घरौंदे नज़रे-आतिश और ज़ख्मी जिस्मो-जां कब तक – आबिद आलमी

घरौंदे नज़रे-आतिश और ज़ख्मी जिस्मो-जां कब तक
बनाओगे इन्हें अख़बार की यों सुर्खियाँ कब तक

यूँ ही तरसेंगी बाशिंदों की खूनी बस्तियाँ कब तक
यूँ ही देखेंगी उनकी राह गूंगी खिड़कियाँ कब तक

नहीं समझेगा ये आखिर लुटेरों की जुबां कब तक
हमारे घर को लुटवाता रहेगा पासबाँ कब तक

रहीने-कत्लो-गारत यूँ मेरा हिन्दोस्तां कब तक
लुटेंगी अपनों के हाथों ही इसकी दिल्लियाँ कब तक

कहो सब चीखकर हम पर बला का कहर टूटा है
कि यूँ आपस में ये सहमी हुई सरगोशियाँ कब तक

गिरा देता है हमको ऊंची मंजिल पर पहुँचते ही
हम उसके वास्ते आखिर बनेंगे सीढियाँ कब तक

यूँ ही पड़ती रहेगी बर्फ़ ये कब तक पसे-मौसम
यूँ ही मरती रहेंगी नन्ही-नन्ही पत्तियाँ कब तक

कहीं से भी धुआं उठता जब घर याद आता है
यूँ ही सुलगेंगी मेरी बेसरो-सामानियाँ कब तक

हमारे दम से है सब शानो-शौकत जिनकी ऐ `आबिद’
उन्हीं के सामने फैलायेंगे हम झोलियाँ कब तक

आबिद आलमी

आबिद आलमी

परिचय आबिद आलमी का पूरा नाम रामनाथ चसवाल था। वो आबिद आलमी नाम से शायरी करते थे। उनका जन्म गांव ददवाल, तहसील गुजरखान, जिला रावलपिंडी पंजाब (पाकिस्तान) में हुआ। उन्होंने अंग्रेजी भाषा साहित्य से एम.ए. किया। वो अंग्रेजी के प्राध्यापक थे और उर्दू में शायरी करते थे। उन्होंने हरियाणा के भिवानी, महेंद्रगढ़, रोहतक, गुडग़ांव आदि राजकीय महाविद्यालयों में अध्यापन किया। वो हरियाणा जनवादी सांस्कृतिक मंच के संस्थापक पदाधिकारी थे। उनकी प्रकाशित पुस्तकें दायरा 1971, नए जाविए 1990 तथा हर्फे आख़िर (अप्रकाशित) आबिद आलमी की शायरी की कुल्लियात (रचनावली) के प्रकाशन में प्रदीप कासनी के अदबी काम को नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने आबिद की तीसरी किताब हर्फ़े आख़िर की बिखरी हुई ग़ज़लों और नज़्मों को इकट्ठा किया। ‘अल्फ़ाज़’ शीर्षक से रचनावली 1997 और दूसरा संस्करण 2017 में प्रकाशित। आबिद आलमी जीवन के आख़िरी सालों में बहुत बीमार रहे। बीमारी के दौरान भी उन्होंने बहुत सारी ग़ज़लें लिखीं।

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