भीतरला हो साफ मणस का चाहे रंग बेशक तै काला हो – विक्रम राही

भीतरला हो साफ मणस का चाहे रंग बेशक तै काला हो
हो रंग भी काला दिल भी काला उसका के उपराला हो

भूरा हो जै देखण मैं नर जाणू चांद उजाला देरया हो
बोलण तै पहलां लागै कदे खास पर्सनल्टी लेरया हो
भेद बोलते खुल्ल ग्या जाणू फूलां के माह नाला हो

ब्लैक ब्यूटी समझकै खुद नै घणा तु भी इतराईए ना
माड़ी सोच माड़ा माणस इस महफिल मै चाहिए ना
सोच बदलकै आ ज्याइए जब तु माणस की ढालां हो

कोए काला माणस बहू छोरी नै जै काली कहकै हांसै
शब्दजाल भी इसा बुणकै राखै वो हर किसे नै फांसै
देर सबेरी गल उसके तो फेर जूतया आली माला हो

रंग नस्ल और जात धर्म का बोदा माणस बिचार करै
हो सुंदर सोच माणसा आली हर माणस सत्कार करै
विक्रम राही सै सही लड़ाई जै कोए पुग्गण आला हो

विक्रम राही

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