त्रिकता से मुक्ति पाने की दिशा में सही कदम लगे। कृत्रिम वर्जनाओं को तोड़कर अन्त:करण में छुपी अनन्त गहराइयों के दिग्दर्शन का दावा करने वाली इस परंपरा के बारे में हम शायद यही सोचते हैं कि इससे साहित्यिक अभिव्यक्ति में मनौवैज्ञानिक सघनता एवं भाव सम्बन्धी विशिष्टता बढ़ी है। जब आसपास का जीवन अर्थहीन, नीरस, गतिरोधमय तथा अति सामान्य हो जाए तो शायद व्यक्ति की अस्मिता का दिग्दर्शन ही उसकी मानवी सत्ता को घोषित करने का एक मात्र उपाय रह जाता है। बीसवीं शताब्दी के साहित्य में अनुभूति की सच्चाई और कसक अक्सर इसी रूप में मुखरित हुई है।

            परन्तु व्यक्ति को सामाजिक जीवन के आघात-प्रत्याघातों से अलग करके देखने के किसी भी प्रयास से वास्तव में मानव-व्यक्तित्व की सम्पूर्णता को ठेस पहुँचती है। लूकाच ने आधुनिक अस्तित्ववादी एवं अन्य साहित्यकारों का विवेचन करते समय यह विशेष रूप से स्पष्ट किया है। व्यक्ति को वस्तुपरक जीवन से काट देने पर उसकी निजी भाव-सम्पदा का ह्रास होता है और उसके बारे में हमारी कल्पना में अमूर्तता का अंश बढ़ जाता है। मानव का व्यक्तित्व तो अन्तत: दूसरे मानवों से व्यत्तिगत एवं सामूहिक रूप में राग-विरागात्मक सम्बन्ध बढ़ाने तथा बाहरी जगत से उलझने के फलस्वरूप ही गठित होता है। जब व्यक्तित्व को अपने आप में पूर्ण मान लिया जाय तो उसके विकास एवं संशोधन की कल्पना की गुंजाइश नहीं रहती। इतिहास ने, व्यक्ति-इतिहास ने तथा समूचे मानवी इतिहास ने मानव व्यक्तित्व में जो बहुत सारे आयाम जोड़ दिये हैं वे इस प्रकार के दृष्टिकोण से एकदम विलीन हो जाते हैं। आन्तरिक कल्पनाओं के जाल में उलझे रहने से गतिहीनता आ जाती है और उन दो प्रकार की संभावनाओं में भेद करना असंभव हो जाता है जिन्हें लूकाच ‘अमूर्त संभावनाएं’ तथा ‘वास्तविक संभावनाएं’ कहते हैं। मनुष्य के मन में छाई हुई संभावनओं की संख्या अनगिनत होती है। आधुनिक आन्तरिकतावाद इन सभी संभावनाओं को जीवन की समृद्धि मान बैठता है और इसी कारण खिन्नता तथा उत्साह की तरंगों के बीच नाचती रहती है। ऐसी अमाप्य और बिखरी हुई संभावनाओं के जरिये व्यक्तित्व की विशिष्टता कभी परिभाषित नहीं हो सकती। आन्तरिक, मानसिक अवस्थाएँ कितनी ही गहराई लिए हुए क्यों न हों, अपने आप में व्यक्तित्व पर निर्णायक प्रभाव नहीं डाल सकतीं। केवल वही संभावनाएं अथवा मूर्त बनती हैं जो उस समय सामने आती हैं जब व्यक्ति को निश्चयपूर्वक एक विशिष्ट पथ का चुनाव करना पड़ता है। जब उसे बाहरी दबावों से किसी-न-किसी रूप में टक्कर लेनी पड़ती है, तभी उसके चरित्र के अप्रत्याशित पक्ष सामने आते हैं और उसका व्यक्तित्व परिभाषित हो पाता है। व्यक्तित्व-विकास का यह अनिवार्य साधन बाहर दबाओं से कटने पर तथा आन्तरिकता में उलझे रहने पर खत्म हो जाता है और इस प्रकार व्यक्तित्व का विघटन हो जाता है।

            इस मनोवैज्ञानिक आन्तरिकतावाद से बाह्य संसार के बारे में भी सूझ-बूझ खत्म हो जाती है। वह एक न समझ में आ सकने वाला तथा डरा देने वाला रहस्य बनकर रह जाता है क्योंकि उसकी गतियों के नियम अथवा सूत्र हाथ नहीं आते, उसके अकस्मिक दबाव मन को चिन्ता तथा संशय से भर देते हैं। संसार केवल एक असंगठित, विश्रृंखलतापूर्ण समुच्चय बनकर रह जाता हैै। प्रकृतवाद की तरह यहाँ भी आन्तरिक एवं बाह्य जीवन के बारे में परिप्रेक्ष्य नष्ट हो जाता है और महत्वपूर्ण और सारहीन का भेद करना कठिन हो जाता है। जीवन की सार्थकता, मूर्तता तथा नियमितता व्यक्ति के अन्त:करण और बाह्य जगत के बीच निरन्तर होते रहने वाले टकरावों से ही पहाचानी जा सकती हैं।

            यह ठीक है कि आज की परिस्थितियों में व्यक्ति की मानवता की सच्ची अभिव्यक्ति आन्तरकि रूप धारण कर लेती है। इस तथ्य को तो पहचानना ही पड़ेगा परन्तु मनोवैज्ञानिक आन्तरिकतावाद की परंपरा ने आज की विशिष्ट परिस्थिति को मानव की सर्वकालिक स्थिति का रूप दे दिया है। इससे तो निराशा और अन्धकार की भावना और भी प्रखर हो  जाती है क्योंकि विशिष्ट परिस्थिति के मूल कारणों को समझने की कोई चेष्टा नहीं की जाती। इस परिस्थिति का पार करने की कोई दिशा भी हो सकती है यह पूर्णतया भुला दिया जाता है। इस विशिष्ट परिस्थिति से उत्पन्न विकृतियों को पहचानना तथा उन्हें दूर करने की सोचना भी बहुत कठिन हो जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि यह साहित्य-परम्परा भी वास्तविकतावाद के विघटन की सूचक है। यह वास्तव में एक तरह से प्रकृतवाद के समानान्तर पड़ती है और प्रकृतवादी साहित्य के दोष यहां भी अन्तत: विवेकपूर्ण परिप्रेक्ष्य नष्ट हो जाता है तथा मानव-व्यक्तित्व की विशिष्टता प्रदान करने वाली ‘वास्तविक’ संभावनाओं को पहचान पाना मुश्किल हो जाता है। आज के साहित्यकार का कर्तव्य है कि आधुनिक युग के विशेष दबावों को सहता हुआ इन परिस्थितियों में उद्भूत कला के रूपों को आत्मसात करता हुआ, वास्तविकतावादी परंपरा को आगे बढ़ाये और जीवन के विभिन्न दबावों में अन्तर्निहित ‘पैटर्न’ को पकड़ने की कोशिश करे। पर इसके लिये आज पहले से भी कहीं ज्यादा विवेक, साहस, प्रतिज्ञाबद्ध एवं सहानुभूति के विस्तार की आवश्यकता पड़ेगी।

ओम प्रकाश ग्रेवाल

ओम प्रकाश ग्रेवाल

डा. ओमप्रकाश ग्रेवाल (1937 – 2006) हरियाणा के भिवानी जिले के बामला गांव में 11 जुलाई 1937 को जन्म हुआ।भिवानी से स्कूल की शिक्षा प्राप्त करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की। अमेरिका के रोचेस्टर विश्वविद्यालय से पीएच डी की उपाधि प्राप्त की। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे। कला एवं भाषा संकाय के डीन तथा कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के डीन एकेडमिक अफेयर रहे। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं महासचिव रहे। जनवादी सांस्कृतिक मंच हरियाणा तथा हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति के संस्थापकों में रहे। साक्षरता अभियान मे सक्रिय रहे। ‘नया पथ’ तथा ‘जतन’ पत्रिका के संपादक रहे। एक शिक्षक के रूप में अपने विद्यार्थियों, शिक्षक सहकर्मियों व शिक्षा के समूचे परिदृश्य पर शैक्षणिक व वैचारिक पकड़ का अनुकरणीय आदर्श स्थापित किया। हिंदी आलोचना में तत्कालीन बहस में सक्रिय थे और साहित्य में प्रगतिशील रूझानों को बढ़ावा देने के लिए अपनी लेखनी चलाई। नव लेखकों से जीवंत संवाद से सैंकड़ों लेखकों को मार्गदर्शन किया। वे जीवन-पर्यंत साम्प्रदायिकता, जाति-व्यवस्था, सामाजिक अन्याय, स्त्री-दासता के सांमती ढांचों के खिलाफ सांस्कृतिक पहल की अगुवाई करते रहे। प्रगतिशील-जनतांत्रिक मूल्यों की पक्षधरता उनके व्यवहार व लेखन व वक्तृत्व का हिस्सा हमेशा रही। गंभीर बीमारी के चलते 24 जनवरी 2006 को उनका देहांत हो गया।

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