कनाडाः  शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व की मिसाल – सुरेंद्र पाल सिंह

 सुरेन्दर पाल सिंह

                 ( हर समाज-देश की एक विशिष्ट संस्कृति है। मानव के विकास क्रम में आबादियां एक जगह से दूसरी जगह जाकर बसती रही हैं। जिससे मनुष्य एक दूसरे समुदाय से सीखकर अपनी संकीर्णताओं-पूर्वाग्रहों से मुक्त होता रहा है। भारत तो इसका अनूठा उदाहरण है ही दुनिया की कोई जगह ऐसी नहीं है जहां ये प्रक्रिया ना चली हो।
देस हरियाणा पत्रिका के सलाहकार सामाजिक कार्यकर्ता सुरेंद्र पाल सिंह बैंक में अधिकारी रहे। स्वैच्छिक सेवानिवृति के बाद विभिन्न संगठनों और मंचों के माध्यम से सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हैं। अपना पूरा समय सामाजिक कार्यों व लेखन में निवेश कर रहे हैं और घुमक्कड़ी उनका शौक है। प्रस्तुत है उनकी कनाड़ा यात्रा का अनुभव  – सं.)

ब्राम्पटन से एक मित्र की कार से करीब 700 किलोमीटर शीतलहर में सूखे हुए मेपल के वृक्षों व सड़क किनारे बर्फ़ के बिना पिघले हुए लौंदों के बीच यात्रा करते हुए सेंट मेंरी रिवर के किनारे बसे एक शान्त लेकिन ऐतिहासिक शहर में एक लंबा पड़ाव आज 20 मई को पूरा होने जा रहा है।

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मेपल

इस 21 दिनों के अन्तराल में बहुत कुछ नया जानने और समझने को मिला। तीन विशेष बातों ने मुझे अत्यधिक प्रभावित किया। विभिन्न राष्ट्रीयताओं और धर्मों के व्यक्तियों का शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व, मूलनिवासियों के लिए विशेष रिज़र्व और अन्य प्रावधान व एक बड़ी संख्या के बाशिन्दों द्वारा बिना किसी धार्मिक पहचान के सामाजिक जीवनयापन।

सन 1871 में 879 की जनसंख्या वाला ये कस्बा सन 1981 में आजतक की अधिकतम जनसंख्या 82,697 को दर्ज कर पाया। सन 2016 की जनगणना के अनुसार यहाँ की जनसंख्या 73,368 है जोकि 2011 की गणना से 2.4% गिरावट पर है।

यहाँ दक्षिणी एशियन, चीनी, अफ़्रीकी, फिलीपीन्स, लेटिन अमेरिकन, अरब, दक्षिणी- पूर्वी एशियन, कोरियाई, जापानी, इतालवी, फ्रेंच, स्वीडिश आदि मूल की राष्ट्रीयताओं से जुड़े नागरिक रहते हैं। धार्मिक पहचान के नाम पर क्रिस्चियन में 9 तरह के समुदाय हैं जिनमें से मुख्यतः कैथोलिक क्रिस्चियन 40.64% हैं। यहूदी, हिन्दू, मुस्लिम, बुद्धिस्ट, पारंपरिक और अन्य पहचानों के अलावा बिना किसी धार्मिक पहचान वाले नागरिकों का 24.56% है।

ये इलाका परंपरागत रूप से योजिब्वे नाम के मूलनिवासियों का था जो अनिशिनाबे नाम की भाषा बोलते थे। वे इस इलाक़े को बाइटिगोंग कहते थे क्योंकि यहाँ नदी के एक हिस्से में पानी का ज़बरदस्त ज्वार सा उठता है। सन 1623 में एक फ्रेंच मिशनरी ने इस जगह का नाम फ्रांस के सम्राट लुइस xiii के भाई के नाम से सॉल्ट दे गेस्तों रख दिया था लेकिन सन 1668 में फिर से इसका नाम बदल कर सॉल्ट सेंट मेंरी रखा गया। यहाँ भी सॉल्ट शब्द जिसका अर्थ पानी में तेज उफ़ान है कायम रहा। लेकिन, आम भाषा में इसे सू के नाम से उच्चारित किया जाता है।

उत्तरी अमेरिका का यह इलाक़ा सबसे पहले की फ़्रेंच बसासत में से एक है। अब ये स्थान मोंट्रियल से सू और लेक सुपीरियर से ऊपर के उत्तरी क्षेत्र में फैले हुए 3000 मील वाले फर्र व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। इस प्रकार धीरे धीरे ये क्षेत्र यूरोपीय व्यापारियों से भर गया जो स्थानीय मूलनिवासियों की सहायता से फर्र को जुटाने और उसके व्यापार में व्यस्त हो गए। इन तमाम यूरोपीय लोगों में दबदबा फ़्रांस का ही था। सर्दियों में नदी का उपयोग पानी के ठोस बर्फ़ के रूप में जम जाने की वजह से सड़क की तरह किया जाता था। इस दौरान योजिब्वे और इरॉकोइस मूलनिवासियों की आपसी लड़ाई इस हद तक बढ़ गई कि 1689 तक फ़्रांस वाले सॉल्ट सेंट मेंरी मिशन से उदासीन से हो गए थे लेकिन 1701 में मॉन्ट्रियाल में ग्रेट पीस समझौते पर फ्रांस और उत्तरी अमेरिका के 40 फर्स्ट नेशन (मूल निवासियों को यहाँ फर्स्ट नेशन के नाम से जाना जाता है) पर समझौता होने के बाद लम्बे समय से चलने वाले कलह से फ्रांस को राहत की साँस मिली। इसके बावजूद व्यापारिक हितों के चलते अब ब्रिटेन और फ़्रांस की आपसी तनातनी ने एक बड़ी और लम्बी लड़ाई का रूप ले लिया। सन 1754 में शुरू हुए इस युद्ध को सेवन इयर्स वॉर के नाम से जाना जाता है। अंततः 1763 में पेरिस सन्धि के अनुसार उत्तरी अमेरिका के क्षेत्र अब फ़्रांस के हाथ से निकलकर ब्रिटेन और स्पेन के हवाले हो गए। और इस प्रकार से अब सू का इलाक़ा ब्रिटेन के आधिपत्य में आ गया।

लॉक और नदी पर अमेरिका से जोड़ने वाला पुल
सू लॉक और नदी पर अमेरिका से जोड़ने वाला पुल

1783 में अमेरिकन क्रांति के बाद ब्रिटेन और अमेरिका के बीच एक नई पेरिस सन्धि हुई जिसके अनुसार सेंट मैरी नदी को दो देशों के बीच का बॉर्डर मान लिया गया। इस प्रकार एक सू के दो हिस्से हो गए- कनाडा का सू और अमेरिका का सू । इसी दिशा में फिर लन्दन में 1794 में हुई जे सन्धि के अनुसार इस क्षेत्र के मूल निवासियों (फर्स्ट नेशन) को दोनों देशों में आने जाने और बसने का समान अधिकार मिल गया।

कालान्तर में सन 1871 में यहाँ की बसासत को आधिकारिक स्तर पर एक गाँव का दर्जा मिल गया था। सन 1875 में यहाँ पहले स्कूल की स्थापना हुई जो आज अल्गोमा विश्वविद्यालय के रूप में विद्यमान है। धीरे धीरे यहाँ बिजली, टेलीफ़ोन, होटल, बाज़ार, उद्योग आदि का प्रसार होना शुरु हो गया। सन 1895 में सू की एक विशेष और आश्चर्यजनक उपलब्धि यहाँ ऊंचे और नीचे जल स्तर के बीच जहाजों के आवागमन के लिए लॉक व्यवस्था की स्थापना है। इस लॉक के माध्यम से लेक सुपीरियर और सेंट मैरी नदी के पास निम्न जलस्तर वाली ग्रेट लेक के बीच जहाज गुजारे जाते हैं। उल्लेखनीय है कि दोनों तरफ़ के जलस्तर में 21 फुट का फर्क़ है। उद्योग के नाम पर मुख्यतः यहाँ एक पेपर मिल और दो स्टील इंडस्ट्रीज हैं जिनमें एक स्टील इंडस्ट्री तो एस्सार की है।

कनाडा में भी लखनऊ है, लन्दन है, कैम्ब्रिज है, वाटरलू है और बर्लिन भी था। वाटरलू, किचनर और कैम्ब्रिज आसपास है इन्हें ट्राइसिटी के नाम से जाना जाता है।

वाटरलू: सन 1783 में अमेरिकन क्रांति के दौरान एक अजीबोगरीब बात हुई । योजिब्वे फर्स्ट नेशन (मूल निवासी) ने अमेरिका का साथ दिया और इरॉकोइस फर्स्ट नेशन ने 5 अन्य फर्स्ट नेशन के साथ गठजोड़ बना कर उपनिवेशवादी ब्रिटेन को सहयोग दिया। ब्रिटेन को बेशक अमेरिका से हाथ धोना पड़ा लेकिन ब्रिटेन ने वॉटरलू के इलाक़े में सन 1784 में इरॉकोइस फर्स्ट नेशन को 6।75 लाख एकड़ ज़मीन इनामस्वरूप दे दी। खैर, सन 1796-98 में कर्नल रिचर्ड बैसले ने इरॉकोइस से 93 हजार एकड़ ज़मीन खरीद ली। सन 1804 में पेनसिल्वेनिया से आए जर्मनभाषी मेंनोनिटीएस {प्रोटेस्टेंट क्रिश्चियन का एक समुदाय जो मेंनो साइमन (1496-1561) के नाम पर नीदरलैंड में पनपा और उन्हें वहाँ से भागने को मजबूर होना पड़ा} ने कर्नल बैसले से ज़मीन खरीद कर वहाँ बस गए।

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सन 1815 में बेल्जियम में नेपोलियन को ब्रिटेन, डच, पर्सिया,जर्मनी आदि की सँयुक्त फौज ने वॉटरलू (तत्कालीन नीदरलैंड में) के मैदान में हराया था। इस जीत की खुशी में कनाडा के इस इलाक़े का नाम भी वॉटरलू रखा गया। वैसे वॉटरलू का अर्थ पानी के साथ की ज़मीन है।

किचनर: वॉटरलू और बगल के इलाक़े में धीरे धीरे जर्मनी से आए लोगों की संख्या इतनी अधिक हो गई (50 हजार के करीब) कि सन 1833 में बगल के इलाक़े का नाम बर्लिन रखा गया। लेकिन पहले विश्वयुद्ध में जर्मनी और जर्मन लोगों के ख़िलाफ़ एक विशेष प्रकार रोष यहाँ भी दिखाई दिया। इसी संवेदना के तहत आखिरकार, सन 1916 में पहले विश्वयुद्ध में शहीद हुए ब्रिटिश फील्ड मार्शल हर्बर्ट किचनर के नाम से बर्लिन का नाम किचनर रखा गया।

किचनर – वॉटरलू अक्टूबर फेस्ट: कनाडा का सबसे बड़ा फेस्टिवल अक्टूबर फेस्ट जर्मन मूल के लोगों द्वारा अक्टूबर महीने में मनाया जाता है। हर वर्ष औसतन 6 से 7 लाख लोग इस फेस्टिवल में हिस्सा लेते हैं।

नारीवाद के इतिहास में एक मील पत्थर

 कनाडा के ओंटारियो प्रोविन्स के अल्गोमा जिले का  शान्त सा ऐतिहासिक शहर सॉल्ट सेंट मैरी( सू)।  सेंट मैरी नदी के किनारे बसा है। नदी के ऊपर बना हुआ पुल इसे अमेरिका से जोड़ता है। संसार के नारीवादी आंदोलन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अध्याय इस इलाक़े से सम्बद्ध है।

श्रीमती एंजलीना नपोलितानो (1882-1932) इटली से न्यूयॉर्क होते हुए अपने परिवार के साथ सन 1909 में सू में आकर बस गई थी। उसका पति पित्रो उस पर बार बार शरीर बेच कर पैसा कमाने का दबाव डालता था जिसके लिए एंजलीना के राजी ना होने पर पित्रो ने 1910 में अपने पॉकेट चाकू से उस पर 9 हमले किये। मामला थाना कचहरी गया लेकिन पित्रो की सजा स्थगित कर दी गई।31754625_1689609387791021_7137775212572966912_n

जब एंजलीना 6 महीने की गर्भवती थी तो 1911 में पित्रो ने फिर उसे जान से मार देने की धमकी दी अगर वो सेक्स से पैसा कमा कर नहीं लाती। आख़िरकार 16 अप्रैल 1911 में परेशान होकर एंजलीना ने एक कुल्हाड़े से पित्रो का क़त्ल करके अपना जुर्म क़बूल कर लिया।

अब अदालती कार्यवाही के साथ साथ कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और यूरोप के मीडिया में एक तूफ़ान खड़ा हो गया। एंजलीना के पक्ष और विपक्ष में सरगर्मियां बढ़ गई। नारीवादी परिप्रेक्ष्य ने पक्ष की आवाज़ को मुख़र किया। ओहियो से एक डॉक्टर एलेग्जेंडर आल्टो ने तो एंजलीना के बदले में अपने लिए फाँसी की सज़ा माँग ली। आख़िरकार 14 जुलाई 1911 को एंजलीना को मौत की सज़ा के बदले उम्र कैद दी गई। 11 वर्षों बाद उसे पैरोल पर छोड़ा गया और 1932 में उसकी मृत्य हो गई।

कालान्तर में 2005 में इस विषय पर बहुचर्चित और लोकप्रिय फ़िल्म बनी – लुकिंग फ़ॉर एंजलीना। ये फ़िल्म मोंट्रियल, जेनेवा, मुम्बई में हुए अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म फेस्टिवल में दिखाई गई है और अनेकों पुरस्कार जीत चुकी है।

संपर्क—9872890401

सुरेंद्र पाल सिंह

सुरेंद्र पाल सिंह

जन्म - 12 नवंबर 1960 शिक्षा - स्नातक - कृषि विज्ञान स्नातकोतर - समाजशास्त्र सेवा - स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत लेखन - सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित सलाहकर - देस हरियाणा कार्यक्षेत्र - विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि-ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि। पताः डी एल एफ वैली, पंचकूला मो. 98728-90401

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