संतराम उदासीः जन संघर्षों व आंदोलनों का प्रेरक- प्रोफेसर सुभाष चंद्र

संतराम उदासी का संबंध पंजाबी कविता की क्रांतिकारी धारा से है। संतराम उदासी की रचनाओं में दलित कविता तथा इंकलाबी कविता के सरोकारों का संगम है। संतराम उदासी का संबंध समाज के सदियों से दलित-अछूत समझी जाने वाली जाति (महजबी सिक्ख) से है। इनकी कविता मानवीय उदार धर्म व सिक्ख गुरुओं के शहादत, सामाजिक उत्पीड़न के प्रति अदम्य विद्रोह, लोकमानस से अथाह राग, शोषणपरक सामाजिक व्यवस्था को आमूल-चूल बदलकर समतामूलक समाज निर्माण के ज़ज़्बे से ओत-प्रोत है। संतराम उदासी ने रेडिकल कविता की जिस धारा से जुड़े थे, उसने स्वतंत्रता के बाद के भारतीय साहित्य और विशेषकर पंजाबी कविता के सौंदर्यशास्त्र को गहरे से प्रभावित किया। पंजाबी कविता में अवतार सिंह पाश, लाल सिंह दिल और संतराम उदासी की तिकड़ी विशेष महत्व रखती है। जहां पाश और दिल की कविताएं पंजाबी से बाहर के साहित्यिक और क्रांतिकारी जगत में खूब पढ़ी गई, वहीं संतराम उदासी के संगीतमय स्वर ने क्रांतिकारी आंदोलन को निरंतर गर्मी प्रदान की है।

अपनी मृत्यु के लगभग तीस साल बाद भी संतराम उदासी कुछ इस तरह से जन संघर्षों व आंदोलनों का हिस्सा रहे हैं कि मजदूरों, किसानों, महिलाओं, छात्रों, कर्मचारियों आदि के संघर्षों में उनके गीत एक प्रेरणा देते हैं।  सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों में उनके गीत सुनाई देंगे। गौर करने की बात ये है कि जगराज सिंह धौला, सुखदेव भोपाल, नवदीप सिंह धौला, अजमेर अकलिया जैसे क्रांतिकारी धारा के लोक गायकों ने तो संतराम उदासी के गीत गाए ही हैं, बल्कि देवेंद्र कोहिनूर, मिनू सिंह, जसबीर जस्सी, शर्मा, हरदेव माहीनंगल, जैसे पेशेवर गायकों ने भी अपना स्वर दिया है। सोशल मीडिया के नवीनतम माध्यम युट्यूब के सैकड़ों चैनलों पर संत राम उदासी के गीत उपलब्ध हैं। उल्लेखनीय बात ये है कि गीतों के अतिरिक्त संत राम उदासी के जीवन पर नाटक व कोरियोग्राफी आदि उपलब्ध हैं।

जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि

संत राम उदासी का जन्म 20 अप्रैल 1939 को पंजाब के वर्तमान में जिला बरनाला के रायसर गांव में हुआ।  तत्कालीन पंजाब में दो तरह का शासन था। पंजाब का कुछ भाग पर सीधा अंग्रेजी शासन के अधीन था और कुछ हिस्सों में देसी रियासतें थी पटियाला, संगरूर, नाभा, कैथल आदि। रायसर गांव दो हिस्सों में बंटा हुआ था। गांव का एक हिस्सा अंग्रेजी राज अधीन तो दूसरा हिस्सा देसी रियासत में आता था। जिस कालसां पत्ती (बस्ती) में उदासी का घर था वह अंग्रेजी राज के अधीन थी।

6 नवंबर 1986 को छोटे साहबज़ादों के शहीदी पर्व के मौके पर गुरुद्वारा हजूर साहिब[1] के निमंत्रण पर कवि सम्मेलन में भाग लेकर रेल से वापिस आ रहे थे तो महाराष्ट्र के मनमाड़ रेलवे स्टेशन के निकट उनके साथ सफर कर रहे डा. बलकार सिंह ने चाय पीने के लिए उठाना चाहा, तो वह उठे नहीं। उदासी जी चल बसे थे। 

संतराम उदासी के लोक में प्रसिद्ध होने का कारण है उनकी लोक चेतना में बसे साहित्यिक रूपों व धुनों का प्रयोग। लोक संतराम उदासी की रचनाओं की आत्मा है। लोक चेतना व क्रांतिकारी चेतना का स्वर यहां एकमएक हो गया है। संत राम उदासी काव्य के बारे क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश ने  लिखा है कि संत राम उदासी को पहली बार जब गाते हुए सुना तो लोक कला के बारे में मेरे तमाम भ्रम दूर हो गए। संगीत, महेनतकशों की जिंदगी के दर्द और रोह का ऐसा शानदार सुमेल शायद ही पंजाबी के किसी और कवि में हो। जनता की दुश्मन सरकार ने इस बात को शायद पहले ही भांप लिया था। इससे बड़ी बात यह थी कि उदासी निस्वार्थ जन सेवा की भावना के कारण अन्य कवियों की तरह बहुत सारी पत्रिकाओं में प्रकाशित होने की दौड़ में नहीं फंसा, बल्कि वह अपनी रचनाओं को सीधा जनता की सभाओं और कार्यक्रमों में जाकर गाता रहा। यही कारण है कि उस को दो बार इंटेरोगेशन सेंटर की दरिंदगी  का शिकार होना पड़ा।

जहां उसके गीत अनपढ़ ग्रामीण जनता को प्रभावित करते हैं वहीं पढ़े-लिखे शहरी लोगों पर भी उसकी कला के बड़प्पन्न की सादगी, आवाज के संगीत की कदर और रोह का जादू छाया। हम सब को उस से सीखना चाहिए और प्रेरणा लेनी चाहिए।

पंजाबी के प्रसिद्ध नाटककार गुरशरण सिंह ने संतराम उदासी के जीवन व काव्य सरोकारों के बारे में एकदम सही कहा है कि  “गुरु नानक से 525 सालों के बाद उदासी ही ऐसा सरोदी कवि  है जिसने उसकी परंपरा – एती मार पई कुरलाणे तों की दरद ना आई, राजे शींह मुक्कदम कुत्ते – को जारी रखे हुए समय की सरकारों को हक-सच की आवाज के साथ स्पष्ट शब्दों में ललकारा। चाहे हमारे लोक कवि को समय की सरकारों ने अपने कहर का निशाना बनाया या फिर उसे बचपन से ही हजारों मुसीबतों का सामना करना पड़ा लेकिन कोई भी मुसीबत उसके अपने स्वभाव से डिगा नहीं सकी। लेकिन अफसोस है कि मेहनतकशों का प्रवक्ता, जन संघर्ष का योद्धा, हमें वक्त से पहले ही बिछड़ गया। मैं समझता हूं कि अभी तक पंजाबी साहित्य में उदासी की कविता का सही मूल्यांकन नहीं हो सका है।”

संतराम उदासी का ‘वसीयतनामा’ और उनकी रचनाओं का ‘केसर’ शोषणमुक्त समाज के निर्माण में संघर्षरत जनयोद्धाओं और अपने सच्चे पाठकों व वारिसों को हमेशा नई दृष्टि देता रहेगा।

 

मेरी मौत पे ना रोना, मेरी सोच को बचाना।

मेरे लहू का केसर, मिट्टी में ना मिलाना।

मेरी भी जिंदगी क्या, बस बूर सरकंड़ों का,

सांसों का सेंक काफी, तिल्ली बेशक ना लगाना।

होना मैं नहीं चाहता, जल कर स्वाहा अकेला,

जब-जब ढलेगा सूरज, कण-कण मेरा जलाना।

श्मशानों में कैद होना, मुझे नहीं मुनासिब

यारों की तरह अर्थी, सड़कों पे ही जलाना।

जीवन से मौत तक, आते बड़े चौराहे,

जिसकी राह नई, उस राह मुझे ले जाना।

नई उडारी मार पंछी, नई उडारी मार।

जितने नन्हे पंख हैं तेरे

उतने लंबी राहें तेरी

तेरी राहों में ‘शिकारी’ ने, उठा रखी गर्द-गुबार।

पंछी नई उडारी मार…

जिस डाल पर वास तेरा है

उस डाल का हाल बुरा है

तेरे उड़ने से पहले, कहीं उड़ ना जाए बहार।

पंछी नई उडारी मार…

छनक-छनक निकली हथकड़ियां

पर तूने जोड़ी नहीं कड़ियां

तेरे ‘बच्चों’ पे पसरा, गिद्धों का वार।

पंछी नई उडारी मार…

तू लोहे की चोंच बनवा के

डाल-डाल पे पहरा लगा के

खेतों में बिखरे चुग्गे का, बन जा तू पहरेदार..

पंछी नई उडारी मार…

कंमीआं का वेहड़ा[1]

मां धरतीए! तेरी गोद को चंद ओर बहुतेरे

तू चमकते रहना सूरज कम्मियां के वेहड़े

जहां तंग ना समझे तंगियों को

जहां मिलें अंगूठे बहियों[2] को

जहां बाल तरसते कंघियों को

नाक बहती, आंखों में सूजन, दांत में कीड़े

तू चमकते रहना सूरज….

जहां रूह बन गयी एक हावा है

जहां जिंदगी का नाम पछतावा है

जहां कैद स्वाभिमान का लावा है

जहां अक्ल अफसोस मुड़ गई खा थपेड़े

तू चमकते रहना सूरज…

जहां लोग बहुत मजबूर हैं

दिल्ली के दिल से दूर हैं

और भुखमरी से मशहूर हैं

जहां मरके बन जाते चंडाल भूत बडेरे

तू चमकते रहना सूरज…

जहां इंसान जन्मता सीरी है

पैसों की ‘मीरी-पीरी’ है

जहां कर्जों तले पंजीरी है

बाप के कर्जे के सूद में पूत जन्मदे जेड़े

तू चमकते रहना सूरज…

जे सूखा पड़े तो यही सड़ते हैं

जे बाढ़ आए तो यही मरते हैं

सब कहर इन्हीं पर पड़ते हैं

जहां फसलों ने भी अरमान तोड़े

तू चमकते रहना सूरज..

जहां हार मान ली चावां ने

जहां कोयल घेर ली कौवां ने

जहां अनब्याही ही मांवां ने

जहां बेटियां सिसकती बैठ मुंडेरे

तू चमकते रहना सूरज…

जहां रोटी में मन घुटता है

जहां गहन अंधेरा उठता है

जहां गैरत का धागा टूटता है

जहां वोट मांगने वाले आकर रिश्ता जोड़ें

तू चमकते रहना सूरज…

तू अपने आप चमकता है

अपने आप ही रोशन रहता है

क्यों कम्मियां से शर्माता है

यह सदा-सदा ही नहीं रहेंगे भूखे में जकड़े…


[1] दलित मजदूरों की बस्ती को पंजाबी में कमिआं दा विहड़ा कहा जाता है।

[2]साहूकार की कर्ज लिखने वाली नोटबुक

सुभाष चंद्र

प्रोफेसर, हिंदी-विभाग

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र -136118



[1] महाराष्ट्र में गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा स्थापित ऐतिहासिक गुरुद्वारा

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