सासड़ होल़ी खेल्लण जाऊंगी- मंगत राम शास्त्री

मंगतराम शास्त्री
सासड़ होल़ी खेल्लण जाऊंगी, बेशक बदकार खड़े हों।
री मनै पकड़ना चावैंगे, जाणूं सूं जाल़ बिछावैंगे
ना उनकै काबू आऊंगी, कितनेए हुशियार खड़े हों।
हेरी इसा कोरड़ा मारूंगी, देही तै चमड़ी तारूंगी
मैं कती नहीं घबराऊंगी, चाहे थानेदार खड़े हों।
री वें बात करैंगे मन की, मरोड़ करैंगे धन की
री मैं आप कमा कै खाऊंगी, चाहे साहूकार खड़े हों।
चाहे बोल्लो वें बोल जहरीले, पर मैं गाऊंगी गीत सुरील्ले
री दिल चोरी करकै ल्याऊंगी, चहे चौकीदार खड़े हों।
हेरी सासड़ ना घबरावै, तनै नहीं उलाहणा आवै
मैं प्रीत के रंग लगाऊंगी, बेशक तड़ीपार खड़े हों।
री मैं नहीं एकली जाय री, खड़तल मेरी गेल खड़्या री
री मैं सबनै धूल़ चटाऊंगी, चाहे डार की डार खड़े हों।

मंगत राम शास्त्री

जिला जीन्द के टाडरथ गांव में सन् 1963 में जन्म। शास्त्री, हिन्दी तथा संस्कृत में स्नातकोतर। साक्षरता अभियान में सक्रिय हिस्सेदारी तथा समाज-सुधार के कार्यों में रुचि। अध्यापक समाज पत्रिका का संपादन। कहानी, व्यंग्य, गीत विधा में निरन्तर लेखन तथा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। बोली अपणी बात नामक हरियाणवी रागनी-संग्रह प्रकाशित।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *