भेड़िया- हरभगवान  चावला

हरभगवान चावला

(हरभगवान चावला सिरसा में रहते हैं। हरियाणा सरकार के विभिन्न महाविद्यालयों में  कई दशकों तक हिंदी साहित्य का अध्यापन किया। प्राचार्य पद से सेवानिवृत हुए। तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुए और एक कहानी संग्रह। हरभगवान चावला की रचनाएं अपने समय के राजनीतिक-सामाजिक यथार्थ का जीवंत दस्तावेज हैं। सत्ता चाहे राजनीतिक हो या सामाजिक-सांस्कृतिक उसके चरित्र का उद्घाटन करते हुए पाठक का आलोचनात्मक विवेक जगाकर प्रतिरोध का नैतिक साहस पैदा करना इनकी रचनाओं की खूबी है। इन पन्नों पर हम उनकी कविताएं व कहानियां प्रकाशित कर चुके हैं इस बार प्रस्तुत है उनकी लघुकथा)


प्रशिक्षण शिविर में कुत्तों को बताया गया कि हिंसा परम धर्म है, कि तुम जैसा वफादार प्राणी इस संसार में नहीं है, कि तुम इस संसार के गौरव हो, कि तुम्हारे पूर्वजों के कारण ही यह सृष्टि हमेशा सलामत रही, कि अब तुम्हारी नस्ल खतरे में है क्योंकि भेड़िए तुम्हारा सर्वनाश करने पर आमादा हैं, कि अपना अस्तित्व बचाने के लिए तुम्हें भेड़ियों का वध करना होगा। कुत्तों में गर्व का संचार हुआ। उन्हें लगने लगा कि उनसे ज्यादा ताकतवर और कोई प्राणी नहीं है। वे आश्वस्त थे कि भेड़िए तो क्या, शेर भी उनके सामने टिक नहीं पाएंगे। प्रशिक्षक का संकेत पाते ही प्रशिक्षित हिंस्र  कुत्तों का झुंड किसी जंगल पर टूट पड़ता। एक के बाद एक जंगल भेड़ियों से विहीन होते चले गए। कुत्ते भेड़ियों को खाते नहीं थे, सिर्फ नोचते थे। एक दिन एक जंगल का सफाया करने के बाद जब झुंड सुस्ता रहा था तो एक कुत्ते ने गौर किया कि उन के झुंड का वह काला कुत्ता गायब है जिसमें पिछले कुछ दिनों से शिकार के प्रति उत्साह निरंतर कम हो रहा था। क्या उसे भेड़ियों ने मार डाला है? कुत्तों को समझ में नहीं आया, पर वे काफी समय तक उदास बने रहे। तीन-चार दिनों के बाद कुत्तों ने झुंड में से एक और कुत्ते को गायब पाया। फिर तो यह सिलसिला शुरू हो गया। कुछ कुछ दिनों के बाद कोई ना कोई कुत्ता गायब हो जाता। कुत्तों ने तय किया कि वे उनके झुंड के सदस्यों को मारने वाले भेड़िए का पता लगा कर रहेंगे। कुत्तों का दल बारी बारी से उन सभी जंगलों में गया जहां उन्होंने भेड़ियों का खात्मा कर दिया था। किसी जंगल में उन्हें अपने साथियों के शव तो नहीं ही मिले, किसी भेड़िए का शव भी नहीं मिला। जहाँ-जहाँ उन्होंने भेड़ियों को मारा था,  वहां खरगोशों, नीलगायों, हिरणों, बंदरों, गीदड़ों आदि के शव पड़े थे। ओह तो उन्होंने भेड़ियों के भ्रम में अब तक इन मासूम प्राणियों को ही मारा था। हिंसा के मद में डूबे वे सभी जानवरों को भेड़िया ही समझते रहे। कुत्ते जंगल से बाहर आए और अपने साथियों के गायब होने की शिकायत करने के लिए प्रशिक्षक के महल में घुस गए। वे पहली बार  महल में घुसे थे। वे यह देख कर हैरान रह गए कि उनके साथी कुत्तों की खालें दीवारों पर लटक रही थीं ।प्रशिक्षक चिल्लाया- बिना इजाज़त तुम महल में घुसे कैसे? कुत्तों ने कुछ नहीं सुना। उनकी प्रश्नाकुल आँखें प्रशिक्षक की ओर मुड़ गईं। उन्होंने देखा उनके सामने खूँखार भेड़िया खड़ा था।

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