झूठा ही सही वायदा क्यूँ न यकीं कर लेते – सुरेन्द्र पाल सिंह

2019 में 17वीं लोकसभा के चुनावों के लिए मतदान का सिलसिला जारी है. हमारे राज्य में भी 12 मई को मतदान होना है. आमतौर पर राजनैतिक पार्टियों द्वारा चुनावी घोषणापत्रों का जारी किया जाना एक रस्मअदायगी माना जाता रहा है लेकिन कई बार किसी पार्टी के घोषणापत्र के कुछ बिन्दु जनता को इस हद तक अपील कर जाते हैं कि पूरा का पूरा चुनाव उन एक दो बिन्दुओं के इर्दगिर्द घूम जाता है. बेशक, सत्ता विरोधी वातावरण इसमें मुख्य कारक होता है. उदाहरण के लिए कभी बुढ़ापा पेन्शन, कभी शराब बंदी और कभी किसानों की कर्जा माफ़ी के वादों ने हमारे राज्य में सत्ता परिवर्तन के लिए बड़ी लामबन्दी की है.

घोषणापत्र का एक महत्वपूर्ण तर्क ये भी है कि विपक्षी पार्टी ही सत्ता के दावे को भुनाने के लिए कोई धमाकेदार घोषणा का ऐलान करती है जबकि सत्तासीन पार्टी वादों के मुताबिक उपलब्धियां ना गिनवा पाने की स्थिति में बचाव की संकरी गलियों से निकलने को प्रयासरत होती है . ऐसे में सत्तासीन पार्टी का पूरा प्रयास रहता है कि किसी प्रकार से सारा चुनाव कुछ भावनात्मक मुद्दों पर या शीर्ष नेता के व्यक्तित्व पर ही टिक पाए. आज जब भाजपा के वायदों का ज़िक्र आता है तो पूरे विमर्श को इस धुरी पर समेटने का प्रयास किया जाता है कि घोषणापत्र की क्या आवश्यकता है जब मोदी है ना.

    खैर किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था की परिपक्वता का आधार ये होता है कि सत्तासीन पार्टी अपने किए हुए वायदों के प्रति जवाबदेह हो. इसके लिए जनता को ही इतना जागरूक होना पड़ेगा कि वह जवाब और हिसाब माँगना शुरू करदे.

        इस बार कांग्रेस पार्टी ने भाजपा की तुलना में काफी पहले ही अपने घोषणापत्र का ऐलान कर दिया था. लग रहा था कि पुलवामा, बालाकोट, आतंकवाद, पाकिस्तान के बुखार के दौर में कांग्रेस का घोषणापत्र नक्कारखाने की तूती के मानिद कोई करंट पैदा नहीं कर पाएगा. लेकिन ये सच्चाई है कि लगातार दो तीन दिनों तक इस घोषणापत्र के पक्ष या विपक्ष में गर्मागर्म बहस देखने सुनने को मिली और नतीजा ये हुआ कि राष्ट्रवाद के नाम पर ऊँचे तापमान को लगातार जारी रखने का प्रयास करीब करीब धराशायी हो गया. ये अलग बात है कि भाजपा किसी ना किसी बहाने जनजीवन से जुड़े ज़मीनी मुद्दों पर विमर्श से कतरा रही है और इसी दिशा में भोपाल से साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाया गया है जो कभी हेमन्त करकरे और कभी बाबरी मस्जिद का मुद्दा उछाल कर पुरे चुनाव को भावनात्मक हवा में रखने का प्रयास कर रही है. ये लेख लिखते हुए पांच चरणों के मतदान हो चुके हैं और उम्मीद है कि आखिरी सातवें चरण तक ऐसे ऐसे कुछ और प्रयोग भी देखने को मिलेंगे. जो भी हो कांग्रेस के घोषणापत्र के बाद भाजपा की भी मज़बूरी बन गई कि कुछ ऐलान तो किए ही जाएं. और नतीजे के तौर पर पहले चरण के मतदान से महज तीन दिन पहले घोषणापत्र के दस्तावेज के बदले एक संकल्प पत्र हमारे सामने है. इस दौरान अन्य क्षेत्रीय पार्टियों ने भी अपने अपने घोषणापत्र या नीति पत्र जारी किए हैं लेकिन पुरे देश में व्यापक प्रभाव डालने वाले कांग्रेस के घोषणापत्र बनाम भाजपा के संकल्प पत्र तक ही इस विमर्श को सीमित किया जा रहा है.

क्या कहता है भाजपा का संकल्प पत्र

1.      कश्मीर : चुनावी माहौल में कश्मीर पर भाजपा फिर सख्त हुई है. कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 हटाने को कह रही है. गैर-कश्मीरियों को कश्मीर में प्रॉपर्टी खरीदने से रोकने वाली धारा 35A भी अतीत के पन्नों में दफन होगी. BJP का मानना है कि ये धाराएं “जम्मू-कश्मीर के अस्थाई नागरिकों और महिलाओं के साथ भेदभाव हैं”. घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी भी पार्टी के एजेंडे में है.

2.      उत्तर-पूर्वी राज्य: भाजपा ने अपने मेनिफेस्टो में नागरिक संशोधन बिल को लागू करने को कह रही है. पार्टी ने उस ऐतराज को भी संज्ञान में लिया है जो उत्तर-पूर्वी राज्यों ने इस बिल पर किया है. भाजपा ने भरोसा दिया है कि ऐतराज दूर कर दिये जाएंगे.

3.    आतंकवाद: संकल्प पत्र में आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस और आतंकवादियों से सख्ती से निपटने के लिए सेना को फ्री हैंड जारी रखने का वादा किया गया है.

  1. राम मंदिर: भाजपा ने कहा है कि राम मंदिर बनाने के लिए संविधान के तहत संभावनाएं तलाशी जाएंगी.

08_04_2019-sanklap_pic_19113772_14114653.jpg

  1. आधी आबादी: संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का वादा किया गया है. भाजपा का वादा है कि वो तीन तलाक और निकाह हलाला जैसी परम्पराएं खत्म करने के लिए विधेयक लाएगी. भाजपा इस विधेयक को यूनिफॉर्म सिविल कोड से जोड़ रही है. पार्टी का कहना है कि जब तक यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू नहीं होगा तब तक लैंगिक समानता नहीं आएगी.
  2. किसान और गरीब: कृषि क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाने के लिए 25 लाख करोड़ रूपये का निवेश, हर किसान को पीएम सम्मान निधि योजना के अनुसार सालाना 6 हजार देगी. साथ ही 60 साल की उम्र पार कर चुके छोटे किसानों को पेंशन भी देगी. एक लाख रूपये तक की सीमा वाले किसान क्रेडिट कार्ड को ब्याज मुक्त किया जाएगा.
  3. स्वास्थ्य: अपने संकल्प पत्र में पार्टी ने कहा है कि साल 2022 तक 5 लाख और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर खोले जाएंगे.
  4. रोजगार: सरकार ने दोहराया है कि आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में 10% आरक्षण दिया गया है. इसके अलावा रोजगार पर संकल्प पत्र का कहना है कि रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेंगे तो रोजगार बढ़ेगा, घुसपैठियों के कारण स्थानीय लोगों का रोजगार छिना इसलिए घुसपैठ रोकेंगे, पीपीपी से रोजगार बढ़ाएंगे और अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए 22 सेक्टरों की पहचान करेंगे जिससे रोजगार भी बढ़ेगा.
  5. अन्य: 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करेंगे, हर परिवार को पक्का मकान, अधिक से अधिक गरीब ग्रामीण परिवारों के लिए एलपीजी गैस कनेक्शन, सभी घरों में बिजली, प्रत्येक नागरिक के लिए बैंक खाता, गांवों को हाई स्पीड ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क से जोड़ना, 2022 तक सभी रेल पटरियों का बिजलीकरण के हर संभव प्रयास,  सभी प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर वाई-फाई, क्षय रोगों के मामलों में कमी लाना, निर्यात दोगुना करने की दिशा में काम, 2022 तक स्वच्छ गंगा का लक्ष्य, इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में 100 लाख करोड़ रूपये का पूंजीगत निवेश आदि आदि .

क्या कहता है

कांग्रेस द्वारा जारी घोषणापत्र 

1.  कश्मीर: कश्मीर मामले पर कांग्रेस ने भाजपा की सोच के विरुद्ध अपने घोषणापत्र       में  कहा है कि कश्मीर में धारा 370 से किसी सूरत में छेड़छाड़ नहीं होगी.  AFSPA पर कांग्रेस ने आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट की समीक्षा करने और साफ-सुथरे चुनावों का वादा किया है. देशभर में कश्मीरी छात्रों के खिलाफ हिंसा पर भी कांग्रेस ने चिन्ता जताई है.

2. देशद्रोह कानून: इसके अलावा कांग्रेस ने देशद्रोह कानून की धारा 124A को ख़त्म करने का वायदा किया है. मानहानि के मुकद्दमों को भी क्रिमिनल की बजाय सिविल बनाने का वायदा किया गया है.

3. उत्तर-पूर्वी राज्य:  नागरिक संशोधन बिल को लेकर कांग्रेस इसे  वापस लेने पर अड़ी हुई है. दूसरी ओर नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स ऑफ इंडिया पर कांग्रेस नरम है. पार्टी का वादा है कि इस सूची में हर किसी को शामिल किया जाएगा.

4. आतंकवाद: घरेलू सुरक्षा के मसले पर कांग्रेस ने खुफिया रिपोर्ट एनालिसिस और फौरन कार्रवाई करने पर जोर दिया है. कांग्रेस ने वादा किया है कि सत्ता में आने के तीन महीने के अंदर वो National Counter-Terrorism Centre का गठन करेगी.

WhatsApp-Image-2019-04-02-at-14.31.46-e1554195813855-696x392.jpeg

5. किसान और गरीब: कांग्रेस के लिए किसानों की दुर्गति और गरीबी बड़े चुनावी मुद्दे हैं. कांग्रेस के मेनिफेस्टो में NYAY, यानी न्यूनतम आय योजना का वादा है. इस योजना में 5 करोड़ सबसे गरीब परिवारों को हर महीने 6 हजार देने का वादा है. देश के 20% गरीब इस योजना में कवर होंगे. रेलवे की तरह किसानों के लिए एक अलग बजट पेश किया जाएगा.

6. आधी आबादी: दोनों पार्टियों ने संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का वादा किया है. महिला आरक्षण को लेकर कांग्रेस कुछ आगे बढ़ गई है और केन्द्रीय नौकरियों में भी आरक्षण देने का वादा किया है.

7. स्वास्थ्य : कांग्रेस ने देश के हर नागरिक को स्वास्थ्य सेवा देने के लिए Right to Healthcare Act लागू करने का वादा किया है.

8. रोजगार: रोजगार के मुद्दे पर कांग्रेस आक्रामक है कांग्रेस का आरोप है कि बेरोजगारी के मोर्चे पर BJP सरकार बुरी तरह फेल हुई है. पार्टी ने वादा किया है कि अगर वो सत्ता में आई तो मार्च 2020 तक 22 लाख खाली पड़ी सरकारी नौकरियों पर भर्ती करेगी. साथ ही ग्राम पंचायतों में 10 लाख युवाओं को नौकरी देगी. कांग्रेस ने मनरेगा का भी जिक्र किया है.मनरेगा में रोजगार गारंटी की अवधि 100 दिनों से बढ़ाकर 150 दिन करने का वादा किया गया है.

9. शिक्षा: जीडीपी का 6% शिक्षा क्षेत्र के लिए.

10. जीएसटी: जीएसटी का पुनरावलोकन.

तुलनात्मक आकलन

उपरोक्त हिस्से में दोनों मुख्य पार्टियों के मुख्य वायदों का ज़िक्र किया गया है, लेकिन इसी के साथ साथ एक तुलनात्मक आकलन की भी आवश्यकता महसूस होती है.

  • अब तक की चुनावी बिसात से यह तय हो गया है कि सत्तारूढ़ दल बार बार यह साबित करेगा कि देश की मुख्य समस्या देश की सुरक्षा है, कश्मीर है, राममंदिर है और उसके बाद किसानों की आमदनी बढ़ाना और सबको सामाजिक सुरक्षा देना है।
  • वैसे संकल्पपत्र समारोह में प्रधानमंत्री के भाषण पर गौर करें तो भाजपा की प्राथमिकता राष्ट्रवाद, अंत्योदय और सुशासन है। उधर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के मुताबिक इस समय देश के मुख्य संकट आर्थिक तंगी, बेरोजगारी, किसानों की बदहाली और छोटे व्यवसायियों की परेशानियां हैं।
  • कांग्रेस की दूसरी प्राथमिकताओं में शिक्षा और स्वास्थ्य है। यानी दोनों दलों के मुद्दों की लिस्ट में भले ही किसान और गांव शामिल हों लेकिन प्राथमिकताओं के लिहाज़ से साफ साफ फर्क है। भाजपा का जोर राष्ट्रवाद, कश्मीर और राममंदिर जैसे भावनात्मक मुददो पर ज्यादा है और कांग्रेस का जोर किसान और बेरोजगारी पर ज्यादा है।
  • इस मान्यता में सच्चाई है कि आमतौर पर सत्तासीन पार्टी अपने घोषणापत्र में बहुत लंबे-चौड़े वादे करती भी नहीं है क्योंकि पांच साल तक सरकार चलाने वालों से यह सवाल पूछा ही जाता है कि इस कार्यक्रम या घोषणा पर अब तक अमल क्यों नहीं किया गया. भाजपा के संकल्प पत्र पर भी यह बात लागू होती है. पार्टी इस बार किसान, युवा और रोजगार जैसे मुद्दों पर बहुत स्पष्ट वादे करती नजर नहीं आती. बल्कि, पुलवामा और उसके बाद पाकिस्तान पर हुई एयर स्ट्राइक के बाद बने माहौल के बहाने वह इन मुद्दों से बच निकलने की कोशिश में ज्यादा दिखती है. कश्मीर से धारा 370 और अनुच्छेद 35ए हटाने जैसे प्रावधानों को ही घोषणा पत्रों के मुख्य बिंदुओं के तौर पर पेश किया जा रहा है.
  • ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा का संकल्प पत्र जल्दबाजी में तैयार किया गया है और इसमें औपचारिकता ही ज्यादा निभाई गई है.
  • कांग्रेस और भाजपा के घोषणापत्रों की तुलना की जाए और उन्हें विशुद्ध आर्थिक नजरिये से देखा जाए तो उनमें एक समानता भी नजर आती है. घोषणाओं को आमने-सामने रखकर देखने के बजाए अगर उनके पीछे के विचार पर गौर किया जाए तो दोनों पार्टियों का आर्थिक दर्शन एक जैसा लगता है. दोनों ने वोटरों को लुभाने के लिए लोक-कल्याणकारी कार्यक्रमों की घोषणा के वादे बिना यह सोचे-विचारे किए हैं कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा. राजनीति में लोक-कल्याणकारी दौर की पुरजोर वापसी का मूल विचार दोनों के घोषणापत्र में मिलता है, जिसे आलोचना के तौर पर एक तरह का तात्कालिक लोकलुभावनवाद भी कहा जा सकता है.
  • मार्च में पेश किए गए अंतरिम बजट के दौरान ही भाजपा सरकार ने परंपरा तोड़ते हुए दो एकड़ से कम जोत वाले किसानों को साल में छह हजार रूपये देने की योजना शुरू की थी. इसके जवाब में कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में गरीब परिवारों को सालाना 72,000 रुपये देने की बड़ी घोषणा की. हालांकि, पहले चर्चा थी कि भाजपा ऐसी ही किसी योजना की घोषणा अपने संकल्प पत्र में कर सकती है. लेकिन इस मामले में कांग्रेस ने बाजी मार ली और लोकलुभावन चुनावी राजनीति में न्याय (न्यूनतम आय योजना ) के रूप में ऐसा वादा किया, जिसका जवाब भाजपा अभी तक नहीं ढूंढ़ पाई है.
  • घोषणा पत्रों का तुलनात्मक अध्ययन करने पर ‘न्याय’ ऐसी योजना नजर आती है जो लोक कल्याणकारी वादों के मोर्चे पर भाजपा को पछाड़ देती है. कांग्रेस की ‘न्याय’ (न्यूनतम आय योजना) एक बड़े खर्च (6 लाख करोड़ प्रति वर्ष) वाली घोषणा है. इसका क्रियान्यवयन कैसे होगा, यह एक अलग प्रश्न है. लेकिन चुनावी संभावनाओं के लिहाज से यह खासी प्रभावशाली दिखती है.
  • अनेक बुद्धिजीवियों का मानना है कि पुलवामा के बाद बने माहौल और न्यूनतम आय योजना की घोषणा में कांग्रेस के बाजी मार लेने के बाद भाजपा ने घोषणा पत्र की अपनी रणनीति बदली. उसने अपने घोषणा पत्र में केंद्रीय विचार के रूप में कश्मीर, राष्ट्रीय सुरक्षा और राम मंदिर जैसे मुद्दों को तरजीह दी. गरीबों, किसानों और युवाओं से वादे तो भरपूर किए गए लेकिन उनके किसी ठोस रूप पर चर्चा नहीं की गई.
  • लोक-लुभावनवाद दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के घोषणा पत्र में नजर आता है. लेकिन शायद कांग्रेस की ‘न्याय’ जैसी योजना की घोषणा के बाद भाजपा ने लोक-कल्याणकारी वादों की अपनी धार कम कर ली. गरीबों को साल में 72,000 हजार रुपये और मनरेगा के तहत 100 के बजाय 150 दिन का काम देने जैसे वादे कर कांग्रेस ऐसी नजर आ रही है, जैसे वह आर्थिक नीतियों के मामले में इंदिरा गांधी के जमाने वाली कांग्रेस की समाजवादी नीतियों पर चलने जा रही है.
  • रोजगार के मोर्चे पर भी कांग्रेस ने बड़ा वादा किया है और उसका मुख्य जोर सरकारी भर्तियों पर है. कांग्रेस ने कहा है कि वह राज्य सरकारों के साथ मिलकर खाली पदों पर जल्द से जल्द से जल्द नियुक्तियां करेगी. एक अनुमान के मुताबिक, केंद्र और राज्य सरकारों के खाली पद देखें जाएं तो ये नौकरियां 22 लाख बैठती हैं. 22 लाख सरकारी नौकरियां सरकारी खर्च को कितना बढ़ा देंगी, यह अर्थशास्त्रियों के लिए चिंता की बात है. लेकिन, इसमे दिलचस्प बात यह है कि अभी से कुछ समय पहले तक ही केंद्रीय सरकारें नौकरियां कम करके सरकारी खर्च कम करने के सिद्धांत पर चल रहीं थीं और अब जोर सरकारी नौकरी देने के वादे पर है.
  • कांग्रेस ने स्वास्थ्य गारंटी जैसा वादा भी किया है. यह कैसे लागू होगा यह स्पष्ट नहीं है. लेकिन घोषणा पत्र में जिस अंदाज में स्वास्थ्य गारंटी की बात की गई, उससे लगता है कि यह निजी कंपनियों के इंश्योरेंस मॉडल पर आधारित नहीं होगा. तो क्या कांग्रेस सरकार बनने पर लोक-कल्याणकारी कार्यक्रमों को सरकार द्वारा चलाने की अवधारणा पर वापस आ रही है? शिक्षा और स्वास्थ्य के मद में बजट बढ़ाने के कांग्रेस के वादे इसी दिशा में नजर आते हैं. आर्थिक जानकार मानते हैं कि कांग्रेस के पूरे घोषणा पत्र के वादों को अगर आर्थिक नीतियों के नजरिए से देखें तो पार्टी कम से कम आर्थिक सुधारों की अब तक की मान्यता से अलग हटती दिखती है. लोक कल्याण के कामों में सरकारी दखल और बजट बढ़ने के आसार कांग्रेस के घोषणा पत्र में साफ दिखते हैं.
  • राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों को छोड़ दिया जाए तो युवाओं, गरीबों और किसानों के मुद्दों पर भाजपा भी लोकलुभावन ट्रैक पर ही दिखती है. हालांकि, रोजगार जैसे मोर्चे पर भारी आलोचना झेल चुकी मोदी सरकार और भाजपा इस बार इन मसलों पर कोई बहुत ठोस वादा नहीं कर रही है. सरकारी नौकरियों पर वह बिल्कुल चुप्पी साधे हुए है. लेकिन, ‘न्याय’ की काट के तौर पर उसका जो सबसे प्रभावशाली वादा कहा जा सकता है, वह यह है कि पीएम किसान सम्मान योजना का दायरा बढ़ाया जाएगा और हर किसान को छह हजार साल की सीधी आर्थिक मदद दी जाएगी. किसान पेंशन की भी बात है, लेकिन वह क्या होगी, कैसे होगी इस पर संकल्प पत्र मौन है. यह वैसे ही हो सकती है जैसे कामगारों के लिए अंतरिम बजट में पेंशन योजना की घोषणा की गई थी. इसमें पात्र को एक निश्चित रकम का योगदान करना होगा और 60 साल बाद उसे पेंशन मिलेगी. लेकिन, यह वादा सांकेतिक ही ज्यादा लगता है.
  • रोजगार के मामले में भाजपा इस बार हर साल दो करोड़ रोजगार देने के वादे के बजाय ‘उद्यमिता’ पर ज्यादा बात करती नजर आती है. सस्ते कर्ज का भी वादा किया गया है. विकास कर रहे 22 सेक्टरों में युवाओं के लिए रोजगार की बात कही गई है. यानी अपने स्वरूप में भाजपा का घोषणा पत्र भी कम लोक-लुभावन नहीं है. लेकिन भाजपा इसकी व्याख्या में फर्क करती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत अधिकतम भाजपा नेता कांग्रेस की ‘न्याय’ योजना को अव्यावहारिक और मुफ्तखोरी को बढ़ावा देने वाली बताते हैं.
  • यह तो चुनावी भाषणों की बात है लेकिन अगर तुलना की जाए तो दोनों पार्टियों के घोषणापत्रों में बहुत बारीक फर्क भी नजर आता है. कांग्रेस का घोषणा पत्र जहां, भारी-भरकम लोक-कल्याणी कार्यक्रमों के साथ ‘गरीबी हटाओ’ के पुराने नारे पर वापस लौटता दिखता है तो भाजपा का घोषणा पत्र लोक-लुभावनवाद के साथ उसे एक शहरी मध्यम वर्ग की चिंताओं के लिफाफे में पेश करता है. घोषणा पत्र से ज्यादा यह बात भाजपा नेताओं के भाषण में झलकती है, जिनमें वे मध्यम वर्ग को इस बात का डर दिखाते हैं कि कांग्रेस ‘न्याय’ जैसी योजना के लिए मध्यम वर्ग पर करों का बोझ डालेगी.
  • कांग्रेस और भाजपा दोनों के घोषणा पत्र लोकलुभावन घोषणाओं से भरे पड़े हैं और दोनों आर्थिक सुधार या राजकोषीय हालात पर कोई गंभीर बात करते नहीं दिखते. आर्थिक जानकार कहते हैं कि चुनावी आरोप-प्रत्यारोप की बात अपनी जगह है, लेकिन लोक-लुभावनवाद आर्थिक नीतियों में पुरजोर तरीके से अपनी वापसी कर चुका है. सामाजिक सुरक्षा और जीवन स्तर में सुधार के लिहाज से कांग्रेस और भाजपा दोनों के घोषणापत्र में कुछ अच्छी बातें भी हैं, पर इस मोर्चे पर बहुत कुछ आने वाली सरकार की नीति और नीयत पर निर्भर करता है. लेकिन इन सबके साथ अर्थशास्त्री यह चिंता भी जताते हैं कि अगर इन योजनाओं को ठोस मकसद के बजाय सिर्फ सियासी लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया तो आर्थिक सुधार बेलगाम हो सकते हैं और राजकोषीय हालत भी.

सुरेंद्र पाल सिंह

सुरेंद्र पाल सिंह

जन्म - 12 नवंबर 1960 शिक्षा - स्नातक - कृषि विज्ञान स्नातकोतर - समाजशास्त्र सेवा - स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत लेखन - सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित सलाहकर - देस हरियाणा कार्यक्षेत्र - विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि-ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि। पताः डी एल एफ वैली, पंचकूला मो. 98728-90401

One comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *