डरैगा सो मरैगा

राजकिशन नैन

एक बै जंगल के सारे खरगोशां नै आपणी सभा करी अर सभ आपणे-आपणे दुःखां का रोणा रोण लागे। एक जणां बोल्या, ‘आखिर कित लिकड़ कै चालां? पीण नै पाणी रह्या ना, तपदी लू चाल्लै, खेतां मैं जाड़ा (घास) ना।’

‘तन्नै पाणी की अर चारै की पड़ री सै, आड़ै जान पै  बण री सै। सारी हाण शिकारी कुत्ते अर लोह का डंडूक (बंदूक) लेहीं आदमी गेल्यां पड़े रहै सै।’ एक दूसरा खरगोश बोल्या।

एक तीसरा बोल्या, ‘भाई सच्चाई घणी कड़वी हो सै अर साची बात या सै अक राम नै म्हारी गेल्यां कती कु न्या करया सै। हाम इतणे छोटे बणाए अक किसे जानवर तै हाम बराबरी ए ना कर सकदे।’

‘बराबरी के खाक करां। राम जी तैं इतणा बी ना हुआ अक हाम न सींग ए दे देंगा, ताकि हाम छोटे-मोटे जानवरां तैं आपणा बचा कर लेंदे।’ एक और खरगोश बोल्या।

‘तो फेर यूं गया गुजरा अर बिना मान का जीवन जीण का के फैदा सै?

‘कोए फैदा नहीं, घणा आच्छा तो यू रहैगा अक हाम सारे डूब कै मरज्यां अर इस दुःख तै पांडा छुटाल्ल्यां।’ एक नै सलाह दी।

इस बात पै सारे राजी होगे अर कटठे होकै जोहड़ में डूबण ताहीं चाल पड़े। वै जोहड़ पै पहुंचे ए थे अक कंठारै बैठे मिंडक उन तैं डर कै पाणी में जा बड़े। अर मिंडका के खुड़के तैं डर कै माक्खी-माच्छर उड़गे। या बात देख कै एक स्याणा बोल्या, ‘भाइयो डटो।’

‘क्यूं के बात सै, के मरण तै डरग्या?’

‘ईब मरण अर डरण की तै बात ए ना रही।’

‘पर हाम आए तै आडै मरण सां।’

‘आए थे पर ईब नहीं मरांगे।’ ‘पर क्यूं?’ ‘क्यूं के, देख्या नहीं? म्हारै तै डर कै मिंडक भाजगे, अर जो म्हारे तै डरे, उन तै डर कै माक्खी उड़गे। इसका मतलब यू अक जै म्हारै तै कुछ ठाढै सै तै हाम बी किसै तै ठाढै सां। हाम क्यों आपणे नै छोटे मान कै जी छोड़ां अर क्यूं खामखां मरां?’ स्याणे खरगोश की स्याणी बात सभ के समझ मैं आगी अर वै सारे उल्टे चाले गए।

साभार: हरियाणवी लघुकथाएं, भारत ज्ञान विज्ञान समिति

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