वैदिक साहित्य में भाषाई चिन्तन- डॉ. रणवीर सिंह

  वैदिक साहित्य में सभी स्तरों पर भाषा के संबंध में सूक्ष्म चिन्तन किया गया है । ऋग्वेद के कई पूरे सूक्तों में तथा अन्य वेदों, ब्राह्मणों,आरण्यकों,उपनिषदों व वेदांगों में भाषा का  वाक् के रूप में विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है । वेद की संहिताओं में पाए जाने वाले वर्णन प्रायः रूपक शैली में तथा अधिकांशतः स्तुतिपरक हैं । परंतु कुछ स्थलों पर वाक् एवं शब्द का इतना स्पष्ट, सुन्दर और सभी पक्षों की व्याख्या करने वाला वर्णन प्राप्त होता है कि विद्वानों को भी आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है ।

          ऋग्वेद का यह सूक्त 10–71 पूरा वाक् पर केंद्रित है । इस में कहा गया है कि ज्ञान की यह स्तुति वाणी के मूल श्रोत का कथन करती है । उसके मूल श्रोतों का आवास उन नामों में है जो सबसे पहले हुए ऋषियों ने विभिन्न पदार्थों को दिए । अन्न को जैसे छाज से साफ किया जाता है वैसे ही ऋषियों ने भाषा को स्वच्छ करके उस पर कल्याणकारी चिह्न लगा दिया । वेदों में इस सूक्त के समान वाणी का संबंध यज्ञ से जोड़ा गया है । वह ऋषियों के यहां प्राप्त होती है, उसे ऋषियों में से निकाला जाता है । मानव की सेवा में नियुक्त करने के लिए वाणी को कई भागों में बांटा जाता है । पर हर कोई भाषा में महारत हासिल नहीं कर सकता, भाषा की महारत भाग्यवान को ही प्राप्त होती है । भाषा पर अधिकार व्यक्तिगत योग्यता की अपेक्षा आपस के प्रेम–प्यार पर अधिक निर्भर है जिसे ‘सखीत्व’ कहा गया है । इसकी आवश्यकता वादविवाद प्रतियोगिता में साझीदारों को होती थी । यह प्रतियोगिता यज्ञ का अभिन्न अंग हुआ करती थी । इस प्रकार इस सूक्त में वाणी की उत्पत्ति की ओर संकेत करते हुए क्रियात्मक महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है ।

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          ऋग्वेद के एक दूसरे सूक्त (10–125) में वाक् का एक महान शक्ति के रूप में वर्णन किया गया है । यह ब्रह्म से उत्पन्न हुई है । दूसरी ओर इसका मानवीकरण ब्रह्म की उत्पादिका शक्ति के रूप में भी किया गया है । इन दोनों को एक–रूप भी कहा गया है । वाक् विश्व के सब पदार्थों का निर्माण करने वाली है । यह सब दैवी शक्तियों की प्रेरक है । यह रुद्र के लिए धनुष उपलब्ध कराती है ताकि मंत्र से द्वेष करने वाले को बाण नष्ट कर सके । वस्तुतः इस रूपक का प्रासंगिक अभिप्राय यही हो सकता है कि ब्रह्म की व्यवहार–शक्ति वाणी सब पदार्थों में व्याप्त होती हुई सब कामों को पूरा करवाने वाली है । परोक्ष रूप में यह सारी सृष्टि को जीवन देने वाली है । इसको ‘राष्ट्री’ विशेषण से पुकारा गया है । मनुष्य की सब इन्द्रियां इसके द्वारा नियन्त्रित हैं तथा यह अपने तेज से अपने भक्त को ऋषि, ब्राह्मण, अथवा विद्वान् बना देती है । यह मानवों को धन एवं रक्षा का दान देती है । इस प्रकार वर्तमान सूक्त में वाणी की महिमा का वर्णन करते हुए उसकी विशिष्ट उपयोगिता को रेखांकित किया गया है ।

           ऋग्वेद के एक अन्य मंत्र में शब्द का रूपक बांधते हुए कहा गया है कि एक वृषभरूपी महान देवता पृथ्वीलोक के मनुष्यों में घुसा हुआ है जिसके चार सींग, तीन पैर, दो सिर और सात हाथ हैं तथा यह तीन प्रकार से बंधा हुआ है ।  पतंजलि ने महाभाष्य में चार सींग का अभिप्राय संज्ञा, क्रिया, उपसर्ग, अव्यय रूपी चार प्रकार के शब्दों सेय  तीन पैर का अभिप्राय भूत, भविष्यत, वर्तमान रूपी तीन कालों सेय दो सिर का अभिप्राय नित्य और कार्यरूपी शब्द के दो भेदों सेय सात हाथों का अभिप्राय प्रथमा आदि सात विभक्तियों से लिया है । तथा तीन प्रकार से बंधा होने का अभिप्राय लिया है कि यह शब्द मनुष्यों में नाभि, छाती और कंठ में बंधा पाया जाता है ।

          एक अन्य मंत्र में (ऋग् 1–164–4 5) कुछ स्पष्ट वर्णन मिलता है जिसमें शब्द के सीधे चार  रूप बताए गए हैं । इन चार रूपों की पतंजलि ने यहां भी ऊपर के समान ही व्याख्या की है । वाणी के उन चार रूपों को बारीकी से मनीषी विद्वान् ही जानते हैं, आम लोग तो केवल इनका चैथा भाग ही बोल पाते हैं ।

          वाणी का इसी प्रकार का एक अन्य रूपक शतपथ ब्राह्मण में बांधा गया है । यज्ञ के प्रसंग में गाय के रूप में वर्णन करते हुए इसके चार स्तन बताए हैं –  स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वधाकार । इनमें से पहले दो का संबंध देवताओं से, तीसरे का मनुष्यों से तथा चैथे का पितरों से है । यज्ञ में स्वाहा व वषट् के उच्चारण से देवताओं को तथा स्वधा से पितरों को आहुतियां देने का चलन है । जैसे गाय थनों से दूध देती है वैसे ही वाणी द्वारा स्वाहा आदि का उच्चारण देवताओं, मनुष्यों और पितरों को प्रसन्नता देने वाला है ।

          ऋग्वेद के एक मंत्र में(4–58–1) वाणी की समुद्र से तुलना की गई है, ऐतरेय ब्राह्मण में इसका खुलासा करते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार समुद्र कभी नष्ट नही हो सकता क्योंकि वह अत्यन्त विस्तृत है उसी प्रकार वाणी भी अत्यन्त विस्तृत होनेके कारण कभी नष्ट नहीं हो सकती । तांड्य महाब्राह्मण में उल्लेख है कि वनस्पतियों ने वाणी को चार प्रकार से धारण किया हुआ है – दुंदुभि में, वीणा में, पासे में तथा धनुष की डोरी में । अत: यह जो वनस्पतियों में पाया जाने वाला सबसे सुंदर वाणी का स्वरूप है इसी को बोलना चाहिए । देवताओं की वाणी भी इसी प्रकार की थी । अन्य वेदों – यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी वाक् संबंधी वर्णन पाए जाते हैं । सरस्वती की नदी के अलावा वाणी और विद्या की देवी के रूप में स्तुतियां मिलती हैं । सरस्वती के दोनों किनारों पर अधिकांश वैदिक साहित्य की रचना हुई और इस प्रक्रिया में वह नदी से देवी कब बन गई इसका किसी को आभास ही नहीं हुआ ।

          भाषा का विश्लेषणपरक विवेचन प्रातिशाख्यों, निरुक्त, पाणिनि व इसकी पूरी परंपरा, एवं संस्कृत–कोषों की समस्त सरणि में गहराई एवं विस्तार से पाया जाता है । शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष ये छह वेद के अंग स्वीकार किए गए हैं, इनमें से शिक्षा, व्याकरण, निरुक्त एवं छंद का सीधा संबंध भाषा से है ।

          यास्क का निरुक्त मूलरूप में तो एक प्राचीन निघंटु नामक वैदिक कोष की व्याख्या के लिए लिखा गया परंतु इसमें प्रसंगत: उच्च भाषाई चिंतन भी पाया जाता है । संभवतः यह पहला ग्रंथ है जिसमें निर्वचन–विज्ञान एवं अर्थ–विज्ञान का गहनता से विश्लेषण किया गया है । भाषा के चार तत्वों – नाम, आख्यात(क्रिया), उपसर्ग, निपात – का अलग–अलग विस्तृत विवेचन भी बड़ी बारिकी से किया गया है । निरुक्त का एक अनूठा सिद्धांत है कि सभी नाम अर्थात् संज्ञा–पद मूलरूप में क्रियापदों से विकसित हुए हैं । वेदव्याख्या की दृष्टि से इस सिद्धांत की अद्भुत उपयोगिता है क्योंकि इसमें गंभीर अर्थविज्ञान समाया हुआ है । वेदमंत्रों के रचयिता ऋषियों के अभिप्रेत अर्थों को स्पष्ट करने के लिए यह नियम चाबी का काम करता है । चूंकि व्याकरण–शास्त्र में हरेक धातु (मूलक्रिया) का एक विशिष्ट अर्थ दिया गया है तथा उससे व्युत्पन्न संज्ञा–पद का अर्थ पहले से दिए हुए उस अर्थ/अर्थों के आधार पर किया जाना ही उचित है ।  निरुक्त का समय आम तौर पर ईसा से सात सौ वर्ष पूर्व माना जाता है । उस प्राचीन समय में इस प्रकार का सूक्ष्म विवेचन एक उल्लेखनीय विशेषता है । इस ग्रंथ में श्रुति–परंपरा से भाषा की लिखित–परंपरा में प्रवेश के स्पष्ट संकेत भी प्राप्त होते हैं । इसमें कहा गया है कि जब ऋषि–लोग अपने पूर्वजों के समान तपस्वी नहीं रहे तो गुरु–मुख से सुनकर मंत्रों को याद करने में कठिनाई में फंसने लगे तो उन्होंने वेद, वेदांग और निरुक्त–निंघंटु की परंपरा को यथावत चालू रखने के लिए ‘समाम्नान’ क्रिया का आगाज़ किया । इसका सीधा अभिप्राय लिखित प्रणाली का आरम्भ और विस्तार प्रतीत होता है ।

          पाणिनि के व्याकरण–शास्त्र को मानव मस्तिष्क का सर्वाेत्तम आविष्कार माना गया है । अष्टाध्यायी बनाने से पहले पाणिनि ने एक धातुपाठ की रचना की –  जिसमें लगभग दो हजार धातुओं का अर्थ सहित संग्रह किया गया हैय एक गणपाठ की रचना की – जिसमें अनेक शब्दों का किन्ही सामान्य विशेषताओं के आधार पर समूहीकरण किया गया हैय तथा एक उणादिपाठ की रचना की – जिसमें उण् आदि अनेक प्रत्ययों का विधान करने वाले सूत्रों का संग्रह किया गया है । अष्टाध्यायी के चार हजार सूत्रों में इन सभी उपकरणों का व्यावहारिक उपयोग किया गया है । इसके अलावा पाणिनि ने अलग–अलग अक्षरों एवं मात्राओं के शुद्ध उच्चारण के लिए एक शिक्षा–ग्रंथ तथा विभिन्न शब्दों के लिंग–निर्धारण के लिए एक लिंगानुशासन का प्रणयन भी किया है । भाषा संबंधी सभी बारीकियों का अनुपम विश्लेषण पाणिनि को सर्वश्रेष्ठ भाषाशास्त्री के पद पर बैठा देता है ।

          पाणिनि ने अष्टाध्यायी में संस्कृत भाषा के सभी तत्त्वों का बड़ी बारीकी से संपूर्णता के स्तर तक विश्लेषण किया है । अष्टाध्यायी के 4000 सूत्रों में वैदिक और संस्कृत भाषा के विविध अंगों, यथा– संज्ञा, सर्वनाम, कारक, संधि, समास, लकारार्थ, तिंगंत, कृदंत, तद्धित, वैदिक पद एवं स्वर–प्रक्रिया – का संपूर्ण विवरण एवं विवेचन विशदता से किया गया है । कात्यायन के वार्त्तिकों तथा पतंजलि के महाभाष्य ने इस  विवेचन को सामयिक दृष्टि से तरोताजा स्वरूप देते हुए प्रासंगिकता को बनाये रखा । काशिका, सिद्धांतकौमुदी तथा आधुनिक हिंदी व्याख्याओं ने आज तक उपयोगी बनाया हुआ है । पतंजलि ने महाभाष्य के आरंभ में शब्द, अर्थ और इनके संबंध के विषय में विशद और सार्थक विवेचन किया है । भर्तृहरि ने वाक्यपदीय में शब्द को ब्रह्म का दर्जा दिया है । ऊपर बताया जा चुका है कि वेद में भी वाणी को यही स्थान हासिल है । पतंजलि ने ध्वनि और स्फोट के रूप में शब्द के दो भेद माने हैं । स्फोट की दृष्टि से शब्द नित्य और ध्वनि की दृष्टि से अनित्य माना गया है । स्फोट और ध्वनि में जो संबंध बताया गया है वह व्यंग्य–व्यंजक–भाव जैसा है । शब्द अपने अर्थ के साथ नित्य रहता है । शब्द और अर्थ में अभेद स्वीकार करते हुए भी व्याकरण को शब्दानुशासन कहा गया है अर्थानुशासन नहीं क्योंकि वाणी से शब्द बोला जाता है अर्थ नहीं । अर्थ तो शब्द का अनुगमन करता है । पतंजलि ने सिद्धांत के तौर पर जाति, गुण और क्रिया इन तीन प्रकार के शब्दों को माना है, यदृच्छा शब्दों को नहीं ।

          भाषा के दार्शनिक चिंतन की परंपरा में पतंजलि के बाद भर्तृहरि का नाम आता है जिन्होनें वाक्यपदीयम् के तीन काण्डों में भाषा के तत्त्वों पर गंभीर विवेचन किया है । आगे नागेश भट्ट के नव्य व्याकरण के ‘मंजूषा’ ग्रंथों में व्याकरण–दर्शन कठिन भाषा के साथ गंभीर स्वरूप में प्राप्त होता है जिसे आधुनिक अनुवादकों ने सरल रूप दे दिया है ।

          अमरसिंह एक बौद्ध मत का अनुयायी था । उसने चैथी ईस्वी या इससे भी पहले ‘नामलिंगानुशासन’ नामक एक संस्कृत कोष बनाया जिसे अमरकोष के नाम से अधिक जाना जाता है । इसके तीन काण्डों के कुल 25 वर्गों में से 22 में पर्यायवाची तथा एक–एक वर्ग में अनेकार्थवाची, अव्यय और लिंगादि का  समावेश किया गया है । पहले कांड के छठे शब्दादि वर्ग में भाषा का अच्छा विश्लेषण मिलता है । भाषा के पर्यायवाची गिनाते हुए ब्राह्मी, भारती, भाषा, गीर्वाग्, वाणी, सरस्वती, व्याहार, उक्ति, लपित, वचन और वचस् का उल्लेख प्राप्त होता है । व्याकरण से असम्मत को अपभ्रंश और अपशब्द कहा गया है । क्रिया और नाम पदों के संयोग को वाक्य कहा गया है जिनमें आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि नामक तत्व उपस्थित हों । इसके बाद अमरसिंह ने वेद, वेदांग, इतिहास, अर्थशास्त्र, पुराण, प्रहेलिका, स्मृति, समस्या, किंवदन्ति, अभिधान, आह्वान, उपन्यास, उदाहार, शपथ, प्रश्न, उत्तर, मिथ्या अभियोग, अभिशाप, यश, स्तुति, आम्रेडित, घोषणा, निन्दा, पारुष्य, भर्त्सना, उपालम्भ, आक्रोश, आलाप, प्रलाप, विलाप, विप्रलाप, संलाप, सुप्रलाप, अपलाप, संदेश, वाणी के तीन भेद – रुशती, कल्या, संगत आदि अनेक शब्दों के पर्यायों का अत्यन्त सुन्दर चित्रण किया है । ये सभी शब्द भाषा के विकास को सूचित कर रहे हैं । यह आश्चर्य का विषय है कि संस्कृत में 100 के लगभग कोषग्रन्थ और 200 के लगभग टीकाएं लिखी गई हैं । अकेले अमरकोष पर 85 के लगभग टीकाएं मिलती हैं ।

          सार के तौर पर कहा जा सकता है कि वैदिक साहित्य में जो भाषाई चिंतन पाया जाता है बाद की परंपरा में उसी का विस्तार प्राप्त होता है । वैदिक और संस्कृत साहित्य में भाषा के विषय में जो विवेचन और विश्लेषण मिलता है वह अपने आप में अद्भुत और आश्चर्य पैदा करने वाला है । वह पूर्णता की सीमा तक विस्तृत और सभी अंगो को शामिल किए हुए है । वैदिक भाषा में किसी शब्द में उच्च–स्वर(उदात्त) की आगे या पीछे की उपस्थिति के आधार पर जो उच्चारण किया जाता था तथा उसके आधार पर जो अर्थ की प्रतीति होती थी वह अपने आप में एक अनुपम विशेषता थी । जैसे ‘आशा’ शब्द में उच्च–स्वर आरंभ में बोलेंगें तो अर्थ होगा– दिशा और यदि अंत में बोलेंगें तो अर्थ होगा– संभावना । इसी प्रकार लिंग के भेद से भी अर्थ में बदलाव आता है, यथा ‘मानः’ पुंलिंग का अर्थ है– प्रमाण और ‘मानम्’ नपुंसकलिंग का– नापने या तौलने का साधन । इसी प्रकार किसी मूल क्रिया(धातु) से जुड़ने वाले प्रत्यय के बदलने से अर्थ का बदलना तो सभी को मालूम है । भाषा की संरचना, अर्थ की स्पष्ट अभिव्यक्ति, उच्चारण की निश्चितता तथा  लिखने और बोलने में देश–काल की सीमा से परे की एकरूपता संबंधी ऐसी खासियत हैं जो संस्कृत में पाई जाती हैं ।

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