फ्लाई किल्लर – एस आर हरनोट

एस. आर. हरनोट


(एस. आर. हरनोट शिमला में रहते हैं। हिंदी के महत्वपूर्ण कहानीकार के साथ-साथ साहित्य को जन जीवन में स्थापित करने के लिए अनेक उपक्रम करते हैं । साहित्यिक संगोष्ठियां व यात्राएं साहित्य व समाज के बीच जीवंत संबंध पुल बना रही हैं।   हिमाचल का जन जीवन विशेषतौर पर जनजातियों-दलित-वंचित समाज की स्थितियां व  आकांक्षाएं उनके साहित्य के केंद्र में हैं। वर्तमान दौर में  जनविरोधी राजनीति किस तरह से संपूर्ण समाज को प्रदूषित कर रही है इस पर पैनी नजर रखते हुए उन्होंने अपने कहानियों का विषय बनाया है। – सं.)


उस चिनार के पेड़ पर सारे मौसम रहते थे। उसके नीचे लगी लोहे की बैंच अंग्रेजों के ज़माने की थी जिस पर वह बैठा रहता था। वह कई बार अपनी उंगलियों के पोरों पर हिसाब लगाता कि इस चिनार के पेड़ की उम्र इस बैंच से कितनी छोटी रही होगी लेकिन वह सही सामंजस्य नहीं बिठा पाता। वह आस-पास खड़े आसमान को स्पर्श करते देवदारों से बतियाना चाहता, जिन पर वह विश्वास कर सकता था कि इस दुर्लभ चिनार के पेड़ को किस समय और किस मौसम में रोपा गया होगा। वह नगर निगम के माली से भी यह बात पूछ सकता था परन्तु उसे किसी पर विश्वास ही नहीं होता कि कोई इस बारे में सही बता देगा। कुछ भी था वह इस बैंच पर बैठा-बैठा अपने को बहुत स्वतन्त्र और सुरक्षित महसूस किया करता था।

  गर्मियां शुरू होने से पहले चिनार पर चैत्र-बैसाख बैठ जाते और उसके सूखे जिस्म से छोटी-छोटी हरी कोंपलें निकलने लगतीं। बैंच पर बैठा वह अपने भीतर बसंत महसूस करता और उसके अप्रतिम सौन्दर्य से अभिभूत हो जाता। हर पत्ते की ओट में उसे ज्येष्ठ और आषाढ़ भयंकर गर्मी की झुलस से छुपते दिखते। हवाएं जैसे तीव्र लू से बचती, उन्हीं के बीच छुप छुपी करती, शीत झोंकों में तबदील होती लगतीं और तीखी गर्मी में उस बैंच पर बैठा वह अपने भीतर गजब की ठंडक महसूस करता। उसके देखते-देखते चिनार के पत्ते पेड़ पर पूरा यौवन बस जाता और सावन-भादों उन्हें अपने आलिंगन में ले लेते। रिमझिम या भारी वर्षा में भी वह अपने रूमाल से बैंच के मध्य भाग को सूखा कर वहां बैठ जाता। इन दिनों उसके पास एक छाता होता। कई बार बादलों की पतली परतें उसके छाते पर इठलाने लगतीं और उसे अपने शरीर में कांटों जैसी हल्की चुभन महसूस होती। उसे अचानक मां याद आ जातीं जो बरसात में अक्सर उसे समझाया करतीं कि रिमझिम वर्षा के साथ जो सफेद धुंई खेतों में पसरी रहती है उसके कांटे बदन में चुभ जाते हैं।

  अश्विन और कार्तिक के महीनों का आक्रमण जैसे ही उस हरियाते पेड़ पर होने लगता वह विचलित हो जाता। इन महीनों के साथ माघ और फाल्गुन भी चले आते। चारों मिलकर उस चिनार को नंगा और निर्जीव करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। एक-एक करके उसके पत्ते झरते रहते और बैंच के चारों तरफ उनका ढेर लग जाता। वह बैठने के लिए जैसे ही उन्हें हटाने लगता वे अजीब तरह से चीखने लगते। पौष के आते-आते उन पेड़ का कहीं नामोंनिशां नहीं मिलता। माघ और फाल्गुन तो जैसे उसका पूरी तरह चीर हरण कर लेते और वह पेड़ ऐसा लगता जैसे सदियों से सूखा खड़ा हो। निर्जीव। अचेत। निस्तेज। उसकी निराशा, शिथिलता, बुझापन और उल्लासता मानों पूरे परिवेश पर छा गई हो। इन्हीं सभी के बीच वह भी अपने को जैसे निपट नंगा पाता…महसूस करता। उसे ये महीने कई राजनीतिक दल के गठबंधनों जैसे लगते, जिनके मिजाज तो अलग-अलग होते पर उस हरे-भरे पेड़ पर पतझड़ से लेकर शीत-आक्रमण तक वे एकमत हो जाते और उस चिनार के जीवन को विरामित कर देते। पेड़ निर्जीव जरूर दिखता पर वह और अधिक प्रमाणिकता के साथ उन प्रतिकूल प्रहारों को सहते हुए किसी तपस्वी जैसा सम्पूर्ण अक़ीदत के साथ नया जीवन पाने तक विश्रामशील लगता।

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उस बैंच पर एक साथ चार लोग बैठ सकते थे। वह लंच टाइम में आकर वहीं बैठ जाता और उन मौसमों को अपने भीतर जीने लगता। उसका बैठना बैंच के मध्य इस तरह होता ताकि उसके अकेलेपन में कोई दूसरा खलल न डाले। वह जितनी बार भी वहां आता उसे बैंच खाली मिलता। शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि उस पर पहले से कुछ लोग बैठे हों और उसे अपने बैठने का इंतजार करना पड़ा हो। कभी जब उस पर कोई बैठा रहता और उसे सामने से बैंच की ओर आते देखता तो वह या कोई भी दो तीन लोग या बच्चे या औरतें या उसके हम उम्र पचपन साल के आसपास के लोग अचानक उठने लगते जैसे वे सभी उसके सम्मान में बैंच को खाली कर रहे हों। उसे अपने होने पर गर्व होता और वह बीच में बैठ जाता। कुछ पल बैठने के बाद वह मानसिक रूप से स्खलित होने लगता। एकाएक खड़ा हो जाता। अपने कपड़े झाड़ता। अपनी पैंट की जिप को देखता कि कहीं खुली तो नहीं रह गई है। फिर जेब से अपना एंडराएड फोन निकालता और उसकी स्क्रीन में अपना चेहरा देखता। बाल देखता। गले में बंधी टाई हाथ से ठीक करता। अपनी छोटी-छोटी मूंछों को उंगलियों के पोरों से सिधाता। जब पूरी तरह आश्वस्त हो जाता कि उसके यहां होने या बैठने में कोई अवनति, अपकर्ष या अभद्रपन नहीं है जिसकी वजह से वह दुर्यश का कारण बने, वह फिर अपनी पूर्व मुद्रा में बैठ जाता और चिनार के पेड़ पर बैठे मौसम को निहारने लगता।

  कुछ देर बैठने के बाद पता नहीं क्यों उसका अर्जित आत्मविश्वास टूटने लगता और आत्मसंदेह में परिवर्तित हो जाता। उसे लगता कि क्या उस के शरीर से कोई अशिष्ट संकेत तो नहीं मिलने लगे हैं जिससे लोग उससे दूरियां बना लेते हैं। वह अपने भीतर की गंध को महसूस करने लगता। कई बार अपने नाक से सूंघने की कोशिश करते हुए जल्दी-जल्दी ऐसे सांस भीतर और बाहर लेता-छोड़ता मानो सुदर्शनक्रिया का अन्तिम चरण पूरा कर रहा हो। बहुत प्रयास के बाद वह अपने को थोड़ा स्थिर और सहज कर लेता और अपने विश्वास को समेटते हुए आश्वस्त हो जाता कि कहीं कुछ ऐसा दुष्कर नहीं है जिससे लोग उसकी उपस्थिति से असहजता महसूस करने लग जाए।

  किसी भी काम से यदि किसी ने मिलना होता तो वह डेढ़ से दो बजे के मध्य इसी जगह चला आता और खड़े-खड़े उससे बातें करता। उसे अपने ऑफिस, मित्रों और रिश्तेदारों के बीच कई असामान्य गुणों की वजह से ऐसी मक़बूलियत हासिल थी जो आज किसी में भी विरल देखने को मिलती। हालांकि योजना निदेशालय में वह किसी बड़े पद पर तैनात नहीं था फिर भी कम्प्यूटर विज्ञान में महारत हासिल होने की वजह से उसे इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी विंग का इन्चार्ज बनाया गया था। इसलिए कम्प्यूटर और इन्टरनैट से जुड़ी तमाम तकनीकें उसे बखूबी मालूम थीं। गूगल जैसी विश्व प्रख्यात साइट से तो उसका रिश्ता दादी-पोते जैसा हो गया था। अपने देश सहित विश्व भर की तमाम जानकारियां उसके जे़हन में दादी के उपले में रखी आग की तरह छुपी रहती।  बैंच पर बैठा वह कभी किसी को मिलने खड़ा नहीं होता और न ही मिलने वाला उसके अगल-बगल बैठता। लोग उसके पास कई तरह की सलाहें और मशविरें लेने आते रहते जिनमें आधुनिक तकनीक से लैस एंडराएड फोन का कल्चर समझने वाले अधिक होते। किसी का इन्टरनेट नहीं चल रहा होता। किसी की फेसबुक या दूसरे एकाउंट नहीं खुलते। कोई अपना पासवर्ड भूल जाता। कोई अपने थ्री जी फोन को फोर जी में कनवर्ट करने की तकनीक समझता। किसी का फोन हैंग हो जाता तो कोई हिन्दी में टाइप न होने की वजह को जानता-समझता। अब तो लोग विशेषकर उसकी सेवाएं मोबाइल इन्टरनेट बैंकिंग और पे-टीएम को समझने के लिए लिया करते और अपने-अपने बैंक के एकाउंट उससे खुलवाकर साथ-साथ पेटीएम एप भी डाउनलोड करवा लेते। उसके मित्र इस काम के बदले उसे चाय-कॉफी ऑफर करते लेकिन वह साफ मना कर देता। वह इन कामों को करते कभी भी अमृदुल या असहज नहीं होता। वह हमेशा विनम्र बना रहता। किसी ने कभी भी उसके चेहरे पर मायूसी या शिकन नहीं देखी होगी। उसके चेहरे पर हमेशा चिनार के पेड़ की तरह चैत्र-बैसाख बैठे रहते और उस बसंती मुस्कान से उसके मित्र भी उस जैसा बनने का प्रयास करते।

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  उसकी सेवानिवृत्ति भी उसी मौसम में हुई थी जब अश्विन और कार्तिक के महीनों ने चिनार पर बैठ कर उसके पत्तों को एक-एक कर गिराना शुरू किया था। अपनी सेवानिवृत्ति के दूसरे दिन भी वह पहले की तरह तैयार होकर जब घर से बाहर निकलने लगा तो पत्नी ने पूछ लिया था,

‘जी, ऐसे सजधज कर कहां जा रहे हो ?’

उसके कदम ठिठक गए। क्योंकि आजतक तो कभी पत्नी ने इस तरह टोका नहीं था। खड़े-खड़े वह पीछे मुड़ कर उसके चेहरे को गौर से देखने लगा कि कहीं उसकी तबीयत तो खराब नहीं। इससे पहले वह कुछ प्रतिक्रिया देता पत्नी ने उसकी शंका का समाधान कर लिया था।

‘आप पिछले कल रिटायर हो गए हैं ?’

रिटायर शब्द ने उसे भीतर तक झिंझोड़ दिया। उसे लगा जैसे पल में ही वह चिनार की तरह नंगो हो गया है। वह उस शब्द की विलोम ध्वनि कुछ देर अपने भीतर महसूस करता रहा। सचमुच उसे बिल्कुल याद नहीं था कि वह अब सेवानिवृत्त हो गया था। अपने को सहज करते हुए वह थोड़ा पास आया और प्यार से समझाने लगा, ‘मैं तुम से झूठ नहीं बोलूंगा। सच में मुझे नहीं याद रहा। तुम तो जानती हो 37 सालों तक नौकरी की है और वह भी एक ही दफतर में। अब यह आदत तो धीरे-धीरे जाएगी न। वैसे भी घर से बाहर तो उसी रूटीन में निकलना होगा। नहीं तो कुछ दिनों में ही जड़ हो जाऊंगा।’

‘तो लंच साथ ले जाओ। अब दफतर की कण्टीन तो नहीं है कि भूख लगने पर कुछ मंगा लिया।’

पत्नी ने रसोई में जाते-जाते कहा था।

उसे उसकी बात जच गई। पता नहीं कितना समय लौटने को लगेगा। फिर उसे रिटायरमैंट के बाद के कई काम याद हो आए। अपने पर गुस्सा भी आया कि क्यों उसे इतनी सी बात याद नहीं रही। याद रहती तो पैंडिग कामों की एक लिस्ट ही बन जाती। दफ्तर के भी तो अभी कई काम शेष थे।

इसी बीच पत्नी ने उसे लंच पकड़ा दिया और हिदायत दी कि समय पर खा लें और जल्दी घर आ जाएं।

उसने लंचबाक्स पकड़ कर अपने बैग में डाला और बाहर निकल गया।

बाहर निकलते ही उसे नारों का शोर सुनाई दिया। उसने सामने देखा तो एक विशाल हुजूम गाजे-बाजे के साथ सब्जीमंडी ग्रांउड की ओर जा रहा था। उसे एकाएक झटका सा लगा। उसे याद आया कि पूरे देश में नई पार्टी जीत कर आई है। रिटारयरमैंट की पार्टी और मिलने-जुलने आने वाले लोगों की वजह से पिछले दिन उसे याद ही नहीं रहा कि चुनाव में विपक्ष भारी बहुमत के साथ जीत गया है। पिछली रात को उसने पहली बार इतनी थकावट महसूस की कि समाचार तक ध्यान से नहीं देख-सुन पाया। हालांकि उसके कमरे में टीवी नहीं था, वह अपने कम्प्यूटर पर ही इन्टरनैट से यह काम चला लेता था। समाचार तो वह अपने ऑफिस में लगे टीवी पर ही देख लिया करता।

इन्हीं नारों की ध्वनियों के मध्य वह अपने रास्ते चलता रहा। बहुत से खयाल उसके मन में आते-जाते रहे। सबसे आहत करने वाली बात यह थी कि जिस एक पार्टी को वह बरसों से, या आजादी के बाद से वोट देता रहा, वह पूरी तरह हर जगह हारती चली गई। उसे चिनार पर बैठे मौसम याद हो आए कि परिवर्तन तो समय की मांग है, उसे कौन रोक सकता है। लेकिन किसी भरे-भराए पेड़ पर से सारे मौसमों का इस तरह चले जाना दुःखद तो है ही।

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आज जब वह उठा तो उसे अपने घर में कई परिर्वतन देखने को मिले। पहले उसका बेटा कमरे में आया। उसके हाथ में पांच सौ और हजार के कई नोट थे। फिर बहू आई और उसके बाद पत्नी। उनके हाथों में भी कुछ नोट थे। बेटे ने ही शुरूआत की थी,

‘कैसा लग रहा है डैड फ्री होकर ?’

वह मुस्कुरा दिया था। कहा कुछ नहीं।

‘आप जानते हैं कि पांच सौ और हजार के नोट बन्द हो गए हैं।’

उसे झटका सा लगा।

‘कब हुआ यह सब….’

‘अरे डैड, रात से ही तो टीवी पर आ रहा है।’

उसने कुछ नहीं कहा। वैसे वह इसका बढ़िया जवाब दे सकता था कि घर के दोनों टीवी तो आप लोगों के कमरों में हैं। मनमर्जी के कार्यक्रम देखने के लिए। अब मुझे तो समाचारों के लिए तीसरा टीवी खरीदना होगा। पर वह चुप्पी साध गया।

बेटे ने अपनी पत्नी और मां से नोटों को लेकर उसे पकड़ा दिए थे।

‘डैड! ये नोट हमारे पास थे। कुछ मां के पास भी। आपके पास भी तो होंगे ही। अब समय ही समय है। बैंक जाकर इन्हें बदलवा लीजिए। आपकी तो जान-पहचान भी बहुत है।’

अपना-अपना काम बता कर सभी कमरे से बाहर निकल गए। उसे आज अच्छा लगा कि वह अब अपने परिवार के लिए भी समय दे सकता है। उसका छोटा सा परिवार था। बेटा यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर था और बहू एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापिका। दो पोतियां थीं जिनकी शादियां हो गई थीं। उसने नोटों को समेटा और अपनी अल्मारी खोली। पांच सौ और हजार के कुछ नोट रखे थे। आज घर में जितना भी धन जिस किसी ने अपने-अपने हिसाब या जरूरत के मुताबिक रखा था वह सभी निकल गया। कुल पैंतालीस हजार के करीब। उसे जोर की हंसी आई कि जीवन कुमार के पास 37 सालों की नौकरी के बाद घर में बस यही काला धन है? उसने पैसों के साथ कुछ दूसरे कागज अपने बैग में डाल दिए। तैयार हुआ और नए काम पर निकल गया।

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आज पूरे शहर का माहौल गर्म था। हर तरफ नोटबंदी की चर्चाएं थीं। बौखलाहट थी। मायूसी थी। हड़कंप था। वह सीधा अपने बैंक में गया। वहां देखा तो सर चकरा गया। तकरीबन पांच सौ लोगों का जमघट लगा था। कई लाइनों में लोग खड़े थे। वह भी एक लाइन में खड़ा हो गया। इधर-उधर झांकता रहा। बैंक में बहुत से कर्मचारी थे जो पूर्व में उसकी सेवाएं लेते रहे थे। लेकिन आज कोई दिखाई नहीं दे रहा था। एक दो बार उसने लाइन से बाहर निकल कर बैंक के भीतर जाने का प्रयास किया लेकिन वहां खड़े पुलिस वालों ने रोक दिया। पूरे दिन वह भूखा-प्यासा खड़ा रहा लेकिन उसकी बारी नहीं आई। थका हारा वह घर चला आया।

कई दिनों तक वह उसी रूटीन में बैंक के चक्कर काटता रहा परन्तु नोट बदलवाने या जमा करवाने में कामयाब नहीं हो पाया। घर में सभी आश्वस्त थे कि वह सभी के पैसों को बैंक में या तो जमा करवा लेगा या बदलवा देगा। आज जब वह घर पहुंचा तो सीधा बिना कुछ बात किए अपने कमरे में चला गया।

उसका माथा पसीने से तरबतर था। जितना पोंछता उतना ही गीला हो जाता। अपने को इतना कमजोर और असहाय कभी महसूस नहीं किया जितना उसने इन दिनों बैंक की लाइन में खड़े खड़े किया था। उसने कई बार बैंक में फोन पर बात करनी चाही लेकिन सभी के फोन बंद मिले। दिन को अब वह बेटे के कमरे में जाकर समाचार देख लिया करता था। जिस चैनल पर भी देखो, बैंक के बाहर लम्बी लम्बी लाइनें ही नजर आतीं। कहीं पैसों के लिए झगड़े होते तो कहीं भीड़ पर पुलिस वाले लाठियां बरसाते रहते। फिर खबरें आने लगीं कि लाइनों में खड़े-खड़े कई बुजुर्ग बेहोश होकर मरने भी लगे हैं। उसके मन में अचानक विचार आया कि उसके साथ भी तो ऐसा ही कुछ हो सकता है। वह एक पल के लिए जड़ सा हो गया। दूसरे पल सोचने लगा कि थोड़े से पैसों के लिए वह अपने को क्यों इतना विवश या मजबूर कर देगा कि वह इस परिस्थिति तक पहुंच जाए। लेकिन जिस तरह का माहौल बन रहा था उससे उसे यह चिंता जरूर थी कि वह समय रहते परिवार के इस छोटे से काम को कैसे निपटा पाएगा ? रिटायमैंट से पूर्व ऑफिस में रहते हुए तो उसके सारे काम चपड़ासी या उसका कोई क्लर्क करवा दिया करता। उसके मन में यह भी ख्याल आया कि क्यों न वह अपने दफ्तर जाकर किसी को इन पैसों को दे दे ताकि वह अपनी सुविधा से जमा करवा दें या उन्हें नए नोटों से बदलवा कर उसे दे दे। फिर उसे कई पहले के रिटायर लोगों का ध्यान आया कि जब वे उसके अपने दफ्तर आते थे तो लोग कैसे उनकी उपेक्षा करने से नहीं चूकते। अब वह भी उन्हीं की श्रेणी में शामिल है। …..यह सोचते-सोचते उसे लगा कि वह ‘रिटायरमैंट’ शब्द कहीं उसकी जीभ पर चिपक गया है। उसने एक दो बार जीभ के मध्य दांत फंसा कर उसे बाहर निकालना चाहा लेकिन वह धीरे-धीरे कहीं भीतर घुसता चला गया था।

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आज पहले वह बैंक की कतार में लगा रहा। भारी जद्दोजहद के बावजूद उसकी बारी नहीं आ सकी। फिर थका हारा वह कई दिनों बाद चिनार के पेड़ के नीचे लगी बैंच पर बैठने चला आया। वहां पहुंचा तो देखा कि उस पर सूखे पेड़ की कई परतें जमी पड़ी थीं। पतझड़ के महीनें जैसे हर टहनी पर बैठे उम्रदराज पत्तों को एक-एक करके बेघर करने में लगे थे। वह कभी बैंच को देखता तो कभी नंगे होते उस चिनार को। हल्की सी हवा से कोई पत्ता नीचे गिरता तो उसे लगता जैसे अथाह वेदना से वह कराह रहा है। वह घिसटता, लड़खड़ाता सा अधमरा हो कर दूर-पार चला जाता। हवा तेज चलती तो बहुत से पत्ते भुरभुराकर उसके आसपास और कुछ उसके ऊपर गिरने लगते। उसने देखा कि समय के साथ-साथ कितना कुछ नहीं बदल जाता ? यह सोचते वह ‘समय’ शब्द पर अटक गया। एक समय था जब वह नौकरी के लिए शहर आया, एक समय था जब उसकी नौकरी लगी, एक समय था जब उसकी शादी हुई और बच्चे हो गए, एक समय यह भी है जब वह रिटायर है और अकेला-अकेला सा चिनार और पेड़ का सहारा ढूंढ रहा है…..असहाय सा बैंक के बाहर लगी पंक्तियों में दिन भरा खड़ा रहता है और अपने ही थोड़े से पुराने नोटों को बदलवाने में नाकामयाब हो रहा है।

  पर वह इस मौसम का क्या कर सकता था जो अब चिनार के साथ उस पर भी बैठने लगा था। कई रंजना अग्रवाल उसके मन में आए थे…..कि क्या वह भी इस चिनार का ही कोई प्रतिरूप है……क्या वर्ष भर के सारे मौसम उस पर भी ऐसे ही आकर बैठ जाते हैं……..उसका या किसी का भी जीवन इसी चिनार जैसा है…..? उम्र के अंतिम पड़ाव में आदमी का जीवन भी सभी मौसमों से विछिन्न हो जाता है। पर एक मौसम हमेशा उसका साया बनकर उसके साथ अंत तक होता है, कभी विलग नहीं होता–पतझड़। वह निराश होकर कभी उस बैंच को देखता। कभी चिनार को तो कभी अपने ढलते जीवन को। तभी उसे लगता जैसे वह चिनार उससे बतियाने लगा हो…….उस से कह रहा हो कि….देखो मैं भी तो सर्दी में ठिठुरता रहता हूं। सांस भी नहीं ली जाती। फिर भी मुझे डट कर इन प्रतिकूलताओं का सामना करना है, ताकि मौसम खुद-ब-खुद चल कर आए और फिर से मुझे हरा-भरा करे। देखो, मैं कहीं नहीं जाता। एक जगह अडिग रहता हूं। भयंकर अंधेरों में भी। तूफानों में भी। मुसलाधार वर्षा में भी और बर्फ के दिनों में भी।

  इन्हीं खयालों में खोया वह बैंच की तरफ बढ़ा और हाथ से सारे पत्ते हटा लिए। फिर अपनी जेब से रूमाल निकाला और उस पर जमी धूल की परत को साफ कर दिया। बैंच पहले जैसा चमकने लगा था। पता नहीं कितने दिनों से उस पर कोई नहीं बैठा होगा।…..क्या लोग अब किसी पेड़ की छांव में नहीं बैठते होंगे…..क्या लोगों ने अब आराम करना छोड़ दिया होगा…क्या अब सभी के भीतर पतझड़ घुस गया होगा…..उसके मन में ऐसे कई विचार कौंधे और चले गए। उसने महसूस किया कि जैसे चिनार और बैंच उसके जीवन के दो छोर हो। एक जीना सिखा रहा है और दूसरा घड़ी-दो घड़ी उस जीने को ठहराव दे रहा है। यह ठहराव आराम है, जो जीवन का अभिन्न अंग है। इसी के साथ उसने एक ओर बैग रखा और बैठ गया था।

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आज वह बैंच के मध्य नहीं बैठा। किनारे बैठ गया था। इसलिए ही कि शायद कोई दूसरा थका हारा, उस जैसा, आए तो पल दो पल यहां आराम कर ले। बैठते-बैठते उसे नई सरकार के बदलने के बाद के कई परिदृश्य याद आ गए। अचानक वह एंटी रोमियो सेना और गौरक्षक की कुछ असभ्य वारदातों के मध्य उलझ गया। पिछली रात जो कुछ समाचार उसने अपने और कई दूसरे शहरों के देखे-सुने उन्होंने उसे बहुत विचलित कर दिया था।…बैंकों के बाहर लम्बी कतारें, लोगों का आक्रोश, पुलिस का लाठीचार्ज और लड़का-लड़की को एक साथ देख कर पुलिस और लोगों द्वारा उनकी पिटाई। वह उन स्मृतियों और छवियों को अपने मन से ऐसे बाहर निकालने का प्रयास करता रहा जैसे कोई कोट पर बैठी धूल को झाड़ता है, लेकिन उन समाचारों या घटनाओं के धुंधलेपन को वह झाड़ने और बाहर निकालने में पूरी तरह नाकाम रहा था। वह उसी तरह बैंच पर बैठ गया कि दो-चार घड़ी सुकून से गुजारेगा।

  वह अभी बैठा ही था कि सामने से एक लड़की आती दिखाई दी। उसने अंदाजा लगाया कि उसकी उम्र सात या आठ बरस होगी। उसके हाथ में आइसक्रीम थी। उसकी नजर अचानक लड़की के दांई ओर पड़ी, जहां एक बंदर आइसक्रीम को झटकने की ताक में था। वह झटके से उठा और उसे पकड़कर बैंच तक ले आया। लड़की बंदर को देखकर घबरा गई थी। उसने उसे अपने साथ बिठा दिया। उसका दिल जोर जोर से धड़क रहा था। वह स्थानीय नहीं थी। बाहर से अपने परिजनों के साथ घूमने आई थी। उसने उसकी पीठ सहलाई और ढाढस बंधाया कि उसे डरने की आवश्यकता नहीं है। लड़की थोड़ा सहज होकर जल्दी-जल्दी बची हुई आइसक्रीम खाने लगी। वह इधर-उधर देखता रहा कि उसके परिजन उसे लेने आएंगे पर पता नहीं वह उसे छोड़ कहां निकल पड़े थे। वह यूं ही उससे बातें करने लग गया था।

  तभी अचानक दो तीन पुलिस वाले कुछ युवाओं के साथ वहां धमक पड़े। नौजवानों के गले में एक विशेष रंग के पट्टे थे जिन पर लिखा था एंटी रोमियो सेना। उसे कुछ समझ नहीं आया। तभी एक पुलिस वाले ने पूछ लिया,

  ‘तुम्हारी लड़की है’

  ‘नहीं तो…।’

  ‘फिर ये इधर कैसे…’

  वह कुछ बोल पाता, पीछे से एक नौजवान ने आकर सीधा उसका कालर पकड़ लिया।

  ‘हम बताते हैं न अंकल। ऐसे ही तुम इसे फुसलाओगे, बहलाओगे और गलत काम करके निकल जाओगे। जानते हैं हम तुम जैसे बूढ़ों को। ले चलो इसे पुलिस थाने।’

  उस नौजवान की हरकत से पुलिस वाले एक पल के लिए भौचक्क रह गए पर क्या करते अब माहौल ही इसी तरह का था।

  उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा है। उस नौजवान ने उसका कालर अभी भी पकड़ा हुआ था। उसने पुलिस वालों की तरफ इस आस के साथ देखा कि वे इस बदतमीजी के लिए उसकी मदद करेंगे। जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उसने झटके से उस नौजवान का हाथ कालर से हटा दिया। झटका इतना तेज था कि वह तकरीबन दस फुट दूर औंधे मुंह गिर पड़ा।

  ‘तुमको इतनी भी शर्म नहीं है कि सीनियर लोगों से कैसे बात करते हैं। मैं तुमको बदमाश, गुण्डा दिखता हूं …?’

कालर सीधा करते हुए वह उन नौजवानों और पुलिस वालों पर टूट पड़ा था। उन्होंने सोचा भी नहीं था कि पतला-दुबला दिखने वाला वह आदमी पल भर में एक हंगामा खड़ा कर देगा। वे कई लोग थे। उसे क्या मालूम कि अब इस तरह कोई अधेड़ या युवा किसी लड़की के साथ नहीं बैठ सकता। साथ नहीं चल सकता। कोई बच्ची भी किसी पराए आदमी के साथ नहीं बैठ सकती।

  काफी देर वहां हंगामा होता रहा और आखिर उसे पुलिस वालों के साथ थाने में जाना पड़ा। बच्ची के परिजन अभी भी नहीं आए थे।

  पुलिस स्टेशन में जब उसे ले जाया गया तो वह गुस्से से तमतमाया हुआ था। भीतर जाते ही उसने जेब से अपना फोन निकाला और सीधे सिटी के एस0पी0 को लगा दिया। पुलिस वालों ने कभी सोचा भी नहीं था कि इस तरह कुछ हो जाएगा। इससे पहले कि पुलिस वालों को बात समझ आती उसने सारी बात एसपी को बता दी थी। एस.पी ने इस मध्य चौकी इन्चार्ज से बात कर ली थी। चौकी प्रभारी ने स्थिति को ज्यादा बिगड़ने नहीं दिया और समझा बुझा कर इस मामले को खत्म करवा लिया। शायद अब पुलिस वालों और उन नौजवानों को थोड़ा एहसास हुआ होगा कि उन्होंने बिन वजह ही यह हंगामा कर दिया। लड़की अभी भी सहमी हुई थीं। इसी बीच उसके परिजन वहां पहुंच गए थे। पुलिस वालों ने उसे उनके हवाले कर दिया।

  इस छोटे से वाकये ने उसे भीतर तक हिला दिया था। वह सड़क पर चल तो रहा था लेकिन उसे लगा जैसे उन नौजवानों के गले के पट्टे उसके अपने गले में फंसने लगे हों। वह चलते-चलते जैसे उनको गले से उतार कर फैंकने की कोशिश कर रहा हो। उसने इस तरह कई बार कोशिश की लेकिन गले में कुछ नहीं था। वह सड़क में सभी से बच कर चल रहा था। विशेषकर उसे कोई बच्ची या लड़की दिखती तो उसकी सांसें रूक जाती। वह झटपट उनसे दूर हो जाता या भाग कर निकल पड़ता। राह चलते लोगों की आंखें उसे दूर तक जाते देखती रही। उन्हें वह शायद साधारण आदमी नहीं लग रहा था…..कोई मानसिक विक्षिप्त व्यक्ति जो इस तरह की सायास हरकतें करता चला जा रहा है। उसे इस बीच कोई भी परिचित नहीं मिला। वह अपने साथ हुई और अपने द्वारा की जा रही तमाम बातों से इस तरह परेशान हो गया जैसे उसने न जाने आज कितनी शर्मनाक हरकतें कर ली होंगी। शर्म जैसी कोई चीज उसके शरीर और भीतर तक ऐसे महसूस हुई जैसे किसी मोबाइल या कम्प्यूटर में कोई खतरनाक वायरस घुस गया हो। फिर लगा कि यह वायरस कहीं उस नई सरकार के साथ-साथ तो नहीं चला आया है जो इस शहर जैसे कई शहरों में घुस कर उसे अशांत कर देगा। घर तक वह कई ऐसी बातें सोचता रहा था जिनका कहीं कुछ औचित्य नहीं था पर वे जैसे होने को तैयार बैठी थीं। घर पहुंच कर उसे कुछ राहत महसूस हुई पर न जाने क्यों उन पट्टों पर लिखा ‘एंटी रोमियो’ और थोड़ी देर मस्तिष्क में कौंधा ‘वायरस’ शब्द उसकी आंखों में घुस गए। वह सीधा बाथरूम गया और पानी से आंखें धोता रहा। वे शब्द अब आंखों के पारों से निकल कर अपने कानों में पसरते लगे। उसने दांए और बांए हाथ की तर्जनी से कई बार कान खुजलाए लेकिन लगा कि वे कहीं उसके भीतर घुस कर बैठ गए हैं।

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  उस दिन के बाद कई शब्द जैसे उसकी आंख, कान, गले और मस्तिष्क में चिपक गए थे। कभी वे आंखों में चुभने लगते तो अजीब तरह से आंखे इधर-उधर घुमाता। खोलता और बंद कर देता। दूसरे पल कान खुजलाने लगता। उन्हें कुछ पल बंद किए रखता। फिर उसके हाथ अनायास ही नाक के नथूनों को बांए हाथ की तर्जनी और अंगूठे से बंद कर लेते। वह भीतर ही भीतर कपाल-भाती जैसा कुछ करता और जोर से उज्जैयी प्राणायाम की मुद्रा में आ जाता।

  आज फिर सीधा वह बैंक चला गया था। लोगों की पंक्तियां अभी भी समाप्त नहीं हुई थीं, जैसे सभी काला धन लेकर बैंक के बाहर खड़े हों। बहुत मशक्कत और जद्दोजहद के बाद भी वह अपने नोट नहीं बदलवा पाया। वह पिछले कई दिनों से देख रहा था कि एक पतली सी अधेड़ महिला लाठी के सहारे जब भी आती तो सबसे पीछे पंक्ति में खड़ी हो जाती। कुछ देर के बाद वह बैठ जाती। फिर उठती और कुछ हिम्मत जुटा कर लाइन में लग जाती। अचानक वह खांसने लगती तो जैसे सारे शरीर का बोझ दोनों हाथों की हथेलियों से जमीन में गड़ाई लाठी पर सिमट जाता। वह काफी आगे लोगों के मध्य खड़ा होकर उसे देखता तो लाइन तोड़ कर उस औरत को अपनी जगह खड़ा करने का प्रयास करता। लोगों की असंवेदनशीलता और अधैर्य इतना हो जाता कि वह जहां से पंक्ति से बाहर होता उस औरत के वहां पहुंचाने तक लोग एक दूसरे से चिपक जाते और उसे उनसे बहुत अनुनय करके उसे वहां खड़ा करना पड़ता। परन्तु वह देखता कि उसका भी कोई लाभ उस बेचारी को नहीं मिलता और वह दिनभर उसी हालत में खड़ी रहती।

  एक दिन पंक्ति में खड़ी-खड़ी वह अचानक गिरी और बेहोश हो गई। उसने अपने नोटों की परवाह न करते हुए तत्काल उसे अपनी बोतल से पानी पिलाया और 108 एंबुलैंस को बुला कर अस्पताल भिजवा दिया। वह कभी उससे उसके परिजनों के बारे में भी नहीं पूछ पाया। न ही उसने कभी किसी और को उसके साथ देखा। जब उसे एम्बुलैंस में स्ट्रेचर पर रख रहा था तो उसकी मुट्ठी में एक नोट दिखा। उसने धीरे से उसे खींचा और देखा कि वह पांच सौ का पुराना नोट है। वह अचम्भित रह गया कि महज पांच सौ रूपए के लिए वह बेचारी इतने दिनों से परेशान थीं। उसने नोट को अपने पास रख कर अपनी जेब से सौ-सौ के दस नोट निकाले और 108 में सेवारत महिला डाक्टर की उपस्थिति में उसकी जेब में डाल दिए। वह उस के साथ जाना चाहता था पर खुद भी कई दिनों से नोट बदलवाने और जमा करने के चक्कर में परेशान था। इसलिए उसका जाने का मन नहीं हुआ। उसने देखा कि जहां वह खड़ा था वहां अब लोग एक दूसरे से चिपक गए थे। वह अपनी जगह खड़ा होना चाहता था लेकिन लोगों ने उसे लाइन में पीछे खड़े होने के लिए बाध्य कर दिया। सभी के सामने वह घटना घटी थी और वे जानते थे कि उसने लाइन से बाहर होकर एम्बुलैंस बुलाई थी पर किसी को उससे कोई लेना-देना नहीं था। वह आहत, अपराजित, असहाय सा चुपचाप सबसे पीछे खड़ा हो गया था। अब उसने महसूस किया कि वह अधेड़ औरत उसके भीतर पसर गई है। उसने अपने शरीर को बेतहाशा भारीपन से लबरेज महसूस किया और एक पल के लिए जमीन पर बैठ गया। उसे दिमाग में वह पांच सौ का नोट घुसता महसूस हुआ। इस बीच बैंक में लंच हो गया और सभी को दूसरे दिन आने की हिदायत दे दी गई थी कि आज नोट नहीं बदलवाए जाएंगे।

  लोग धीरे-धीरे लाइनों से बाहर हो लिए। सभी के चेहरों पर अपने ही पैसों के बोझ की ऐसी विकट थकान थी जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता था। केवल देखा और परखा जा सकता था। महसूस किया जा सकता था। वह बैठा-बैठा सभी के चेहरों की उस थकान को अपने भीतर कुछ देर जुगालता रहा और फिर ऐसे उठा जैसे टांगों में जान ही नहीं रह गई हो। उसका एक मन हुआ कि वह अस्पताल जाकर उस औरत की सुख-सांद लें पर दूसरे पल सोचा कि इतने बड़े अस्पताल में बिना उसका नाम-पता जाने उसे कहां तलाश करेगा।

  चलते-चलते उसने अपने भीतर पता नहीं कितने शब्द उठते-बैठते, बिलखते, अटपटाते, चीखते, विलगते महसूस किए थे……..सरकार, रोमियो, नोटबंदी, पुलिस, लड़की, आईसक्रीम, चिनार, मौसम, 108 एम्बुलैंस और पांच सौ का नोट…..ये शब्द नहीं जैसे नुकीली छुरियां हों जो उसे भीतर ही भीतर घोंपती चली जा रही हो।

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थका हारा वह बैंच तक गया और हाथ से पत्तों को साफ करके वहां बैठ गया। अब पत्ते कम होने लगे थे। जैसे वे अपने-अपने घर चले गए हों और जो कुछ बिरल चिनार की टहनियों और बैंच तथा उसके आसपास थे वे मानों किसी का इंतजार कर रहे हों।

  संयोग से उस दिन उसे मिलने कोई नहीं आया। उसे पेड़ पर हल्की सी कांव-कांव की आवाज सुनाई दी। ऊपर देखा तो एक कौवा बैठा उसी की तरफ नीचे देख रहा था। सोचा वह भूखा होगा। उसने उठ कर पास वाली दुकान से एक बिस्कुट का पैकिट लिया। उसे खोला और दो बिस्कुटों को कुतर-कुतर कर बैंच के बांए किनारे डाल दिया। कौवा पेड़ से आकर उन्हें खाने लगा। इसी तरह लगभग पांच मिनट की अवधि में उसने कौवे को सारे बिस्कुट खिला दिए। वह खुश हुआ कि उसकी सेवानिवृत्ति के बाद बैंच और चिनार के साथ उसका एक और दोस्त भी हो गया है। वह इस बात के लिए अपने को धन्य समझ रहा था कि उसने अपने पित्रों को आज खुश कर दिया है। बचपन में स्कूल के समय जब गांव में श्राद्ध होते तो उसकी दादी और अम्मा दोनों मिलकर पहले कौवों को खाना खिलाया करतीं थीं। दादी एक थाली में रोटी के टुकड़े करके आंगन की मुंडेर से ‘आओ कागा,  आओ कागा,  बोल कर आवाजें लगाती तो कई कौवे पलक झपकते ही वहां आ जाते और सारी रोटियां खा जाते। उसके बाद जब वह शहर आया,  जैसे कौवों को देखना ही भूल गया। कभी कभार ही ऐसा होता कि कोई कौआ उसे कहीं पेड़ पर चुपचाप बैठा दिखाई देता। उनकी नस्लें जैसे गुम होने लगी थीं। कौवा तो उड़ गया था लेकिन ‘कौआ’ शब्द उसके सीधे मन में बैठ गया।

  वह बैंच से उठा और घर की तरफ चलने लगा। बैग में रखा पुराने नोटों का बंडल इस दृष्टि से देखा-छुआ कि कहीं गिरा तो नहीं दिया है। एक छोटे से काम के लिए इतनी मशक्कत उसे शायद ही जीवन में करनी पड़ी हो। आज वह इसलिए भी अपनी ही नजरों में अपमानित महसूस कर रहा था कि पहली बार वह अपने परिवार का इतना छोटा सा काम नहीं कर पाया है। चलते-चलते किसी ने उसे बताया कि जिस अधेड़ महिला को उसने अस्पताल भिजवाया था वह अब नहीं रही।

  ‘वह बेचारी अपने सांजे हुए पैसे के लिए मर गई।’

  उसकी आंखें भर आईं थीं। वह उसे नहीं जानता था पर एक इनसानियत का रिश्ता तो था ही। फिर वह तो अभी भी शब्दों में उसके भीतर जिंदा थीं। उसे एकाएक वह कौआ याद आ गया। शायद वह मौत का संकेत लिए वहां आया होगा। उसे एक पल के लिए अच्छा लगा कि उस महिला के लिए ही कहीं वह बिस्कुट का श्राद्ध तो नहीं लगा होगा। अब दो और शब्द उसके भीतर पसर गए थे। श्राद्ध और कौआ। पर उन सब पर भारी ‘मौत’ शब्द था जिस पर वह कई तरह से सोच रहा था। यह बात उसके भीतर कहीं चिपक गई थी कि इस आजाद देश में और वह भी इक्कीसवीं सदी के समय में कोई अपने ही पैसे बैंक से लेने लिए कैसे मर सकता है ? पर सच तो यही था।

  वह आज बहुत निराश, आहत और दुखी मन से घर पहुंचा। कई पल दरवाजे के बाहर ऐसे खड़ा रहा जैसे किसी अजनबी घर के बाहर खड़ा किसी का पता ढूंढ रहा हो। बहुत हिम्मत से उसने डोरबैल दबा दी। पत्नी ने दरवाजा खोला था। आज पत्नी ने उसे नहीं टोका कि नोट बदले या नहीं। वह जानती थी कि इन दिनों किसी बुजुर्ग का लाइन में खड़ा होना कितना खतरनाक हो रहा है। टीवी पर दिखाई जाने वाली खबरों से वह पूरी तरह वाकिफ हो गई थीं। वह दबे पांव हारा हुआ सा अपने कमरे में चला गया। आज उसे दरवाजे के पास बूट खोलने की याद भी नहीं रही। उसकी पत्नी ने ही उसके बूट उतारे थे और सामने एक पानी का गिलास रख दिया था। उसने एक ही घूंट में पूरे गिलास को भीतर उड़ेल दिया। बहुत राहत मिली उसे। लगा कि जितने भी शब्द भीतर जोश में उछाल मार रहे थे, वे पानी में कहीं विलुप्त हो गए हैं।

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  उसे नींद आनी कम हो गई थी। वह देर रात तक खबरें देखता और सुनता। उसने अपने जीवन में अखबार और टीवी समाचारों को कभी इतनी गंभीरता से नहीं लिया था, जितना अब लेने लगा था। पहले तो काम के बोझ से वह समय ही नहीं निकाल पाता था। उसने आज एक टीवी रिपोर्ट देखी थी जिसमें भारत में हुए आतंकी हमलों के साथ-साथ दुनिया में हुए कुछ बड़े नर संहारों को भी दिखाया गया था। साथ ही अपने देश में किसानों को किस तरह आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़ रहा है, इस पर कुछ निष्पक्ष विशेषज्ञों की बहस आयोजित की गई थी। 1990 के बाद जिस तरह की परिस्थितियां देश में उत्पन्न हुई, उसने अब तक लाखों किसानों को आत्महत्या करने पर विवश कर दिया। सत्ताएं अपने स्वार्थ और अतिजीविता के लिए कितनी क्रूर और आततायी हो सकती हैं, ये रिपोर्टें उसका अभूतपूर्व उदाहरण थीं।

  एक चैनल पर देश में मासूम लोगों पर गौ-रक्षकों के हमलों से मारे गए कुछ अल्पसंख्यक और दलितों के बारे में रिपोर्ट दिखाई जा रही थी।

  वह इन रिपोर्टों को देखकर बहुत विचलित हो गया था। उसके दिमाग में पहले से घुसे कई शब्दों के बीच अब आत्महत्याएं, आतंकी हमलें, नरसंहार और गौ-रक्षक जैसे शब्द ऐसे घुस गए थे कि वह बार-बार उन्हें याद करके भयभीत होने लगा था। इन शब्दों को अपने दिमाग से कई बार बाहर निकालने का प्रयत्न किया पर उसे लगा जैसे ये शब्द फेबीकोल के जोड़ की तरह मजबूती से भीतर फंस गए हैं।

  उसने अपना कम्प्यूटर बंद कर दिया और अरामदेय कुर्सी पर पीछे की तरफ गर्दन लटकाए आंखे बंद करके बैठ गया। उसने लाइट बुझा दी थी। वह चाहता तो अपने दिमाग को आराम देने की गरज से सो भी सकता था परन्तु उसे लगा कि वह कुर्सी पर आगे-पीछे झूल कर थोड़ी राहत महसूस कर लेगा। पर ऐसा नहीं हुआ। उसका विचलन बढ़ता ही गया। उसने जो टीवी में देखा था और जो कुछ समय-समय पर अपनी स्मृतियों में संजोया था उसके धुंधले से परिदृश्य भीतर उमड़ने-घुमड़ने लगे थे। उसे पहले मुंबई का छग्ब्बीस ग्यारह याद आया। फिर अमेरिका का नौ ग्यारह और पेशावर के स्कूल में मारे गए बच्चे याद हो आए। फिर न जाने दुनिया के कितने आतंकी हमलों ने उसे घेर लिया। उसने अपने भीतर ऐसा घमासान महसूस किया जैसे अभी एक विस्फोट हो जाएगा और अपने घर समेत उसके परखचे उड़ जाएंगे। उसने अंधेरे में ही मेज पर रखी पानी की बोतल का सारा पानी एक सांस में गटक लिया। भीतर ऐसे लगा जैसे ठंडा पानी गर्म तवे पर गिरा हो। वह अप्रत्याशित काले धुंए के मध्य घिर गया और कुर्सी से उठ कर बदहवास सा अंधेरे कमरे में भागता रहा। कुछ देर बाद अचानक एक निस्तब्धता कमरे में पसर गई। उसने सोने का जैसे ही प्रयास किया उसके सिरहाने दुनिया के कई नरसंहार आकर बैठ गए थे।

उसे पहला विश्वयुद्ध याद आया जिसमें अंदाजन एक करोड़ लोगों की जानें चली गई थीं। इससे कहीं अधिक बीमारियों और कुपोषण से मर गए थे। आर्मीनिया उस समय आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद सम्पन्न था। यह नरसंहार आर्मीनियाइयों के प्रति तुर्की सरकार की गहरी नफरत का नतीजा था। वह यह सोचकर दहल गया कि किस तरह सैंकड़ों लेखकों, पत्रकारों, वैज्ञानिकों और अन्य बुद्धिजीवियों को पकड़ कर विशाल रेगिस्तानों में मरने के लिए छोड़ दिया गया था। मजदूरों और आमजन तो कीड़े-मकोड़ों की तरह मसल दिए गए थे।

  अब दूसरे विश्वयुद्ध का नरसंहार हिटलर के रूप में उसकी छाती पर बैठ गया। उसकी आंखों में करीब सात करोड़ लोगों की लाशें तैरने लगी। हिटलर उसे बहुत याद आया क्योंकि वह अपने ऑफिस में अपने कई उच्चाधिकारियों को हिटलर के नाम की संज्ञा देकर नवाज चुका था। हिटलर ने किस तरह अपनी डेथ यूनिट्स को बेरहमी से यहूदियों को कत्ल करने के आदेश दे दिए थे और देखते ही देखते साठ लाख से ज्यादा यहूदियों को बेरहमी से मार दिया गया। उसके तुरन्त बाद उसे हिरोशिमा और नागासाकी याद आ गए। उसका कलेजा जलने लगा जैसे वह भी कहीं ‘लिटल बॉय’ और ‘फैट मैन’ परमाणु बमों के घ्वंस के मध्य आखरी सांस ले रहा हो। उसकी सांसे तेज-तेज चलने लगी थीं। वह बिस्तर से उठना चाह रहा था लेकिन उसे लगा कोई भारी चीज उसे दबाए हुए है।

  काफी देर बाद वह उठ कर बैठ गया था। उसने शांत होने के लिए ओम का मन ही मन उच्चारण आरम्भ कर दिया। लेकिन वे नरसंहार पहले से ज्यादा मुखर होकर कमरे के अंधेरे खोह में विचरने लगे और एक-एक कर पुनः उसके कानों से होते हुए मस्तिष्क में घुसने लगे थे। इस बार उसे चीन के नरसंहार ने परेशान किया जो दुनिया के सर्वाधिक क्रूरतम नरसंहारों में से एक था। उसे अचानक चीनी साम्यवादी नेता माओत्सेतुंग याद आ गए। जिसने भी माओ की सरकार का विरोध किया था वे मौत के घाट उतार दिए गए।

  तदोपरान्त उसके दिमाग में बारी-बारी चलचित्र की तरह युगोस्लाविया, यूगांडा, पूर्वी पाकिस्तान, चिली, कंबोडिया, इथोपिया, इरान, अफगानिस्तान, श्रीलंका और फिलीस्तीन के नरसंहार घूमने लगे थे। उसने मन को थोड़ा एकाग्र और शांत करने के लिए भ्रामरी प्राणायाम का सहारा लिया। उसी बीच वह अपने बाल्यकाल में लौट आया जब वह 10-12 साल का रहा होगा। उसके दादा उस समय शहर में एक अंग्रेज अधिकारी के पास रसोईए का काम करते थे। देश आजाद हुआ तो उसके दादा का अंग्रेज अफसर भी देश छोड़ कर चला गया। दादा फिर काम की तलाश में शहर ही रहे। दादा बताते थे जब देश का बंटवारा हुआ तो कितने लोगों का कत्ल हो गया। भाई-भाई, पड़ोसी-पड़ोसी एकाएक कैसे एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे।

  अब वह भ्रामरी मुद्रा में ही 1984 में पहुंच गया। उसके सामने हजारों सिक्ख भाईयों की लाशों के ढेर बिछ गए। फिर वह 2002 में चला आया और मुसलमान भाईयों के कत्लेआम का साक्षी बन बैठा। वहां से निकला तो किसानों की आत्महत्याओं के मध्य फंस गया। एक पल उसे लगा जैसे वह अपने ही पंखे से लटक गया है और घुट-घुट के मर रहा है। उसने भ्रामरी मुद्रा तोड़ी और दोनों हाथों से गला ऐसा पकड़ा जैसे फांसी की रस्सी को खींच कर निकाल रहा हो। पर वहां कुछ नहीं था। उसकी गर्दन में अथाह पीड़ा होने लगी थी। वह महसूस करने लगा कि उसके पास लाखों का कर्ज है…..साहुकारों और बैंक के दलाल हाथ में डंडे लिए उसके दरवाजे पर खड़े हैं…..जैसे वे उसकी ज़मीन हथिया लेंगे…गौशाला से बैलों को खोल कर ले जाएंगे…उसकी पत्नी और बेटियों से बदसलुकी करेंगे…..? मानो अब उसके पास कोई रास्ता नहीं है और वह अपने कमर में लपेटी चादर को पेड़ में बांध कर उस में लटक गया है….?

  उसे महसूस हुआ कि उसका रक्तचाप बढ़ रहा है। उसने तत्काल बिजली जला दी थी। वह दूसरे कमरे में सोई पत्नी को उठा कर रक्तचाप मापने की मशीन को मंगाकर अपना रक्तचाप देखना चाहता था लेकिन उसकी नजर जब घड़ी पर पड़ी तो वह रूक गया। रात का एक बज रहा था। उसने बिजली बुझा दी और पुनः सोने का प्रयास किया। लेकिन नींद कोसों दूर भाग गई थी। अंधेरे में जैसे ही आंखें बंद कीं उसे कुछ बड़ी राजनीतिक और बौद्धिक हत्याएं याद आ गईं। उसके मस्तिष्क में पहले कई राजनेता आए और बाद में एक-एक कर सफदर हाशमी, दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी बैठ गए। वह सोचता रहा कि स्वतन्त्र अभिव्यक्ति, विचार, लेखन और अभिनय भी कितने घोर अपराध की श्रेणी में आते होंगे कि उसके लिए सत्ता या उसके अंधभक्त उनका खून कर दें। वह सिहर उठा। उसे अपने शरीर में ऐसी कंपकपी महसूस हुई कि बाहर बर्फ गिर रही हो। उसने पास पड़ी रजाई से अपने शरीर को ढक लिया। धीरे-धीरे मन का विचलन, मस्तिष्क की थकान और परेशानियां उसकी आंखों के भीतर पसरने लगी और वह बेहोशी की जैसी हालत में अपने को महसूस करने लगा। अचानक उसे जयपुर में गाय खरीदते हुए पहलू और उसके चार साथी याद आ गए। उसके बाद राजस्थान का अलवर, आन्ध्रप्रदेश का पूर्वी गोदावरी जिला और गुजरात का ऊना याद आया जहां गौ-रक्षकों ने दलितों की न केवल पिटाई की बल्कि कुछ को मार भी दिया था। उसे इस तरह के अनगिनत किस्से याद आए जो सरकार के बदलने के बाद इस देश में आए दिनों हो रहे थे।

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  उसे नहीं पता सुबह कब हो गई। परन्तु उसकी आंखों में नींद की वजह से अजीब सी ऊंघ पसर गई थीं। वह रात भर जो कुछ भी मन की आंखों से देखता रहा उसकी धुंधली सी छवियां अभी तक आंखों में बसी थीं। उसने उठ कर कई बार आंखों में पानी मारा और कुछ देर पलकों को यूं झपकाता रहा जैसे उनके बाहर-भीतर नरसंहार और हत्याओं के कुछ बारीक कतरे फंसे हों।

वह रोज की तरह तैयार होकर बैंक के लिए चल दिया। उसने अपने बैग में रखे पुराने नोटों के बंडल को हाथ से छुआ। आश्वस्त होकर बाहर निकल गया। पत्नी ने उसके चेहरे पर जब नजर डाली तो घबरा गई। उसे ऐसा महसूस हुआ कि वह एक रात में ही इतना कैसे बूढ़ा गया है। उसका मन हुआ कि उसे आज न जाने के लिए कहें, पर पैसे याद आ गए। समय रहते नहीं बदले तो नोट बेकार हो जाएंगे।

अपने से उसने पूरा प्रयास किया कि वह जल्दी जाकर बैंक की पंक्ति में खड़ा हो जाए, लेकिन आज भीड़ पहले से ज्यादा थीं। उसने देखा कि पंक्तियों में असंख्य बिहारी, नेपाली और उत्तर प्रदेश के मजदूर अपनी पासबुकें हाथ में लिए खड़े हैं। कई नेपाली औरतों की पीठ पे बच्चे हैं। उसी भीड़ में कई गांव के किसान भाई भी हैं। मजदूरों का कहना था कि वे अपने खाते बंद करवा रहे हैं क्योंकि अब शहर में काम नहीं रहा। ठेकेदारों के पास पैसे नहीं है। वे अपने-अपने गांव लौट जाएंगे। किसान कह रहे थे कि बिना पैसों के उनके छोटे-छोटे काम रूक गए हैं। खेतीबाड़ी चौपट है। ब्याह-शादियां बंद हो गई हैं। यहां तक कि दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हो रही। उसके साथ ही दो-तीन पत्रकार भाई भी थे, जिनके चेहरे से लग रहा था कि उनकी कलम कई दिनों से उनके झोले में बंद पड़ी है और वे लाइनों में या तो नोट बदलवाने या कुछ पैसे निकलवाने के लिए रोज आकर खड़े हो जाते हैं।

  उसका मन लाइन में खड़े होने का नहीं हुआ। उसने दो-चार चक्कर भीड़ के आसपास ऐसे लगाए जैसे वह किसी अखबार का रिपोर्टर हो या किसी एजैन्सी का निरीक्षक। उदास-हताश वहां से आते हुए उसका मन कॉफी पीने का हुआ। पहले उसने सोचा कि वह कॉफी हाउस चले लेकिन वह आज किसी शांत-एकांत जगह पर बैठना चाहता था। कॉफी हाउस के मिजाज से तो वह वाकिफ था कि वहां कितना शोर होता है।

चलते-चलते अब उसके मस्तिष्क में मजदूर, किसान और पत्रकार-लेखक जैसे कुछ और शब्द पसर गए थे जो भीतर पहले विराजमान शब्दों पर भारी पड़ते महसूस हुए। उसे पंक्तियों में इसी तरह के आमजन खड़े मिल रहे थे। जो सम्पन्न थे, या रसूखदार या राजनीति से जुड़े नेता या अफसर, उन्हें तो उसने कभी पंक्तियों में खड़े नहीं देखा। वह सोचने लगा कि क्या यह नोटबंदी हम जैसे आम लोगों के लिए ही है…क्या उन लोगों के पास….पांच या हजार रूपए के नोट नहीं होंगे……क्या उन्हें पैसों की आवश्यकता नहीं होगी…?

यह सब सोचते हुए वह शहर के सबसे बढ़िया रेस्तरां में घुसा और एक किनारे की मेज पर बैठ गया। वेटर ने जैसे ही पानी के गिलास के साथ मैन्यू मेज पर छोड़ना चाहा उसने कोल्ड कॉफी का आर्डर दे दिया। वह यह तय करके कतई नहीं आया था कि कोल्ड कॉफी पियेगा। उसे यदि कुछ ठंडा ही लेना था तो वह बाहर आईसक्रीम या साफ्टी भी ले सकता था, यह सोचते हुए उसे पास ही से ‘चट’ की आवाज सुनाई दी। यह उसे साधारण आवाज नहीं लगी। पता नहीं इस आवाज में ऐसा क्या था कि वह सीधे उसके मस्तिष्क में चुभती हुई दिल पर बैठ गई। उसने सामने ध्यान से देखा। वहां फ्लाई किल्लर लगी थी जिसके समीप जैसे ही कोई मक्खी जाती, चट की आवाज से उसके छिछड़े उड़ जाते। हालांकि उसने किसी मक्खी को मरते हुए नहीं देखा था परन्तु उस मौत की आवाज ने उसे परेशान कर दिया। इसी बीच वेटर कॅाफी लेकर आ गया और मेज पर रखते हुए उसने दो सौ रूपए थमाकर बिल काटने के लिए कह दिया। जैसे ही उसने कॉफी का गिलास मुंह तक लाया पुनः दो-तीन आवाजें उससे टकरा गईं। उसने पूरा गिलास पानी की तरह गटक लिया और यह भी नहीं सोचा कि आस-पास बैठे लोग उसे क्या कहेंगे ? उसने बकाया पैसे भी नहीं लिए और रेस्तरां से उन मौत की भयंकर आवाजों के साथ बाहर निकल गया। एक जगह खड़ा होकर सोचता रहा कि मौत किसी की भी हो शायद उसकी आवाजें ऐसी ही होती होंगी। उसे चिनार से अलग होते पत्तों का स्मरण हो आया और दिमाग पर जोर देकर सोचता रहा कि इस तरह की असंख्य आवाजें उसके भीतर पहले से मौजूद हैं। उसे एक पल के लिए अपने ऊपर गर्व हुआ कि वह दुनिया का शायद पहला आदमी होगा जिसने मौत की आवाज को इतने करीब से महसूस किया है। वह जानता था कि आए दिन रेस्तरां में ये आवाजें बहुतों के कानों तक जाती होंगी लेकिन उनके लिए तो ये आम आवाजें होंगी……केवल एक मक्खी के मरने की आवाज भर।

  वह जिस शांति के लिए रेस्तरां में गया था उसे उन मौत की आवाजों ने भंग कर दिया था। वह अशान्त मन से उसी बैंच पर बैठने चला आया। उसने देखा कि चिनार बिल्कुल नंगा हो गया था। बैंच के ऊपर और आसपास कुछ पत्ते जरूर औंधे मुंह से पड़े दिखे जिन्हें न जाने कितने पैरों ने मसल दिया होगा। उसके भीतर, बैंच पर बैठते-बैठते, उन पत्तों के मरने की आवाजें पसर गईं। वह उनकी वेदनाओं में खो गया। आज चिनार के पेड़ से पत्तों का यूं विलग हो जाना उसे अच्छा नहीं लगा। न ही रेस्तरां में उन निर्दोष मक्खियों का मरना ही। उसकी आंखें भर आईं। वह बहुत देर गर्दन झुकाए रोता रहा था। चिनार की तरह का अकेलापन उसने अपने भीतर महसूस किया। उसे पहली बार ऐसी आतंकानुभूति हुई जो इससे पूर्व उसने कभी महसूस नहीं की थी। वह अपने भीतर के इस मनोविकार में कई कुछ तलाशने लगा था….मन की अस्थिरता…… मस्तिष्क का असंतुलन…न्यूरोसिस या साइकोपैथी जैसा कुछ…या फिर इस चिनार के साथ-साथ उस पर वर्ष भर के मौसमों ने उसकी ज़ेहनीयत या मनोवृत्ति को बिल्कुल तबदील कर दिया है। वह अपने भीतर रिटायरमैंट से पूर्व के जीवन कुमार को ढूंढने लगा जो उसे कहीं नहीं मिला। उसकी जगह उसे अकर्मण्यता, अचेतनता, अजीवंतता, अवसाद और निराशा के चक्रव्यूह में फंसा एक दूसरा ही आदमी दिखाई दिया। वह कई बार खड़ा हुआ और बैंच के दांए-बांए बैठता रहा। उसने अपने को स्थिर करने का भरसक प्रयत्न किया। इस ठहराव में उसे एक बात यह सूझी कि वह व्यर्थ इतनी दुनिया की चीजों को अपने भीतर घुसा बैठा है जिसका शायद कोई मतलब नहीं हो….वह आग को शायद अपने दामन में ढकने का प्रयास कर रहा है। उसने एक गहरी सांस ली और आंखें बंद कर लीं। उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी आंख लग गई और किसी अचम्भित करने वाले स्वप्नलोक में चला गया।

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  स्वप्नलोक में उसने जिस दुनिया में प्रवेश किया वह उसके अपने देश जैसी नहीं थी। क्योंकि बचपन से लेकर सेवानिवृत्ति तक जो कुछ उसने देखा या महसूस किया उस जैसा वहां कुछ नहीं था। अपने देश में तो वह अभी 4-जी में ही जी रहा था जबकि जिस दुनिया में वह चला आया था वह 11-जी से भी आगे की दुनिया थी। वह यह देख कर स्तब्ध था कि इस अत्याधुनिक तकनीक से सम्पन्न इस दुनिया के राजा को किन्हीं तीन लोगों की तलाश थीं जिन्होंनें उसका जीना हराम कर रखा था।

  उसने अपने को जहां खड़ा पाया, सामने भीतर प्रवेश के लिए एक विशालकाय गेट था जिसे सोने, चांदी और हीरों से मढ़ा गया था। उसके बीच कई रंगों में नहाई कुछ पक्तियां लिखी थीं जो रोशनियों के साथ रंग बदलती रहती थीं। शीर्ष पर लिखा था —11 जी राष्ट्र। बहुत संकोच से उसने जब भीतर प्रवेश किया तो उसे किसी ने नहीं रोका। वह बहुत भय और संभल के चला जा रहा था। परन्तु सड़कों पर चलते हुए उसे गजब का सुकून महसूस हो रहा था। बहुत देर तक वह इसी में खोया रहा। अचानक कोई चीज उससे टकराई और वह गिरते-गिरते बचा। इधर-उधर देखा, कुछ दिखाई नहीं दिया। वह आगे चलता रहा। चलते-चलते उसे महसूस हुआ कि उसके कंधो पर कोई चीज है। उसने कई बार अपने कंधे उचकाए। गर्दन आड़ी-तिरछी की। आगे-पीछे मुड़ा। सिर कई बार झाड़ा। लेकिन वह कुछ ऐसा था जो कंधे से हिलने का नाम नहीं ले रहा था। परेशान होकर जब वह एक पेड़ के नीचे खड़ा हुआ तो उसे एक आवाज सुनाई दी जिसे वह पहचान गया….कौए की आवाज। वह सोच में पड़ गया कि इस नई दुनिया में कौवा कहां से आ गया। कुछ और सोच पाता, कौवा आदमी की आवाज में बोलने लगा था।

  ‘सुनो जीवन कुमार! मैं भी तुम्हारे साथ हूं। तुम्हारे कंधे पर हूं। मैं पिछले कई सालों से भटक रहा था कि मुझे कोई सुरक्षित जगह मिले। मैं अब तक बहुत मुश्किल से अपने को बचाते हुए जिंदा हूं।’

  ‘पर कैसे ?’

  ‘मेरे पास उस राजा के कोट की 11-जी चिप जो है।’

  ‘मतलब….’

  ‘जैसे टू जी, थ्री जी, और फिर फोर जी। तुम तो अपने देश में फोर जी के माहिर थे। तुम्हारे देश में यही सबकुछ तो चल रहा है। बच्चों और बूढ़ों के हाथों में अब फोर जी-फोन हैं। लेकिन इस दुनिया में तो लोग ग्यारह जी तक पहुंच गए हैं।

  उसकी समझ में कुछ नहीं आया। कंधे उचकाते हुए चिढ़ कर उसने पूछा था,

  ‘तुम क्या बक रहे हो मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा है ?’

  ‘बताता हूं, बताता हूं। सब बताता हूं। मैं जानता हूं, तुम्हारी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। सुनो मैं विस्तार से समझाता हूं।’

  कौवा उसे पूरी कहानी सुनाने लगा था –

  इस दुनिया का जो राजा है वह पहले नमक बेचता था। उसने धीरे-धीरे इस धन्धे से अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया और नमक के व्यापार में देश-विदेश में मशहूर हो गया। वह जिसे भी नमक देता वह उसका दिवाना बनता गया। इसी नमक और अपने वाग्जाल की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते वह राजनीति में पहुंच गया। उस राजनीति की कई सीढ़ियां थीं। घर। पड़ोस। गांव। पंचायत। नगर। शहर। जिले। राज्य और उसके बाद देश। वह धीरे-धीरे देश के आखरी पायदान तक पहुंच गया और देश का एकस्व मुखिया बन गया। अपने झूठे प्रपंच और अनेक कारनामों से उसने देश में ऐसा जादू फैलाया कि वह उस देश का राजा घोषित हो गया। उसने अपने साथ बुर्जुवा किस्म के लोगों को लिया जिसमें अभिजात और रईस किस्म के लोग मौजूद थे। पूंजीवादी समाज का शासक वर्ग और उत्पादन के समस्त साधनों के स्वामी थे। उनके पास इतना पैसा था कि वे देश की 90 प्रतिशत जनता पर भारी थे। उन्होंने उस राजा को राजा बनाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया और अत्याधुनिक तकनीक से लैस कर दिया।

  लेकिन जैसे-जैसे दिन गुजरते रहे, उसके आगे अनेक समस्याएं खड़ी हो गईं। उसके देश में पच्चास प्रतिशत से ज्यादा ऐसे लोग थे जो भूखे थे। नंगे थे। गरीब दलित थे। किसान-मजदूर थे। लेखक पत्रकार थे। हड़तालें होती थीं। विपक्ष किसी को चैन से नहीं रहने देता था। एक तरफ उन साधन सम्पन्न लोगों का पैसा किसी न किसी योजना में लाभ देकर चुकाना था तो दूसरी तरफ वहां गरीबी और बेकारी की समस्याओं से निजात पाना था। धर्म और जाति के नाम पर रोज-रोज दंगे फसाद हो रहे थे। किसानों के पास जमीनें थीं पर वे अन्धाधुंध कर्जो में डूबे हुए थे। आए दिनों वे आत्महत्याएं कर रहे थे। उनकी जमीनों पर उन चन्द बनिया किस्म के लोगों की नजरें गड़ी थीं जो वहां बड़े-बड़े उद्योग लगाना चाहते थे। कामगरों के हाथों का काम अत्याधुनिक मशीनें छीने जा रही थीं। हर तरफ आक्रोश का माहौल बन रहा था। आतंकवाद जोरों पर था। लोग मर रहे थे। पानी के लिए लड़ रहे थे। धर्म एक दूसरे का दुश्मन हो गया था। ईश्वर और जानवरों के प्रतीक भयंकर नर संहार की ओर अग्रसर थे।

  इसीलिए राजा इन सभी समस्याओं से अलग व मुक्त दुनिया बनाना चाहता था। उसकी सोच में फटेहाल लोगों के लिए कोई जगह नहीं थी। वह नहीं चाहता था कि कोई गरीब या नंगा भूखा उसकी दुनिया में रहे। वह जानता था कि यदि गरीब मजदूर और किसान रहेंगे, विभिन्न संस्कृतियां और धर्म होंगे तो अखबारों और पत्रकारों की दुनिया चलेगी। नेताओं की दुनिया जीवित रहेगी। उसकी इच्छा थी कि उसका एकछत्र राज हो जहां ऐसी सम्पन्नता हो कि सभी के पास ऐशो-आराम के साधन हों।

वह चुपचाप कौवे की कथा सुन रहा था। हालांकि उसके मन में कई प्रश्न थे पर वह शांत बना रहा। कौवा बताए जा रहा था……

  अब समस्या यह थी जीवन कुमार कि इन सभी मुसीबतों से राजा को मुक्ति कैसे मिले…? इन्हीं समस्याओं से निजात पाने के लिए उसने एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जिसमें महज उसके बेहद विश्वसनीय तीन लोग थे। उन्हें इस काम के लिए पूरी छूट और सुविधाएं दी गईं।

  इससे पूर्व उस राजा को किसी ने एक ऐसा सूट भेंट किया था जिसमें उस देश की पच्चास प्रतिशत जनता जितने राजा के नाम बहुत ही बारीक शब्दों में लिखे गए थे। राजा जहां भी उसे पहन कर जाता वाह वाही हो जाती। उस सूट को पहन कर उसने जिस भी देश की यात्रा की, वही उसका दीवाना होने लगा। लेकिन करोड़ों रूपए के उस सूट ने राजा का जीना हराम कर दिया। देश के आमजन की नजरें उस पर थीं। सभी उसे शक से देखने लगे थे। समाचारों में अब केवल वह सूट ही था। हर आदमी की जुबान पर वह चढ़ गया था। परेशान होकर राजा ने उस सूट को नीलामी के लिए एक उद्योगपति को दे दिया। वह जानता था कि राजा के इस कोट की करोड़ों की बोली लगेगी। परन्तु जो तीन लोगों की समिति राजा ने बनाई थी उन्होंने उस सूट की नीलामी को रूकवा दिया था।

  ‘पर क्यों….?’

उसने थोड़ा रूक कर कौवे से पूछा था।

‘बताता हूं, बताता हूं…जल्दी भी क्या है…?’

  वे कई आलीशान रेस्तरां में जा कर मन्त्रणा करते कि इन समस्याओं से कैसे छुटकारा पाया जा सकता है। एक दिन वे एक सात सितारा होटल के आलीशान रेस्तरां में उच्चकोटि की शराब और खाना ले रहे थे। हालांकि उन तीनों की पसन्द एक दूसरे से नहीं मिलती थीं पर सोच में वे एक समान थे। पहला केवल ‘पेनफोल्ड्स एम्पूल वाइन’ पीता था जो पेन की शेप जैसी बॉटल में आती थी और उसकी कीमत एक करोड़ ग्यारह लाख तक थी। दूसरा सदस्य उससे हल्की शराब का शैकीन था जिसका नाम ‘शैटियू डी क्यूम’ था जो 85 लाख से ऊपर कीमत की थी। तीसरा शराब का ज्यादा शौकीन नहीं था पर उसे बीफ के साथ ‘द विंस्टन कॉकटेल’ चाहिए होती जो नौ लाख से ज्यादा की कीमत की थी। अक्सर वह 80 हजार रूपए कीमत वाली ‘वियल बॉन सीकॉर्स ऐल’ बीयर ही पीता था।

  उन में से एक की नजर सामने लगी मक्खीमार मशीन पर चली गई। वह उठा और कई पल मशीन के पास खड़ा रहा। उसने होटल के मालिक से मशीन के निर्माता के बारे में पूछा और आदेश दिए कि उसे होटल में बुलाया जाए। आदेशों का तत्काल पालन हुआ। मशीन निर्माता कुछ पलों में वहां पहुंच गया। वह जानता था कि उसकी बैठक आज देश के तीन उच्च राजनेताओं से होने वाली है जो राजा के विशेष दूत हैं। उसने विनम्रता से अपने को उनके सामने प्रस्तुत कर दिया।

  बातचीत शुरू हुई। यह अति गोपनीय मीटिंग जिस कमरे में हो रही थी वहां किसी को भी आने की अनुमति नहीं थी।

  ‘तो यह मक्खीमार मशीन आपने बनाई है ?’ पहले सदस्य ने पूछा।

‘जी सर! यह हमारी कम्पनी की ही क्रिएशन है। हमने देश के हर छोटे बड़े रेस्तरां और होटलों के लिए यह मशीन सप्लाई की है। इसमें अब अत्याधुनिक किस्म के कई फीचर शामिल कर दिए गए हैं।’

‘वैरी गुड, वैरी गुड।’

  दूसरे ने शराब की घूंट पीते हुए कम्पनी मालिक की पीठ थपथपाई।

  ‘तो इसमें मच्छर और मक्खियां ही मरती होंगी ?’

तीसरे ने बीफ के टुकड़े को मुंह में ठूंसते हुए पूछा।

  ‘जी सर। पर इस मशीन की यह खासियत है कि यह दो फुट की दूरी पर से मक्खी और मच्छर को अपनी ओर घसीट कर मार देती है। साथ ही छिपकली जैसी कई चीजों को तो इतनी फुर्ती से निगलती है कि सांप भी देखता रह जाए।’

   ‘एक्सेलैंट जाब डन।’

उसने सोने की डिबिया से दुनिया की सबसे महंगी सिगरेट डनहिल ब्रांड निकाली और उसी डिबिया के किनारे लगे एक माइक्रो लाइटर से सुलगा दिया। उसके कश लेते हुए जब कई रंगों के धुंए निकलने लगे तो बाकी बैठे लोग थोड़ा हैरत में पड़ गए। उसने एक-एक सिगरेट सभी को थमा दी थी।

  पहला सदस्य उठकर मशीन के पास चला गया। उसने कुछ दूरी पर अपना हाथ रखा तो उसे अजीब सी झनझनाहट महसूस हुई। उसने हाथ थोड़ा आगे किया तो ऐसा लगा कि उसके हाथ को कोई अदृश्य तरंगें चुम्बक की तरह अपनी ओर खींच रही हों। वह एकाएक हंस दिया। कई पल की उस हंसी में दोनों सदस्य और मशीन निर्माता भी शामिल हो गए। काफी देर ठहाके लगते रहे। लेकिन उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि पहला सदस्य हंस क्यों रहा है। इस हंसी के बीच सभी ने खूब शराब पी।

  लड़खड़ाती आवाज में पहला सदस्य मशीन मालिक की ओर झुका,

  ‘एक्सेलैंट। मक्खीमार यानि फ्लाई किल्लर।’

  ‘सुनो’।

  उसने मशीन निर्माता को पास खींचते हुए कहा,

‘देखो हम तुम्हें मुंह मांगी कीमत देंगे। पर इस मशीन को ‘फलाई किल्लर’ से ‘वेस्ट किल्लर’ में विकसित करना होगा।’

‘वेस्ट किल्लर’…?

‘मतलब बेकार की चीजों का खात्मा।’

‘पर सर वो तो पहले से हमारी कम्पनी बना रही है। उन्हें कूड़ा संयन्त्र कहते हैं। जिसमें देश का कूड़ा खपाया और जलाया जाता है।’

‘वही तो, वही तो। हम भी देश के बेकार हो रहे ‘जीवित कूड़े’ को खपाना चाहते हैं और फ्लाई किल्लर से बेहतर विकल्प क्या हो सकता है ?’

एक पल के लिए भीतर सन्नाटा छा गया।

दोनों सदस्यों के साथ मशीन मालिक की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

चुप्पी देख कर पहले सदस्य ने फिर जोर के ठहाके लगाए। उसके साथ वे तीनों भी ठहाकों में लीन हो गए।

थोड़ी देर बाद पहले सदस्य ने समझाना शुरू किया,

‘ध्यान से सुनो। ये जो फ्लाई किल्लर मशीन है, आपको इसकी तकनीक बदलनी होगी। इसे आपको अत्याधुनिक रूप से विकसित करके जी-11 यानि ग्यारवीं जनरेशन तक पहुंचाना होगा। हम वैसे भी अब 4-जी से धीरे-धीरे वहीं पहुंच रहे हैं। यह एक मानव आकार में परिवर्तित होनी चाहिए। जिसमें विशेष प्रकाश की ट्यूबें लगाई जाएंगी। उस मशीन में अत्याधुनिक कम्प्यूटर फिट होंगे जो तकरीबन सौ फीट से किसी भी अवांछित को अपनी गिरफ्त में लेकर पहले अदृश्य करेंगे और बाद में मक्खी की तरह चूस लेंगे, लेकिन उसमें कोई आवाज नहीं आनी चाहिए। वह साइलैंण्ट किल्लर की तरह काम करेगी।’

  ‘क्यों नहीं सर, बिल्कुल हम बना देंगे। मेरे पास दुनिया के बेहतरीन साफ्टवेयर इंजीनियर हैं। पर एक बात समझ नहीं आई कि वे अवांछित हैं कौन।’

  अब दोनों सदस्यों को पहले सदस्य की सोच समझ आ रही थी। तीनों मंद मंद मुस्करा दिए। पहले सदस्य ने ही कहना शुरू किया,

‘अवांछित’ ?

सभी हंस दिए।

मशीन मालिक अभी भी खामोश था और विस्फारित आंखों से उन तीनों को देख रहा था।

  ‘अरे, अरे इतना मत सोचो। आपकी कम्पनी रातों-रात देश की सबसे बड़ी कम्पनी बन जाएगी। अरबों-खरबों की मशीनें बिकेंगी। मान लो, आपके मजदूर किसी बात को लेकर हड़ताल कर दें तो पिटोगे न। अब तो वो लाल-लाल झण्डों वाले कुछ भी करने पर उतारू हैं। 80 प्रतिशत किसानों की आबादी वाले देश में 76 फीसदी किसान अपनी खेती छोड़ रहे हैं और जगह-जगह मजदूरी कर रहे हैं। ये कभी भी इस सरकार और देश की शक्ल बदल सकते हैं। फिर उनके साथ ये कलमें, पैन वाले, कैमरे और माइक वाले। उनके पीछे विपक्ष के लोलुप नेता लोग। कर्ज में डूबे हलईए। कौन कौन नहीं नारे लगाने आ जाएगा।’

  ‘सर वो तो है। बहुत मुश्किल पैदा कर देते हैं ये लोग।’

‘यही तो। यही तो। समझो। जब ये लोग ही नहीं रहेंगे, न बजेगा बांस न बजेगी बांसुरी। कहावत पुरानी है पर सटीक बैठती है।’

‘जी…जी…जी।’

  ‘पर सर इनका क्या करेंगे। कैसे करेंगे ?’

‘फ्लाई किल्लर भई, उसी में जा मरेंगे सब।’

कमरा ठहाकों से गूंज गया। इस बार मशीन मालिक इतने जोर से हंसा कि तीनों सदस्यों की हंसी उसके ठहाकों में दब गई।

‘मान गए सर आपका दिमाग। कम्प्यूटर से कहीं ज्यादा। मानो किसी दूसरी दुनिया से लाया गया हो।’

‘वही तो, वही तो। हमारे राजा भी ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं जहां एक वर्ग हो। एक रंग हो। एक सोच हो। एक सरकार हो। एक राजा हो। एक धर्म हो। एक ड्रैस कोड हो। एक ही सोच की एलीट सोसाइटी हो। किसानों, मजदूरों का काम केवल रोबोट करें। इन रोज-रोज के झमेलों से तंग आ गए हैं हम। हम भी खुश और विपक्ष भी। सभी अपने-अपने स्वार्थों के लिए तो लड़ते हैं भाई। शुरूआत समाज सुधार से, फिर समाज जाए भाड़ में, अपना सुधार शुरू। आसानी से नहीं मिले तो खून-खराबा, दंगे फसाद, साजिशें, धर्म के नाम पर मारपीट, जाति के नाम पर वोट। ये सब अब पिछड़ों के मुद्दे रह गए हैं। हम एक सम्पन्न दुनिया बनाना चाहते हैं और वह तभी बनेगी भाई जब इन वंचितों का कुछ होगा।’

मशीन मालिक थोड़ी देर चुप रहा। फिर कहने लगा,

‘वह तो ठीक है सर, पर उसकी जद में तो कोई भी आ सकता है।’

‘भई हम आपको इतनी राशि एक मशीन के लिए क्यों दे रहे हैं। बोलो एक करोड़, दो करोड़, पांच करोड़, कितनी राशि चाहिए आपको। तकनीक ऐसी होनी चाहिए ताकि ये वांछित ही उस मशीन के शिकार हों। चुन-चुन कर।’

‘एक बात है सर। हो जाएगा। हो जाएगा। पर आपको उस राजा का जो कोट है उसे हमें देना होगा।’

‘पर किस लिए ?’

‘आप नहीं जानते सर, उसमें राजा के उतने ही नाम हैं जो उनके अपने हैं, उनकी सोच के हैं और सम्पन्नता में हैं। अमीर हैं। उद्यौगपति हैं। यानी बुर्जुवा वर्ग। समझ रहे हैं न आप। इस देश की आधी आबादी जितने।’

‘पर आपको कैसे पता ?’

‘क्या सर, इतना भी नहीं जानते ? उसे हमने अपने राजा की विशुद्ध साम्राज्यवादी सोच के दृष्टिगत ही निर्मित किया था। वह पूरी तरह आधुनिक तकनीक के उच्चस्तरीय कम्प्यूटर से बना है। उसमें राजा के नाम विशेष चिप से गुने गए हैं। और हम उन्हीं चिपों को अपनी सोच के लोगों में वितरित कर देंगे। जिनके पास वह चिप होगी, वे उस मशीन की जद में आ ही नहीं पाएंगे।’

  ‘पर उन्हें अपनी सोच के लोगों में बांटेंगे कैसे ?’

  ‘वह हमारी कम्पनी पर छोड़िए सर। हमारे पास एलियन से ज्यादा दिमाग के इंजीनियर हैं। हम ऐसी तकनीक विकसित करेंगे जैसे एक ही बार एक ई-मेल या संदेश लाखों लोगों को जाता है। उसी तरह हम एक विशेष तकनीक से अपनी सोच के लोगों में वह चिप अति गोपनीयता से फिट कर दें। यानी हमारे कम्प्यूटर यह काम करेंगे। काम भी उनका, चयन भी उनका।

ऐसा कहते ही फिर कमरा ठहाकों से गूंज गया।

बहुत देर बाद जीवन कुमार ने अचम्भित होकर कौवे से पूछा, ‘हमारे पास भी तो चिप नहीं है ?’

  ‘अब तुम इस दुनिया के नहीं हो न। आत्मा हो। जो अभी मरी नहीं। सुप्त अवस्था में है। तुम जानते हो, मैं भी आत्मा हूं। कोई भी आत्मा मेरे बिना अधूरी है। यानी उसकी गति नहीं है मेरे सिवा। तुमने शास्त्र तो पढ़े होंगे। और हम तो किसी को दिखते भी नहीं न।‘

  ‘वह तो है।’

कौवा आगे बताता चला गया।

‘…..और इस तरह लाखों फ्लाई किल्लर मशीनें जगह-जगह लगा दी गईं। और आहिस्ता-आहिस्ता बिना चिप के लोग उसमें मक्खियों की तरह गुम होते चले गए। बहुत कम समय में उन वंचितों का खात्मा हो गया। राजा के लिए कोई समस्या नहीं रही। मनचाही योजनाएं बनी। हर तरफ एक सामंती स्वामित्व तथा प्रत्यक्ष उत्पादकों के शोषण की ऐसी सामंती प्रभुओं वाली संरचना होने लगी कि सब कुछ राजा की सोच के मुताबिक होता चला गया। राजा ने अपनी सोच के मुताबिक दुनिया बना ली। कोई विपक्ष नहीं, कोई बोलने वाला नहीं। कोई लिखने वाला नहीं। कोई विरोध करने वाला नहीं। कोई चीखने चिल्लाने वाला नहीं। पर उसके बाद भी….?’

‘उसके बाद क्या….?’

जीवन कुमार ने उत्सुकता से पूछा था।

‘तीन लोग हैं जो पकड़े नहीं गए हैं। उनके पीछे राजा ने अपनी तमाम फौजें, पुलिस और सुरक्षा एजैंसियां लगा रखी हैं। लेकिन वे नहीं मिल रहे, न ही वे उस मशीन की जद में आते हैं।’

‘पर वे कौन लोग हैं।  ?’

कौवा उसके कन्धे से उतर कर एक सुन्दर पेड़ पर बैठ गया। उसने पेड़ के नीचे लगी एक बैंच पर जीवन कुमार को बैठने का इशारा किया। यह कोई ऊंची जगह थी जहां से बहुत दूर-दूर तक देखा जा सकता था।

कौवा जीवन कुमार को उन तीनों के बारे में बताने लगा था।

‘एक के पास हल है, दूसरे के पास कलम और तीसरे के पास हथोड़ा है। राजा को यह समझ नहीं आ रहा है कि इन तीनों के लिए कौन सी मशीन विकसित की जाए जिसकी जद में वे जहां भी हो तुरन्त आ जाएं।’

  कौवा अभी यह बता ही रहा था कि सामने से राजा की फौजें आती दिखी। जीवन कुमार भूल गया कि वे उसे नहीं देख सकते। वह आतंकित हो गया। भागा, जितना भी भाग सकता था और एक अंधेरी खाई में गिर गया। होश आया तो अपने को बदहवास सा चिनार के नीचे बैंच पर बैठे पाया। उसे दायीं तरफ के कन्धे में कुछ खिंचाव सा महसूस हुआ। गर्दन घुमाई तो देखा कि  बगल में लटके बैग के भीतर एक गाय मुंह घुसाए कुछ चबा रही है। उसने जैसे ही अपने बैग को छुड़ाया, गाय के मुंह में वही पुराने नोटों की गठ्ठी थी जो अब आधी-अधूरी झाक के बीच दिख रही थी। वह बौखलाया सा जैसे ही उसके मुंह से उन नोटों को छुड़ाने उठा सामने वही विशेष पट्टे वाले लोग खड़े थे।

  ‘क्यों अंकल! आज दूसरा धन्धा शुरू। गाय को बेचने ले जा रहे हो…..?’

बोलने वाला वही व्यक्ति था, जिसने उस मासूम लड़की के चक्कर में उसका कालर पकड़ लिया था।

यह सुनकर उसका मुंह खुले का खुला रह गया। तभी अचानक उसको याद आई कि वह जिस दुनिया से लौटकर आया है वहां का राजा अभी तक भी उन तीन लोगों को पकड़ने में असमर्थ है। उन परिदृश्यों को याद करते हुए सिर उठा कर उसने चिनार के पेड़ की तरफ देखा जिस पर  चैत्र-बैशाख अपने शाही अंदाज से बैठ रहे थे। …..और इसी के साथ वहां से निकलते हुए इतनी जोर से ठहाका लगाया कि पास के पेड़ पर बैठे पक्षी भी उड़ गए।

वे विशेष पट्टे वाले लोग किंकर्तव्यविमूढ़ से दूर तक जीवन कुमार को जाते देखते रहे।

 

संपर्कः  ओम भवन, मोरले बैंक इस्टेट, निगम विहार, शिमला-171002  मो. – 98165 66611

एस.आर. हरनोट

एस.आर. हरनोट

जन्म : 22 जनवरी 1955, चनावग, शिमला (हिमाचल प्रदेश) मुख्य कृतियाँ उपन्यास : हिडिंब कहानी संग्रह : पंजा, आकाशबेल, पीठ पर पहाड़, दारोश तथा अन्य कहानियाँ, जीनकाठी तथा अन्य कहानियाँ, मिट्टी के लोग सम्मान हिमाचल राज्‍य अकादमी पुरस्‍कार, साहित्‍यकार पुरस्‍कार (हिन्दी अकादमी दिल्ली), अखिल भारतीय भारतेंदु हरिश्चंद्र एवार्ड, हिमाचल गौरव सम्मान, हिमाचल केसरी एवार्ड, जे.सी. जोशी शब्दसाधक जनप्रिय लेखक सम्मान, इंदु शर्मा अंतरराष्ट्रीय कथा सम्मान

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