छाती, तू और मैं – निकिता आजाद

nikनिकिता आजाद (युनिवर्सिटी ऑफ आक्सफोर्ड) में पढ़ी हैं। उन्होंने  ‘हैपी टु ब्लीड’ लिखे सैनिटरी नैपकिन के साथ अपनी तसवीर पोस्ट करते हुए लोगों को पितृसत्तात्मक रवैए के खिलाफ खड़े होने की अपील की थी और सोशल मीडिया पर #happytobleed मुहिम चलाई थी।
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तू हमेशा कहता रहा
ये बहुत छोटी हैं
बहुत ढीली हैं
बहुत चपटी हैं
और मेरी छातियां तेरी कसौटी पर कभी खरी नहीं उतरी।
तूने बहुत बार मेरा दिल रखने के लिए
मेरी आंखों की झूठी तारीफें की
और मैंने भी उनको
झूठी मुस्कुराहट के साथ स्वीकार कर लिया
क्योंकि मैं जानती हूं
कि एक दिन आएगा
जब यह गर्व से नाचेंगी, लांघेंगी और तुम्हारी तमाम कसौटियों का मजाक उड़ाएंगी।
जब यह छोटी और कुरूप छातियां तुझे और तेरे स्पर्श को ठुकरा देंगी।
मेरी छातियां सदियों से ऋतुओं के अनुसार अपने मकान बदलती रही हैं
पुश अप, अंडरवायर जैसे दर्द झेल कर तुम्हारे जैसों की आंखों को सेक रही थी
पर इन्हें कहीं अपना घर नहीं बसाया।
इस लिए जब तू मिला
इनको पहली बार मुहब्बत का एहसास हुआ।
ऐसा लगा जैसे भटकते हुए पंछी को घोंसला मिल गया हो।
लेकिन जल्दी ही तेरे आदर्श जिस्म की कसौटी के सामने
यह चपटी, ढीली और छोटी रह गईं।
उस दिन इनको समाज के चरित्र की “ऊंचाई” का पता लगा।
सच तो यह है कि मेरी छातियां
उस धधकती आग से बनी हैं
जिस को मेरी आत्मा ही संभाल सकती है।
यह उन पीढ़ियों की यादों से बनी हैं
जिस में इन्होंने जान फूंकी है
यह उस संघर्ष से बनी हैं
जो इन्होंने समाज व अपने ही घर में घूमती हवस भरी नजरों के साथ किया है।
हां मेरी छाती ढीली हैं, छोटी हैं, चपटी हैं।
लेकिन यह चपटी, ढीली और छोटी होते हुए भी तेरी सोच और औकात से कहीं ज्यादा बड़ी हैं।


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